Home / राष्ट्रीय परिदृश्य / यह दौर भगत सिंह की वापसी का है

यह दौर भगत सिंह की वापसी का है

saval-dar-savalहमारे सामने घोषित आदर्श के जितने चेहरे हैं, वो सवालों के दायरे में हैं।

आप सवाल कर सकते हैं कि ‘ऐसे चेहरे कितने हैं?’

इस देश में चेहरों की कमी नहीं है, मगर आधुनिक भारत के इतिहास में तीन ऐसे चेहरे हैं, जिनके पीछे आज भी हजारों-हजार चेहरे हैं। किसी के चेहरे को बाजार के लिये रूपये बना दिया गया, किसी के चेहरे को फांसी के फंदे से टांग दिया गया है, तो किसी के चेहरे की 150वीं जयंती मनायी जा रही है। महात्मा गांधी के बारे में पूछा जा रहा है कि वो राष्ट्रपिता हैं या नहीं 23 मार्च को यह सवाल हमें पूछना चाहिये कि भगत सिंह और उनके दो साथियों को फांसी के फंदे से उतारा गया या नहीं? विवेकानंद जिन्हें युवाओं का आदर्श घोषित किया गया है और जिनकी 150वीं जयंती के लिये 18 फरवरी को देश भर में ‘सूर्यनमस्कार महायज्ञ’ का आयोजन किया गया, युवाओं के जीवन में कितने हैं?

महात्मा गांधी, विवेकानंद और भगत सिंह इस व्यवस्था में कहां हैं? वो कहीं हैं भी, या सवाल ही गलत है?

देश में गांधी, शायद सर्वव्यापी हैं, इसलिये नहीं कि उन्हें पुलिस स्टेशन से लेकर न्यायालय तक और प्रशासनिक कार्यालय, मंत्रालय से लेकर राष्ट्रपति भवन तक देखा जा सकता है, बलिक इसलिये कि उन्हें बंद हुए सिक्के और चालू नोटों पर छाप कर, हाथों हाथ बांट दिया गया है। उन पर सरकारी मुहर लग गयी। अब सवाल यह है कि वो ‘राष्ट्रपिता’ हैं या नहीं?

सूचना के अधिकार के अंतर्गत लखनऊ की आरटीआर्इ कार्यकर्ता ऐश्वर्य पाराशर ने केंद्र सरकार से यह जानकारी मांगी थी कि ‘गांधी जी को राष्ट्रपिता क्यों कहा जाता है?’

सरकार से जवाब मिला कि ”सरकारी तौर पर उन्हें ऐसी कोर्इ उपाधि नहीं दी गयी है।” यह भी जानकारी मिली कि गांधी जी के निजी सचिव रहे वी0 कल्याणम के उस प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया गया है, जिसमें उन्होंने गृहमंत्रालय से गांधी जी को राष्ट्रपिता घोषित करने की मांग की है। गृहमंत्रालय का कहना है कि ‘ऐसा करना असंवैधानिक है।’ गृहमंत्रालय ने संविधान की धारा 18(1) की जानकारी देते हुए कहा है कि ‘शिक्षा एवं सैन्य उपाधियों के अलावा सरकार कोर्इ उपाधि नहीं दे सकती है।’

सवाल यह है कि ‘गांधी जी को राष्ट्रपिता कहना, असंवैधानिक है?’

सवाल यह है कि आजादी के 6 दशक पूरा होने के बाद यह सवाल क्यों खड़ा हुआ? क्या इसकी जरूरत महात्मा गांधी को है?

मोहनदार करमचंद गांधी को महात्मा और राष्ट्रपिता का दर्जा सरकारी नहीं सामाजिक है।

क्या यह आग्रह और गृहमंत्रालय का जवाब गांधी का अवमूल्यन नहीं है?

गांधी के बारे में संवेदनशील अब, स्थितियां नहीं हैं। जिन सामाजिक एवं राजनीतिक स्थितियों ने उन्हें महात्मा और राष्ट्रपिता बनाया, वो सामाजि एवं राजनीतिक स्थितियां बदल गयी हैं। बाजारवादी सरकार को न तो गांधी जी की जरूरत है, ना ही विवेकानंद को वो अपना आदर्श घोषित कर सकते हैं। भगत सिंह तो जितनी बड़ी चुनौती बि्रटिश हुकूमत के लिये थे, उतनी बड़ी चुनौती वो आज की सरकार के लिये भी हैं। यही कारण है कि बदलाव के हिमायती युवाओं के सामने वो विवेकानंद को परोसते हैं।

हमारा मकसद युवा वर्ग के प्रतीक के रूप में विवेकानंद और भगत सिंह को आमने -सामने खड़ा करना नहीं है, ना ही हमारा मकसद आदर्शों के चेहरे में आज को बांधना है। हमारा मकसद सिर्फ यह बताना है कि महात्मा गांधी हों, विवेकानंद हों या भगत सिंह हों, वो बाजारवादी नहीं थे। गांधी का आग्रह आत्मनिर्भर ग्राम समाज था, विवेकानंद भूखों के सामने धर्म की थाली परोसना नहीं चाहते थे, और भगत सिंह का सपना शोषणविहीन समाज का निर्माण करना था। उनकी शहादत इन्हीं उददेश्यों के लिये थी। वो जीवन के अंतिम क्षणों में, काल कोठरी से फांसी के फंदे तक अपने देश की आम जनता, दुनिया की शोषित आवाम और लेनिन के साथ थे। यह छोटी नहीं, बड़ी बात है कि भगत सिंह का आजाद भारत बाजारवादी नहीं समाजवादी था। जिसकी प्रासंगिकता देश और दुनिया में बढ़ती जा रही है।

सरकारें अपने हित में ही महामानवों की सूरतें बनाती हैं। वो उन सूरतों को अपने पक्ष में उपयेग करती हैं। उन्हें छोटा बनाती हैं। गांधी अपने समय के प्रतिनिधि थे, विवेकानंद सांस्कृतिक समृद्धि के आयाम, जबकि भगत सिंह संघर्षों की दिशा और आने वाले कल की समाजव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम कांग्रेसी आग्रह, अनुनय और विनय की राजनीति को, ‘हक की लड़ार्इ’ में बदलने का काम किया। गांधी के सविनय अवज्ञा असहयोग अहिंसा और यूरोपीय श्रेष्ठता को स्वीकृति के विरूद्ध जनचेतना और जनसंघर्षों की अनिवार्यता पर जोर दिया। भगत सिंह और महात्मा गांधी के बीच की दूरियां उनकी साचे और समझ की दिशा की दूरियां ही नहीं हैं, बलिक, वर्गहित की दूरियां भी हैं।

23 मार्च भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में, वह निर्णायक दिन है जिन दिन आंदोलन की दिशा में निर्णायक बदलाव आया। भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव को बि्रटिश हुकूमत के द्वारा फांसी दी गयी। जिसका दूरगामी प्रभाव पड़ा। महात्मा गांधी और राष्ट्रीय कांग्रेस के हाथों आंदोलन की कमान आ गयी। जिसे बि्रटिश सरकार ने अपने लिये, कभी गंभीर खतरा नहीं माना। यूरोपीय श्रेष्ठता और अंग्रेजों के न्यायप्रियता का भरम गांधीजी को बना रहा। उन्होंने क्रांतिकारियों को दी गयी फांसी और देश के विभाजन के लिये भी अंग्रेजों को कभी दोषी नहीं माना। गांधी जी के लिये भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी भटके हुए युवा थे। उन्होंने गोलमेज कांफ्रेन्स में भी इस मुददे को नहीं उठाया। देश की आम जनता की रग गांधी जी के हाथों में थी, किंतु 23 मार्च को यह पकड़ तब छूट गयी, जब भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी की सजा दी गयी। क्रांतिकारियों की शहादत ने देश में जैसी राजनीतिक चेतना को जन्म दिया, वैसी राजनीतिक चेतना, जो आंदोलन को निर्णायक संघर्ष में बदल सके, फिर कभी पैदा नहीं हुर्इ। देश आंदोलित था, मगर निर्णायक संघर्ष की शुरूआत नहीं हो सकी। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने देश की आम जनता को, उस ओर बढ़ने से रोक दिया, बि्रटिश हुकूमत को दशकों लम्बी सांस लेने की राहत मिल गयी। भारत को मिली आजादी गांधी और कांग्रेस के नेतृत्व में जारी अहिंसक आंदोलन से ज्यादा, विश्व की बदली हुर्इ परिस्थितियों का परिणाम है, जिसने देश को विभाजित किया और एक पतनशील व्यवस्था से उसे स्थायी रूप से जोड़ दिया।

आज भी हम उस पतनशील व्यवस्था का हिस्सा हैं, जिसके राजनीतिक एवं विश्व परिदृश्य में आम आदमी के हित और समाजपरक आतिमक आदर्शों के स्वामी विवेकानंद के लिये कोर्इ जगह नहीं है। संस्कृति, बाजारवाद की गलियों में, सांस्कृतिक साम्राज्यवाद में बदल गयी है। इसलिये ‘सूर्यनमस्कार का महायज्ञ’ न तो विवेकानंद के सांस्कृतिक आव्हान का आध्यातिमक नेतृत्व करता है, ना ही उन्हें आज के संदर्भों से जोड़ पाता है। सच तो यह है, कि हम गांधी और भगत सिंह के बीच कहीं उलझे हैं, जहां एक पतनशील व्यवस्था अपने को बनाये रखने की लड़ार्इ लड़ रही है। आदर्शों के रूप में पेश करता है, उसकी गतिविधियां और नीतियां उनके विरूद्ध होती और इसूरी बनाने की संभावनाओं से संचालित हो रही हैं।

स्थापित आदर्शों के चेहरों का सवालों से घिर जाना, इस व्यवस्था की विसंगतियां हैं। जो अपने द्वारा स्थापित व्यवस्था को उन पर थोप देता है। सच यह है कि मौजूदा समाज व्यवस्था के समने जो आदर्श है, वह उन्हें सार्वजनिक तक नहीं कर सकता, यही कारण है कि वह उनका उपयोग कर रहा है, समाज में जिनकी पकड़ है। गांधी को राष्ट्रपिता मानें या न मानें, सरकार इसकी घोषणा करे या न करे(?) इससे गांधी के होने पर केर्इ फर्क नहीं पड़ता। विवेकानंद स्वीकृति के मोहताज नहीं हैं, उनकी कोर्इ दावेदारी नहीं है। उन्होंने लुटेरों और सपेरों का देश समझने वालों के सामने अपनी बातें रखीं, जिसका व्यापक प्रभाव पड़ा। और भगत सिंह और उनके साथी सिर्फ 23 मार्च नहीं हैं। सिर्फ शहादत दिवस नहीं हैं। यह दौर उन सपनों को अपने पांव पर खड़ा करने का है, जिसके पांव के नीचे से, गले में फंदा डाल कर, तख्त खींच लिया गया था। यह दौर भगत सिंह की वापसी का है।

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top