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लोकतंत्र यदि भारत है तो कोई खास बात नहीं – 2

प्रतिक्रियावादी ताकतें इस बात को अच्छी तरह जानती हैं, कि अंततः उनका वास्ता जनअसंतोष से ही पड़ेगा। आम जनता से लड़ाई उसे लड़नी होगी। ऐसी सरकारें यह भी जानती हैं, कि आम जनता का भरोसा जब तक बना रहेगा, सरकारें चलती रहेंगी लेकिन जिस दिन भुलावे का भरम टूट जायेगा, वो रेत की दीवारों में बदल जायेंगी। इसलिये पहले वो भुलावे और भरम का खेल खेलती हैं, और फिर दमन का रास्ता अख्तियार कर लेती हैं। मोदी सरकार इस स्थिति को बनाये रखने के लिये आम जनता में विशेष किस्म का राष्ट्रवाद और आक्रामक देशभक्ति फैला रही है। वो सपने दिखा रही है, जिसे वह पूरा नहीं कर सकती। दमन का हथियार उसके पास है। वह इस हथियार का उपयोग बेझिझक करेगी। लोकतंत्र में बन सकने वाले तमाम विकल्पों को खत्म कर रही है। जनवादी और लोकतांत्रिक विकल्पों की अब खैर नहीं है। जिन्हें इस बात की समझ अब तक नहीं आयी है, कि जिस लोकतंत्र की दीवार से टिक कर खड़े हैं वो, उस लोकतंत्र की बुनियादें हिल गयी हैं।

संघ एवं भाजपा ने लोकतंत्र की बुनियादों को हिला कर, उन्हें खड़ा रखने के लिये, बुनियादों में अपनी सोच भर रहे हैं।

मोदी जी खड़े हैं, वित्तीय ताकतों का साईन बोर्ड लिये।

‘भरोसे की सरकार‘ खड़ी है, आम जनता का दिखावटी हित लिये।

मीडिया पेट भर खा कर गुणगान कर रही है।

जिनके पास सोच और जुबान है, उसके लिये राष्ट्रवाद का डंडा है।

देशभक्ति युद्ध का उन्माद है।

सेना का सम्मान देश का सम्मान है। सेना लोकतंत्र की नये साझेदार है। वित्तीय ताकतों की साझेदारी लोकतंत्र का नया सिद्धांत है।

यदि वित्तीय ताकतें सरकार बनाती हैं, और सेना ऐसी सरकारों को बनाये रखने के लिये दमन का हथियार बनती है, तो लोकतंत्र और आम जनता का हित कहां है? लोकतंत्र में लोकतांत्रिक विकल्प कहां है?

भाजपा बड़ी मुश्किल से केंद्र में सरकार बनी है, और अब वह सरकार बने रहना चाहती है।

जिन ताकतों की वजह से वह सरकार बनी है, और राज्यों में भी अपनी सरकार बनाती जा रही है, वह उन ताकतों के प्रति जागरूक है, लगे हाथ वह विपक्ष के विकल्प को खत्म करने पर तुली हुई है। उसके राजनीतिक भ्रष्टाचार, जो आर्थिक ताकतों के साथ मिल कर की गयी है, को और पूर्व की सरकारों के द्वारा किये गये कार्यों को अपन हथियार बना चुकी है।

इस हथियार की समझ बड़ी अच्छी है, हमेशा सरकार के हाथ में रहती है, सरकार की सुनती है।

आप यह जान लें कि पूंजीवादी लोकतंत्र की सरकारें हमेशा से भ्रष्ट रही हैं, और इन्हीं मुद्दों के साथ एकाधिकारवादी ताकतें उभरती हैं। जिनके पास देशभक्ति और उग्र राष्ट्रवाद का हथियार होता है। दो दशक का उन्माद भरने की उनमें ताकत होती है। एक दशक लोकतंत्र के भुलावे का होता है, और दूसरा दशक विरोध और दमन का होता है। जिसके विरूद्ध उन्हीं लोकतांत्रिक ताकतों को उतारा जाता है, जो वैश्विक वित्तीय ताकतों के हितों को पूरा करती हैं। वैश्विक वित्तीय ताकतों ने राजसत्ता से आम जनता के हितों को स्थायी रूप से खारिज कर दिया है। आप चाहें तो मान सकते हैं, कि पूंजीवादी लोकतंत्र में जनसमर्थक सरकारों की सम्भावनायें खत्म हो चुकी हैं। यह अलग बात है, कि समाजवादी ताकतें इस लकीर को आज भी पीट रही हैं। मोदी सरकार अपने पहले दशक के दौर से गुजर रही है। छः दशक की सरकार अब इस देश में संभव नहीं है। लेकिन संघ और भाजपा इससे आगे निकलना चाहते हैं।

उनकी नीतियां कांग्रेस को नेस्तनाबूद करके अपने अस्तित्व को बनाये रखने की है। वह ‘बोफोर्स‘ के जिन्न को बोतल से निकाल रही है, यह सोचे बिना की बोतल से निकला यह जिन्न आने वाले कल में उसके लिये भी घातक है। गंगा की सफाई हो सकती है, लेकिन पूंजीवादी जनतंत्र की सफाई संभव नहीं है, क्योंकि भ्रष्टाचार मुनाफा का जरिया है, और मोदी सरकार भी मुनाफे के अर्थव्यवस्था की उपज है।

(जारी)

-आलोकवर्द्धन

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