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शैतान का दिमाग खाली नहीं

‘खाली घर शैतान का डेरा।‘

सुनते और पढ़ते हुए हम बड़े हुए हैं। क कहरा के अक्षर ज्ञान से लेकर विश्व विद्यालयों तक। कठपुतली बनने की सलाह हमें किसी ने नहीं दी। कृष्ण हों या कौटिल्य, कणांद हों या चार्वाक, मार्क्स हों या लेनिन, यहां तक कि धर्मग्रंथों ने भी हमें रंगरूट बनना नहीं सिखाया। हां, मैकाले की सोच कलम घिस्सूओं की थी, कि ‘‘इतिहास को मार दो, आज मर जायेगा।‘‘ उन्होंने भी मरी हुई सोच का ज्ञान ही फैलाया। गुरूओं ने ज्ञान ही बांटे हैं। ज्ञान ही शिक्षा का आधार रहा है।

अब शैतानी मशविरा है- ‘‘शिक्षा का मूल लक्ष्य दिमाग को खाली करना है।‘‘

वजह…?

‘‘नये विचारों के लिये जगह बनानी है।‘‘

योजना…?

‘‘देश को आगे ले जाने के लिये, हमें दिमाग को खाली करने का अभियान चलाना होगा।‘‘

अभियान तो शुरू हो गया है प्रधानमंत्री जी। एनडीटीवी के प्राईम टाईम में रवीश कुमार ने दिखा ही दिया है, कि विद्यार्थियों का दिमाग खाली रखने के लिये प्रोफेसर और प्राध्यापकों के पदों को विश्वविद्यालयों में खाली रखा गया है। तदर्थ और अतिथि विद्वान चप्पल घसीट रहे हैं, बिना-हवा पानी के खोली में अपने ज्ञान को मार रहे हैं, मर-खप रहे हैं। दिमाग खाली हो रहा हैं। खाली दिमाग में शैतानों का डेरा है। सर्वोच्च पदों पर भी वो ही विराजमान हैं।

आपको मालूम है, कि मोदी जी का ‘नवाचार‘ क्या है?

आदमी को गदहे के सींग की तरह गायब कर देना। उसको उत्पाद और उपभोक्ता बना देना। सरकार के लिए सैल्यूट बना देना।

समाज को बाजार बना देना।

देश को ब्राण्ड बना देना।

मातृभूमि का सौदा करना।

देश की आम जनता की सरकार को सिर के बल खड़ा कर देना एक दल, एक नेता, एक राष्ट्र का रंगरूट बना देना।

‘शिकागो स्कूल‘ के लड़कों को विश्वविद्यालयों में भर देना।

शिक्षा को उद्योग में बदल कर उन्हें निजी कम्पनियों को सौंपना ही ‘खाली दिमाग’ का लक्ष्य है। जहां विचारहीन खाली दिमाग का उत्पादन होना है। जी हुजूर छाप प्रशासनिक अधिकारी, सीईओ और प्रबंधकों की फौज बनानी है, जिनके लिये निजी कम्पनियों के मुनाफा से अलग कोई चीज़ नहीं है। उच्च शिक्षा को आम जनता की पहुंच से बाहर निकालना ही ‘सुधार की तेज़ी’ है।

सुनिये, 14 अक्टूबर 2017 को, पटना विश्वविद्यालय के सौवीं वर्षगांठ पर मोदी जी फरमाते हैं-

‘‘शिक्षा के क्षेत्र में सुधार की गति बहुत धीमी है। अब सरकार इसमें तेजी लाने जा रही है। जिस प्रकार पटना विश्वविद्यालय ने देश को प्रशासिनक अधिकारी उपलब्ध कराये हैं, उसी प्रकार आईआईएम विश्व को सीईओ उपलब्ध कराता है। आईआईएम को सरकारी बंधनों से मुक्त किया जा चुका है। अब सरकार 20 चुनिंदा विश्वविद्यालयों को भी सरकारी बंधनों से मुक्त करने जा रही है। योग्यता के आधार पर 10 निजी और 10 सरकारी विश्वविद्यालयों का चयन होना है। पांच वर्ष में उन्हें 10 हजार करोड़ रूपये उपलब्ध कराये जायेंगे, जिससे वो एक विश्वस्तरीय संस्थान बन सकें।‘‘

भाई वाह! 10 हजार करोड़ की रेवड़ी 2019 के लिये बंट गयी, लगे हाथ निजी कम्पनियों के लिये शिक्षा को उद्योग में बदलने का आधार भी बन गया। विश्वविद्यालय अब सीईओ और प्रबंधकों का उत्पादन करेंगी। खाली दिमाग में यही भरा जायेगा। रूपये, रूपये, मनी, मनी! सोच और चिंतकों की जरूरत नहीं।

आपके सुधारों का जवाब नहीं, गांठ किसी और की मजबूत होती है, जेब हमारी कटती है।

आपने नोटबंदी की, करेन्सी हमारी पकड़ से बाहर हो गयी, किल्लतें मिलीं।

जीएसटी आया- व्यापार ने गोते लगाये, हमारे लिये चीज़ें महंगी हो गयीं।

श्रम कानूनों में सुधार हुआ- श्रमिकों का हक़ छिन गया।

भूमि अधिग्रहण अधिनियम की चालबाजियां चल रही हैं, किसानों को कर्ज माफी का धोखा मिला।

आधार कार्ड आया- हमारी निजता छिन गयी।

क्या-क्या गिनायें? डीजल, पेट्रोल, रसोई गैस। हम मर रहे हैं, विकास का मिडियायी जादू चल रहा है, आर्थिक विकास निजी कम्पनियों की बल्ले-बल्ले!

1 प्रतिशत लोगों के पास इस देश की आधी से अधिक सम्पत्ति पहुंच गयी। 2016 से अब तक भारत के सबसे धनवान 100 लोगों की सम्पत्ति में 26 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हो गयी। अर्थव्यवस्था गोते लगा रही है, आप आर्थिक विकास की बंशी बजा रहे हैं। श्रम बाजार में देश की आम जनता सस्ती है, बौद्धिक सम्पदा के बाजार में भी अब हमारी बोली लगेगी।

क्षमा करें प्रधानमंत्री जी, आपकी देशभक्ति(?) ने हमें देशद्रोही बना दिया है। आप इस पीढ़ी का दिमाग खाली करना चाहते हैं, मगर ऐसा नहीं होगा। उसे मालूम है ‘शैतान का दिमाग खाली नहीं है।’ वह शौतानों को जगह नहीं देगी।

-आलोकवर्द्धन

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