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राजनीति में कारोबार, तेल में घाटे से मुनाफे का व्यापार

p11asmxzदेश और जनसमस्याओं के बारे में जब, सरकार और समाज की सोच अलग-अलग होने लगती है, तब मुददे उलझ जाते हैं। सामाजिक विकास, विकस की आर्थिक दिशा और राजनीति में कारोबार, कारोबारियों को मिली छूट सी लगती है, क्योंकि हमें उस ढांचे के लायक बनाया जा रहा है, जिस ढांचे में ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाने की फितरत को काबलियत कहा जाता है। इस नजरिये से देखा जाये तो, सिर्फ दो ही जमात के लोग काबिल हैं, एक- जो राजनीति कर रहे हैं, और दूसरा- वो जो कारोबार कर रहे हैं- बड़े पैमाने पर। जो बे-धडक बाजार के लिये सरकार को, और सरकार के लिये व्यापार को, एक ही तराजू के अलग-अलग पलड़ों में रखते हैं। हमें पता ही नहीं चलता और वो जो भी सामने है, उसका सौदा कर लेते हैं। हम यकीन के साथ नहीं कह सकते कि ”यह बिकाऊ नहीं है।” जो भी बाजार में है, वह बिकाऊ है, और बाजार के बाहर, अब कोर्इ नहीं है।

गये महीने हमने पढ़ा कि ”अब सरकार नहीं, तेल कम्पनियां ही तेल की कीमतों का निर्धारण करेंगी।” यह भी पढ़ना पड़ा कि ”हर महीने 50 पैसे प्रति लीटर की दर से वृद्धि की जायेगी।”
कहीं कोर्इ सुनगुन नहीं हुआ, हलचल नहीं हुर्इ। 50 पैसा मामूली रकम है। बाजार में जिसका चलन भी बंद हो गया है। पचास पैसे में अब बुखार की एक टिकिया, माचिश की एक डिबिया और कुल्हड़ में आधी घूंट चाय भी नहीं मिलती। पचास पैसा भिखमंगा भी नहीं लेता। बच्चे की हंथेली पर भी पचास पैसा रखियेगा, तो उसे पता चल जाता है कि ‘बाप धोखा दे रहा है।’ सरकार भी पचास पैसे से धोखा दे रही है। करोड़ों-करोड़ के दैनिक खेल को फटा-चिथड़ा लिबास पहना रही है। जिस पचास पैसे से पान खा कर थूका भी नहीं जा सकता, वह साल में 6 रूपये हो जाता है, वह भी तब, जब पचास पैसे की शराफत बची रहे। फिर सरकार और बाजार की शराफत के बारे में हम क्या कहें? जहां 95 पैसे के नाम पर एक रूपये और 99 रूपये के नाम पर सौ रूपये लिया जाता है। एक लीटर तेल के नाम पर नौ सौ ग्राम से थोड़ा ऊपर तेल दिया जाता है। जो सस्ता है, उसकी मिलावट की जाती है। जो बिकता है, उसमें बड़ा घपला है। पहले संतरी बिकते थे, अब मंत्रियों के बिकने के नायाब किस्से हैं। व्यवस्था काजल की कोठरी है, कोयले की खदान है, चोर अब आंखों से सूरमा नहीं चुराते, या तो डिबिया चुरा लेते हैं, या कोयले की खदानों को अपने नाम लिखवा लेते हैं। यह सब सरकार और बाजार की यारी है, जिसे मन को मोहने वाले हमारे सिंह जी उदारीकरण कहते हैं। जिनके लिये आदर्श तो अमेरिका है, मगर वो यूरोपीय देशों की सरकारों के नक्शे कदम पर चल रहे हैं, आम जनता के कंधों की मजबूती और उसकी गांठ को ढीला कर के उसे तोल और परख रहे हैं। वो पेट्रोल और डीजल की कीमत बढ़ाते हैं, और यातायात परिवहन से लेकर खाद और अनाज तक की कीमतें बढ़ जाती हैं। सभी को लाभ कमाने का मौका सौंप देते हैं।

घाटे से मुनाफा कमाने की नायाब तरकीब, भारत में, मनमोहन सिंह की इजात है। वो काफी समझदार किस्म के अर्थशास्त्री हैं। उन्होंने राष्ट्रीयकरण की ओट में निजीकरण के फार्मूले का इजात भी किया है। उनकी उपलबिधयां न कल छोटी थीं, न आज छोटी हैं, और आने वाला कल भी यही प्रमाणित करेगा कि मुसीबतों की जड़ उदारीकरण के शैतान की आंत है। जिसने देश की अर्थव्यवस्था को खोखला कर दिया, लोकतंत्र की राजनीतिक संरचना को तोड़ दिया और देश के कल्याणकारी राज्य के आदर्श को उस बाजार के हवाले कर दिया, जहां हर एक चीज, और सख्श बिकाऊ है। और यह तो सवैमान्य सिद्धांत है कि जिसके गांठ में दम होगा, वही न लोग और चीजों को खरीदेगा। हम और आप, या देश का आम आदमी राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को, उत्पादन के साधन और प्राकृतिक सम्पदा को, संसद में बैठे सियासतदां और हुक्मरांओं को तो खरीदेगा नहीं। वह तो रोटी, कपड़ा और मकान खरीदेगा, बिजली, तेल और र्इंधन खरीदेगा, खाद-बीज और अनाज खरीदेगा, और खरीदने के लिये खुद को बेचेगा, जिस पर अब सराकर का नहीं बाजार का कब्जा है। बाजार के लिये बड़ी मारामारी है। दुनिया का सबसे बड़ा खुदरा व्यापारी ‘वालमार्ट’ भी अब मुकाबले के लिये आ गया है, जिससे लड़ने के लिये परचूनिया छाप व्यापारी को मैदान में उतार दिया गया है, कि जो लड़ेगा वहीं बचेगा, और जो बचेगा, वहीं हलुवा-पूड़ी, पुलाव, बिरयानी और मुर्ग मुसल्लम खायेगा।

इस मामले में आशांओं से भरपूर मनमोहन सिंह जी की सोच राष्ट्रवादी है कि ”चींटियों को हाथी से कोर्इ खबरा नहीं।” उनका बाजारवादी आला दिमाग हाथी को भी आश्वस्त कर लेता है कि ”चीटियां हाथी का क्या बिगाड़ सकती है?” बाजार के जंगल में सभी लड़ने-भिड़ने वाले भार्इ-भार्इ हैं। इसलिये, अंतर्राष्ट्रीय भार्इचारा के के लिये बाजारवादी होना अच्छी बात है। और दुनिया में लड़ार्इ-भिड़ार्इ छाप भार्इचारा के प्रति अमेरिकी सरकार और बहुराष्ट्रीय कम्पनियां कमर कस कर खड़ी हैं। इस देश में लेन-देन की लुकाछिपी है, मगर अमेरिका में सबकुछ खुलेआम है। भारतीय बाजार की संभावनाओं से संचालित लगभग 20 अमेरिकी कम्पनियां और औधोगिक समूह, भारत में अपना पांव पसारने के लिये पिछले साल 20 करोड़ डालर -लगभग 1 हजार करोड़ रूपये से ज्यादा की धनराशि, खर्च की गयी। यह जानकारी अमेरिकी संसद में इन कम्पनियों के द्वारा जमा की गयी रिपोर्ट पर आधारित है। जिसे भारतीय मीडिया ”चौंकाने वाला खुलासा” के रूप में दख रही है। जबकि, अमेरिका में लाबिंग पर किये गये खर्च का रिकार्ड रखना स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो कम्पनियों के द्वारा पेश की गयी रिपोर्ट है। यह खर्च अमेरिकी संसद के दोनों सदनों के सदस्य, व्यावसायिक समूह के लिये काम करने वाले संपर्क सूत्रों एवं संगठनों पर किया गया है। सत्ता के गलियारे में बसे बिचौलियों ने यह खर्च भारत में भी किया गया है, जो अवैध है। और जिसकी जांच ‘वालमार्ट’ के मामले में, पहले से ही एक जांच कमीशन कर रही है।

सरकार किस बात की जांच करा रही है, और जांच कमीशन किस चीज की जांच करेगी? अजीब सा सवाल है, क्योंकि रिपोर्ट अमेरिकी संसद में पेश है, और वह कांग्रेस के दस्तावेजों में दर्ज है। इसके बाद भी जांच होनी है, और जांच हो रहा है, क्योंकि आम जनता को धोखे में डालने का यही सबसे अच्छा तरीका है, जैसे पचास पैसे से करोड़ों करोड़ का दैनिक वारान्यारा है।
सरकार के द्वारा जून-जुलार्इ 2012 में जब पेट्रोलियम के मूल्यों में भारी वृद्धि की गयी थी, उसके पास तर्क दो ही था- 1. तेल कम्पनियों के घाटे को घटाने के लिये तेल के मूल्य में वृद्धि जरूरी है। 2. देश के राजकोषीय घाटे को सुधारने के लिये, इसके अलावा और कोर्इ रास्ता नहीं है।

‘घाटा दिखा कर मुनाफा कमाने की तरकीब’ में हमने लिखा- ”आर्इये, इन तर्कों में हल्का सा चीरा लगायें और देखें कि उदारीकरण का सारा बोझ किस पर पड़ रहा है(?) और राष्ट्रीय कम्पनियों तथा सरकार की कटोरी में कितना मलार्इ(?) और तेल उत्पादन को घटाने के लिये सरकार क्या कर रही है?” जो 489 अरब डालर के आयात में 156 अरब डालर का है।

तीसरे सवाल के जवाब में हमारा सिर्फ इतना ही कहना है कि तेल आयात के मामले में सरकार की नीति अमेरिकी दबाव में है और कोल ब्लाक आबंटन की तरह ही सरकार राष्ट्रीयकरण की ओट में, निजीकरण को बढ़ावा दे रही है। अपनी मुद्रा में आयातित तेल का भुगतान करने के प्रस्ताव की अनदेखी कर डालर में भुगतान कर अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ बढ़ाने का काम कर रही है। हमारा अनुमानित राजकोषीय घाटा वर्ष 2011-12 में 4.6 से बढ़कर 5.76 प्रतिशत हो गया है। इसी घाटे को घटाने का शोर मनमोहन सरकार मचा रही है।

शेष दो सवालों का जवाब हमें विस्तार से देना होगा।

सरकार का तर्क है कि तेल कम्पनियां की अण्डर रिकवरी -न्यूनतम प्राप्तियों का भारी बोझ राजकोष को उठाना पड़ रहा है। वर्ष 2010-11 में यह घाटा 1,71,140 करोड़ था। मतलब, तेल कम्पनियों के घाटे को पूरा करने के लिये सरकार लुट रही है। और वह ऐसा सिर्फ इसलिये कर रही है कि तेल और तेल उत्पाद आम उपभोक्ता को सस्ते में मिल सके। कि दशकों से वह ऐसा करती रही, अब वह ऐसा करना नहीं चाहती है।

तर्क शानदार है कि ”अब राजकोष इतना बड़ा वार्षिक घाटा उठाने की स्थिति में नहीं है।”

आम जनता के हित में, राजकोष को यह घाटा उठाना चाहिये या नहीं उठाना चाहिये? पर हम कोर्इ तर्क नहीं करेंगे। हम सरकार के इस बात को मान लेते हैं कि ”यह घाटा उठाना नहीं चाहिये।” लेकिन तब न, जब वास्तव में घाटा हो रहा हो। और यदि घाटा नहीं हो रहा है, तब?

वास्वत में अंडररिकवरीज -न्यूनतम प्राप्ति- का नुक्सान, जो दिखाया जा रहा है, वह वास्वविक नहीं, अनुमानित है। या यूं कह लीजिये कि पूरी तरह खयाली है। यह आयात मूल्य और खुदरा मूल् के बीच का अंतर है।

भारत ज्यादातर कच्चे तेल का आयात करता है और उसका शोधन कार्य देश में किया जाता है। आजादी के बाद, विदेशी तेल कम्पनियों के राष्ट्रीयकरण से पहले, देश में एस्सो, बर्मा शैल और काल्टटैक्स जैसी विदेशी कम्पनियां तेल उत्पाद बेचा करती थीं, यही कारण है कि वे तेल कम्पनियां तेल उत्पादकों की अंतर्राष्ट्रीय कीमत को आधार बना कर मूल्य, लाभ-हानि का निर्धारण करती थी। राष्ट्रीयकरण के बाद भी तेल कम्पनियां, आज तब इसी नियम का पालन कर रही हैं, परिणाम स्वरूप उत्पादक कम्पनियों का घाटा आसमान छूता हुआ नजर आता है, जबकि राष्ट्रीकरण के बाद घरेलू बाजार में तेल उत्पादों का मूल्य, कच्चे तेल के आयात पर आया खर्च और घरेलू तेल शोधन लागत को जोड़ कर मूल्य एवं लाभ-हानि का निर्धारण होना चाहिये। जोकि नहीं किया जाता। सरकार और तेल कम्पनियों ने घाटा दिखा कर राजकोष को लूटने का काम कर रही हैं।

सरकार पहले इन घाटों की पूर्ति के नाम पर राष्ट्रीय कम्पनियों को लाभ पहुंचाती रही, अब उस पूर्ति को बंद कर, सीधे आम जनता से, मूल्य बढ़ा कर लाभ कमा रही है। सरकार और कम्पनियां पहले भी फायदे में थीं, आज यह फायदा पहले से ज्यादा हो गया है। पहले भी आम जनता को संचित धन लुटाया जा रहा था, आज भी आम जनता को ही लूटा जा रहा है। मगर इस मूल्य वृद्धि का एक घातक परिणाम यह हो रहा है कि परिवहन खर्च भी बढ़ रहा है, जिसका सीधा प्रभाव बाजार में हो रहे मूल्य वृद्धि के रूप में हमारे सामने है। पहले तेल कम्पनियों को लाभ पहुंचाया जा रहा था, अब इन कम्पनियों के साथ अन्य उत्पादकों को भी लाभ पहुंचाया जा रहा है। आम जनता पर एकसाथ दो बोझ लादा जा रहा है। राष्ट्रीय कम्पनियों के साथ निजी क्षेत्र को भी भीरी मुनाफा कमाने का अवसर बना दिया गया है। यही नहीं, अब सीधे तौर पर निजी कम्पनियों को तेल के उत्पादन और शोधन से जोड़ा जा रहा है। के0जी0बेसिन का मामला भी हमारे सामने है। अब तो मंत्रालय भी निजी कम्पनियों की ओर देख कर बनाया जाने लगा है।

लोकसभा में एक सवाल का जवाब देते हुए तात्कालिक पेट्रोलियम मंत्री ने सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कम्पनियों के कर अदा करने के बाद मुनाफे का विवरण दिया कि ”वर्ष 2010-11 में ओएनजीसी ने 18,924 करोड़, आर्इओसी ने 7,445 करोड़, बीपीसीएल ने 1,547 करोड़ और एचपीसीएल ने 1,539 करोड़ रूपये का मुनाफा कमाया।” लोकसभा में दर्ज यह जवाब यदि सही है, तो तेल कम्पनियों को नुक्सान कैसे हो रहा है? और यदि नुक्सान नहीं हो रहा है, तो सरकार उन्हें सबसिडियां क्यों दे रही है?

आर्इये, सबसिडियों के बारे में भी जान लें। संसदीय समिति की रिपोर्ट यह बताती है कि वर्ष 2010-11 में केंद्र सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर करों और महसूलों की मदद से 1,36,479 करोड़ रूपये राजस्व प्राप्त किये। इसके अलावा राज्य सरकारों ने इसी तरह 88,997 करोड़ रूपये के राजस्व वसूले। कुल मिला कर 2,25,494 करोड़ रूपये का राजस्व एक साल में वसूल किया गया। केंद्र सरकार के द्वारा तेलकम्पनियों को दी गयी कुल सबसिडियां, जिसमें तेल बांड का खर्च भी शामिल है, 43,926 करोड़ रूपये है। इस तरह सभी छूटों के बाद भी सरकार के हाथ 92,571 करोड़ रूपये की कमार्इ बचती है। फिर छूट का सवाल कहां है? कौन किसे छूट दे रहा है? सच यह है कि सरकार और राष्ट्रीय कम्पनियां भरपूर लाभ कमा रही हैं। घाटा दिखा कर लाभ कमा रही हैं। आंकड़े यह बताते हैं कि वर्ष 2009-10 में जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल 23.17 रूपये प्रतिलीटर था, तब हम यहां औसत 47.93 रूपये प्रतिलीटर चुका कर उसे खरीद रहे थे। डीजल जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 22.7 रूपये प्रतिलीटर बिक रहा था, हमें 38.1 रूपये प्रतिलीटर में बेचा जा रहा था। घरेलू गैस जब 177.14 एवं प्रति सिलेंडर था, हम 210.35 रूपये में खरीद रहे थे। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें गिरी हैं। मगर राष्ट्रीय बाजार में बढ़ाने और घटाने की नौटंकी के साथ 5.50 रूपये प्रतिलीटर की वृद्धि हुर्इ है। अब सराकर के द्वारा तेल कम्पनियों को लाभ पहुंचाने का अंदाजा लगाया जा सकता है। सरकार आम जनता पर जो बोझ लाद रही है, उसे पीछे की बाजारवादी सोच को समझा जा सकता है। इस बात को भी समझा जा सकता है कि मनमोहन सिंह जी आम जनता को ‘उदारीकरण’ से कितना लाभ पहुंचा रहे हैं?

यह तो कमाल ही है कि उदारीकरण का सारा लाभ आम जनता के लिये है, तो वह इतना बेहाल क्यों है? राजकोषीय घाटा क्यों बढ़ रहा है? इस घाटे का मुनाफा कहां जा रहा है?

इस समय देश का राजकोषीय घाटा 5,21,980 करोड़ रूपये है, यानी सकल घरेलू उत्पाद का 5.9 प्रतिशत। बजट दस्तावेजों से यह जानकारी मिलती है कि सरकार के द्वारा इस साल 5,29,432 करोड़ रूपये का राजस्व माफ किया गया। घोषित राजकोषीय घाटे से 8,000 करोड़ ज्यादा। राजस्व माफी आम जनता के हिस्से तो आयी नहीं, फिर किसे दिया गया? देश और आम जनता के कीमत पर सरकार अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी को आकर्षित करने में लगी है। वह निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों को एक साथ खोल रही है, ताकि सार्वजनिक क्षेत्रों पर निजी वित्तीय पूंजी का वर्चस्व कायम हो सके। प्रधानमंत्री जी का तर्क पेश है कि निगरानी समिति का गठन किया गया है कि सकल घरेलू उत्पादन दर में आयी गिरावट और सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था को गति देने के लिये यह कदम उठाया जा रहा है। समिति उन सभी सरकारी एवं गैर-सरकारी परियोजनाओं पर निगरानी ‘राष्ट्रीय विनिर्माण प्रतियोगिता परिषद’ करेगी और निजी क्षेत्रों की परियोजनाओं की निगरानी रिपोर्ट की समीक्षा प्रधानमंत्री कार्यालय के द्वारा की जायेगी। मतलब, प्रधानमंत्री जी ही विकास योजनओं के दरोगा होंगे। वो सरकारी खर्च पर प्रोजेक्ट बना कर, उसकी नीलामी भी करेंगे। उनकी विकास योजनओं की सबसे बड़ी बाधा भू-अधिग्रहण है, जिससे देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी का हित जुडा है। जिनकी गांठ के खिलाफ बटमारी के साथ, पांव के नीचे से जमीन भी खींचेंगे।

उनकी यह खींचतान उनके न रहने के बाद भी, बच जायेगी, क्योंकि बाजारवाद की पटरी पर आर्थिक विकास योजनायें ऐसे ही दौड़ती है।

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