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भारत को अपनी नीतियां साफ करनी होंगी

कारोबार में सौदेबाजी तो होती ही है। ऐसे ही रिश्तों के नये दौर की शुरूआत हो गयी है, जिसमें युद्ध और युद्ध की धमकी भी शामिल है।

सिक्कीम-दोकलम पठार को लेकर भारत और चीन के बीच का तनाव बढ़ गया है। कूटनीतिक समाधान के अलावा और कोई रास्ता नहीं है, लेकिन कूटनीतिक समाधान की कड़ियां रोज टूट रही हैं। भारत अपने रणनीति पर टिके रहना चाहता है, और चीन का रवैया अड़ियल होता जा रहा है। जी-20 देशों के सम्मेलन में मोदी-शि जिनपिंग के द्विपक्षीय वार्ता की स्वाभाविक संभावनायें खत्म हो चुकी हैं। माहौल धारदार हुआ है।

क्या भारत-चीन के रिश्तों में वार्ता की कोई जगह नहीं है?

क्या चीन वास्तव में युद्ध चाहता है, या भारत भुट्टान को लेकर अपने महत्व को परख रहा है?

यह तो तय है, कि भारत की मोदी सरकार रूस से ज्यादा अमेरिका को, चीन से ज्यादा जापान, दक्षिण कोरिया, वियतनाम को महत्व दे रही है, जिनकी चीन से असहमति और विवाद है। अंतर्राष्ट्रीय मंच पर यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और अब इस्त्राइल से सहयोग बढ़ा रहा है। इस्त्राइल की तरह ही अमेरिकी दबाव में भारत ने, चीन की महत्वाकांक्षी योजना ‘वन बेल्ट वन रोड‘ से न सिर्फ दूरी बना कर रखा है, बल्कि उसका विरोध भी कर रहा है। जबकि भारत के पास इस परियोजना में शामिल होने का खुला प्रस्ताव है।

यदि निर्पेक्ष रूप से देखें तो भारत का यह रूख ब्रिक्स देश, शंघाई सहयोग संगठन का सदस्य देश होने और विश्व की वैकल्पिक व्यवस्था की अवधारणां के विरूद्ध है।

हम मानते हैं, कि सिक्कीम-दोकलम की घटना से पहले तक चीन का रवैया भारत के लिये जितना सकारात्मक था, उससे पहले कभी नहीं रहा। वह अपने व्यावसायिक हितों के लिये दशकों से लम्बित भारत-चीन सीमा विवाद को किस्तों में, वार्ता की मेज पर हल करने का पक्षधर था। शि जिनपिंग ने भारत के सामने सहयोग एवं समर्थन का खुला प्रस्ताव रखा। जिसका एक ही मकसद था कि चीन और भारत मिल कर काम कर सकते हैं। विश्व अर्थव्यवस्था के निर्णायक बन सकते हैं।

लेकिन, 1962 का भूत दोनों के बीच खड़ा रहा। आज भी तल्ख बयानबाजी का मुख्य हिस्सा यही रहा कि ‘‘भारत अब 1962 का भारत नहीं है।‘‘ और ‘‘भारत को 1962 के इतिहास से सबक लेना चाहिये।‘‘ जिसका कोई मतलब नहीं है।

दोनों देशों के बीच विवाद का मतलब क्या है?

भारत की मोदी सरकार जो दिखाती है, वह होता नहीं। उसका मकसद देश की आम जनता पर मोदी की पकड़ को मजबूत करना, राष्ट्रवादी सोच को उग्र करना और देश के आर्थिक विकास को बाजार की पटरी पर डालना है। यह स्थापित करना है कि मोदी के नेतृत्व में भारत सर्वोच्च है। कम-ओ-बेश चीन की मौजूदा सरकार की स्थिति भी यही है। लेकिन भारत सरकार से ज्यादा वास्तविक है। चीन की आर्थिक एवं सामरिक क्षमता का आंकलन अमेरिका भी नहीं कर सका है। उसके इरादों का परिदृश्य बड़ा है। वह भारत ही नहीं अपने पड़ोसी देश -जिनसे असहमति और विवाद है- उनसे अपने सम्बंधों को सहज बनाना चाहता है, उनका सहयोग अपने वैश्विक हितों के लिये चाहता है। चीन वैकल्पिक बाजार व्यवस्था के लिये समानांतर अर्थव्यवस्था, डॉलर के विरूद्ध युआन, द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय निवेश से लेकर अमेरिकी पकड़ से मुक्त परिवहन व्यवस्था के निर्माण में लगा है। रूस के साथ उसने बहुध्रुवी विश्व की अवधारणा को विकसित कर लिया है, जिसमें तीसरी दुनिया के देशों की हिस्सेदारी है। वह खुले तौर पर विश्व अर्थव्यवस्था में अमेरिकी वर्चस्व के खिलाफ है। जो अमेरिकी साम्राज्य के सामरिक एवं राजनीतिक वर्चस्व के लिये चुनौती है।

‘‘भारत के लिये चीन अपनी योजनाओं में परिवर्तन नहीं करेगा।‘‘ हिंद महासागर में अमेरिकी वर्चस्व को बढ़ाने और ‘वन बेल्ट वन रोड़‘ की परियोजना के विरूद्ध भारत का होना, भारत के लिये चीन की नीतियां में परिवर्तन का कारण बन सकता है। भारत को अपनी नीतियां साफ करनी होंगी। अपने पक्ष में गंभीर कूटनीतिक पहल करनी होगी। यह स्वीकार करना होगा कि ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध‘ अमेरिकी खेमें में तो चल सकता है, हर जगह नहीं। अमेरिका जिन नीतियों के तहत हिंद महासागर और चीन सागर में अपनी सामरिक नाकेबंदी मजबूत कर रहा है, उन्हीं नीतियों के तहत चीन ने हिंद महासागर में अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ा दी है।

कारोबार में सौदेबाजी होती है, और यही हो रहा है। युद्ध और युद्ध की धमकी जिसका हिस्सा बन गया है। रूस से अपने समिकरण को बदलना भारत के लिये घातक हो सकता है। पुतिन भारत की सुरक्षा के लिये आज भी जरूरी हैं।

-आलोकवर्द्धन

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