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बीएचयू – मुद्दे छोटे सवाल बड़े हैं

काशी हिंदू विश्व विद्यालय -बीएचयू- का मुख्य द्वार खुलता है और बंद हो जाता है। लोग जानना चाहते हैं- यह हो क्या रहा है?

स्थितियां सामान्य नहीं हैं। पुलिस, पीएसी की छावनियां स्थायी हो रही हैं।

मुद्दे छोटे और सवाल बड़े हैं।

छात्राओं के साथ ‘छेडखानियां‘ की गयीं।

‘छेडखानी‘ सही शब्द नहीं है। जिन्होंने कला भवन के सामने वारदातें की उन्होंने तमाम हदें पार की। उन्हें बीएचयू परिसर में संगठित गिरोह का गुर्रगा मानना चाहिये। जो मानते हैं, कि ‘‘कोई उनका कुछ नहीं बिगाड सकता।‘‘

बीएचयू प्रशासन यह प्रमाणित भी कर रही है, इसलिये समझा जा सकता है, कि ऐसे छात्र, लड़के या गुर्गे कौन हैं?

छात्राओं ने अपनी सुरक्षा की मांग की। जिसे उपकुलपति ने ऐसे उलझा दिया कि बीएचयू अपने होने के सबसे शर्मनाक दौर में पहुंच गया। खाखी पैंट और काली टोपी के बीच की व्यवस्था लागू कर दी गयी।

तमाम मसले के बीच का सच यही है, कि सरकार शिक्षा, बौद्धिक सम्पदा और केन्द्रीय विश्व विद्यालयों पर अपनी पकड़ मजबूत कर रही है। जवाहरलाल नेहरू विश्व विद्यालय -जेएनयू-, हैदराबाद यूनिवरसिटी से लेकर बीएचयू की वारदात का मूल यही है। सरकार अब बीएचयू में सुरक्षा के नाम पर खुफिया कैमरे और खुफिया तंत्र का जाल बिछा देगी। विश्व विद्यालय परिसर की स्वायत्तता और स्वतंत्रता की गिरेबां उसके हाथ में होगी। संघर्ष, विरोध प्रदर्शन, धरना और सरकार की जन एवं शिक्षा विरोधी नीतियों के खिलाफ आवाजें दबा दी जायेंगी।

हमारी सुरक्षा की मांग, हमारी निगरानी में बदल जायेगी।

सरकार इस बात का प्रचार करेगी की ‘‘उसे ‘बेटियों‘ की फिक्र है।‘‘ ये वही बेटियां हैं, जिनके साथ बलात्कार होता है, ये वही बेटियां हैं, जिनके साथ छेड़-छाड़ बद्सलूकियां होती हैं, ये वही बेटियां हैं, जिन्हें बाजार में वस्तु एवं सामान की तरह उतारा जाता है, ये वही बेटियां हैं जिन्हें महंगी शिक्षा के जाल में फंसाया जा रहा है, और ये वही बेटियां हैं, जिनकी बौद्धिक क्षमता को बौद्धिक सम्पदा के नाम से निजी कम्पनियों को सस्ते में बेचा जा रहा है। जिन्हें महंगा दाम मिलता है, उन्हें महंगी कीमत भी चुकानी पड़ती है।

हमारी सोच नारी प्रधान या पुरूष प्रधान नहीं है। जो लड़कियों के साथ होता है, वही लड़कों के साथ भी होता है। शिक्षा और काम को सरकार निजी कम्पनियों के हवाले करने की नीति पर चल रही है।

संवैधानिक पदों पर बैठे लोग, उसकी गरिमा के अनुकूल नहीं हैं, बीएचयू के उप कुलपति गिरीश चंद त्रिपाठी ने एनडीटीवी के रवीश कुमार से जिस स्तर की बातें की, वह अपने आप में इस बात का प्रमाण है, कि जिसमें किसी स्कूल का हेडमास्टर बनने की योग्यता नहीं है, उसे एक प्रतिष्ठित विश्व विद्यालय का उप-कुलपति बना दिया गया। वो सवालों का जवाब अपनी एकतरफा सोच आौर झूठ की बुनियाद पर खड़े हो कर देते रहे, बार-बार फंसते और बार-बार अपनी कही बातों से मुकरते रहे।

उनके खयाल से बीएचयू का मौजूद वारदात, धरना, प्रदर्शन बाहरी लोगों (दिल्ली-इलाहाबाद) के बहकावे में आये छात्राओं और छात्रों की कारस्तानी है। उन्होंने यह भी कह दिया कि ‘‘यह मोदी जी के बनारस कार्यक्रम को ‘डिस्टर्ब‘ करने की कोशिश थी।‘‘ उन्होंने यह स्वीकार ही नहीं किया कि ‘‘छात्राओं पर लाठीचार्ज हुआ है।‘‘ जैसे उन्होंने आंख बंद कर लिया हो कि ‘‘मेरे सामने ऐसा कोई भी प्रमाण नहीं है।‘‘ जबकि छात्राओं पर लाठीचार्ज हुआ, अंश्रुगैस के गोले दागे गये, रबर बुलेट का उपयोग हुआ। लड़कियां सड़कों पर घसीटी गयीं, पुलिस-पीएसी के जवानों ने घेर कर लाठियां बरसाईं, गिरी हुई छात्राओं को लात और बूटों से मारा। रात 11 बजे से भोर 3 बजे तक बत्तियां गुल कर हॉस्टलों की तलाशी ली गयी, बद्सलूकी की गयी, छात्र एवं छात्राओं को पीटा गया।

21-22 सितम्बर को शहर में होने के बाद भी, मोदी, योगी और भाजपा के मंत्री-पदाधिकारी बीएचयू के काण्ड से किनाराकशी करते दिखे। मोदी रूट बदल कर मंदिरों के चक्कर लगाये। अब प्रशासन की सक्रियता बढ़ गयी है, मोदी-योगी खोज-खबर ले रहे हैं। अपनी हुई भद्द और खिसकते जनाधार को बचाने में लगे हैं। छात्राओं की सुरक्षा के नाम पर निगरानी की स्थायी व्यवस्था बना रहे हैं। बनारस और देश भर में हो रहे विरोध को संभालने में लगे हैं। उप कुलपति बकरा बन चुके हैं। मोदी सरकार और संघ के उग्र राष्ट्रवाद को नयी छूट मिलेगी। बीएचयू का मुख्य द्वार खुल और बंद हो रहा है। लोग शायद यह समझें कि यह क्यों हो रहा है? झूठ और फरेब की राजनीति चल पड़ी है।

-आलोकवर्द्धन

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