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पद्मावती : ‘केवल एक ही सत्य’ एक भयानक सोच है

फिल्म-जगत, राजनितिज्ञों इतिहासकारों और करणी सेना के जद्दोजहद के बीच अन्ततः रानी पद्मावती बडे पर्दे पर आ ही गई। अब कुछ दावेदारियों से मुक्ति पा कर रानी पद्मावती की कहानी सबकी हो जाएगी। चलचित्र के भव्य प्रदर्शन और उसके कभी न खत्म होने वाले प्रेक्षण के बहाने यह कहानी सबके दिलों में जगह बना लेगी। इन्टरनेट और यू-ट्यूब के दौर में इसकी पहुँच कहीं अधिक व्यापक होगी। ऐसे में कुछ रूआँसे से पन्नों में किसी इतिहासकार के बयान जो रानी पद्मावती के होने पर सवाल उठाता है, वह घर में पड़ी रद्दी का हिस्सा बनकर रह जाएंगे। इसी के साथ रद्दी में वे खबरें भी गुम हो जायेगी जिसमें सड़क पर रानी पद्मावती पर बनी फिल्म का विरोध कर रहे लोगों की आवाजें हैं, प्रतिबंध लगाते मंत्री आदि, आदि…। इतने महीने से चली आ रही इस बहस का विश्लेषण करने से यह बात सामने आती है कि कहानियाँ एक सामाजिक संकल्पना हैं। उन्हें न तो एक फिल्म में कैद किया जा सकता है और न किसी प्रतिवाद में बाँधा जा सकता है।

किसी भी राजपूत घराने में पद्मावती बच्चों के जे़हन में वैसे ही रहती है जैसे कि दादी माँ। हम हर रोज उनकी कहानियाँ सुनते हैं, उन्हें समझते हैं, उनके बारे में और जानने की कोशिश करते हैं। मेरे अपने अनुभव में इन कहानियों के बलबूते, मुझे पद्मावती के बारे में इतना मालूम है जितना अपने बाबा (पिता के पिता) या नानी के बारे में नहीं मालूम। एक फिल्म, इस कहानी पर हक जताते हुए राजपूत संगठन या पद्मावती के अस्तित्त्व को नकारते हुए इतिहासकार, इस बात को नहीं झुठला सकते कि समाज के एक भाग में पद्मावती कई कहानियों के माध्यम से बसती है। कहानियों की कई पद्मवातियों में से एक कहानी बडे पर्दे पर आ चुकी  है। समाजशास्त्र के नजरिये से देखें तो यह समय एक महत्त्वपूर्ण एवं रोमांचक प्रक्रिया पर विचार व विवेचना करने का है। एक कहानी किसी के लिए सामाजिक अस्मिता से जुडे मान-सम्मान का प्रश्न हो गया है और किसी के लिए कलात्मक अभिव्यक्ति के प्रकटीकरण का।

एक कहानी कैसे जन-साधारण के लिए केवल एक कहानी बन जाती है? उस कहानी की अनन्त व्याख्याओं में क्या से क्या हो जाता है? जब पद्मावती बड़े पर्दे के जरिये सब के जेहन में सच की तरह बस जाएगी, तब इतिहास के तथ्यों और उन अनगिनत कहानियों का क्या होगा? क्या जनता के लिए उनका कोई औचित्य रह जाएगा? या सिनेमा के द्वारा जो एक लोक-सम्मति बनायी जाएगी, उससे क्या वे सभी कहानियाँ विलुप्त हो जाएंगी? इन सभी बातों पर विचार करना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि समकालीन युवा ऐसी किसी भी बात या तर्क पर आसानी से यकीन कर लेते हैं जिसे इन्टरनेट पर ज्यादा हिट, लाइक्स और कमेन्ट्स मिले हों। जहाँ ट्रोलिंग जैसी इन्टरनेट आधारित गाली-गलौच कुछ विषयों तक ही सीमित है।

यह फिल्म भी किसी झूठे या अप्रमाणित व्हाट्सऐप मैसेज की तरह लोगों के सच का अपना एक संस्करण बन जाएगी। बाकी सारे तथ्य तब तक किसी कोने में सुबह के सूरज का इन्तजार करते रहेंगे जब तक उन्हें बाहर निकाल कर जनता की नजर में लाने के लिए कोई और फिल्म या उपन्यास नहीं आ जाता है। समाज में कहानियों का एक सामाजिक जीवन है, जिसमें वो हर रोज कही और सुनी जाती हैं, तोडी-मरोडी जाती हैं, पूजी जाती हैं, धिक्कारी जाती हैं। उसे न तो केवल इतिहास के तथ्यों से समझा, स्वीकारा या नकारा जा सकता है और न ही एक फिल्म बनाकर उसपर एकाधिकार जमाया जा सकता है। कहानियों और उनके सामाजिक महत्त्व को समझने के लिए हमें एक बिन्दु पर आने की आवश्यकता है जहाँ मौखिक परम्परा (ओरल ट्रेडिशन) और ऐतिहासिक तथ्य एक समान दूरी पर हों। अन्यथा एक भव्य निर्देशन और छायांकन से सुसज्जित सिनेमा, कुछ प्राध्यापकों के बयानों और कुछ राजनितिज्ञों के बीच में, कहानी के जितने भी रूप हैं, वे विलुप्त हो जाते हैं।

हमें कुछ ऐसी आवाजों के लिए जगह बनाने की जरूरत है, जो हर रोज एक कहानी का या किसी और कहानी का हिस्सा है। जरूरी नहीं है कि हर किसी कहानी को लेकन एक फिल्म ही बनायी जाए, लेकिन उनकी कोई सुनवायी तो होनी ही चाहिए। एक जनतंत्र के लिए इस तरह की जगह अनिवार्य है। ऐसा होने से हम ‘केवल एक ही सत्य’ के चक्रव्यूह से बच सकते हैं। ‘केवल एक ही सत्य’ एक भयानक सोच है जो तथ्यान्वेषण और राजनीति में फँस जाती है। तर्क और प्रमाण से समझा हुआ सत्य शायद वुलकन समाज में लाजिमी हो, पर धरती पर तथ्य कई प्रकार से समझे और बताये जाते हैं। विभिन्न आख्यानों के लिए मंच तैयार करने से ही किसी ‘एक’ कहानी को सच होने से रोका जा सकता है।

अंशु सिंह

शोधार्थी, दिल्ली विश्वविद्यालय

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