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कामगरों के हक और हड़ताल की दिशा

rastriya muddaमजदूरों और कर्मचारियों के हम और हड़ताल की बात जब भी होती है, सरकार और मीडिया राष्ट्रीय सम्पतित की क्षति और वित्तीय हानि का जिक्र करना नहीं भूलती है। आम जनता की असुविधाओं को प्रचार इस तरह किया जाता है जैसे सरकारें आम लोगों के फिक्र में दुबरा रही हैं, और हड़ताली मजदूर-कर्मचारी खा-पी कर मोटाये ऐसे लोग हैं, जो असुविधा और नुक्सान पहुंचाने के लिये सड़कों पर उतर आये हैं। आगजनी, लूटमार, का उन्हें शौक है। छपी हुइ खबरों को देख कर ऐसा लगता है जैसे आम जनता जन-विरोधी नीतियों के विरोध को गलत मानती है, मतलब, वह समाज के सबसे बड़े वर्ग के हक और हड़ताल के खिलाफ है।

क्या वास्तव में ऐसा है?

क्या क्षति और हानि वास्तविक हैं?

क्या देश की आम जनता सरकार की जनविरोधी वित्तीय नीतियों और राजनीतिक घपले और घोटालों की वजह से उठा रही है, वह हडताल या बंद की क्षति से कम है?

क्या राष्ट्रीय सम्पतित का निजी करण देश ओर समाज के हित में है?

विवादहीन रूप से हम यह कह सकते हैं, कि समाज के बहुसंख्यक वर्ग का हित ही सामाजिक विकास की वास्तविक दिशा है, इसलिये आम जनता के हितों को सुरक्षित करना ही सरकार के होने की वजह है। यदि, सरकार इन जिम्मेदारियों का निर्वाह नहीं करती है, तो वह जन विरोधी ही नहीं राष्ट्रविरोधी भी है। मगर, प्रामाणित यह किया जाता है, कि हड़ताल से आम जनता और देश को भारी नुक्सान उठाना पड़ा है। यही नहीं, हड़ताल से आम जनता और देश को भारी नुक्सान उठाना पड़ा है। यही नहीं, हड़ताल को असंवैधानिक करार दिया जाता है।

20 और 21 फरवरी को, देश की 11 बड़ी ट्रेड़ यूनियनों के द्वार आहुत, दो दिवसीय हड़ताल को यदि ”अभूतपूर्व” बताया गया तो, दूसरे निद अखबारों की सुर्खियां बनी ”महाबंद’ में धधका नोएड” ”अंबाला में यूनियन नेता पर बस चढ़ार्इ” कि ”हिंसक हड़ताली बने दंगार्इ”। यह भी जानकारियां दी गयीं कि बैंकों में 40 लाख चेक अंटके, 25 हजार करोड़ रूपये का लेन-देन हुआ बाधित। कि हड़ताल से 26 हजार करोड़ रूपये तक के वित्तीय नुक्सान की आशंका। तस्वीरें भी जलती हुर्इ कारों और तोड़-फोड़ की छपी। जन विरोधी और मजदूर विरोधी सरकार की नीतियों का जिक्र थोड़े में हुआ। इस बात का जिक्र भी थोड़े में हुआ कि ट्रेड यूनियनों ने जहां एक ओर अपनी एकजुटता दिखार्इ, वहीं दूसरी ओर उन्होंने राजनीतिक दलों से कम हुए अपने सरोकार को भी प्रदर्शित कर दिया। सत्तारूढ़ और विपक्ष के मजदूर विरोधी राजनीतिक दलों के ट्रेड यूनियन भी इस हड़ताल में शामिल हुए।

हम यह नहीं कहेंगे कि भारत का मजदूर वर्ग वर्गगत राजनीतिक चेतना से पूरी तरह लैस है।

हम यह भी नहीं कहेंगे कि सभी ट्रेड यूनियानों के बीच समझ की साझेदारी कायम हो गयी है।

मगर, यह तो साफ है, कि श्रमिक वर्ग और ट्रेड यूनियनों में इस समझदारी की शुरूआत हो गयी है, और उन्होंने जान लिया है कि वर्तमान केंद्रीय सरकार की आर्थिक नीतियों का संगठित विरोध जरूरी है। कि महंगार्इ महत्वपूर्ण मुददा है। जिसका समाधान सरकार के पास नहीं है। बाजारवादी निजीकरण के जरिये वित्तीय विकास के जिस लक्ष्य को पाने की कोशिश की जा रही है, और वर्तमान अर्थव्यवस्था की जैसी लड़खड़ाती सी स्थिति है, वह इस बात का प्रमाण है कि सरकार की आर्थिक नीतियां सिर के बल खड़ी हैं। यदि उस लक्ष्यय को पा भी लिया गया तो आम जनता को उसका लाभ मिलेगा, ना ही अर्थव्यवस्था की लड़खड़ाहट खत्म हो सकती है। पूंजी निवेश की जरूरतें और उसके पीने की लत और बढ़ जायेगी। यूरोप और अमेरिकी अर्थव्यवस्था में यही हो रहा है। वास्तव में यह राज्य की सरकारों के हाथों से वित्तीय शकितयों का घातक हस्तांतरण है। जिसे रोकने का काम देश की आम जनता और कामगर वर्ग ही कर सकता है। जिस पर इन बाजारवादी नीतियों का सबसे घातक प्रमाण पड़ रहा हैं उसके सामने सड़कों पर आने के अलावा और कोर्इ रास्ता ही नहीं बचा है।

दो दिवसीय हड़ताल के खिलाफ सरकार, व्यापारी संगठन और औधोगिक घरानों की प्रतिक्रिया एक है। सरकार यह प्रमाणित करने में लगी है कि इससे वित्तीय विकास की दिशा और कमजोर पड़ते विकास दर पर घातक प्रभाव पड़ेगा। औधोगिक घराने और व्यापारी संगठनों की चिंतायें बढ़ गयी हैं। उनके लिये यह सबसे बुरी खबर है, कि कल तक भ्रष्टाचार और सामाजिक असुरक्षा के विरूद्ध आम जनता सड़कों पर आ रही थी, अब वह औधोगिक मजदूर भी सड़कों पर आ गये हैं। बैंक, बीमा एवं परिवहन कर्मचारियों ने काम रोक दिया है। कि पूंजीनिवेश के लिये भारत का औधोगिक वातावरण बिगड़ रहा है। कि बाजार में बाजारवादी सोच के खिलाफ लोग लामबद्ध हो रहे हैं। कि मजदूर और श्रमिक वर्ग सिर्फ अपने अधिकारों की मांग ही नहीं कर रहा है, वह जनविरोधी नीति और बढ़ते हुए बाजारभाव के भी खिलाफ है। कि उस सरकार की मुशिकलें बढ़ रही हैं, जो उनके हितों की पोषक है।

आर्थिक सुधार और उदारीकरण की नीतियों ने श्रम कानूनों को ताक पर डालने और श्रमिक वर्ग को हाशिये पर रखने का काम किया है। उसकी जन और मजदूर विरोधी नीतियों ने सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक निश्चयता को तोड़ दिया है। श्रमिक संगठनों ने लगभग 4 माह पहले ही हड़ताल की घोषणां की थी, मगर सरकार की ओर से एक भी सकारात्मक पहल नहीं की गयी। वह विकास दरों में आयी क्रमिक गिरावट और भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी रही। सच तो यह है कि उसने इसे गंभीरता से नहीं लिया। अमेरिकी स्कूल के अच्छे अर्थशास्त्री की तरह मनमोहन सहं की नीतियां सार्वजनिक क्षेत्रों को निजी क्षेत्रों में बदलने की कार्ययोजना पर अमल करने में लगी है। उन्होंने राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की सहुलियतों और अर्थव्यवस्था में पूंजीनिवेश को इतनी वरियता दी कि उनकी अपनी ही घोषित ‘समावेशी विकास’ की अवधारणा एकांगी होती चली गयी। आज भी सकरार गोते लगाती अर्थव्यवस्था के बारे में सोच रही है। जिसमें आम जनता और श्रमिक वर्ग का हित कहीं नहीं है। उन प्रावधानों के बारे में सोच रही है, जिनके तहत श्रम कानूनों को स्थगित एवं संशोधित किया जा सके और आम हड़ताल को प्रतिबंधित किया जा सके। वह श्रमिकों की मांग और आम जनता के हितों के विपरीत अपनी आर्थिक नीतियों को सख्ती से लागू करने के बारे में सोच रही है, जिसका कोर्इ भविष्य नहीं है। जिनकी जड़े खोखली हो गयी हैं और उनके पांव के नीचे से जमीन, वहां भी खिसकती जा रही है, जहां उन्होंने ऊंचार्इयां पायी थीं। अमेरिका से शुरू हुआ वैशिवक संकट और यूरोप की टूटती वित्तव्यवस्था उन्हें नजर नहीं आ रही है। जहां आम आदमी सड़कों पर है।

सरकार सर्वोच्च न्यायालय के उन टिप्पणियों के बारे में सोच रही है जिसमें कहा गया है कि ”हड़ताल या बंद संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के दायरे में नहीं आते।” सरकार हड़ताल के दौरान हुर्इ हिंसा और आर्थिक नुक्सान के बारे में सोच रही है, वह सोच रही है कि इस घाटे को पूरा करने की जिम्मेदारी ट्रेड यूनियनों पर कैसे डाली जाये?

दो दिवसीय हड़ताल के दौरान नोएडा में अब तक 184 एफआर्इआर दर्ज की गयी है, और 35 लोगों को हिरासत में लिया गया है। मुददा हड़ताल के दौरान हिंसा, आगजनी और तोड़-फोड़ बन गया है। पहले दिन जो आग नोएडा में सुलगी, दूसरे दिन वह आग ओखाला में पहुंच गयी। यह जाने बगैर कि दंगार्इ वास्तव में हड़ताली हैं या नहीं? ट्रेड यूनियनों को खामियाजा पटाने के लिये निशाने पर ले लिया गया। सरकारों से लेकर राजनेता और उधोगपतियों से लेकर मीडियायें ऐसी खबरें आने लगीं। उन सवालों को पीछे धकेल दिया गया जिनकी वजह से ऐसी नौबत आयी। हड़ताल के कारणों और मांगों को भी पीछे धकेल दिया गया। प0 बंगाल की सरकार ने हड़ताल को गैर कानूनी करार दिया। केंद्र की सरकार भी इसे अवैधानिक मानती है। मीडिया के लिक्खाड लिख रहे हैं कि यदि मजदूरों कर्मचारियों को हड़ताल करने का अधिकार है, तो आम जनता के लिये शांति बनाये रखने का अधिकार भी सरकार के पास है।

हम यह नहीं कह रहे हैं कि हिंसा, आगजनी और तोड़-फोड़ क्षम्य है। बलिक हम यह कह रहे हैं कि इनके पीछे मुददों को धकेलना गलत है। यदि लाखों चेक बैंकों में अंटक गये और करोड़ों का लेन-देन बाधित हुआ, तो उन्हें पूरा भी काम पर लौटने के बाद बैंक कर्मचारी ही करते हैं। यदि उत्पादन और परिवहन बाधित हुआ, तो उसे सामान्य बनाने का काम भी मजदूर और कर्मचारी ही करते हैं। इसके बाद भी यदि आर्थिक विकास की दिशा बाधित हुर्इ तो राष्ट्र और समाज की सम्पतित को निजी क्षेत्रों के हवाले करने का नुक्सान करोड़ों गुणा उससे भारी है। बड़े ही सुनियोजित ढंग से करोड़ों-करोड़ लोगों के जीवन और उनके जीने की परिस्थितियों को चंद लोगों के हाथों में सौंपने की साजिश है। आम जनता और कामगरों के वैधानिक अधिकार को गैर कानूनी बनाना है।

नोएडा और ओखला दोनों ही ऐसे औधोगिक क्षेत्र हैं, जहां राष्ट्रीय निजी कम्पनियों की गहरी पकड़ है, और हड़ताल के दौरान वहां की हिंसक वारदातों का होना यह प्रमाणित करता है कि मजदूरों एवं कर्मचारियों की स्थिति वहां सामान्य नहीं है, और उनमें गहरा असंतोष है। इस बात की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि हड़ताल के दौरान हिंसा सुनियोजित हो सकती है, ताकि हक और हड़ताल की जायज मांगों को गलत दिशा दी जा सके। ट्रेड यूनियनों की एकजुटता से कर्इ सवाल जुड़े हैं। वैचारिक एकजुटता की अनिवार्यता पहले से ज्यादा बढ़ गयी है।

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