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देश को बाजार और हथियारों के दलदल में धंसाया क्यों जा रहा है?

rastriya mudda 2देश की यूपीए सरकार के खाते में भ्रष्टाचार के इतने मामले दर्ज हैं कि वह देश के आंतरिक ही नहीं बाहरी सुरक्ष के लिये खतरा बन चुकी है। एक भी मंत्रालय और एक भी प्रशासनिक विभाग ऐसा नहीं है, जिसके बारे में कहा जा सके कि वहां राष्ट्रीय हित सुरक्षित है। इटली की कम्पनी से अतिविशिष्ट लोगों के लिये की गयी ‘हेलीकाप्टर सौदे’ में दलाली का सवाल सराकर के साथ, सुरक्षा के मुददे को भी सवालों के दायरे में ला चुका है। हमारे लिये सवाल यह नहीं है कि पूर्व वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एस0पी0 त्यागी दोषी हैं या नहीं? सवाल यह भी नहीं है कि 3600 करोड़ के सौदे में 362 करोड़ रूपये की दलाली का बंटवारा कैसे हुआ? सवाल यह है कि देश्या और देशवासियों की सुरक्षा के लिये सरकार और सेना यदि दोषी है तो हम किस पर विश्वास करें? क्यों हम ऐसी व्यवस्था को ढोयें जिसमें दलाली कारोबार का हिस्सा हौ और जिन पर विश्वास करना मुशिकल है?

भारत के रक्षा समझौतों में दलाली का मुददा हमेशा अहम रहा है। सर्वाधिक चर्चित ‘बोफोर्स तोप घोटाला’, 64 करोड़ रूपये की दलाली है। आरोप लगे। कर्इ बड़े लोगों के साथ मि0 क्लीन कहे जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर भी छींटे पड़े। जांच एजेनिसयों के हाथ नाकामियां लगीं। आज भी सत्ता के गलियरे में मि0 क्लीन कहे जाने वाले रक्षा मंत्री ए0के0 एंटनी के सामने 362 करोड़ रूपये की दलाली का कीचड़ है। उन पर छीटे नहीं पड़ेंगे, यह तो माना ही नहीं जा सकता। उनके कार्यकाल में ही टैट्रा ट्रक सौदे में दलाली की पेशकश के बारे में, पूर्व सेना प्रमुख वी0के0 सिंह ने सवाल उठाया था। जिसकी जानकारी रक्षामंत्री एंटनी को भी उन्होंने दी थी। फ्रांस के साथ हुए, पनडुब्बी समझौते में हुए, घोटाले का जिक्र भी होता रहा है। निजी तौर पर रक्षामंत्री पर रक्षा समझौतों में देरी का अरोप है, जिसके चलते सैन्य उपकरण और गोला-बारूद की कमी भारतीय सेना की समस्या है।

रक्षामंत्री के पक्ष में विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद और कांग्रेस के बकबकिया चैनल के ‘दिग्गी’ दिगिवजय सिंह उतर चुके हैं। सरकार सख्त कार्यवाही का आश्वासन बांट रही है, एयरचीफ मार्शल त्यागी अपने को निर्दोष बता रहे हैं, विपक्ष सरकार को मुददों से घेर रही है, जोकि वह पहले से ही घिरी हुर्इ है। उसके पास गिरने और घिरने के लिये जगह की कमी नहीं हैं उसने सीबीआर्इ को जांच का मामला सौंप दिया है, जबकि उसके पास एफआर्इआर दर्ज करने का भी आधार नहीं है। वह जांच तब कर रही है, जब इटली में अगस्ता वेस्टलैण्ड हेलीकाप्टर सौदे में घूस -दलाली- देने के आरोप में फिनमैका निका कम्पनी के सीर्इओ गियूसेप्पे ओरसी को हिरासत में लिया जा चुका है। अतिविशिष्ट लोगों की हवार्इ सवारी के खरीदी में अतिविशिष्ट लोगों की गर्दन ही फंस रही है। इस खरीदी में रक्षा मंत्रालय से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय तक कडि़यां बिखरी पड़ी हैं, यह भी जानकारी मिली है, कि वित्त मंत्रालय इस सौदे के पक्ष में नहीं था। इटी महान है, बोफोर्स तोप की दलाली यदि 64 करोड़ की थी, तो हेलीकाप्टर की दलाली को 362 करोड़ तक पहुंचा दिया गया है। अच्छी और ऊंची उड़ान है, बस परेशानी यह है कि यह उड़ान अब सुरक्षित नहीं है। शेष सौदा से लेकर शेष भुगतान तक पर रोक लगा दी गयी है। रक्षामंत्री कहते हैं कि ”यदि दलाली प्रमाणित होती है तो वो कम्पनी को काली सूची में डाल देंगे, और सौदे को रदद कर दिया जायेगा। एक-एक पैसे की वसूली होगी।”

सवाल यही है कि यह सब कौन करेगा? भ्रष्टाचार के शिखर पर विराजमान मनमोहन सरकार या कोर्इ और? जो मौजूदा सरकार को खिसका कर अपनी सरकार बनाना चाहते हैं, उन्हीं के कार्यकाल में इसकी शुरूआत हुर्इ है, और ताबूत घोटाले से लेकर बुलेट प्रूफ जैकेट काण्ड का मामला भी एनडीए सरकार के समय सुर्खियां बनीं।

इटली के पूर्व प्रधानमंत्री सिल्वियो बरलुस्कोनी ने शानदार बात कही है कि ”कारोबार में रिश्वत एक प्रक्रिया है और पूरी दुनिया में इसका वजूद है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता। किसी को कमीशन देना कोर्इ अपराध नहीं है।”

इस तर्क के जायज या नाजायज होने पर बहंस की जा सकती है और आदर्श की बातें भी हो सकती हैं, मगर बाजारवादी विश्व की सोच यही है। सच भी यही है। बरलुस्कोनी अपने सेक्स स्कैण्डल के लिये जाने जाते हैं। उनके पास पतनशील राजनीति और पतनशील समाज व्यवस्था का अच्छा अनुभव है। इसलिये, सौदे की जांच चाहे इटली में हो, या इणिडया में, परिणाम वही निकलेगा जिसकी अपेक्षा हम कर सकते हैं। और यह अपेक्षा तो आपको करनी नहीं चाहिये कि ”दूध का दूध और पानी का पानी होगा।” सरकार और कारोबार दूध नहीं पानी है। वो अलग कैसे होंगे। दुनिया की मौजूदा सरकारें ही दागदार हैं। भारत उन्हीं दागदार सरकारों का मित्र देश है, जिसकी उपलब्धियों को आप मनमोहन सरकार के नाम से आंक सकते हैं। जिसने राजनीतिक एवं आर्थिक भ्रष्टाचार को विकास के लिये आवश्यक बुरार्इ के रूप में स्वीकार कर लिया है। सरकार की यह स्वीकृति इतनी व्यापक है कि देश सिर से लेकर पांव तक भ्रष्टाचार के ‘आवश्यक बुरार्इ’ में अपने लिये बड़ी जगह बना चुका है। मंत्री हों या संतरी, कोर्इ खास फर्क नहीं पड़ता, वो ‘देश की भलार्इ’ के लिये भ्रष्ट होने की प्रतिस्पर्धा में शामिल हैं। प्रतिस्पर्धा स्वस्थ है। यह उसी का कमाल है कि तोप हैलीकाप्टर बन गया है, और दालाली लाबिंग।

जिस बात को अमेरिकी कांग्रेस ‘लाबिंग’ के नाम पर जायज मानती है और निजी तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियां, जिसका ब्योरा अपने रिपोर्ट में पेश करती है। भारत में वह बवाल बना रहता है। अमेरिकी कम्पनियों एवं कारपोरेशनों के द्वारा भारतीय बाजार में अपनी पैठ बनाने के लिये की गर्इ लाबिंग के कर्इ मसले हैं। सरकार जांच कमीशन बैठा कर, न जाने किस चीज की जांच कर रही है, जिसका मकसद भले ही सच को सामने लाना है, मगर सच सामने है, अमेरिकी कम्पनियों के साथ अमेरिकी राजनयिक और व्यापारी संगठन है, उन्होंने भारतीय राजनयिक और सत्ता के गलियारे में पनपने वाले वर्ग को अपना बना लिया है, जिसकी पहुंच रूपये की तरह हर जगह है।

इसलिये, इटली सरकार यदि यह कहती है कि ”करार हुआ है तो कमीशन भी दिया गया है, मगर कमीशन खाने वालों का नाम नहीं बताया जा सकता, क्योंकि प्रकरण अदालत में है।” तो भारत सरकार क्या कर सकती है? हमारे देश की जांच कमीशन क्या कर सकती है? यही न कि सरकार ब्लैक लिस्टेड करने का प्रचार करे, करार को स्थगित करने का जिक्र करे, परदे का रंग रोज बदलती रहे और सुर्खियों के साथ परदे पर परदा गिराती है, अपनी जिम्मेदारियों का कड़ार्इ से पालन करे। तोप को हेलीकाप्टर बना दे, और हेलीकाप्टर को हवा में उड़ा दे। जो जिम्मेदार हैं, उनको जिम्मेदार बनाने के लिये जांच करे। जब तक जांच पूरी नहीं होती वो प्रधानमंत्री बने रहें, विदेशमंत्री बने रहें। सरकार बनी रहे। जिम्मेदार बने रहें।

अब आप पूछ सकते हैं कि ‘सरकार किसके प्रति जिम्मेदार है?’

सवाल का जवाब भी आपको मिलेगा कि ‘सरकार देश के प्रति जिम्मेदार है, देश की सुरक्षा और देशवासियों के प्रति जिम्मेदार है।’

यदि आपके पास और कोर्इ सवाल नहीं है, तो आप देश के अच्छे नागरिक है, भद्रजन हैं, सरकार से लेकर, सरकार को घेरने वाले तक आपके साथ हैं। मगर, आप यदि ऐसे सवाल करते हैं, जिनसे सरकार की बाजारवादी उलझनें बढ़ती हैं, यूरोप से लेकर अमेरिका तक की उलझनें बढ़ती हैं, राष्ट्रीय से लेकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के नाम पर मक्खी बैठती है, तो गलत बात है। आपके भद्र जन होने पर शक किया जा सकता है। आपके अच्छे नागरिक होने पर आफल आ सकती है। यही नहीं, देश की सुरक्षा पर भी खतरा आ सकता है। और यह तो आप जानते ही हैं कि दुनिया की कोर्इ भी ‘र्इमानदार सरकार’ इस बात को पसंद नहीं करेगी। उनकी र्इमानदारी कारोबारी हैं, और कारोबारियों से तो आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वो अपने लाभ के अलावा कुछ और सोचें। इसलिये, यह सोचना कि ‘दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिये’, गलत है।

यह सोचना कि कमीशन खोरी राजनीतिक भ्रष्टाचार है, गलत है। यह कारोबारी तहजीब है, बाजार में बाजारू होना है, गांधी बाबा के फोटो पर बरलुस्कोनी स्वामी को टांगना है। मुक्त बाजार को सरकारी निगरानी में अपने देश में लाना है। दुनिया का बाजारीकरण है। बोफोर्स तोप को अति विशिष्ट लोगों के लिये अगस्ता वेस्टलैण्ड हेलीकाप्टर बनाना है। वह भी भ्रष्टाचार था, यह भी भ्रष्टाचार है। वह भी कारोबार था, यह भी कारोबार है। इसलिये इटली की सरकार जानकारियों को छुपाये या भारत सरकार की, यह कारोबारी लुका-छिपी है। देश में भी ऐसे लोग हैं जो बड़ी बेशर्मी से कहने लगे हैं कि रक्षा समझौतों में दलाली को वैधानिक मान्यता दे देनी चाहिये। वैसे भी, भारत के लिये बड़े पैमाने पर हथियारों की खरीदी और अतिविशिष्ट लोगों के लिये सुरक्षा के नाम पर महंगी खरीददारी पशिचम देशों और अमेरिका का फैलाया हुआ जाल है, जिसमें देश की सरकार उलझ गयी है।

जिस जाल में अमेरिकी सरकार और यूरोपीय देश खुद फंस गये हैं, असुरक्षा का भय दिखा कर, सारी दुनिया को उस जाल में फंसाते जा रहे हैं। भारत के लिये उन्होंने चीन और पाकिस्तान के खतरे को बिछाया है, और इन देशों के सामने भारत एक बड़ा खतरा है। भारत की तरह पाक के वार्षिक बजट पर हथियारों का बोझ है। चीन का रक्षा बजट एशिया में सबसे बड़ा है। वह अमेरिका के एशियायी हितों में बाधा है। भारत हथियार उत्पादक देशों के लिये सबसे बड़ा बाजार है, जिसकी वित्तव्यवस्था पर वित्तीय पूंजी का कब्जा हो गया है। भारत का 70 प्रतिशत हथियार एवं रक्षा उपकरण पूर्व सोवियत संघ और अब रूस से आता है। अमेरिका और यूरोपीय देश अब घुसपैठ कर रहे हैं। इसलिये युद्ध की नयी आशंकायें बढ़ार्इ जा रही हैं। यह भी हो रहा है कि सरकार पूर्व के सभी करारों को रदद कर दे और नयी प्रतिस्पर्धा के लिये जगह बनाये, ताकि हथियारों के बाजार की हरियाली भारत में भी यूरोप और अमेरिका के यिले लौट आये, जिसकी लाबिंग में फ्रांस के राष्ट्रपति और बि्रटिश प्रधानमंत्री भारत की यात्रा कर रहे हैं। फ्रांस के पास राफेल लड़ाकू विमान है, तो बि्रटेन के पास यूरो फाइटर है। अमेरिकी पेण्टागन भारत के साथ नजदीकी रिश्ते बनाने और तकनिकी जानकारी के साथ हथियारों का सौदा करे की पेशकश पहले ही कर चुका है। हेलीकाप्टर रक्षा सौदा नहीं है, मगर निशाने पर अब रक्षा समझौता ही है। हथियारों से सुरक्षा पाने का खयाल प्रचारित हो रहा है।

सवाल यह है कि अमेरिका अपने वैश्विक सामरिक क्षमता के बाद भी हथियारों के बल पर खुद को सुरक्षित नहीं रख सका है, तो भारत हथियारों से अपनी सुरक्षा कैसे सुनिशिचत कर सकता है?

सवाल यह है कि जिन बाजारवादी नीतियों की वजह से यूरोप और अमेरिकी वित्तव्यवस्था डूब रही है, उन्हीं नीतियों से भारत अपना निर्माण कैसे कर सकता है?

सवाल यह है कि दलाली क्या वास्तव में कारोबारी तहजीब है? यदि ‘हां’ तो हाय तौबा क्यों है? और ‘नहीं’ तो देश और देशवासियों को बाजार के दलदल में धंसाया क्यों जा रहा है?

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