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सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप की राह खोलने की कवायतें

asiaएशिया में सुलगते हुए खतरों पर थोड़ी सी धूल पड़ी है, मगर पशिचमी देश और अमेरिकी सरकार की नीतियों में कोर्इ खास बदलाव नहीं आया है। वो इस बात को स्वीकार करने की स्थिति में ही नहीं है, कि ”सुलगते हुए खतरों का समाधान वार्ताओं की मेज पर है।” इससे उन्हें कोर्इ फायदा नहीं होना है, क्योंकि खतरों को बनाये रखने की खुराक पर ही वो अपने को बनाये रखने को सही प्रमाणित करते हैं। वो जहां भी है, वहां अस्थिरता है, शांति को खतरा है, सुलगते सवाल और उलझते मुददे हैं। उनके पास हथियारों का इतना बड़ा जखीरा है, कि वो हथियारों के बल पर ही समस्याओं का समाधान अपने पक्ष में चाहते हैं, क्योंकि वार्ताओं की मेज पर वो जरूरत से ज्यादा कमजोर है। उनके पास अपने सही होने का कोर्इ तर्क नहीं है।

यदि सीरिया के मुददे को ही हम लें तो, यह सवाल तो पैदा होता ही है कि अमेरिकी सरकार और पशिचमी ताकतों को आखिर सीरिया की इतनी फिक्र क्यों है? उनकी अपनी अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही है, उनके देश की जनता उनके खिलाफ सड़कों पर है, वो अपनी वित्तीय एवं जनसमस्याओं का समाधान करने के बजाये, सीरिया की समस्या का समाधान करने के लिये क्यों मरे जा रहे हैं? इतने परोपकारी वो कब से हो गये? दर असल वो हथियारों का बाजर बना रहे हैं, हंथियारों से एशिया को अफ्रीका की तरह पाट देना चाहते हैं, जोकि युद्ध के खतरों के बढ़ने, गृह युद्ध जैसी स्थितियों के बने रहने पर ही संभव है। एशिया की राजनीतिक अस्थिरता और तनाव में, वो अपनी स्थिरता और अपने चौतरफा संकट से उबरने का समाधान तलाश रहे हैं। उनकी शांति और स्थिरता का मिशन गैर मियादी ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें अशांति और अस्थिरता भरे तनाव का बने रहना जरूरी है, और वो यही कर रहे हैं।

28 फरवरी को इटली की राजधानी रोम में ‘फ्रंडस आफ सीरियन ग्रुस’ और ‘सीरियायी अपोजिशन’ की बैठक हुर्इ। इस बैठक में ‘असद सरकार’ के खिलाफ लड़ने के लिये सीरियायी विद्रोहियों को और सहयोग देने की बात कही गयी। दिवालिया होने के कगार पर खड़े आयोजक देश इटली ने इस बैठक के बाद एक वक्तव्य जारी किया कि, ”बैठक में शामिल देश के मंत्रियों ने वादा किया कि वो राजनीतिक और संसाधन उपलब्ध कराने में सीरियायी लोगों की एक मात्र वैध प्रतिनिधियों के इस संगठन को पूरा सहयोग और समर्थन देंगे, ताकि उन्हें सीरिया में मजबूत सहयोग मिल सके।” उन्होंने सीरियायी विद्रोहियों को सीरिया की सेना से लड़ने के लिये प्रशिक्षण देने की योजनाओं की घोषणा भी की। बैठक में अमेरिका के ‘सेक्रेटरी आफ स्टेट’ जान कैरी और सीरिया के विपक्ष के नेता अहमद-अल-खतीब ने सीरिया की सरकार से लड़ने के लिये विद्रोहियों को और ज्यादा सहयोग तथा समर्थन बढ़ाने के तरीकों पर चर्चायें की। कैरी ने वाशिंगटन के इस निर्णय की घोषणा की कि ”सीरियायी विद्रोही गु्रपों को 60 मिलियन डालर का नया सहयोग देगा।”
इस घोषणा से यह स्पष्ट हो गया है कि सीरिया के संकट का और गहराना तय है। वैसे भी इस बात का अनुमान लगाया जा रहा था कि राष्ट्रपति चुनाव के बाद सीरिया पर निर्णायक हमले की कार्यवाही की जा सकती है। अमेरिकी सरकार की परेशानियां सिर्फ दो है कि सीरिया को पूरी तरह अकेला बना कर उस पर लीबिया की तरह हमला करने की राह में चीन और रूस की बाधायें हैं और दूसरी ओर सीरिया में विद्रोहियों की पकड़ रोज घटती जा रही है। यही नहीं अमेरिकी वित्त व्यवस्था का घरेलू संकट भी रोज बढ़ता जा रहा है।

पशिचमी देश और अमेरिकी साम्राज्य के पास सीरिया के खिलाफ सख्त कार्यवाही करने का स्पष्ट समर्थन नहीं है। राष्ट्रसंघ में उसके प्रस्तावों पर रूस और चीन का विटो भारी पड़ता रहा है।

26 फरवरी को राष्ट्रसंघ ने कहा है कि ”फरवरी में अब तक 1,50,000 सीरियायी लोगों को हिंसा की वजह से विस्थापित होना पड़ा है।” यू0एन0 अण्डर सेक्रेटरी जनरल फार पोलिटिकल अफेयर्स ने ‘राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद’ को जानकारी दी है कि सीरिया की संकट की वजह से 9,00,000 लोगों ने पड़ोसी देशों में शरण ले रखा है। उन्होंने कहा कि ”फरवरी महीने में ही 1,50,000 लोगों ने वहां से पलायन किया है।”
हाल ही में एक जर्मन टी0वी0 से प्रसारित इण्टरव्यू में सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल-असद ने कहा कि ”सरकार ने संघर्ष की शुरूआत नहीं की है” उन्होंने साफ-साफ कहा कि ”विद्रोही गु्रप्स ही देश की आम जनता को मार रहे हैं और देश की आंतरिक संरचना को नष्ट कर रहे हैं।”

25 फरवरी को ‘द न्यूयार्क टार्इम्स’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार सऊदी अरब ने जार्डन के जरिये, सीरियायी विद्रोहियों को भारी मात्रा में हथियारों की आपूर्ति कर रहा है।” पशिचम के एक अधिकारी ने जानकारी दी है कि ”सीरिया में भेजे गये हथियारों में रायफल और सैंकड़ों मशीनगन है।” उन्होंने निशिचत संख्या बताने में अपनी असमर्थता जाहीर की। सऊदी अरब ये हथियार क्रोएशिया से लेकर जार्डन के जरिये सीरिया भेज रहा है। ये हथियार 1990 में हुए बाल्कन युद्ध के समय अघोषित रूप से भेजे गये हथियारेां की भारी खेप का एक हिस्सा है, जो क्रोएशिया में बचा हुआ था। इन भारी हथियारों में यूगोस्लोवाकिया में बने एक विशेष किस्म का वह हथियार भी है जिससे टैंकों को ध्वस्त किया जाता है। इसके साथ रायफल, ग्रेनेड लांचर, मशीनगन, मोर्टार और सोल्जर फायर राकेट भी है। यह जानकारी अपना नाम गुप्त रखने की शर्त पर अमेरिकी अधिकारी के द्वारा दी गयी।

वाशिंगटन में एक अधिकारी ने भी सुनिशिचत यिका कि पिछले साल गर्मियों में एक वरिष्ठ क्रोएशियायी अधिकारी ने वाशिंगटन का दौरा किया था, और अमेरिकी अधिकारियों को सलाह दिया था कि ”क्रोएशिया के पास बड़ी मात्रा में जो हथियार है, उसे सीरियायी विद्रोहियों तक पहुंचाया जा सकता है।”

क्रोएशियायी समाचार पत्र ने 23 फरवरी को एक रिपोर्ट प्रकाशित किया है कि क्रोएशिया की राजधानी जा़ग्रब के प्लेसो एयरपोर्ट पर हाल ही के महीनों में, काफी बड़ी संख्या में जार्डन के कारगो विमान देखे गये हैं। समाचार पत्र के अनुसार इलयूशिन 76 एयरक्राफ्ट, जो जार्डन का अंतर्राष्ट्रीय एयर कारगो है को 14 एवं 23 दिसम्बर, 6 जनवरी और 18 फरवरी को प्लेसो एयरपोर्ट पर देखा गया है। अनुमा इसबात का लगाया जा रहा है कि इन्हीं विमानों के द्वारा हथियारों को जार्डन तक पहुंचाया गया।

25 फरवरी को बि्रटेन और अमेरिका ने संयुक्त रूप से कहा है कि ”सीरिया की बशर-अल-असद सरकार से लड़ने के लिये सीरिया के विद्रोहियों को और सहयोग बढ़ाया जायेगा। हम सीरियायी विपक्ष को देने वाले अपने समर्थन में उल्लेखनिय वृद्धि करेंगे। हम इसकी तैयारी कर रहे हैं।” बि्रटिश विदेश सचिव वेलहन हग के इस वक्तव्य का समर्थन अमेरिका के जान कैरी ने भी किया। यह संयुक्त वक्तव्य 25 फरवरी से लंदन में जारी किया गया।

सीरियायी विपक्ष अपने विदेशी समर्थकों द्वारा प्राप्त सहयोग न मिलने की शिकायत करता रहा है। अपनी असफलता से बढ़ती इस निराशा के बारे में जान कैरी ने कहा कि ”मैं विपक्ष के इस निराशा के प्रति काफी संवेदनशील हूं।” अमेरिका और पशिचमी देशों की नीतियां सीरिया में विपक्ष की सरकार बनाना और विद्रोहियों को सहयोग दे कर क्षेत्र विस्तार की है।

22 फरवरी को पशिचमी समर्थित तथाकथित ‘सीरियायी राष्ट्रीय गठबंधन’ ने कहा है कि ”उनकी योजना स्वतंत्र कराये गये क्षेत्रों में अपनी सरकार बनाने की है। गठबंधन के प्रवक्ता वालीद-अल-बुन्नी ने 23 फरवरी को मिस्त्र की राजधानी काहिरा में कहा कि ”हम मुक्त कराये गये क्षेत्रों के काम-काज को चलाने के लिये, वहां सरकार के गठन पर सहमत हो गये हैं। ” उन्होंने आगे कहा कि ”सरकार की स्थापना संभवत: उत्तरी सीरिया में हो और गठबंधन के सदस्य 2 मार्च को इस्ताम्बुल में बैठक करेंगे। उसी बैठक में सरकार के गठन और उसके प्रमुख को चुनने के लिये भी विस्तार विमर्श होगा।”

सीधी लड़ार्इ में सीरियायी विद्रोहियों को मिल रही शिकस्त और आम सीरियायी के प्रतिरोध की वजह से, अब वो आतंकी कार्यवाहियों को अपना हथियार बना रहे हैं। वैसे भी सीरियायी विद्रोहियों का नेतृत्व अमेरिका समर्थित आतंकी ही कर रहे हैं। 21 फरवरी को दमिश्क में हुए एक बम धमाके में लगभग 100 लोगों के मारे जाने और 250 लोगों के घायल होने की खबर है। इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया व्यकित करते हुए राष्ट्रसंघ अरब लीग के विशेष दूत लखदर ब्राहिमी ने कहा है कि ”हम इसकी कड़े शब्दों में निंदा करते हैं। कोर्इ भी चीज इस भयानक कार्यवाही को न्यायसंगत प्रमाणित नहीं कर सकता। इसे अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत युद्ध अपराध ही माना जायेगा।”

दमिश्क कार बम हमले में, अंतर्राष्ट्रीय रूप से नयी स्थितियां पैदा कर दी है। राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद द्वारा इस हमले की निंदा करने वाले प्रस्ताव के अमेरिका ने रोक दिया है। रूस के विदेशमंत्री सर्गेर्इ लोवारोव ने इसे अमेरिका के दोहरे मापदण्ड का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि ”हमें इस बात का अफसोस है कि राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद द्वारा सीरिया में हुए आतंकी घटना की निंदा तक अमेरिका की वजह से नहीं की जा सकी।” उन्होंने यह बात चीन के विदेशमंत्री के साथ मास्को में हुए संयुक्त प्रेसवार्ता के दौरान कही।

इस बीच ‘राष्ट्रसंघ-अरब लीग’ के सीरिया मुददे के विशेष दूत लखदर ब्राहिमी ने सीरिया में अपने शांति मिशन को 6 महीने और बढ़ाने की घोषणा की है, जो कि 22 फरवरी 2013 को समाप्त हो रहा थ।

अमेरिका, पशिचमी देश और उनके सैन्य संगठन -नाटो की सीरिया सम्बंधी नीतियों का समर्थन करने के लिये, तुर्की सरकार को भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है। आम जनता से लेकर तुर्की की कम्युनिस्ट पार्टी और प्रमुख विपक्षी दलों के द्वारा विरोध हो रहा है। 23 फरवरी को दक्षिणी प्रांत हताया में हुए प्रदर्शन में प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि अंकारा सीरिया के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना बंद करे। इन्होंने तुर्की में अमेरिकी सेना की मौजूदगी का भी विरोध किया। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुए। पुलिस ने अंश्रु गैस और मिर्च के स्प्रे का सहारा लिया।

22 फरवरी को प्रमुख विपक्षी पार्टी के लीड़र केमाल चिरिजालोगो ने तुर्की के प्रधानमंत्री रिसेप फेयेगिप एरडोगन की सीरिया नीतियों को ‘गंभीर गलती’ करार दिया। उन्होंने कहा- अंकरा सरकार सीरिया के मुददे पर गंभीर गलती कर रही है। सीरियायी विपक्ष और विद्रोहियों को अंकरा सरकार के द्वारा दिये जा रहे आर्थिक एवं सैनिक समर्थन की वजह से बहुत से आम सीरियायी मारे गये हैं। उन्होंने कहा कि ”तुर्की की सरकार को चाहिये था कि वह दोनों पक्षों के बीच वार्ता करा कर वहां फैली अशांति को खत्म कराये, ना कि हथियार बद्ध विपक्ष का समर्थन करे।” उन्होंने जानकारी दी कि ”सीरिया के विपक्षी गुट सरकार के साथ वार्ता के प्रस्ताव का स्वागत करते हैं, मगर तुर्की एकमात्र ऐसा देश है जो इस प्रस्ताव का विरोध कर रहा है।” उन्होंने कहा कि इस सीरिया में विदेशी हस्तक्षेप को अस्वीकार करते हैं, इस समस्या का समाधान खोजने का अधिकार सीरिया की आम जनता को है।

तुर्की के रक्षामंत्री इस्मेत यीलमास ने कहा कि ”तुर्की सीरिया सीमा पर नाटो के पेटि्रयाट मिसाइलों की तैनाती के बाद अब अंकरा को प्रतिवर्ष लगभग 8 मिलियन डालर खर्च उठाना पड़ेगा।” तुर्की की विपक्ष और तुर्की की आम जनता इन मिसाइलों की तैनाती के खिलाफ है। यूरोपीय देश अपने युद्ध, सेना और हथियारों का खर्च भी साझा कर रहे हैं। पहले वो हथियारों की बिक्री करते हैं, और उन बिके हुए हथियारों को विद्रोहियों में बांटा जाता है। उनकी सेना एशिया में भाड़े के सैनिकों में बदल गये हैं, जिन्हें भारी विरोध का सामना करना पड़ता है। सीरिया की घेराबंदी जार्डन और तुर्की के जरिये इसी तरह की गयी है। क्षेत्रीय अस्थिरता पैदा करना उनकी नीति है, और वो युद्ध के खतरे को बढ़ाये रखना चाहते हैंं। सीरिया में विद्रोहियों को मजबूत कर प्रवासी सरकार को सीरिया में लाने का मकसद एक है कि ऐसी सरकार को मान्यता दे सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप की राह खोली जा सके।

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