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यूरोपीय संकट से घिरे बड़े देश

europeयूरोपीय देशों की दौड़ एशियायी और अफ्रीकी देशों की ओर बढ़ती जा रही है। जैसे-जैसे कर्ज का संकट बढ़ता जा रहा है, और यह सुनिशिचत होता होता जा रहा है कि यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी, फ्रांस, और बि्रटेन भी यूरोपीय मंदी के दूसरे दौर में प्रवेश कर रहे हैं, यह दौड़ दो स्तर पर तेज हो रही है- एक-विवादास्पद मुददे पर युद्ध की आशंकाओं के साथ वार्ताओं के दौर की शुरूआत हो रही है और दो- अपनी वित्त व्यवस्था को बचाने के लिए कर्इ देशों के साथ, व्यावसायिक संधि की पेशकश की जा रही है। वो आपसी असुरक्षा की भावना को बढ़ाते हुए, अपने लिये बाजार ढूंढ रहे है। यदि जर्मनी की चांसलर अपने मंत्रियों और सलाहकारों के साथ चीन की यात्रा करती हैं, तो फ्रांस के राष्ट्रपति अैर बि्रटिश प्रधानमंत्री भारत की यात्रा करते हैं। यूरोपीय देशों के पास तीसरी दुनिया के देशों को देने के लिये वित्तीय संकट, हथियारा, और युद्ध की आशंकाओं के अलावा और कुछ नहीं है।

सरकारें यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष तथा विश्व बैंक से कर्ज ले रही हैं और राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों, कारपोरेशनों को वित्तीय क्षेत्रों मे पांव पसारने की जगह दे रही है। स्थितियां विस्फोटक इसलिये हैं कि देश की आम जनता अपनी सरकार और उनके कर्जदाता अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकाइयों के खिलाफ प्रदर्शन कर रही है। स्थितियां विस्फोटक इसलिये हैं कि भारी कर्ज, कटौती और जनविरोधी नीतियों के बाद भी उनकी वित्तव्यवस्था संभलने का नाम नहीं ले रही है। जो संकट पहले ग्रीस का था, वह संकट अब जर्मनी, फ्रांस और बि्रटेन पर भी छा गया है।

जर्मनी ने अपने स्वर्ण भण्डार को, फ्रांस और अमेरिका से अपने देश में लाने की घोषणा 16 जनवरी के की। रिपोर्ट में बदली हुर्इ राजनीतिक परिस्थितियों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि ”अपनी देश की अर्थव्यवस्था और अपनी मुद्रा की मजबूती के लिये यह कदम उठाया गया है, ताकि उसकी विश्वसनियता बनी रहे।” जर्मनी के सेण्ट्रल बैंक (बुनदिस बैंक) की इस घोषणा का यूरोपीय अर्थव्यवस्था और अमेरिका तथा फ्रांस के बैंकों की विश्वसनियता को सवालों के दायरे में ला दिया है। इसने जर्मनी की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को न सिर्फ खुलेआम कर दिया है, बल्कि इस आशंका को भी बढ़ा दिया है कि फ्रांस और अमेरिकी बैंकों की विश्वसनियता भी अब खतरे में है, इन बैंकों में जमा कर्इ देशों के स्वर्ण भण्डार और राष्ट्रीय धन पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं।

बैंक आफ फ्रांस ने जर्मनी के 374 टन सोने के वापसी के लिये 5 साल का समय मांगा है और अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने 1500 टन में से 300 टन सोने की वापसी की मांग के लिये 8 साल के समय अवधि की मांग की है।

इन मांगों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ‘फेडरल रिजर्व’ और ‘बैंक आफ फ्रांस’ में जमा जर्मनी का स्वर्ण भण्डार पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। इन देशों ने जर्मनी के जमा स्वर्ण भण्डार का उपयोग किया है, और उनकी वित्तीय क्षमता इतनी नहीं है कि वो जर्मनी के स्वर्ण भण्डार के वापसी की मांग के तत्काल पूरा कर सकें। इस वित्तीय घटना ने फेडरल रिजर्व और बैंक आफ फ्रांस की शाख को घटा दिया है। आने वाले कल में यदि, दुनिया के अन्य देशों के द्वारा विदेशी बैंकों में जमा अपने स्वर्ण भण्डारों के वापसी की मांग होती है, तो स्थितियां और भी गंभीर हो जायेंगी। इन देशों की वित्तीय क्षमता इतनी घट गयी है और इन पर कर्ज का इतना बड़ा बोझ है कि अपनी शाख बचाने और अपनी वित्त व्यवस्था को संभालने के लिये इन्होंने तीसरी दुनिया के देशों को लूटने के दौड़ में शामिल अपनी गतिविधियां बढ़ा दी है। अमेरिका अपने बजट में कटौती और कर्ज लेने की क्षमता में वृद्धि करने के साथ अंधाधुंध डालर छाप रहा है, ताकि बैंकों में मुद्रा की तरलता बनी रहे, और फ्रांस माली (अफ्रीकी देश) में लूट के लिये अपनी सेना उतार चुका है। जहां यूरेनियम और सोने का विशाल भण्डार है। तीसरी दुनिया के देशों की लूट ही उनकी समृद्धि का आधार सदियों से रहे हैं।

यूरोपीय देशों की वित्त व्यवस्था के संकट का आधार उनकी बाजारवादी वैश्विक नीतियां और वित्तीय पूंजी का राज्य के नियंत्रण से बाहर जाना है। और अब वो चाह कर भी इसे अपने नियंत्रण में नहीं ले सकते हैं, क्योंकि बाजारवादी ताकतें काफी मजबूत हो गयी हैं और व्यवस्था का वित्तीय संकट राजनीतिक संकट में बदल गया है।

इटली के मतदाताओं ने मारियो मोण्टी सरकार की राजनीति और यूरोपीय संघ को खारिज कर दिया है। मोण्टी सरकार चुनाव हार गयी है। इस घटना से यूरोप की राजधानी में डर और आक्रोश का माहौल है, साथ ही अंतर्राष्ट्रीय वित्त बाजार में अस्थिरता आ गयी है। मतदाताओं ने उन्हीं राजनीतिक दलों के पक्ष में 55 प्रतिशत मतदान किया है, जिन्होंने अपने चुनावी घोषणा पत्र और प्रचार अभियान में यूरोपीय संघ की नीतियों का विरोध किया था। प्रधानमंत्री मारियो मोण्टी को ब्रुसेल्स, बुर्लिन, कैथालिक चर्च और इटली के बड़े औधोगिक घरानों का समर्थन प्राप्त था। यह चौंकाने वाला सच है कि उन्हें मात्र 10 प्रतिशत वोट मिला है। इटली में उच्च सदन -सिनेट के 20 क्षेत्रों में हुए चुनाव परिणामों के आधार पर डेमोक्रेटिक पार्टी को सिनेट में 119 सीट, बरलुस्कोनी की पार्टी को 117 सीट, फार्इवस्टर मोमेण्ट पार्टी को 54 सीट और मारियो मोंटी को मात्र 18 सीट मिले हैं। किसी भी विधेयक को कानून बनने के लिये दोनों सदनों में पास होना जरूरी है, जबकि किसी के पास स्पष्ट बहुमत नहीं है। इसलिये इटली में गठबंधन सरकार का बनना तय हो गया है। इटली के वित्तीय विश्वास में भी गिरावट दर्ज की गयी है। जनवरी और फरवरी के आंकड़ों से भी बड़ा फर्क है। 24-25 फरवरी को इुए इटली के चुनाव स ठीक पहले इटली के ट्रांसपोर्ट वरकर्स का एक बड़ा हड़ताल हुआ था, 19 फरवरी में हुए इस हडताल में मेट्रो, बस और रेल सेवा ही नहीं चुनाव भी प्रभावित हुआ। मजदूर वेतन एवं काम में कटौती का विरोध कर रहे थे।

स्पेन में 23 फरवरी को हजारों-हजार स्पेनवासियों ने राष्ट्रीय स्तर पर खर्च में कटौती, सार्वजनिक क्षेत्रों का निजीकरण और राजनीतिक एवं रायल फैमिली पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप के मुददों को लेकर प्रदर्शन किये। मेडि्रड में 45 लोगों को हिरासत में लिया गया और पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों के बीच हुए झड़ में 40 से अधिक लोग घायल हुए, जिनमें 12 पुलिसकर्मी भी हैं। आर्थिक दिवालियापन के करीब खड़े कर्ज से संकट को झेल रहे लोगों की नाराजगी रिजाय की पापुलर पार्टी और स्पेन के राजघराने के लोगों पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से उत्तेजित हो गयी है। यूरोपीय संकट का घातक प्रभाव उन पर पड़ रहा है। स्थितियां विस्फोटक हैं। सरकार के संभलने की संभावनायें खत्म हो गयी हैं, लोग इस बात को मान कर चल रहे हैं कि यूरोपीय संघ और इस व्यवस्था के बदलना जरूरी हैं 20 फरवरी को स्पेन की न्याय व्यवस्था जजों और न्यायालय सचिवों के 24 घण्टे की हड़ताल से ठप्प रही। उन्होंने न्याय प्रशासन में किये गये परिवर्तनों का विरोध किया।

हालांकि यूरोपीय कमीशन ने कहा है कि यूरोजोन को एक साल और मंदी के दौर से गुजरना पड़ेगा। उसने संभावना व्यक्त की है कि वर्ष 2012 में आर्थिक उत्पादन 0.6 प्रतिशत का घाटा, वर्ष 2013 में 0.3 प्रतिशत के घाटे में बदल सकता है। यूरोपीय कमीशन ने 22 फरवरी को कहा है कि यूरोपीय संघ में बेरोजगारी दर साल 2013 में बढ़ेगी। अनुमान है कि यह (बेरोजगारी दर) 12.2 प्रतिशत रहेगा। फ्रांस के सार्वजनिक क्षेत्र के घाटे की स्थिति 2013-14 में और बदतर होने की आशंका है। जिसका सीधा सा अर्थ यह निकलता है कि यूरोपीय संघ और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की नीतियों में केर्इ गुणात्मक या सकारात्मक बदलाव नहीं होना है। स्थितियों का बद से बदतर होना तय है। जिससे उबरने की उनकी कोशिशों का विशेष परिणाम नहीं निकल सका है। 8 फरवरी को यूरोपीय संघ के राजनेताओं ने इस बात से आपसी सहमति व्यक्त की कि 2014 से 2020 के बीच सात साल के समय में यूरोपीय संघ के बजट में 960 बिलियन यूरो (1.3 टि्रलियन डालर) की कटौती की जायेगी। जिस पर यूरोपीय संसद में मतदान का होना अनिवार्य शर्त है।

फ्रांस के राष्ट्रपति होलांदे ने 18 फरवरी को घोषणां की कि 2013 के लिये अनुमानित वृद्धि 0.8 प्रतिशत को भी प्राप्त नहीं किया जा सकेगा।

31 जनवरी को फ्रांस के सिविल कर्मचारियों ने सरकारी कटौतियों के खिलाफ देशव्यापी प्रदर्शन किया। यह प्रदर्शन फ्रांस के 120 शहरों में हुआ। सी जी टी इक्यूपमेण्ट इन्वायरमेण्ट लेबर यूनियन के अनुसार इस विरोध प्रदर्शन में 1,50,000 से ज्यादा लोगों ने हिस्सा लिया। होलांदे की सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति निकोलस सरकोजी द्वारा साल 2010 में लागू किये गये पबिलक सेक्टर के वेतन वृद्धि में लगाये गये रोक को समाप्त करने की मांग को अस्वीकार कर दिया है, यह प्रदर्शन सरकार पर दबाव बनाने और अपनी मांगों के पक्ष में किया गया।

फ्रांस की डाटा एनालिस्ट फर्म त्रेनिदयो के अनुसर वर्ष 2009 से अब तक फ्रांस में अब तक 1000 से ज्यादा कारखाने बंद हुए हैं, जिसकी मुख्य वजह यूरोप का संकट है। आटो इण्डस्ट्री और दवाओं के उत्पादन पर इसका सबसे घातक प्रभाव पड़ा है। बंद होते कारखानों की मुख्य वजह यूरोपीय संकट के अलावा यूरो की कीमत अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार ज्यादा होना भी है, जिसकी वजह से निर्यात बाजार प्रभावित हो रहा है। वर्तमान में फ्रांस का राष्ट्रीय कर्ज उसके सकल घरेलू उत्पाद का 90 प्रतिशत पहुंच गया है।

होलांदे सरकार ने फ्रांस की बिगड़ती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये राष्ट्रीय घाटे को कम करने का निर्णय लिया है। जिसके तहत अगले पांच सालों में खर्चों में 60 बिलियन यूरो की कटौती और टैक्स में वृद्धि करके 20 बिलियन यूरो निकालने की प्रतिबद्धता घोषित की है। सरकार सोचती है कि इससे वो अपने राष्ट्रीय कर्ज को बराबर करने के करीब पहुंच जायेगी। बिगड़ती हुर्इ अर्थव्यवस्था के बीच कटौती और कर वृद्धि के निर्णय का प्रभाव आम जनता पर पड़ना तय है। यही नहीं बंद होती औधोगिक इकार्इयों का प्रभाव भी पड़ रहा है बेरोजगारी और आर्थिक परेशानियां बढ़ती जा रही हैं। उधोगों का पलायन भी हो रहा है।

फ्रेंच आटो जायंट पी एस ए प्यूजिएट सिट्रन ने घोषणा किया है कि वर्ष 2012 में उसे 5 बिलियन यूरो (6.7 बिलियन डालर) का घाटा हुआ है, जो अब तक का सबसे बड़ा घाटा उसके लिये है। जबकि गये साल उसने इसी दौरान 588 मिलियन यूरो का मुनाफा कमाया था।

फ्रांस के अधिकांश कम्पनियों की हालत यही होती जा रही है। यही कारण है कि या तो वो बंद हो रहे हैं या उनका पलायन हो रहा है। दोनों ही स्थितियों की वजह से बढ़ती हुर्इ बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या बन गयी है। पिछले 20 महीनों से फ्रांस की बेरोजगारी दर लगातार बढ़ रही है। आम जनता में बढ़ती हुर्इ बेरोजगारी और अपनी आर्थिक अनिश्चयता की वजह से नाराजगी और हताशा लगातार बढ़ती जा रही है।

15 फरवरी को 49 वर्षीय एक बेरोजगार व्यकित ने फ्रांस की राजधानी पेरिस में खुद को आग लगा ली। इस घटना से ठीक पहले नेंटस शहर में स्टेट इम्प्लायमेण्ट एजेन्सी के सामने खुद को आग लगा लिया। उसने कहा कि ”अब वह बेरोजगारी का लाभ पाने से भी अयोग्य हो गया है। उसके पास न तो काम पाने का अवसर है ना ही बेरोजगारों को दी जाने वाली सहायता।” इसलिये उसने पत्रकारों को अपने को आग के हवाले करने की जानकारी दी और खुद को आग लगा लिया। 13 फरवरी को उसकी मौत हो गयी।

इससे पहले 3 फरवरी के, एक 22 वर्षीय महिला एमिली ने अपने तीन बच्चों की गला दबा कर हत्या करने के बाद फांसी लगा ली। उसका सबसे बड़ा बच्चा 3 साल का, उससे छोटा 2 साल का और तीसरा बच्चा 15 दिन का था। वो पशिचमी फ्रांस के सेंट जीलयस कम्यून में रहती थी। एमिली के पति ने भी 27 जनवरी को अपनी आर्थिक परेशानियों की वजह से आत्महत्या कर ली थी।
आर्थिक परेशानियों से बढ़ती सामाजिक हताशा के बीच यह जानकारी सामने आयी है कि सरकारी तौर पर घोषित बेरोजगारी आंकड़ों के अनुसार नवम्बर 2012 में 3.13 मिलियन लोगों ने देश के रोजगार कार्यक्रमों को अस्वीकार कर दिया है, जो अक्टूबर 2012 की तुलना में 29,300 ज्यादा है। फ्रांस की रिसर्च एजेन्सी आर्इ पी एस ओ एस द्वारा कराये गये सर्वे के अनुसार फ्रांस के 5,61,042 नौजवानों के बीच कराया गया। सर्वे में यह जानकारी भी सामने आयी है कि 41 प्रतिशत लोग अपने खरीदने की क्षमता के घटने और 27 प्रतिशत रिटायरमेण्ट और करों में वृद्धि से चिंतित हैं।

अपनी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था, सामाजिक हताशा और बढ़ते जन-प्रतिरोध के बीच सरकारी नीतियां नाकाम होती जा रही हैं। उधोगों का पलायन जारी है। गुडइयर डनलप टायर कम्पनी के मजदूर पिछले पांच सालों से अपनी नौकरियां बचाने की कोशिश कर रहे हैंं। उनकी कोशिशें नाकाम हो गयी हैं। इस कम्पनी को चीन में स्थापित करने का निर्णय हो चुका है। अपनी घरेलू स्थितियों को संभालने में नाकाम होती होलांदे सरकार अफ्रीकी देशों में अपनी गतिविधियां बढ़ा रही है। माली में फ्रांसीसी सेनायें लड़ रही हैं। वह वहां लड़ रही हैं। माली में फ्रांसीसी सेनायें लड़ रही हैं। वह वहां अपना उपनिवेश बनाने में लगा है। राजनीतिक अस्थिरिता पैदा करना और कहीं सरकार, कहीं विद्रोहियों के पक्ष में सैन्य गतिविधियों का संचालन ही उसकी नीति है। किंतु यूनेस्को ने फ्रांस के राष्ट्रपति को ”अफ्रीका की शांति और स्थिरता के क्षेत्र में मूल्यवान सहयोग देने के लिये ‘शांति पुरस्कार’ से सम्मानित करने का निर्णय लिया है।

यूरोपीय देशों की एशिया और अफ्रीका में बढ़ती सक्रियता अपनी सेना का उपयोग और हथियारों के लिये बाजार बनाने की उनकी ऐसी कोशिशें हैं जो क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के विरूद्ध है। समस्याओं को नये सिरे से उभारने और उसका उपयोग अपने हितों में करने की चालबाजी है। सच यह है कि अपनी घरेलू समस्याओं का समाधान यूरोपीय शकितयां तीसरी दुनिया के देशों में निकालने की कोशिश कर रही है।

एक रिपोर्ट के अनुसार जर्मनी के हथियारों का निर्यात फारस की खाड़ी के अरब देशों में वर्ष 2012 में 1.4 बिलियन यूरो (1.88 बिलियन डालर) का रहा है। म्यूनिख से प्रकाशित समाचार पत्र में 22 फरवरी को यह प्रकाशित हुआ। जर्मनी अपने हथियारों के उतपादन उधोग को बचाने के लिये फारस की खाड़ी के अरब देशों को बाजार बना रहा है। सउदी अरब जर्मन हथियारों का सबसे बड़ा खरीददार है। बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर और संयुक्त अरब अमिरात में हथियारों की आपूर्ति की गयी। सउदी अरब ने जर्मनी की एक कम्पनी से 1.24 बिलियन यूरो के हथियारों की खरीदी की। जर्मनी अमेरिका और रूस के बाद, हथियारों का सबसे बड़ा निर्यातक देश है।

एमनीस्टी इण्टर नेशनल द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार ”जर्मन हथियारों का उपयोग मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीकी देशों में हो रहे शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों के दमन के लिये, उपयोग में लाया जा रहा है।” यही नहीं इन हथियारों का उपयोग क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के विरूद्ध राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने वाले पशिचमी समर्थक तथाकथित विद्रोहियों के द्वारा भी किया जा रहा है। जोकि वास्तव में आतंकी संगठन से जुड़े आतंकी हैं।

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