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क्या लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों की देखभाल ऐसे की जाती है?

हामिल अंसारी ने कोई गलत बात नहीं की कि ‘‘लोकतंत्र की पहचान अल्पसंख्यकों को मिली सुरक्षा से होती है। देश के मुसलमानों में डर, बेचैनी और असुरक्षा की भावना है।‘‘….. कि ‘‘विपक्ष को यदि सरकार की नीतियों की आलोचना का अधिकार न मिले, तो वह अत्याचार में बदल जाती है।‘‘

यह सच है, मगर मुंडेर पर बैठे कौवों ने चिल्लाना शुरू कर दिया है। इन चिल्लाने वालों में पीएम मोदी भी हैं, जिनकी हर बात को मीडिया ‘नसीहतें‘ बना देती है। मोदी को देश के लिये वरदान समझने वाले उपराष्ट्रपति बने वेंकैया नायडू भी हैं, जिन्हें लगता है, कि संवैधानिक पद पर रहते हुए हामिद अंसारी ने सियासी दुष्प्रचार किया। भाजपा, संघ और वह आईटी सेल भी है, जो शोर मचाने में माहिर है।

जरा सोच कर बतायें

क्या अल्पसंख्यक समुदाय डरा हुआ नहीं?

क्या उसमें बेचैनी नहीं है?

क्या वह असुरक्षा की भावना से पीड़ित नहीं है?

चिल्लाने और गाने वालों आप चाहे जो भी कहें, आपके पीछे खड़ी वित्तीय ताकतें भी यह मानती हैं, कि ‘‘ऐसा है। मोदी सरकार ने आर्थिक सुधारों से ज्यादा संघ के हिंदूवादी सोच को बढ़ाया है।‘‘ जहां भी भाजपा की सरकार है, वहां डर, बेचैनी और असुरक्षा की भावना है। गोरक्षकों को किसी को भी पीट कर मारने की छूट मिली है। मुसलमान, दलित और आदिवासी जिसके शिकार है।

अल्पसंख्यक मुसलमानों की हालत तो अजीब है,

कभी उसको ‘वंदे मातरम्‘ बोलना है, तो कभी ‘भारत माता की जय‘।

कभी योग करना है, तो कभी राम जन्मभूमि के लिये ईंट पहुंचवाना है, तो कभी राम मंदिर के निर्माण कराने की घोषणां करनी है। 15 अगस्त को मदरसों में राष्ट्र ध्वज फहराना है। विडियो रिकॉर्डिग करनी है।

अपनी देशभक्ति को प्रमाणित करने के लिये सरकारें जिसे भी आतंकवादी करार दें, उससे अपना पीछा छुड़ाना है, यह सवाल किये बिना कि कोई आतंकवादी है या नहीं? यही हाल देशद्रोह का है। न्यायालय चाहे, जो भी कहे किसी को भी देशद्रोही तो मीडिया ही बना दी है। और मीडिया अभी किसके कब्जे में हैं, किसका गुणगान कर रही है? यह बताने की जरूरत नहीं है। आम जनता की खबरों के लिये उसकी नजरों में सिर्फ हिकारत है। मोदी और उनकी सरकार की नीतियों की आलोचन करना देशद्रोह है। देशभक्ति और देशद्रोह की जैसी परिभाषा आज है, वैसी इस देश में कभी नहीं रही।

विपक्ष दूध का धुला नहीं है, लेकिन कहीं से यह बात जंचती नहीं है कि ‘कांग्रेस मुक्त देश‘ भाजपा सरकार का राजनीतिक एजेण्डा है।

क्या अघोषित रूप से इस एजेण्डे में, भाजपा एवं उसके सहयोगी दलों के अलावा जो भी राजनीतिक दल हैं, उन्हें खत्म करने -विपक्ष को समाप्त करने- का इरादा नहीं है?

अब आप सोच कर देखिये कि यदि ऐसा होता है, तो भारतीय लोकतंत्र में क्या बचता है?

विपक्ष विहीन मोदी की सरकार

सरकार समर्थक दलों का समूह

अल्पसंख्यक विहीन हिंदूओं का समाज

और निजी कम्पनियों को मुनाफा पहुंचाने वाली ऐसी जनविरोधी सरकार जो अपने को जनसमर्थक सरकार समझती है। जो न मजदूरों की बात सुनती है, न किसानों की बात सुनती है, ना ही आम जनता के हितों का खयाल रखती है। जो देश की प्राकृतिक सम्पदा, जो देश की जन एवं बौद्धिक सम्पदा और देश के बाजार को निजी कम्पनियों को सौंपती जा रही है। सभी संवैधानिक पदों पर संघ और भाजपा के घोर दक्षिणपंथी लोगों का कब्जा है, जो देश के आज, आनेवाले कल को ही नहीं इतिहास को भी अपने सांचे में ढालने पर आमादा हैं।

क्या लोकतंत्र में अल्पसंख्यकों की देख-भाल ऐसे की जाती है? क्या देश के आज और उसके इतिहास को ऐसे दुरूस्त किया जाता है?

आज अल्पसंख्यक समुदाय ही नहीं, मुगल काल का हर स्मारक असुरक्षित है।

-आलोकवर्द्धन

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