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स्थगित लोकतंत्र

‘‘भारतीय राजनीति में क्या मोदी का कोई विकल्प है?‘‘

यह सवाल विपक्ष की ओर उछाला जाता है, और कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी को नरेंद्र मोदी के सामने खड़ा किया जाता है, यह प्रमाणित करने के लिये कि वे कमजोर हैं। कांग्रेस की वापसी नहीं हो सकती। कांग्रेस के बिना विपक्ष की कोई औकात नहीं है। नरेंद्र मोदी और भाजपा का कोई विकल्प नहीं है।

मगर, यह सवाल उस सोच की समझ है, जिसमें नेता के पीछे देश, सरकार और राजनीतिक दल को खड़ा किया जाता है। एक राष्ट्र, एक दल और एक नेता। मोदी को एक नेता के रूप में उभारा जा चुका है। भाजपा एक दल बनने की नीति से संचालित हो रही है, और एक राष्ट्र को हिंदूवाद का सहारा मिल चुका है। भाजपा और मोदी हिंदू राष्ट्रवादी संघ से संचालित हो रहे हैं। संघ का कब्जा सभी महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों -प्रधानमंत्री लोकसभा अध्यक्ष, उप राष्ट्रपति और राष्ट्रपति- पर हो चुका है। सभी केंद्रिय विश्व विद्यालयों में भी ऐसी नियुक्तियां होती जा रही हैं। तमाम महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर भी नजर है। राज्यों में भाजपा की सरकारें बनती जा रही हैं, और जहां गैर भाजपा सरकारें हैं, वहां राजनीतिक अस्थिरता के साथ जोड़-तोड़ की सरकारें बनायी जा रही हैं। बिहार में जो हुआ हमारे सामने है। नितीश कुमार भाजपा के कुएं में कूद चुके हैं। राजसत्ता में बने रहने के लिये भाजपा की कोई हद नहीं है।

इसलिये, मोदी को हल्के में लेना या यह मान लेना कि, विपक्ष के ढ़ीले-ढ़ाले ‘महागठबंधन‘ से 2019 में आम चुनाव से, इन ताकतों को रोका जा सकता है, मूलतः गलत है। मोदी की वास्तविक ताकत संघ का हिंदू राष्ट्रवाद और उन वित्तीय ताकतों का समर्थन है, जिन्होंने भारत में वैधानिक तख्तापलट किया है। जिनके लिये भारतीय राजनीति में मोदी से ज्यादा विश्वसनिय अभी कोई नहीं है। अपने अब तक के कार्यकाल में मोदी ने भारतीय अर्थव्यवस्था में उन वैश्विक वित्तीय ताकतों को बढ़त दे दी है, जिनका मकसद भारत की अर्थव्यवस्था को अपने कब्जे में लेना है। राजनीतिक रूप से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने हिंदूवादी सोच के विस्तार से आश्वस्त है। मीडिया मोदी के कब्जे में है।

भारतीय राजनीति में ‘एक राष्ट्र, एक दल और एक नेता‘‘ की सोच ने जगह बना ली है। जिन वैश्विक वित्तीय ताकतों ने अपने हितों के लिये पूंजीवादी लोकतंत्र को बढ़ावा दिया था, उन्हीं वैश्विक वित्तीय ताकतों ने अपने हितों के लिये उसे मारना शुरू कर दिया है। यूरोप और अमेरिकी साम्राज्यवाद को उस समय भी उन्होंने जरिया बनाया था, आज भी वह जरिया है। सारी दुनिया में पूंजीवादी लोकतंत्र की ओट में फासीवाद की वापसी हो चुकी है। आप चाहें तो मान सकते हैं, कि हिटलर एक सोच है। समाजवाद भले ही आज भी उसके लिये चुनौती है, मगर सोवियत संघ आौर समाजवादी खेमा नहीं है, उसने दुनिया फतह कर ली है। दुनिया पर निजी वित्तीय पूंजी की तानाशाही है।

इसलिये भारत के संदर्भ में जो यह सोचते हैं, कि मोदी सरकार ‘चुनाव मार्केटिंग‘ से आयी अस्थायी व्यवस्था है, उन्हें अपनी सोच दुरूस्त करनी चाहिये। 1975 के आंतरिक आपातकाल के बाद 1977 का आम चुनाव नहीं होना है। श्रीमती इंदिरा गांधी ने उस समय लोकतंत्र को स्थगित किया था, और 1977 में लोकतंत्र की बहाली भी उन्होंने ही की थी। जिसे आप भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय कह सकते हैं, लेकिन अब वास्ता काली किताब से पड़ गया है। मोदी उन ताकतों का प्रतीक हैं, जो अपने अलावा किसी की परवाह नहीं करते। भारत में मरता हुआ लोकतंत्र अस्थायी नहीं स्थायी नीति है। लोकतंत्र के जरिये लोकतंत्र की हत्या है। यह ‘‘इण्डिया इज इंदिरा, इंदिरा इज इण्डिया‘‘ के स्लोगन से आगे की सोच है।

भारतीय राजनीति में मोदी का कोई विकल्प नहीं है, कहने वाले अच्छी तरह जानते हैं, कि क्या कह रहे हैं, और क्या चाहते हैं। लोकतंत्र की वापसी का सवाल अभी खड़ा नहीं हुआ है, क्योंकि अभी यह खुलेआम नहीं हुआ है, कि लोकतंत्र स्थगित हो गया है। अभी तो आजादी के उस जश्न की शुरूआत हुई है, जिसका दर्द झेलना बाकी है। इसे झेलने से आप बच नहीं सकते। बोतल से जिन्न निकल चुका है।

-आलोकवर्द्धन

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