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लकड़बग्घे की हंसी

आपके जी में जो आये कह सकते हैं।

अक्ल यदि आपकी है, तो उसका दीवालियापन भी तो अपका ही होगा। वैसे, अक्ल के दीवालियापन की आज कल वकत बढ़ गयी है। पूछ भी बढ़ी है। गांधी को आप मोदी बना दें, या मोदी को आप गांधी बना दे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

बस एक फोटो सेशन की जरूरत है। चरख कात दें, झाडू-बुहारू कर दें, तस्वीर को सोशल मीडिया पर डाल दें। तस्वीर वायरल हो जायेगी, मीडिया बहंस छेड़ देगी, लकड़बग्घा हंसेगा।

तमाम मुर्दाखोरों के चेहरे खिल जायेंगे।

समझदार चुप रहेगा। मुर्खों के बारे में हम क्या कहे?

हमें अक्ल का ठेका कभी मिला नहीं।

न टेण्डर। न ऑक्सन। डिस्ट्रीब्यूशन भी नहीं मिला।

समझ लें अप कि हम कांग्रेस के जमाने में भी घामड थे मोदी के जमाने में भी घामड हैं। हमारा रूतबा कभी बढ़ा ही नहीं।

सुनते हैं, केंद्र में पर्यटन और संस्कृति मंत्री महेश शर्मा जी हैं, उन्होंने ही सुनाया कि ‘‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी महात्मा गांधी जैसे हैं। वे गांधी युग के विचारों को प्रसारित करने का काम कर रहे हैं।‘‘

किसी नमक सत्याग्रह पर लिखे किताब का विमोचन हो रहा था, लोगों ने तालियां भी बजायी होंगी।

हमारी समझ हाथों से छूट गयी।

गिर कर कांच के बर्तन सा चकनाचूर हुई।

मुर्दाखोर लकड़बग्घे की हंसी मैंने करीब से सुनी।

राष्ट्रपिता शायद ऐसे भी बनते हैं?

– आलोकवर्द्धन

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