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बी.एच.यू. परिसर की सुरक्षा और निगरानियों का जाल

बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के उपकुलपति गिरीश चन्द्र त्रिपाठी लम्बी छुट्टि पर गये – व्यक्तिगत कारणों से।

व्यक्तिगत कारण उन्हें प्रधानमंत्री कार्यालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय और जहां से वो अपनी सोच और समझ लाते हैं, वहीं से बताया गया। छात्राओं के आन्दोलन ने रास्ता दिखाया। बेचारे चलते बने। अब कोई बखेड़ा नहीं।

परिसर से बनारसी इत्मिनान कुछ दिनों के लिये बाहर चला गया है पान खाने, सड़कों पर पीक की पिच्चकारी दिखाने। सुरक्षा व्यवस्था चाकचौबंद हो रही है। नयी चीफ प्रॉक्टर साईकिल से चक्कर लगा रही हैं – सहयोगियों के साथ। लाईट दुरूस्त हो रहे हैं। 100 सीसी टीवी कैमरे की निगरानी शुरू हो गयी है। बी.एच.यू. प्रशासन और जिला एवं पुलिस प्रशासन की जुगलबंदी बैठ गयी है। ढ़ेरों जांच शुरू हो गये हैं। बी.एच.यू. खुल गया है।

विश्वविद्यालय की छात्राओं के धरना, प्रदर्शन और अन्दोलन के लिये बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं।

जिस मुद्दे को लेकर बिना किसी छात्र संगठन और बिना किसी बैनर के यह लड़ाई लड़ी गयी और उसे जितना जबर्दस्त समर्थन मिला, वह वास्तव में बड़ी बात है। जीत के बारे में हम यह नहीं कहेंगे।

नाराज होने की जरूरत नहीं, बताते हैं।

छात्राओं से छेड़छाड़, उनकी सुरक्ष्ज्ञा के लिये खतरा जैसे मुद्दे को हम छोटा नहीं कहेंगे, ना ही बी.एच.यू. प्रशासन की उदासीनता के विरूद्ध हुई प्रतिक्रिया छोटी है। यह होना चाहिए, और हुआ। मगर यह भी तय है, कि जे.एन.यू., चेन्नई आई.आई.टी., हैदराबार सेण्ट्रल यूनिवर्सिटी और एफ.टी.आई.आई. के सवालों और मुद्दों से यह अलग है।

यह एक विश्वविद्यालय परिसर को सुधारने और संभालने की ऐसी लड़ाई है, जिसमें सोच और गलत व्यवस्था को बदलने जैसी कोई बात नहीं है, जिसकी वजह से ऐसी वारदातें होती हैं। ऐसी वारदातों को अंजाम दिया और दिलाया जाता है, ताकि विश्वविद्यालय पर सरकार की पकड़ मजबूत हो। ऐसी स्थितियां बनायी जाती हैं कि शिक्षा के निजीकरण की राहें भी खुलें। वैसे भी, भाजपा की मोदी सरकार देश की प्राकृतिक सम्पदा की तरह ही शिक्षा एवं बौद्धिक सम्पदा को निजी कम्पनियों के हवाले करने की नीति पर चल रही है। जिनके लिये शिक्षा एक बहुत बड़ा उद्योग है। सरकार जिसे अपनी सोच और समर्थन का जरिया बनाती है।

40 से 50 हजार लोग बी.एच.यू. परिसर में होते हैं। जिनके पीछे उनका परिवार होता है। बी.एच.यू. से लाखों लोग जुड़े हैं, जिनकी सोच और समझ के बारे में हम कुछ नहीं कह सकते, मगर परिसर का माहौल जरूरत से ज्यादा पुरातन और परम्परावादी है। वह स्वाभाविक रूप से प्रतिक्रियावादी ताकतों के अनुकूल है।

बी.एच.यू. में कभी यह सवाल पैदा नहीं हुआ कि विश्वविद्यालय परिसर में संघ की शाखाएं क्यों लगती हैं? क्यों ‘पथ संचालन’ होता है? क्यों हिन्दू धर्मवाचकों का तांता लगा रहता है? मालवीय भवन किस सोच का अड्डा है?

यदि मदनमोहन मालवीय सिर्फ हिन्दू हैं, तो उन्हें महामना नहीं कहना चाहिए। मालवीय जी अपने विश्वास के आधार पर हिन्दू हैं, लेकिन वह नहीं हैं जो आज संघ, भाजपा और ऐसे ही हिन्दूवादी संगठन और लोग उन्हें प्रमाणित कर रहे हैं।

आज जिन्हें छात्राओं और छात्रों के इस आन्दोलन में बड़ी संभावनायें नजर आ रही हैं, जो घुमा-फिरा कर इसे वर्ण व्यवस्था, पुरूष शासित समाज और निजी सम्पत्ति पर हमला प्रमाणित कर रहे हैं, जो नारी मुक्ति और उनके समानता के अधिकार से जोड़ कर इसे देख रहे हैं, क्या वो यह प्रमाणित कर सकते हैं, कि यह बाजारवाद और प्रतिक्रियावादी ताकतों के खिलाफ लड़ाई है? जिनके लिये समाज बाजार और व्यक्ति उत्पाद और उपभोक्ता है। जो महिलाओं को वस्तु समझते हैं। छात्राओं की सुरक्षा के लिये सीसीटीवी कैमरे का जाल आने वाले कल में छात्रों की निगरानी के खुफिया जाल में बदल जायेगा। यह होगा। यही होना तय है। किसी भी विश्वविद्यालय परिसर की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को आप खत्म ही मानें। सरकार ऐसे ही अवसर सभी केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में बना रही है। बी.एच.यू. में यह अवसर उसे हासिल हो गया है। उपकुलपति पहले भी मोहरा थे, आज भी मोहरा हैं। सरकार का फतवा है- ‘हम राजनीति नहीं करने देंगे।’

-आलोकवर्द्धन

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