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खुदरा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के बंद होने की घोषणायें

americaअमेरिका के कर्इ बड़े खुदरा व्यावसायिक प्रतिष्ठानों -रिटेल चेन्स- ने वर्ष 2013 के अंदर-अंदर अपनी दुकानों को अमेरिका में बंद करने का निर्णय लिया है। याहू फार्इनेंस के लेख के अनुसार यह अनुमान लगाया जा रहा है कि-

बेस्ट बार्इ के 200 से 250

सीयर्स होलिडंग कार्प के-

के मार्ट के – 175 से 225

सीयर्स के – 100 से 125

जेसी पेनी के – 300 से 350

आफिस डीपाट के – 125 से 150

वर्नेस एण्ड नोबल के 190 से 240

गेम्स स्टाप के 500 से 600

आफिस मैक्स के 150 से 175

रेडियो सेक के 450 से 550

व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर ताले लटक सकते हैं। इन प्रतिष्ठानों को ऐसी स्थितियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसकी उन्होंने कल्पना नहीं की थी। सरकार कटौती, लोगों के आय में कमी, आर्थिक असुरक्षा और बढ़ती हुर्इ बेरोजगारी की वजह से जहां एक ओर लोगों के खरीदने की क्षमता घट गयी है, वहीं दूसरी ओर इन प्रतिष्ठानों को विदेशी सामान से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है, जिसकी कीमत अमेरिका में उत्पादित सामान से काफी कम है। उन्हें चीन में उत्पादित अमेरिकी कम्पनियों के सस्ते सामान का भी सामना करना पड़ रहा है। ज्यादातर अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाने के लिये अपनी फैक्ट्रीयों को चीन तथा तीसरी दुनिया के अन्य देशों में स्थापित कर जिया है, जहां मजदूरी और कच्चा माल अमेरिका की अपेक्षा कर्इ गुणा सस्ता है। यही नहीं उन देशों ने अपनी मुद्रा का अवमूल्यन भी कर दिया है।

इन व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के अलावा ब्लाकबस्र्ट ने घोषणां की है कि ”इस साल के अंदर वह अमेरिका में अपने 300 दुकानों को बंद कर देगा और 3000 कर्मचारियों की कटौती भी करेगा।” इस घोषणा के साथ ही कर्इ अन्य महत्वपूर्ण प्रतिषिठानों ने भी अपने मजदूर एवं कर्मचारियों के छंटनी की घोषणा की है। टवाय मेनुफेक्चरर हैसब्रो ने कहा है कि इस साल के अंदर 10 प्रतिशत कर्मचारियों को घटायेगा।” वालमार्ट के व्हाइस प्रेसिडेण्ट आफ फाइनेंस एण्ड लाजिस्टिक जेरी मुरे द्वारा 12 फरवरी केा अन्य एजुकेटिव को भेजे गये र्इ-मेल लिखा है कि कमपनी के 7 सालों के इतिहास इतनी बुरी शुरूआत नहीं देखी, जितनी बुरी शुरूआत इस साल हुर्इ है। उन्होंने फारवरी 2013 को सबसे बुरा महीना करार दिया है।

बाजारवादियों के लिये बाजार लाभ कमाने का जरिया है, मगर बाजार की रौनक सिर्फ सामान या उत्पाद से नहीं बलिक उत्पादों को खरीदने वाले क्रेता और उसके क्रय करने की क्षमता से बनती है। सजी हुर्इ दुकानों का सन्नाआ बाजार के खा जाता है। जिसकी वजह अमेरिकी सरकार की नीतियां और बाजारवादियों का मुनाफा कमाने की अनियंत्रित चालबाजियां हैं। वो सारा दोष उस वैश्विक मंद के मत्थे मढ़ते हैं, जिसे उन्होंने ही जल्द से जल्द लोन का काम किया हे, और उनकी कोशिशें आज भी जारी हैं। बैंको, वित्तीय इकार्इयों और कारपोरेट जगत को संभालने की गलत नीतियों ने ही बाजार को उजाड़ना शुरू कर दिया है। जिसकी वजह से बैंक वित्तीय इकार्इयां और राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को दोहरा मुनाफा हुआ, उन्होंने बाजार से भी लाभ बटोरा और सरकार से भी उन्हें ही बेलआउट पैकेज मिला। आम जनता को दोहरी मार झेलनी पड़ी। सरकारी सहयोग में कटौतियों का सामना करना पड़ और पेंशन-वेतन में कटौती, टैक्सों में वृद्धि के साथ क्षमता से बाहर के कर्ज की अदायगी की वजह से वह दिवालिया हो गया।

आज आम अमेरिकी और अमेरिकी सरकार को जिस वित्तीय संकट का सामना करना पड़ रहा है, उसकी वजह उसकी अपनी ही बाजारवादी नीतियां हैं। सरकार की सोच थी कि बैंकों एवं औधोगिक इकार्इयों को संभालने का सकारात्मक लाभ उसकी अर्थव्यवस्था को मिलेगा, मगर उसकी वैश्वीकरण की नीतियों और मुक्त बाजारवादी नीतियों ने उधोगों के पलायन की परिस्थितियां दी। सस्ती मजदूरी और सस्ते उत्पादन के साधन की उपलब्द्धता ने अमेरिका के औधोगिक पलायन को मुनाफे का स्थानांतरण बना दिया। परिणाम अमेरिकी सरकार के सामने है। वर्ष 2012 का सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर 1.5 प्रतिशत रहा। जो तेज से गिरता जा रहा है। सरकार बजट में कटोती के प्रस्ताव को लोने का साहस नहीं कर पा रही है और अंधाधुंध डालर छापने की नीति से वित्तीय तरलता को बनाये रखने की नाकाम कोशिशें कर रही है।

जनवरी 2013 के पहले सप्ताह में अमेरिकी बैंकों से 114 बिलियन डालर की निकासी हुर्इ है। यह 2001 से अब तक की एक ही सप्ताह में सबसे बड़ी निकासी है। जो इस बात का प्रमाण है कि बैंकों के दिवालियो होने की शुरूआत फिर से हो गयी है उनकी विश्वसनियता बाजार में लगातार घर रही है। वैसे अब तक इस निकासी की ठोस वजह सामने नहीं आयी है, क्योंकि यह स्पष्ट नहीं है कि इतनी बड़ी धनराशि का निवेश कहां हुआ? निकासी के कारणों और परिणामों को तो समझा जा सकता है, मगर स्थितियां साफ नहीं हैं।

बाजार, कारोबार, और बैंकों की बिगड़ती हुर्इ स्थितियां खुले रूप में संकेत दे रही हैं कि अमेरिकी वित्त व्यवस्था के सामने नये मंदी का खतरा सिर उठा चुका है। 26 जनवरी 2013 को, पहले सप्ताह में 3,68,000 नये बेरोजगारों का पंजीयन हुआ है, मतलब बेरोजगारी दर में भरी वृद्धि आयी है। यदि ऊपर दिये निजी कम्पनियों औधोगिक एवं खुदरा क्षेत्र के संस्थानों के द्वारा संस्थानों एवं प्रतिष्ठानों पर ताले जड़े जाते हैं, और ठंटनी के नये दौर की शुरूआत होती है, तो यह संकट और बढ़ता जायेगा। ओबामा सरकार काम के नये अवसर बनाने में पूरी तरह नाकाम रही है। राष्ट्रपति चुनाव से पहले जिन आंकड़ों के जरिये बेरोजगारी दर में गिरावट और काम के नये अवसर बनने की तस्वीरें पेश की गयी थीं, उसके रंग फीके पड़ गये हैं। राजनीतिक असंतोष और सामाजिक असमानता में इजाफा हुआ।
इस समय अमेरिका में 146 मिलियन लोग या तो गरीब हैं या उनकी आय न्यूनतम स्तर पर है। जबकि गोल्ड़ मैन चेज जैसे लोग भी हैं जो वर्ष 2012 में ‘फूड प्रार्इज’ को बढ़ा कर एक साल में 400 मिलियन डालर की कमार्इ करते हैं। जिसके रेवेन्यु में 30 प्रतिशत की वृद्धि हुर्इ है 2012 में ही उसके स्टाक की कीमत में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी भी दर्ज की गयी है।

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