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ठगी की उल्टी कथा

एक कथा-

एक ब्राम्हण को बछिया दान में मिली। जिसे लेकर दूसरे गावं वह अपने घर को चला। रास्ते में जंगल पड़ता था। तीन ठगों की नजर उस पर पड़ी। उन्होंने बछिया को बकरी बता कर ब्राम्हण को ठग लिया।

हमारी कथा में बछिया बैल है। ब्राम्हण कोई नहीं, सभी ठग, साहूकार और सरकार है। यह ठगी की उल्टी कथा है।

उल्टी कथा-

एक साहूकार के दरवाजे पर एक बैल बंधा था। ठगों की नजर उस पर पड़ी। वे जानते थे कि साहूकारी ठगी का ही आदर्श रूप है, इसलिये साहूकार से बैल की ठगी तो हो नहीं पायेगी, लेकिन बैल से ठगी हो सकती है।

तीनों ठगों ने एक योजना बनायी और लग गये।

पहला ठग साहूकार के यहां गया,

‘‘आपके दरवाजे पर बंधे हाथी की शोभा तो देखते ही बनती है। गजराज है, गजराज।‘‘

‘‘इस मूर्ख को हाथी कहां दिख रहा है?‘‘ साहूकार ने सोचा और बताया भी कि, ‘‘यह बैल है।‘‘ मगर, ठग नहीं माना।

दूसरे दिन, दूसरे ठग ने भी बैल को गजराज बताया। साहूकार सोच में पड़ गया- ‘‘क्या बैल को गजराज बताया जा सकता है?‘‘

तीसरे दिन, तीसरे ठग ने बैल की पूजा-अर्चना गजराज की तरह की। उसके साथ आये ठगों की टोली ने गजराज चालीसा का पाठ किया। ढेरों चढ़ावा चढ़ाये।

साहूकार को विश्वास हो गया, कि यदि इतने लोग बैल को हाथी समझ रहे हैं, तो बैल को हाथी बताया जा सकता है, उसे गजराज बनाया जा सकता है। साहूकार सरकार बन गया है।

बैल को हाथी और हाथी को गजराज बताने के फायदे सरकार की समझ में भी आ गये।

पोस्टर, बैनर, कट-आउट चारो ओर लग गये। मीड़िया बैल को हाथी बताने लगी। मरियल बैल हाथी बन गया।

अब प्रजा का खुराक हाथी खा रहा है और हाथी का खुराक ठग, साहूकार और सरकार खा रहे हैं।

बैल हाथी है, और हाथी कहीं नहीं है।

-आलोकवर्द्धन

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