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अफ्रीकी देशों की जरूरत पश्चिमी ताकतों को है

Gold miners form a human chain while digging an open pit in northeastern Congoलीबिया में कर्नल गददाफी के पतन के बाद अफ्रीकी देशों के विकास की संभावनायें और सुरक्षा की सामूहिक प्रणाली को विकसित करने की अवधारणायें टूट गयी हैं। मौजूदा दौर में सहयोग और समर्थन के विरूद्ध साम्राज्यवादी हस्तक्षेप की परिस्थितियां हैं। प्रायोजित आंतकी विद्रोहियों के पीछे-पीछे यूरो-अमेरिकी ताकतें और उनकी नाटो सेना चल रही है। माली में साम्राज्यवादी हस्तक्षेप हो चुका है और अल्जीरिया निशाने पर है। जो आज भी उपनिवेशवाद और साम्राज्यवादी ताकतों के खिलाफ पूर्व लीबिया के कर्नल गददाफी की महाद्वीपयी नीतियों से जुड़ा है। जहां बाहरी सहयोग से आंतकी गतिविधियों को बढ़ाया जा रहा है।

एक ऐसा महाद्वीप जिसके पास खनिज सम्पदा, प्राकृतिक संसाधन, और जनशक्ति का अपार भण्डार है, उसे मुख्य धारा की मीडिया एक ऐसे बड़े बास्केट के रूप में चित्रित करती है, जहां अंतहीन युद्ध, सूखा और कुपोषण के शिकार सहयेाग विहीन बच्चे हैं। जो पूरी तरह पश्चिमी ताकतों के सहयोग पर निर्भर हैं।

क्या वास्तव में ऐसा है?

क्या पश्चिमी ताकतों के सहयोग के बिना, यह काला महाद्वीप अपनी समस्याओं का समाधान करने की स्थिति में नहीं है?

यदि ऐसा है तो अपनी चरमराती वैश्विक व्यवस्था को बचाने के लिये अमेरकी साम्राज्य और यूरोपीय शक्तियां तीसरी दुनिया के देशों की ओर क्यों दौड़ लगा रही हैं?

यह दौड़ सदियों से जारी है, और यही दौड़ तीसरी दुनिया और अफ्रीकी देशों की सबसे बड़ी परेशानी है।

सच यह है कि अमेरिका और पश्चिमी शक्तियां अफ्रीकी महाद्वीप के देशों पर निर्भर हैं।

आर्थिक सहयोग, राजनीतिक हिस्सेदारी और सुरक्ष के लिये सैन्य अभियानों की कूटनीति महाद्वीपीय जालसाजी की घिनौनी हरकत है। जिसका पूरा लाभ, संसाधन के प्रवाह को बदल कर, पश्चिमी बैंकों को मिलता है। इस अवैध लाभ से स्वीस बैंक जैसी इकार्इयों में अकूत धन का संचय होता है। ”टैक्स हैवन” कहे जाने वाले इन बैंकों एवं वित्तीय इकार्इयों की समृद्धि का आधार भी यही है, जहां काला धन जमा है।

जनतंत्र की बहाली के अभियान में लगे पश्चिमी देशों की पहली पसंद सैनिक तानाशाह ही रहे हैं। जिन्हें राजनीतिक रूप से बनाये रखने का काम प्रशासक वर्ग करता है और पश्चििमी बैंकों के द्वारा ”राष्ट्रीय कर्ज” के रूप में उनहें भरी कर्ज दिया जाता है। जिस पर भारी ब्याज दर की अदायगी की शतें होती हैं। ये तानाशाह इस कर्ज का उपयोग या तो अपने हित में करते हैं, या कर्ज देने वाले पश्चिमी देशों के बैंकों के साथ मिल कर अपने निजी खाते में जमा कर देते हैं। भारी ब्याज दर से लदा चौतरफा बढ़ता वह कर्ज उनके निजी खाते में ही जमा रहता है, मगर कर्ज का बोझ उस देश पर लगातार बढ़ता चला जाता है।

हाल ही में लिआस मिडेकुमाना और जेम्स के बोएस द्वारा किये गये रिसर्च में उन्होंने यह पया है कि हर एक कर्ज लिये गये 1 डालर का 80 सेंट से ज्यादा उधार देने वाले देश (बैंक) में वापस- एक साल के अंदर-अंदर पूंजी के रूप में वापस आ जाता है, जो कभी कर्ज लिये गये देश में वापस निवेश नहीं होता। धोखे से दिये गये कर्ज का एक भी डालर उस देश की आम जनता तक नहीं पहुंचता। इस तरह 20 बिलियन डालर अफ्रीकी देशों को दिये गये कर्ज से हर साल चूसा जाता है। कर्ज और उसकी वसूली का यह जरिया दशकों से चल रहा है। 80 प्रतिशत से ज्यादा साल भर में कर्ज की अदायगी के बाद भी 100 प्रतिशत कर्ज बना रहता है। जिसे वेस्र्टन हेण्ड आउटस -वितरण- भी कहा जाता है। कांगो के पूर्व राष्ट्रपति मोबूतू ने पश्चिमी बैंकों एवं देशों के साथ मिल कर अपने देश के साथ यही किया है।

एक अन्य तरह का ‘वितरण’ ‘खनिज सम्पदा के लूट’ के जरिये भी होता है। ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाने के लिये पश्चिमी देशों की कम्पनियां ऐसे हथियारबद्ध लोगों की टुकडियों को आर्थिक सहयोग, संरक्षण और हथियार देती है, जो खनिज सम्पदा की लूट करते हैं। ‘डेमोक्रेटिक रिपबिलक आफ कांगो’ में ऐसे हथियारबद्ध लोगों की टुकडियां हैं, जो खनिज सम्पदा को लूटते हैं और बाजारभाव से बहुत ही कम मूल्य पर लूटे गये खनिज पदार्थों को पश्चिमी देशों की कम्पनियों को बेच देते हैं। इन हथियारबद्ध टुकडियों के प्रायोजक कम्पनियां पडोसी देश युगांडा, रवाण्डा और बुरूंडी से नियंत्रित करती है। इस बारे में राष्ट्रसंघ के रिपोर्ट में बार-बार उल्लेख किया गया है। जिस पर कभी कोर्इ गंभीर कार्यवाही नहीं की गयी।

आज यूरोप के कारपोरेट घरानों के पास जो अकूत दौलत है, वह इन्हीं लूट का परिणाम है।

अफ्रीका का महत्व इन्हीं कारणों से पश्चिमी देशों के लिये आज भी बना हुआ है। औपनिवेशिक काल के इसी झूठ और लूट को उन्होंने वित्तीय पूंजी में बदल दिया है। पश्चिमी देशों के पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को बनाये रखने के लिये अफ्रीकी देशों का अविकसित और गरीब बने रहना जरूरी है। जहां मानव श्रमशक्ति और प्राकृतिक संसाधन सस्ता से सस्ता है। आज अफ्रीकी महाद्वीप के जितने भी आपसी संघर्ष है, उसके मूल में पश्चिमी देशों का हित है। जिसका मकसद अफ्रीका को अविकसित और गरीब बनाये रखना है, यदि वो सम्पन्न हो जाते हैं तो प्राकृतिक संसाधन, और मानव श्रमशक्ति का मूल्य बढ़ जायेगा। यदि वो तकनिकी रूप से विकसित हो जाते हैं तो कच्चे माल को सस्ते में बेचने के बजाये वो उसे उत्पादित वस्तु के रूप में बेचने लगेंगे, पश्चिमी देशों की सोच है कि जो लाभ वो फैक्ट्री और प्रोसेसिंग प्लांट लगा कर लाभ कमाते हैं, वह लाभ उनसे छिन जायेगा। खनन करके निकाले गये खनिज तेल और खनिज धातुओं की लूट के लिये जरूरी है कि अफ्रीकी देश कमजोर और विभाजित रहें। उदाहरण के लिये हम डेमोक्रेटिक रिपबिलक आफ कांगो को लेते हैं। कांगो हर साल 10 बिलियन डालर का खनिज (कच्चा माल) उत्पादित करता है, मगर वर्ष 2012 में उसे मात्र 32 मिलियन डालर ”टैक्स रेवेन्यू” ही खनिज से प्राप्त हो सका, जिसकी मुख्य वजह पश्चिमी देशों द्वारा थोपे गये क्षदम युद्ध और आपसी संघर्षों के अलावा वो हथियारबद्ध टूकडियां हैं, जो खनिज को लूटती हैं, अशांति फैलाती हैं, और पाशिचमी देशों की कम्पनियों को लूट का माल आधे कीमत पर बेच देती हैं, जिनके सिरपरस्त भी थे ही कम्पनियां और पश्चिमी ताकतें है।

affrica (2)यह सच, झूट का सदियों पुराना हथकण्डा है कि अफ्रीका पश्चिमी ताकतों के सहयोग की वजह से जिंदा है। सच यह है कि पश्चिमी देशों ने अपने हितों के लिये उसे एक काले महाद्वीप में बदल रखा है। वो उसके विकास, उसकी समृद्धि और अपनी मूलभूत जरूरतों की पूर्ति तथा शांति और स्थिरता की राह में सबसे बड़ी बाधा है। सच यह है कि आज का अफ्रीका उन्हीं की करतूतों का परिणाम है। जिसके खिलाफ अफ्रीकी यूनियन का गठन हुआ और कर्नल गददाफी ने निर्णायक भूमिका निभार्इ। इन ताकतों के खिलाफ सोवियत संघ और समाजवादी देशों के पतन के बाद भी, दशकों लम्बा संघर्ष किया।

यदि अफ्रीकी महाद्वीप और अफ्रीकी देशों के लिये देखे गये, कर्नल गददाफी की नीतियां सफल हो जातीं, लीबिया की तर्ज पर यदि कर्नल गददाफी के सपने साकार हो जाते, तो अफ्रीकी देशों से यूरोपीय देशों और अमेरिकी सेना ही नहीं विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और यूरोपीय देशों के बैंकों के तम्बू कनात उखड़ जाते। न माली की समस्यायें होतीं, न मिस्त्र का संघर्ष होता, न साम्राज्यवादी हस्तक्षेप होते, ना ही असुरक्षा और असंतोष की रोज गहराती स्थितियां होतीं। अफ्रीकी देश लातिनी अमेरिकी देशों की तरह सहयोग एवं समर्थन की आर्थिक विकास योजनाओं से संचालित बहुधु्रवी विश्व के एक प्रभावशाली धु्रवीकोंण होतें। लेकिन ऐसा नहीं हो सकता और आने वाले कल की प्रबल सम्भावनाओं को अवशेषों में बदल दिया गया। आतंकवादियों को विद्रोही बना कर साम्राज्यवादी नीतियां लीबिया में ही नहीं, अफ्रीकी देशों में भी कामयाब हो गयीं। यह झूठ आज भी प्रचारित सच है कि अफ्रीकी देश पश्चिमी सहयोग पर टिके हुए हैं।

इसके बाद भी संभावनायें यूरोपीय देश और अमेरिकी साम्राज्य के हाथों से फिसलती जा रही है। सदियों के शोषण और दमन के बाद भी उनकी समृद्धि, उनकी वैश्विक वित्त व्यवस्था और उनकी राजनीतिक संरचना संकटग्रस्त है। वो आतंकवादियों के सहयोग और विद्रोहियों की खुराक पर जिंदा हैं। वो बिखर रहे हैं, उनका बिखरना तय है। प्रचारित झूठ पर सच के अक्स उभर रहे हैं। आप मानें या न मानें अफ्रीकी देशों की संभावनायें कर्नल गददाफी के सपनों की ओर ही बढ़ रहे हैं। आने वाला कल यूरोप और अमेरिका का नहीं, बल्कि तीसरी दुनिया के देशों के साथ अफ्रीकी महाद्वीप का है। भले ही आज अफ्रीकी देश चौतरफा संघर्षों के दौर से गुजर रहे हैं।

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