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अक्टूबर क्रांति के शताब्दि वर्ष में

आज की बात करने के लिये कल का जिक्र भी जरूरी है।

शताब्दि भर पहले अल्बर्ट रीस विलियम ने लिखा था- ‘‘प्रतिक्रियावाद ने अपना मुंह खोल दिया था और वह उद्धत था।‘‘

यह 1917 के अक्टूबर क्रांति से ठीक पहले का समय था। जार की सरकार औपचारिक रूप से जा चुकी थी और नयी सरकार जनआकांक्षाओं को बहलाने-फुसलाने के लिये वायदे पर वायदे कर रही थी। क्रांति यदि सुनिश्चित थी, तो प्रतिक्रियावाद की जड़ें भी मजबूत थीं। सर्वहारा क्रांति के बाद इन जड़ों ने प्रथम विश्व युद्ध में फंसे रूस को गृहयुद्ध के हवाले कर दिया। क्रांति के विरूद्ध साम्राज्यवादी ताकतें रूस में घुसी चली आ रही थीं और प्रतिक्रियावादी ताकतें गृहयुद्ध के जरिये उनके लिये परिस्थितियां रच रही थी। उनकी कोशिश क्रांति को कुचलने की थी। उन्हें इस बात का यकीन था, कि साम्राज्यवादी सेनायें समाजवादी क्रांति और सर्वहारा के प्रथम राज्य को कुचल कर रख देंगी।

मगर, ऐसा नहीं हुआ।

वो हारी। बुरी तरह हारी। हमें मालूम है। इतिहास हमारे पास है। समाजवाद के जीत और साम्राज्यवादी-प्रतिक्रियावादी ताकतों के पराजय का इतिहास हमारे पास है। और आज के तारीख में यह सबक भी हमारे पास है, कि सोवियत संघ और समाजवादी गढ़ का पतन हो चुका है। प्रतिक्रियावादी का मुंह खुला हुआ है। साम्राज्यवादी ताकतें इतिहास को बदल रही है। दुनिया भर में प्रतिक्रियावादी ताकतों की वापसी हो गयी है। वो खड़ी है। अपने पूरे दमखम के साथ खड़ी है, मगर संकटग्रस्त है। राजनीतिक एकाधिकार और निजी वित्तीय पूंजी की तानाशाही के नये दौर की शुरूआत हो गयी है। जिसके बारे में नहीं कहा जा सकता कि वो कितना खून बहायेंगी? कितनों को मारेंगी? इस दौर का अंत कब होगा? होगा या नहीं होगा? होगा तो कैसे होगा? दुनिया बचेगी या हमारे साथ वह भी मर जायेगी?

वैसे हमारी वापसी जितनी तय है, हमारा मरना भी उतना ही तय है। हम अल्बर्ट रीस विलियम और वैसे करोड़ों लोग नहीं जिन्हें समाजवादी क्रांति को जीतते और प्रतिक्रियावादी ताकतों के मारे जाने का नजारा देखने को मिले। क्योंकि प्रतिक्रियावादी ताकतों ने हमें मोहरा बना लिया है, अपने कारोबार का जरिया, अपने तोपों के मुंह का चारा बना लिया है। आम जनता की ताकत और उसकी मरजी को बिखेर दिया है। हमें अपने पक्ष में खड़ा होना चाहिये, मगर हम इस लायक भी नहीं बचे हैं। हम उनके निशाने पर हैं, वो हमारी निगरानी कर रहे हैं, हमारी हर हरकत पर उनकी नजर है और उनके पास इतनी वित्तीय एवं सामरिक ताकत है, कि वो हमारे खिलाफ शताब्दि भर लम्बी लड़ाई लड़ सकते हैं।

इसके बाद भी हम जानते हैं, कि वो जीतेंगे तो नहीं, मगर इतनी लम्बी लड़ाई लड़ने की ताकत हममें है या नहीं? यह सवाल है।

वो भागेंगे नहीं और अपनी मौत मरना भी उन्हें मंजूर नहीं है, हम जानते हैं। इसलिये उनका खुंख्वार होना और हमारी मुश्किलों का बढ़ना तय है।

उग्र राष्ट्रवाद की बैशाखी पर खड़ा फासीवाद खुल कर हंस रहा है। हंसने की इजाजत भी उसे हमने ही दी है। विश्व जनमत और विश्व समुदाय का हर देश उसकी चपेट में है। साम्राज्यवाद का बाजारवादी रूप हमारे सामने है।

वह इराक को फांसी पर टांग सकता है।

वह लीबिया को गोली मार सकता है।

वह सीरिया को गृहयुद्ध के हवाले कर सकता है।

वह विकास के जरिये समाजवाद को वेनेजुएला बना सकता है।

वह चीन को बाजारवादी

और भारत को बेवकूफ बना सकता है। वह उसे उसके अपने ही राजनीतिक ढांचे में फंसा कर वैधानिक तख्तापलट कर सकता है। चुनावी तौर-तरीकों से फासीवाद को राजसत्ता सौंप सकता है। भारत में यह हो चुका है। फासीवाद पूंजीवादी जनतंत्र के खोल से बाहर आता जा रहा है।

मौजूदा फासीवाद की परिभाषा आज उग्रराष्ट्रवाद से नहीं, बल्कि साम्राज्यवादी वैश्वीकरण और बाजारवाद से ही की जा सकती है, जो हिटलर के नाजीवाद से कहीं ज्यादा खतरनाक है। सच बतायें तो यह एक ऐसी व्यवस्था है जिससे छुटकारा पाने की राहें बंद हैं और जो संकटग्रस्त है। निजी कम्पनियों, कॉरपोरेशनों, वित्तीय इकाईयों और उनके मुखियाओं ने अब तक के सबसे बड़े साम्राज्य का निर्माण किया है। पूंजी का यह साम्राज्य जितना बड़ा है, उतना ही शर्मनाक है।

कोई भी ऐसी व्यवस्था जो मानव समाज और प्रकृति के स्वाभाविक विकास के विरूद्ध हो वह स्थायी नहीं हो सकती। पूंजीवादी साम्राज्यवाद एक ऐसी ही व्यवस्था है। जिसकी जिद्द बने रहने की है, जिसका दावा सामाजिक विकास की चरम अवस्था होने की है, जो विश्व समाज और प्रकृति को अपने नियंत्रण में रखना चाहती है। शोषण, दमन और प्रकृति का अबाध दोहन ही उसका मूल सिद्धांत हैं उसने ‘पूंजी के वर्चस्व‘ को स्थापित कर लिया है। अदृश्य पूंजी ही आज सारी दुनिया को नियंत्रित कर रही है। और सबसे बड़ी बात यह है, कि वह किसी भी कीमत पर दुनिया को अपने नियंत्रण से बाहर होने नहीं देना चाहती। ‘‘उसने इतनी आर्थिक, राजनीतिक और सामरिक शक्तियां हासिल कर ली है, कि पूंजीवाद अजये है, उसे नियंत्रित करने वाली वैश्विक वित्तीय ताकतें इतनी बड़ी हो गयी हैं, कि उन्हें पराजित नहीं किया जा सकता।’’ यह उसकी सोच है, उसकी सोच विध्वंसक हो चुकी है।

पूंजीवादी वित्तीय साम्राज्यवाद के सामने अपनी विसंगतियों से उबरने और गहराते आम संकट को हल करने की चुनौती है।

मार्क्सवाद के सामने आज के संदर्भ में सर्वहारा क्रांति और समाजवाद की नयी सोच को विकसित करने की गंभीर चुनौतियां हैं।

अक्टूबर क्रांति के शताब्दि वर्ष में यह सवाल है, कि क्या सोवियत क्रांति की तरह सर्वहारा वर्ग की समाजवादी क्रांति संभव है?

(जारी)

-आलोकवर्द्धन

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