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पड़ोसी देशों के प्रति भारत की कमजोर तटस्थता

chogm-2013भारत की विदेश नीति मुक्त बाजार व्यवस्था की तनी हुर्इ डोर पर करतब दिखाते हुए चल रही है। वह प्रभावशाली और निर्णायक भूमिका अदा कर सकती है। कर नहीं पा रही है। क्योंकि उसकी आंतरिक स्थितियां उसका साथ नहीं दे पाती और पड़ोसी देशों से सम्बंधों की पकड़ ढ़ीली पड़ती चली जाती है। वह एक विशाल देश होने के बाद भी मजबूत देश के रूप में उभर नहीं सका है। उसकी विश्वसनियता कहीं न कहीं कमजोर पड़ जाती है। हम यह मानें या न मानें मगर, हमारी नीतियां अपनी सुरक्षा के नाम पर चीन और पाकिस्तान के इर्द-गिर्द घूमने लगती है। पाकिस्तान के प्रति विश्वास नहीं बढ़ता और चीन की विश्वसनियता को बदलते वैशिवक परिदृश्य में देखने का नजरिया कमजोर है। जिसका लाभ अमेरिकी साम्राज्य उठा रहा है।

दुनिया की मुक्त बाजारवादी व्यवस्था विभाजित है। अमेरिकी एकाधिकार और यूरोपीय देशों के विरूद्ध रूस और चीन का गठबंधन आकार पा चुका है। भारत सरकार पिछले एक दशक से मुक्त बाजार व्यवस्था की गिरफ्त में है। और यही स्थिति कम-ओ-बेश तीसरी दुनिया के ज्यादातर देशों की है, जिसका आर्थिक एवं सामरिक लाभ उठाने की नीतियों से संचालित यूरो-अमेरिकी शकितयां, ‘एशिया पर अधिपत्य’ में अपनी समस्याओं का समाधान देख रही है। अमेरिकी सरकार इन देशों में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर सामरिक हस्तक्षेप और उभरती हुर्इ ताकतों की आर्थिक घेराबंदी को अपने हित में मान रही है। आर्थिक सहयोग और समझौतों के साथ सैन्य करार हो रहे हैं।

भारत मुक्त बाजार व्यवस्था के दो खेमों के बीच है। रूस फिर से करीबी देश बन गया है, और चीन से नयी समझदारी बनायी जा रही है। आपसी सम्बंधों को बढ़ाने पर सहमति बढ़ती जा रही है। अफगानिस्तान में वह रूस और चीन के साथ मिल कर, अमेरिकी सेना की वापसी के बाद, काम करने के पक्ष में है। अमेरिका भी अपने हितों के पक्ष में अफगानिस्तान में भारत की मौजूदगी का समर्थन करता रहा है। जोकि, रूस और चीन के हितों के विरूद्ध है। दो विरोधी हितों के बीच भारत की मौजूदगी तब तक कारगर नहीं हो सकती, जब तक उसकी स्थिति खुद मजबूत न हो, और वह अपने पक्ष में बड़ी ताकतों का समर्थन न हासिल कर ले। भारत की नीति संवेदनशील मामलों में तटस्थ रहने की रही हैं सीरिया पर अमेरिकी हमले के प्रस्ताव का विरोध कर, अमेरिकी नीति से पूरी तरह सहमत रहने की स्थिति को बदलने की कोशिश की है। मनमोहन सिंह की समझदारी और भारत की विदेश नीति में बदलाव से ज्यादा यह अंतर्राष्ट्रीय दबाव था।

अमेरिका की ओर झुकी तटस्थता की नीति आज भी बरकार है। यही कारण है कि भारत सरकार की विश्वसनियता अपने पड़ोसी देशों में वह नहीं रह गयी है, जो कभी थी। जहां जनतंत्र या तो खतरे में है, या जनतंत्र की चुनावी प्रक्रिया चल रही है।

हमारे सामने मालदीव, नेपाल और बांगलादेश है, जहां चुनावी प्रक्रिया चल रही है और जहां भारत विरोध भी है। और श्रीलंका भी है, जहां राष्ट्रमण्डल देशों के चोगम सम्मेलन में भारत की भूमिका उल्लेखनीय नहीं रही है। उसकी आंतरिक स्थितियों का प्रभाव उसकी विदेश नीति पर भी पड़ने लगा है। भारत में भी 2014 का आम चुनाव है, और अनिश्चयता कम नहीं है।

भारत और भारत के छोटे पड़ोसी देशों में जनतंत्र की सेहत खास अच्छी नहीं चल रही है। म्यांमार में जारी नस्लवादी-जातीय दंगे हिंसक होते ही रहते हैं, जिसकी वजह से भारत में जातीय हिंसा, आशंका और बोध गया में आतंकी हमले हुए। मालदीव की हालत भी अच्छी नहीं है। पूर्व राष्ट्रपति का तख्तापलट, भारतीय दूतावास में शरण और भारतीय सहयोग से हुए सहमति का कोर्इ प्रभाव नहीं पड़ा। यूरोपीय संघ राष्ट्रपति चुनाव के असफल होने पर जरूरी कदम उठाने की धौंस जमा चुका है। जनतंत्र के लिये अमेरिकी और यूरोपीय संघ की फिक्र एक सोची-समझी साजिश है। इसलिये इन क्षेत्रों में बढ़ी अमेरिकी सक्रियता ‘बढ़ता हुआ खतरा’ ही है। चीन जिनके निशाने पर है। ‘ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप’ का भारत भले ही सदस्य देश नहीं है, किंतु इसके बनने से भारतीय हितों का प्रभावित होना तय है।

नेपाल की शांति और स्थिरता से भारत और चीन दोनों का हित जुड़ा हुआ है। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (बैध गुट) 33 विरोधी छोटे दलों के साथ नेपाल में होने वाले चुनाव का विरोध कर रहा है। चीन विधान सभा के चुनाव के पक्ष में है, और भारत शांतिपूर्ण आम चुनाव कराने के लिये आवश्यक चुनावी सामग्री मुहैया करा रहा है। नेपाली सरकार के सामने यह बड़ी चुनौती है। 62 हजार सैनिक, 29 हजार सशस्त्र बल और 45 हजार पुलिसकर्मियों की पूरी फौज उतार दी गयी है। नेपाल में उन्हीं संवैधानिक प्रक्रिया को जनतंत्र मान लिया गया है, जिनसे जनतंत्र की औपचारिकतायें पूरी हो जाती हैं, जबकि नेपाल का निर्माण और जनसमस्याओं का समाधान जरूरी है।

बांगलादेश भारत और पाकिस्तान के बीच की गांठ है। जिसकी आर्थिक दशा खराब है, और राजनीति दो ऐसे खेमों में बंटी हुर्इ है, जो विरासत की राजनीति बन गयी है। बांगलादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्र रहमान की बेटी शेख हसीना एक ओर 14 दलों के समर्थन के साथ है, तो दूसरी ओर पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान की बेवा खालिदा जिया अपने 18 समर्थक दलों के साथ हैं। ‘अवामी लीग’ और ‘बांगलादेश नेशनल पार्टी’ के बीच चुनाव से पहले ‘कार्यवाहक सरकार’ का मुददा फंसा हुआ है, और संघर्ष बढ़ता जा रहा है। जिस ‘कार्यवाहक सरकार’ के मुददे को शेख हसीना ने 1996 में उठाया था, उसी मुददे को आज खालिदा जिया उठा ली है। जिसके तहत कार्यवाहक सरकार को 90 दिन के भीतर चुनाव कराना अनिर्वाय होता है, मगर शेख हसीना पिछले दो साल से सेना के सहयोग से सरकार चला रही हैं। शेख हसीना ने ‘जमात-ए-इस्लामी’ के खिलाफ जिस संघर्ष की शुरूआत की है, वह कितना कारगर होगा? नहीं कहा जा सकता। वो भारत और म्यांमार के साथ सीमा सुरक्षा से जुड़े मुददों को, अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिये कर रही है।

भारत सरकार आवाम लीग की शेख हसीना के पक्ष में हैं, मगर वह अपनी तटस्थता की नीति से उबर नहीं पा रहा है। बांगलादेश से जुड़े अपने हितों की देख भाल भी वह ठीक से नहीं कर पा रहा है। भारत के प्रति नरम रूख अपनाने वाली शेख हसीना की सरकार होने के बाद भी दोनों देशों के रिश्तों में वह नजदीकी नहीं आ सकी, जिसकी अनिवर्यता भारत के लिये रोज बढ़ती जा रही है।

भारत सरकार या तो अपनी आंतरिक स्थितियों के प्रभाव में होती है, या अमेरिकी प्रभाव में। और अमेरिकी सरकार एक मजबूत भारत के पक्ष में नहीं है। उसके लिये जनतंत्र के नाम पर एक ऐसी सरकार चाहिये जो उसके लिये मुक्त बाजार का क्षेत्र बन सके और उसके सामरिक संघर्षों का सक्रिय सहयोगी भी है। यदि भारत आज अपने पड़ोसी देशों से अपने सम्बंधों को मजबूत करना चाहे तो उसे पाकिस्तान और बांगलादेश के आतंकी हमलों का समाना करना पड़ता है, जो कि वास्तव में अमेरिका के पाले हुए आतंकी संगठन हैं। जबकि भारत की जरूरत इस बात की है, कि वह क्षेत्रीय संतुलन को अपने पक्ष में करें।

राष्ट्रमण्डल देशों के चोगम सम्मेलन में भाग न लेने के बारे में विदेश मंत्रालय के सलाहकार ने कहा था कि ”बैठक में शिरकत न कर एक और महत्वपूर्ण पड़ोसी देश से रिश्तों का खराब करना अदूरदर्शिता होगी।”

15 से 17 नवम्बर को कोलम्बों में हुए इस सम्मेलन में भाग ने लेने का दबाव यूपीए के सहयोगी दल द्रमुक और अन्नद्रमुक का ही नहीं था, बल्कि वित्तमंत्री पी0 चिदम्बरम ने भी प्रधानमंत्री को यही सलाह दी। यह विरोध जाफना में हुए तमिलों के नरसंहार की वजह से था। विदेशमंत्री और विदेश मंत्रालय का नजरिया ज्याद सही था कि ”भारत इस सम्मेलन में द्विपक्षीय वार्ता के लिये नहीं, बल्कि बहुपक्षीय सम्मेलन में भाग ले रहा है। लेकिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने चुनावी आंकड़ों की वजह से इस सम्मेलन में भाग नहीं ले सके। हालांकि श्रीलंका के राष्ट्रपति राजपक्षे ने अपनी ओर से भारत के इस रवैये का विरोध नहीं किया और उन्होंने विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद की उपस्थिति को ही बड़ी बात माना, मगर यह सच है, कि अपने पड़ोसी देशों से भारत की निकटता घटी है। जो किसी भी नजरिये से सही नहीं है। ‘सीलोन टुडे’ ने भारत के इस संशय के बारे में लिखा था- ”भारत को दक्षिण एशिया में अपनी स्थिति मजबूत करनी चाहिये, और चीन एवं पाकिस्तान को, जिस पर श्रीलंका सरकार का ज्यादा ध्यान है, अपनी जगह नहीं लेने देना चाहिये।”

‘सीलोन टुडे’ ने यह सलाह भी दिया कि ”भारत को इन स्थितियों पर नजर रखते हुए निर्णय लेना चाहिये।”

जो निर्णय लिया गया और घटनायें जिस तरह से घटीं, वह हमें मालूम है। बस, सवाल यह है कि भारत अपनी कमजोर तटस्थता से कब उबर पायेगा और कैसे?

यह तो मानी हुर्इ बात है, कि भारत के पड़ोसी देशों में जनतंत्र की जड़ें मजबूत नहीं हैं। राजनीतिक अस्थिरता का खतरा भी बना हुआ है। जिससे भारत का न सिर्फ द्विपक्षीय हित प्रभावित होता है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता भी प्रभावित होती है। म्यांमार, मालदीव, बांगलादेश, नेपाल और श्रीलंका में यदि राजनीतिक अस्थिरता बढ़ती है, और अमेरिकी तथा यूरोपीय हस्तक्षेप बढ़ते हैं, तो भारत की तटस्थता की नीति का कोर्इ मतलब नहीं है। इन देशों में न सिर्फ भारतीयों की मौजूदगी है, बल्कि वो वहां की स्थितियों के महत्वपूर्ण हिस्सेदार भी हैं। साथ ही परम्परागत मित्र देश भी हैं। यह भी मानी हुर्इ बात है, कि भारत की मौजूदा स्थिति ऐसी नहीं है, कि वह इन देशों में निर्णायक भूमिका निभा सके। इसलिये, उसे तटस्थता के साथ क्षेत्रीय शांति एवं स्थिरता तथा अपने हितों के लिये सम्बद्धता की जरूरत है, जोकि अमेरिकी हितों से जुड़ कर संभव नहीं है। इसलिये, उभरते हुए नये समिकरण की ओर उसे ध्यान देना चाहिये। अपने सम्बंधों को विस्तार देते हुए खुद एक समिकरण बनने की पहल करनी चाहिये। अमेरिकी दबाव में र्इरान के प्रति उसकी नीतियां आत्मघाती ही रही हैं, जिसे 6 बड़े देशों से र्इरान के समझौते के बाद सुधारने की ऐसी पहल की जा रही है, जो अमेरिकी हित में है। यही कारण है कि र्इरान की ओर से भारत की पहल का माकूल जवाब नहीं मिल रहा है, और भारत की नीतियां अपने सबसे निकटतम पड़ोसी देशों से तनाव की ओर बढ़ रही हैं।

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