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वैश्विक व्यवस्था के टूटने का खतरा क्यों उठाया जा रहा है?

soch ki jameenदुनिया का जो नजारा हमारे सामने है, वह किसी दलदल में फंसे भारी-भरकम उस जानवर की तरह है, जिसकी छटपटाहट निकलने की, उसे और भी गहरे में उतार रही है। जो किनारे खड़े हैं, वह भी उस दलदल में फंसे हैं, मगर उन्हें इस बात की खबर नहीं है, और ऐसे लोग बहुत ही कम हैं, बमुशिकल एक प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं, जो अपनी व्यवस्था के डूबने का नजारा, इस यकीन के साथ देख रहे हैं कि वो बच जायेंगे। पिछले 20 सालों में दुनिया के 1 प्रतिशत अमीरों के लाभ में 60 प्रतिशत की वृद्धि हुर्इ है। आक्सफेम की रिपोर्ट के अनुसार- ”दुनिया के 100 बड़े अमीरों का मुनाफा 2012 में, 240 बिलियन डालर है। जिससे दुनिया की गरीबी को 4 बार मिटाया जा सकता है।” मगर, दुनिया के सर्वाधिक धनी लोग, गरीबी, मिटाने की बात तो छोड़ दीजिये, उस व्यवस्था को भी मिटने से बचाने के लिये हाथ-पांव तक हिलाना नहीं चाहते हैं, जिस व्यवस्था ने इनके लूट को मुनाफा बनाया और मुनो को वैधानिकता का जामा पहनाया। अपनी राहें बंद कर उन्हें उस मुकाम पर पहुंचाया जहां वो विश्वव्यापी वित्तीय संकट का लाभ उठा रहे हैं। जिसने आम आदमी के जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है।

वैश्विक मंदी की पहली दस्तक जब अमेरिका में हुर्इ, आम आदमी को उसके प्रभाव से बचाने के बजाये, अमेरिकी सरकार ने दिवालिया होते बैंकों, वित्तीय एवं औधोगिक इकार्इयों को बचाने के लिये बेलआउट पैकेजों की घोषणां की, जिसका पूरा लाभ कारपोरेट जगत को मिला, जिसकी वजह से अमेरिकी मंदी की शुरूआत हुर्इ और जिसने अपने लाभ के लिये आम अमेरिकी को कर्ज के जाल में फंसाया। राकफेलर की योजना से, भारी मुनाफा कमाया। राकफेलर की योजना आम अमेरिकी को बैंकों से, उपभोक्ता सामानों की खरीदी के लिये, आसान कर्ज दिलाने की थी। ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाने के लिये, आम उपभोक्ता को उसकी क्षमता से बड़ा कर्ज दिला दिया गया। परिणाम हमारे सामने मंदी के पहले दौर में ही वेतन में कटौती, सामाजिक सुविधाओं में कमी और बढ़ती बेरोजगारी दर की तरह ही, आम जनता दिवालिया और आवासहीन होती चली गयी। उसके ऊपर राष्ट्रीय कर्ज के अलावा वह कर्ज भी लद गया जिसे जमा करने की उसकी क्षमता नहीं थी। आम जनता सड़कों पर आ गयी, ”आकोपायी वालस्ट्रीट मोमेण्ट” खड़ा हो गया कि ”हम 99 प्रतिशत हैं।” कि ”व्हार्इट हाउस, सीनेट और वालस्ट्रीट वास्तविक आंतकवादी हैं।”

अमेरिकी सरकार के द्वारा जिन राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बेल आउट पैकेज दिया गया था, उनमें से ज्यादातर औधोगिक इकार्इयों ने सस्ते मजदूरी और सस्ते कच्चेमाल की वजह से चीन में अपनी औधोगिक इकार्इयों को स्थानांतरित कर दिया। अब तक का सबसे बड़ा व्यावसायिक घाटा उसे उठाना पड़ा और औधोगिक पलायन की वजह से उसकी घरेलू वित्तव्यवस्था तबाह हो गयी। अमेरिकी बाजार पर विदेशी माल का कब्जा है। निजी कम्पनियों ने ही अमेरिका को निर्यातक देश से आयात करने वाला देश बना दिया। अब अमेरिकी साम्राज्य की नीतियां का निर्धारण देश की चुनी हुर्इ सरकार नहीं, बलिक बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और कारपोरेशनों के द्वारा होता है।

राज्य और दुनिया की चुनी हुर्इ सरकारों के सामने गंभीर संकट है। उसकी सम्प्रभुसत्ता का हस्तांतरण हो गया है। बाजार से उसकी साझेदारी का ही यह परिणाम है कि पूंजी राज्य के नियंत्रण से बाहर हो गयी है और उसने अपनी वरियता कायम कर ली है। पूंजी का निजी क्षेत्रों में केंदि्रयकरण हो गया है। जिसे बनाये रखने के लिये यूरोपीय देश और अमेरिका की सरकारें वैश्विक मंदी और उसकी समस्याओं पर बहंस तो करती है, लेकिन समाधान के रूप में, जो है उसे ही बनाये रखने का प्रस्ताव रखती है। उनके लिये आम जनता की बदहाली और जनसमस्याओं का समाधान से ज्यादा, मौजूदा व्यवस्था को बनाये रखना जरूरी बन जाता है। उन्होंने लोक कल्याणकारी राज्य के आदर्श को पीछे छोड़ दिया है।

यदि राज्य और उनकी सरकारें सिर्फ बाजार की चाकरी के लिये हैं, तो आम जनता के लिये उनकी जरूरत क्या है?

क्या जनतंत्र की सरकारें अपनी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक जिम्मेदारियों को निर्वाह कर रही हैं?

अपने विकास के दौरान राज्य एक शोषक इकार्इ रही है, मगर उसके होने की वजह सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक जिम्मेदारियों से जुड़ी रही है। जिसका उल्लंघन अब खुलेआम किया जा रहा हैं राज्य को एक व्यावसायिक इकार्इ बना कर, उसको उसके होने के सही तर्कों से काट दिया गया है। अंजाने ही बाजारवादियों ने राज् के होने का सामाजिक आधार उससे छीन लिया है। यही कारण है कि यह सवाल खड़ा हो गया है कि जिस समाजव्यवस्था में आम आदमी की न्यूनतम जरूरतें भी पूरी नहीं होतीं, उस व्यवस्था के होने का मतलब क्या है?

जब सरकारें जनसमस्याओं का समाधान नहीं कर सकतीं और उनकी संरचनायें टूट रही हैं, तब उनके सही होने की वजह कहां है? क्या 1 प्रतिशत लोगों के लिये 99 प्रतिशत लोगों को खिलाफ खड़ा होना जायज है? मगर स्थितियां कुछ ऐसी ही हैं। वित्तीय पूंजी के सामने लाचार हो गयी है। उनकी लाचारी, उनकी अपनी ही संरचना है। राज्य और सरकारें विशालतम कारपोरेशनों के जाल में फंस गयी है।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर 22.2 टि्रलियन डालर का कर्ज है, जो उसके सकल घरेलू उत्पादन का 103 प्रतिशत है। यह सत्य चौंकाने वाला है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की प्रचारित मजबूती, उसकी अपनी क्षमता से ज्यादा उसकी अर्थव्यवस्था में हुए विदेशी पूंजी निवेश की वजह से है। जो बदलते हुए वैश्विक वित्तीय संतुलन की वजह से, अब उसके पक्ष में नहीं है। विश्वव्यापी मंदी ने उसे खुले आम कर दिया हैं चीन का कर्ज उसकी अर्थव्यवस्था पर इतना बड़ा बोझ है कि प्रतिदिन 100 मिलियन डालर अमेरिका ब्याज के रूप में चीन को भुगतान करता है। जिस मुक्त बाजार का झण्डा लिये अमेरिकी सरकार तीसरी दुनिया के देशों की वित्तव्यवस्था पर अधिकार जमाने के अभियान में निकला है, उसी मुक्त बाजारवादी वित्त व्यवस्था ने उसकी घरेलू अर्थव्यवस्था को खोखला कर दिया है। चीन यह मान कर चल रहा है कि अमेरिका की सरकार चाह कर भी उसके कर्ज का भुगतान नहीं कर सकती। यही कारण है कि उसने अपने कर्ज को ‘इक्विटि’ में बदल दिया है। अघोषित रूप से वह अमेरिकी अर्थव्यवस्था का वैधानिक साझेदार है। अमेरिका अब चीन का वित्तीय उपनिवेश बन गया है।

आज यदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था दिवालिया हो जाती है, तो अमेरिका के कर्इ राज्यों पर चीन का वित्तीय अधिकार होगा। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में अमेरिकी डालर और पेट्रो डालर के सामने द्विपक्षीय व्यापार में अपनी मुद्रा का उपयोग और चीनी मुद्रा में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार की दी गयी सुविधा का प्रभाव भी अमेरिकी वित्तव्यवस्था पर पड़ने लगा है। अमेरिकी फेड़रल रिजर्व ने घोषणां की है कि ”अब वह चीन के बैंकों को अमेरिका के बैंकों को खरीदने की अनुमति दे देगा।” मतलब आने वाले कल में फेडरल रिजर्व के द्वारा अमेरिकी डालर को छापने के एकाधिकार पर सवालों का खड़ा होना तय है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था का संतुलन न सिर्फ बिगड़ गया है, उस पर से सरकारी नियंत्रण भी समाप्त होता जा रहा है।

यूरोपीय अर्थव्यवस्थ की हालत अमेरिकी अर्थव्यवस्था से भी बुरी है। उस पर विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष का अधिकार हो गया है। सरकारें इन्हीं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के निर्देशों का पालन कर रही हैं। यूरोपीय कमीशन और यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक यूरोपीय संघ के देशों की सरकार के लिये एक बड़े खतरे में बदल गयी हैं। सही अर्थों में बैंकों और उनके सरपरस्त कारपोरेशनों के द्वारा ही सराकरें चलायी जा रही हैं। कर, कर्ज और कटौतियों का बोझ आम जनता पर इतना बढ़ गया है कि वो अपने देश की सरकार ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इ और मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ सड़कों पर है। ग्रीस का दिवालिया होना और यूरोपीय संघ का टूटना लगभग तय है। यूरोप की सबसे बड़ी जर्मनी की अर्थव्यवस्था भी धीरे-धीरे संकटग्रस्त होती जा रही है। वहां भी मुक्त बाजारवादी वित्तव्यवस्था और यूरोपीय संघ के खिलाफ लोग सड़कों पर आ गया है। जर्मनी के द्वारा फ्रांस और अमेरिका से अपने स्वर्ण भण्डार को वापस लाने के निर्णय ने लोगों को आशंकित कर दिया है। विश्लेषकों का अनुमान है कि जर्मनी यूरोपीय संघ की सदस्यता छोड़ सकता है। वह ‘यूरो-डालर’ के बजाये अपनी राष्ट्रीय मुद्रा की ओर वापस होने की तैयारी कर रहा है। यूरोजोन के सकल घरेलू उत्पादन में जर्मनी की हिस्सेदारी 28 प्रतिशत है। गये साल अपनी अर्थव्यवस्था में पूंजी निवेश के यिले वह चीन से आग्रह करता रहा है। जर्मन चांसलर लगभग हर दूसरे महीने चीन की यात्रा की। यूरोप की वित्तव्यवस्था में चीन की हिस्सेदारी है और वित्तीय संतुलन उसके पक्ष में है। यूरोपीय बाजार में वह सबसे बड़ा निर्यातक देश है। माना यही जा रहा है कि यदि चीन जर्मनी में पूंजी निवेश करता है -जिसकी जरूरत है- तो जर्मनी यूरोपीय संघ को छोड़ने का निर्णय ले सकता है।

अमेरिकी अर्थव्यवस्था की तरह ही, यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट दर्ज की गयी है। यह चौंकाने वाला सच है कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के द्वारा वित्तीय रूप से संकटग्रस्त यूरोपीय देशों को दिये गये बेल आउट पैकेजों का लाभ उन देशों के स्थान पर, उन इकार्इयों को मिला है, जिन्होंने कर्ज दिया। आप चाहें तो मान सकते हैं कि वर्तमान वैश्विक तंत्र में सहयोग भी उस देश की व्यवस्था पर अधिकार करने का जरिया है। यही कारण है कि आम जनता की बदहाली के बाद अब यूरोप और अमेरिका की सरकारें बदहाल हो गयी हैं। कल तक जिन वैश्विक नीतियों से अमेरिकी साम्राज्य और यूरोपीय देश तीसरी दुनिया के देशों का दोहन कर रही थी, अब उन्हीं नीतियों से उनकी वित्तव्यवस्था पर अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां अपना आधिपत्य कायम कर चुकी हैं।

‘वैश्विक वित्तव्यवस्था की भीतरी बुनावट’ के अंतर्गत हमने पिछले अंक में ही यह बात स्पष्ट किया है कि 43,000 से ज्यादा दुनिया के बहुराष्ट्रीय कारपोरेशनों को 1318 ज्वार्इंट कारपोरेशन नियंत्रित करती है, जिन पर 147 विशालतम कारपोरेशनों का नियंत्रण है। इस तरह, सारी दुनिया की ”वैश्विक अर्थव्यवस्था” पर 1 प्रतिशत से भी कम लोगों का नियंत्रण है।

यूरोप और अमेरिका में, जहां विकसित देशों का समूह बसता है, और वहां, जहां 20वीं शताब्दी के अंतिम दशक में समाजवादी देशों का पतन हुआ, वहां की अर्थव्यवस्था पर राज्य के जरिये इन कारपोरेशनों ने, अपना वर्चस्व कायम कर लिया है, जिनकी पकड़ तीसरी दुनिया के देशों पर भी है। जहां विकासशील और अविकसित देशों का समूह बसता है। जो सदियों से विकसित देशों की समृद्धि और उनके विकसित होने का आधार रहे हैं।

समाज के एक वर्ग के द्वारा बहुसंख्यक वर्ग और एक देश के द्वारा दूसरे देशों के शोषण पर टिकी राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्त व्यवस्था का वैश्विक संकट, निजी क्षेत्रों में पूंजी के केंद्रीयकरण का स्वाभाविक परिणाम है, जिसने आम जनता के जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है, और विकसित देशों की पूंजीवादी समाज व्यवस्था पर भी अब आफत आ गयी है, उनका असितत्व खतरे में है। बस सवाल एक ही है कि जिस व्यवस्था ने वित्तीय पूंजी को खुली छूट दी, उस व्यवस्था के टूटने का खतरा वह क्यों उठा रहा है? यह स्वाभाविक है, या वैश्विक मंदी की तरह ही संकट से लाभ उठाने की कोशिश है? ताकि सारी दुनिया पर और उसकी प्राकृतिक संपदा पर एकाधिकार कायम किया जा सके।

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