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आतंकवाद के खिलाफ हम कहां हैं?

rastriya vicharअजमल कसाब के बाद, अफजल गुरू को फांसी दे दी गयी। लाश भी जेल में ही दफन कर दिया गया। प्रतिक्रिया भी कुछ वैसी ही हुयी, जैसी उम्मीद की गयी थी। देर आये, दुरूस्त आये से लेकर आतंकवाद को कठोर चेतावनी तक कहा गया। समर्थन से लेकर, एहतियातन करफ्यू का सामना भी करना पड़ा। हम कह सकते हैं कि अल्प संख्यक समुदाय में न तो सन्नाटा पसरा, ना ही नाराजगी के स्वर फूटे। ऐसी आशंकायें सिर्फ राजनीतिक गलियारों में थी, जो अब भी यह मान कर चलते हैं कि समाज धर्म, सम्प्रदाय और जमातों में बंटा है। जिस बात को, इस्लामी आतंकवाद के उदय के साथ ही, आम जनता ने खारिज कर दिया है, फिरकेबाज राजनेता उसकी लकीरें पीटते रहते हैं। भारत में राजनेता और राजनीतिक दलों से ज्यादा समझदार देश की आम जनता है। यह भी है कि उसके अंदर जरूरत से ज्यादा धैर्य है। जिसका फायदा राजनीतिक दल और सरकार, मौका देख कर, उठाते हैं। शीतकालीन सत्र, से ठीक पहले अजमल कसाब को फांसी दी गयी और बजट सत्र से ठीक पहले अफजल गुरू को फांसी के फंदे से टांग दिया गया।

सरकार भावनात्मक मुददों को हवा दे रही है, इसलिये नहीं कि वह संवेदनशील हो गयी है, बल्कि इसलिये कि आम चुनाव में भावनात्मक मुददों से जनमानस प्रभावित होता है। आपातकाल के खिलाफ भड़की भावनाओं ने ही श्रीमती इंदीरा गांधी को सत्ता से बेदखल कर उन्हें फटा हुआ पोस्टर बना दिया था, और उनकी हत्या कके बाद के भावनात्मक ज्वार ने राजीव गांधी को दो तिहार्इ बहुमत दिला दिया। रामरथ पर सवार हो कर ही भाजपा दिल्ली तक पहुंची थी, और राजीव गांधी की हत्या के बाद की सहानुभूति ही कांग्रेस की वापसी है। राष्ट्रीय कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार के बिना, बिना चेहरे-मोहरे की जमात है। आज यदि सोनिया गांधी न हों, तो मनमोहन सिंह बिना हाथ-पांव के सखिशयत हैं। कांग्रेस में उनका कद राहुल गांधी से बड़ा नहीं है। वो अपनी जगह पर बैठे ही इसलिये हैं, कि आप आर्इये, हम खड़ा होने के लिये तैयार हैं।

बहर हाल, सरकार ही नहीं विपक्ष भी उन्हीं मुददों को हवा देती है, जो आम जनता की भावनाओं को झकझोर सके। गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने कांग्रेस के चिंतन शिविर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसी संगठनों को ‘हिंदू आतंकवादी’ कह दिया भाजपा भी नाराज हो गयी। सड़कों पर उतरने के लिये ललकारा जाने लगा। माफी मांगने और इस्तीफा देने की बातें की गयीं। जो होना था वही हुआ कि ”आतंकवाद की कोर्इ जाति या धर्म नहीं होती।” जिस बात को देश की आम जनता दशकों से प्रमाणित कर रही है, राजनीतिक दल उसे आज भी मुददा बनाते हैं।
कहा जाता है- ”आतंकवाद पर राजनीति नहीं होनी चाहिये।” या कि ”दहशतगर्दी सियाशी मुददा नहीं है।” जो भी सुनता है, वह सहमति में सिर हिला देता है। जबकि कहरने वालले और सुनने वालों को यह जानना चाहिये कि आतंकवाद पूरी तरह राजनीतिक समस्या है। जिसकी जड़ें भले ही समाज में, उसकी आर्थिक एवं सांस्कृतिक बुनावट में है। वास्तव में यह राजनीति से अलग नहीं है। सिर से पांव तक आज के बाजारवादी राजनीति का हिस्सा है। जिसकी नीतिगत शुरूआत औपनिवेशिक ताकतों ने की, और जिसे आधुनिक हथियार अमेरिकी सरकार और पशिचमी ताकतों ने बनाया। भारत के लिये इस्लमी आतंकवाद का खतरा अमेरिकी साम्राज्यवाद की देन है, जिस पर पाकिस्तान की सूरत लगी है। पाकिस्तान अमेरिकी मुखौटा है। कसाब या अफजल गुरू के जरिये, इसी मुखौटे को कड़ा संदेश दिया गया है, का प्रचार हो रहा है। केंद्र की सरकार आतंकवादियों के लिये उदार नहीं, सख्त है।

सरकार संसद की वैधानिक सर्वोच्चता भी प्रमाणित कर रही है, कि ”उस पर किया गया आतंकी हमला हमें बर्दास्त नहीं है।”

यह अच्छी बात है। ‘भारत माता की जय’ बोलने या संसद को देश की विधिक सर्वोच्च इकार्इ मानने में किसी को कोर्इ आपतित भी नहीं है। देश की आम जनता कभी भी आतंकवाद के पक्ष में नहीं रही, ना ही वह हथियार उठाने वालों के साथ है, मगर वह देश को बाजार और सरकार को कारपोरेशन बनाने के भी पक्ष में नहीं है। वह भ्रष्टाचार के खिलाफ है। वह सामाजिक असुरक्षा के खिलाफ है। बढ़ती हुर्इ महंगार्इ और आर्थिक अनिश्चयता के खिलाफ है। वह राजनीतिक एवं आर्थिक घोटालेबाजों के खिलाफ है। देश की संसद की सर्वोच्चता को खतरा आतंकवादियों से नहीं, बल्कि राजनीतिक और आर्थिक करारों से है, उन संधि और समझौतों से है जो देश को बाजार और सरकार को कारपोरेशनों में बदल रही है। यदि हम खतरों की बात करें, तो खतरा देश की मौजूदा आर्थिक एवं राजनीतिक ढांचे से है, जो लोकतंत्र और राज्य की लोक कल्याणकारी अवधारणाओं के खिलाफ है।

हम इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि संसद की सर्वोच्चता और देश की सम्प्रभुसत्ता को वास्तविक खतरा वित्तीय पूंजी से है, उन उदारवादी आर्थिक नीतियों से है, जो राज्य के नियंत्रण से पूंजी, प्राकृतिक संसाधन और उत्पादन के साधन को, बाहर निकाल रहे हैं। खतरा उनच ताकतों से है, जिनके नियंत्रण में आतंकी संगठन और आतंकवादी हैं। जो पेशेवर विद्रोही और पेशेवर आतंकी हैं। जिनका सरपरस्रूत अमेरिकी साम्राज्यवाद है। व्हार्इट हाउस, सीनेट और वालस्ट्रीट है। जिनके पीछे विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष है। यूरोपीय संघ और पतनशील व्यवस्था है। जिनसे हमारे संबंध रोज बेहतर हो रहे हैं। सबसे बुरी बात यह है कि आतंकवाद के खिलाफ, हम दुनिया के सबसे बड़े आतंकी देश के साथ हैं। जो दुनिया में आतंकवाद के खिलाफ दिखावटी लड़ार्इयां लड़ रहा है। पेशेवर आतंकवादियां को पेशेवर विद्रोही बना रहा है। लीबिया में जिन्हें वह समर्थन देता है, हथियार, डालर देकर कर्नल गददाफी के खिलाफ उनकी सरकार बनवाता है, माली में वो ही विद्रोही आतंकी बन जाते हैं, और वहां सैन्य अभियान की शुरूआत हो जाती है। सीरिया में जो हो रहा है, वह साम्राज्यवाद समर्थित आतंकी और विद्रोही कर रहे हैं, जिन्हें अमेरिका और पशिचमी देशों का समर्थन हासिल है। जिन विद्रोहियों के पांव सीरिया से उखड़ गये हैं, उन्हीं विद्रोही-विपक्ष को लेकर प्रवासी सरकार का गठन किया गया है।

पाकिस्तान के खिलाफ आतंकी हमलों का जवाब तो हाथ आये आतंकवादियों के लिये फांसी का फंदा है, मगर पाक सरपरस्ती में जीने वाले हाफिज सर्इद, मौलाना मसूद अजहर, जकी उर रहमान और दाउद इब्राहिम क लिये कोर्इ ठोस नीति नहीं है। ऐसी नीतिगत शून्यता वैश्विक स्तर पर हमसे जुड़ गयी है, क्योंकि सरकार आतंकवादी खतरों का प्रचार कर वित्तीय पूंजी के खतरे को छुपाने में लगी है। विपक्ष भी बाजारवाद, उदारीकरण जैसे मुददों से बच कर निकलती है, क्योंकि उसकी आर्थिक नीतियां भी वही हैं, जो वर्तमान सरकार की नीति है। भाजपा गुजरात को देश का माडल के रूप में पेश कर रही है और वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को यूरोपीय संघ और अमेरिकी सरकार का समर्थन हासिल है। उनके लिये वो वैकलिपक दुकान हैं। एफडीआर्इ का विरोध और महंगार्इ का शोर सिर्फ इसलिये है कि आम जनता को मतों में बदला जा सके। सामाजिक सुरक्षा और भ्रष्टाचार का मुददा विपक्ष की ऐसी खानापुर्शी है कि ‘हम धुले हुए दिखें।’ आतंकवाद के बारे में रवैया राजनीतिक लाभ उठाने की ‘समझदारी’ है। इसे ही वो आपस में कह रहे हैं कि ”आतंकवाद पर राजनीति न करें।”

”आतंकवादियों को सजा मिलनी चाहिये”, इस बात से किसी को कोर्इ आपतित नहीं है, मगर जिन्होंने आतंकवाद को जन्म दिया, जो आतंकवादी बनाते हैं, उनके खिलाफ भी अंतर्राष्ट्रीय मुहीम चलानी चाहिये। मगर, आतंकवाद के बारे में भारत का आंकलन पाकिस्तान के बेरियर पर रूक जाता है। जिन्होंने पाकिस्तान को आतंकी देश बनाया, अफगान-पाक सीमा पर आतंकी शिविर चलवाया, आतंकियों को प्रशिक्षित किया और आर्थिक सहयोग दिया, उन्हें हथियारों से लैस किया, उनके बारे में कड़ा तो क्या मुलायम संदेश भी नहीं दिया जाता। विरोध के स्वर फूटते ही नहीं। जिस क्यूबा को अमेरिकी साम्राज्य आतंकवादी देश करार देता है, उस क्यूबा के डाक्टर प्राकृतिक आपदा से पीडि़त देशों तक पहुंचते हैं। स्वास्थ्य, चिकित्सा, सामाजिक विकास योजनाओं के जरिये आम आदमी का हाथ बंटाते हैं। मगर अमेरिकी साम्राज्य की पहुंच दुनिया में घातक हथियारों से लैस उसकी फौज है। निजी सेना और आतंकवादी हैं। हथियारों का आतंक है। किसी भी देश की आंतरिक परिसिथतियों में जहर घोलना, उसे असिथर करना और अपने हितों के लिये सैन्य हस्तक्षेप करना उसकी नीति है।

विश्व परिदृश्य में, आतंकवाद के खिलाफ, कहीं न कहीं, हम अमेरिकी साम्राज्य और यूरोपीय देशों के साथ खड़े नजर आते हैं। जिन्होंने आतंकवाद को वैश्विक आधार दिया, उसे तीसरी दुनिया के देशों में फैलाया। यहां तक कि सरकारों को भी आतंकवाद समर्थक बनाया। आतंकवाद का खतरा साम्राज्वादी शकितयों के आगे-आगे, उनकी राह बनाता हुआ चलता है। भारत में आतंकवाद का वास्तविक खतरा इन्हीं ताकतों से है। अभी वो वैधानिक ताकतों के साथ मिल कर बाजार पर अपनी पकड़ बनाने में लगे हैं, राजनीतिक एवं आर्थिक सम्बंधों के जरिये काम चला रहे हैं, वित्तीय पूंजी को उस मुकाम पर पहुंचा रहे हैं, जहां वह पूरी तरह निर्णायक हो जाये। इस देश में वो आतंकवाद के बाड़े को इस तरह लगा रहे है। कि सरकार के बदलने और परिसिथतियों को अपने हितों से जोड़ने में मदद मिल सके।

भारत में आतंकवाद का खतरा प्रायोजित है। पिछले दो दशक के आतंकी हमलों को यदि हम देखें तो यह बात साफ तौर पर नजर आयेगी कि उसका उपयोग हमारे खिलाफ अपने राजनीतिक एवं आर्थिक हितों से जोड़ने के लिये किया गया है। देश के वास्तविक मुददे को गलत दिशा देने के लिये किया गया है। जिस संसद से हमारी राजनीतिक संवेदनायें जुड़ी हैं, उस संसद पर 13 दिसम्बर 2001 में, जिस दिन आतंकी हमला हुआ थ, उस दिन संसद में ‘ताबूत घोटाले’ पर बहंस हो रही थी। बहंस हंगामे में बदल गयी थी, और संसद के दोनों सदन को स्थगित कर दिया गया था। आज भी हमारी नीतियों को नियंत्रित करने, उसे अपने हितों से जोड़ने के लिये आतंकवाद का उपयोग किया जा रहा है। आज देश और संसद के सामने तो मुददे हैं, उसे आप जानते हैं, न तो घपले-घोटालों की कमी है, ना ही उन बहुराष्ट्रीय हितों की कमी है, जिनसे राजसत्ता को नियंत्रित किया जाता है। यह शर्मनाक है कि आंतकवाद के खिलाफ हम उनके साथ खड़े हैं, जो आतंकी देश हैं, यह जानते हुए कि भारत में आतंकवाद कभी भी निर्णायक बढ़त हासिल नहीं कर सकता, क्योंकि देश की आम जनता राजनीतिक दलों से ज्यादा समझदार है।

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