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मिस्त्र के क्रांति की दूसरी वर्षगांठ पर जन प्रदर्शनों का हिंसक होना

affricaमिस्त्र में राष्ट्रपति मुर्सी के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। प्रदर्शनकारी अमेरिका समर्थित राष्ट्रपति से इस्तिफे की मांग कर रहे हैं। वो होस्नी मुबारक के अंजाम को दिखा रहे हैं और क्रांति के जारी रहने की बात कर रहे हैं। लोगों का मानना है कि ”उन्होंने अपने वायदों को पूरा नहीं किया है। वो सेना के साथ मिल कर अपनी तानाशाही कायम करना चाहते हैं।” आज मिस्त्र का हर एक चौराहा तहरीर चौक में बदल गया है और प्रदर्शनकारी राष्ट्रपति भवन तक पहुच गये हैं। उनके पेट्रोल बम सेना और सरकार के दमन के खिलाफ राष्ट्रपति भवन के चहारदीवारी को पार कर, उस परिसर में गिरने लगे हैं, जहां राष्ट्रपति मुर्सी अपने को सुरक्षित समझने की भूल कर रहे हैं। उन्होंने सरकार विरोधी प्रदर्शनों को रोकने के लिये जहां एक ओर 27 अपै्रल को आम चुनाव की घोषणा की है, वही प्रदर्शनकारियों से सख्ती से निपटने के लिये 1 लाख, 40 हजार ‘टीयर्स गैस के कण्टेनर’ अमेरिका से मंगा रहे हैं। जिसकी कीमत 24,63,000 डालर है।

मिस्त्र के प्रमुख विपक्षी नेता मोहम्मद अल-बरदेर्इ ने होने वाले आम चुनाव के बहिष्कार की घोषणां की है। अन्य विपक्षी नेता मूसा ने भी कहा है कि ”विपक्षी गठबंधन भी आम चुनाव का बहिष्कार करने के पक्ष में है।” उन्होंने कहा कि ”ऐसे गुटों की संख्या काफी है, जो चुनाव का बहिष्कार करना चाहते हैं, मगर अभी इस बारे में न तो चर्चा हुर्इ है, ना ही अंतिम निर्णय लिया गया है।”
21 फरवरी को मिस्त्र के राष्ट्रपति मुर्सी की तरह से लिये गये निर्णय में कहा गया है कि ”मिस्त्र में चुनाव 4 चरणों में होगा। 27 अप्रैल से शुरू हो कर जून के अंतिम सप्ताह तक चलेगा।” उन्होंने घोषणा की है कि नये संसद का गठन 6 जुलार्इ को होगा।” राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोहम्मद मुर्सी ने चुनाव की घोषणा इस उम्मीद के साथ की है कि इससे सरकार विरोधी प्रर्दशनों का अंत हो जायेगा। लेकिन ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है, बलिक प्रदर्शन और प्रदर्शनकारियों की संख्या बढ़ती जा रही है।

स्वेज नहर क्षेत्र के प्रमुख शहर पोर्ट सर्इद में प्रदर्शनकारी पिछले चार दिनों से, गये महीने, पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हुए हिंसक झड़प में मारे गये 40 लोगों के लिये न्याय की मांग कर रहे हैं। उन्होंने सरकारी भवनों को घेर लिया और विशाल प्रदर्शन किया। 20 तारीख को हुए इस प्रदर्शन की वजह से सरकारी कार्यालय, कारखाने और स्कूल बंद रहे। उन्होंने रेल सेवा को भी पूरी तरह रोक दिया। एक प्रत्यक्षदर्शी का कहना है कि इस प्रदर्शन में लगभग 3000 लोगों ने हिस्सा लिया। प्रदर्शनकारी पिछले महीने, वर्ष 2012 के ‘फुटबाल दंगे’ में हिस्सेदार होने के लिये, 21 लोगों को जब एक न्यायालय के द्वारा मौत की सजा सुनार्इ गयी, बत पूरे स्वेज नहर क्षेत्र में हिंसक प्रदर्शनों की शुरूआत हो गयी। इस फुटबाल दंगे में 74 लोगों की जान गयी थी और 1000 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। रिपोर्ट के अनुसार प्रदर्शनकारी नारे लगा रह थे-

16 फरवरी को हुए सरकार विरोधी देशव्यापी प्रदर्शनों में 60 लोगों को हिरासत में लिया गया है। मिस्त्र के इंटीरियर मिनिस्टर के द्वारा जारी वक्तव्य में कहा गया है कि 30 ऐसे लोगों को हिरासत में लिया गया है, जो राष्ट्रपति भवन के सामने प्रदर्शन कर रहे थे। सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों ने 15 फरवरी की रात में राष्ट्रपति भवन पर पत्थरों और पेट्रोल बम से हमला किया। काहिरा से 80 किलोमीटर उत्तर में सिथत शहर गरबिया में प्रदर्शन के दौरान एक व्यकित की मृत्यु हो गयी, जिसे सेना के कार द्वारा कुचल दिया गया। इस प्रदर्शन में शामिल 20 लोगों को हिरासत में लिया गया है। 15 फरवरी को देशव्यापी प्रदर्शनों में 125 लोग घायल हुए हैं। प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि ”राष्ट्रपति मुर्सी जनक्रांति के उस भावना को समझें और उसका सम्मान करें, जिसने होस्नी मुबारक की तानाशाही का खात्मा किया।” मगर ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है। जनभावनाओं के विपरीत 15 फरवरी को ही काहिरा विश्व विधालय के सामने मुर्सी समर्थक मुसलिम ब्रदरहुड के सदस्यों ने एक सभा का आयोजन कर सरकार विरोधी प्रदर्शनकारियों की निंदा की।

8 फरवरी को राष्ट्रपति भवन के सामने प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों को वहां से हटाने के लिये सुरक्ष सेना ने भारी मात्रा में टियर्स गैस के गोले दागे। स्वेज नहर और नील नदी के डेल्ठा में बसे शहरों में भी प्रदर्शन हुए। अलेजेणिड्रया में हुए प्रदर्शनां में कर्इ लोगों के घायल होने की खबरें हैं। पुलिस और सुरक्षा बल के द्वारा भारी मात्रा में किये जा रहे टियर्स गैर कनटेनर के उपयोग के घातक परिणामों की भी खबर है।

40 विपक्षी दलों के द्वारा आयोजित प्रदर्शनों में राष्ट्रपति मुर्सी पर अपने अधिकारों का उपयोग मुसलिम ब्रदरहुड के हितों में करने का आरोप भी लगाया गया। वैसे विपक्ष की मांग- 1. नर्इ संयुक्त सरकार के गठन, 2. नये संविधान में संशोधन और 3. स्वतंत्र न्यायपालिका की है।

पिछले दो सप्ताह से मिस्त्र में सरकार विरोधी प्रदर्शनों का तांता सा लग गया है। पुलिस, सुरक्षा सेना और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प में, इस दौरान 60 लोग मारे गये हैं। हिंसक घटनाओं के लगातार बढ़ने और प्रदर्शनकारियों का हिंसक दमन के विरोध में सरकार में शामिल ‘कल्चर मिनिस्टर’ मोहम्मद साबर अयूब ने अपने पद से इस्तिफा दे दिया। मिस्त्र के समाचार पत्र अल-अहराम ने अपने वेबसार्इट पर जानकारी दी है कि कल्चर मिनिस्टर ने 4 फरवरी को उस विडियो के विरेध में इस्तिफा दिया है, जिसने लोगों की नाराजगी को और बढ़ा दिया। विडियो में 1 फरवरी को जब राष्ट्रपति भवन का घेराव किया गया का नजारा है। ”पुलिस एक प्रदर्शनकारी को मारते हुए घसीट रही है, वह पूरी तरह बिना कपड़ों के है।” जिसकी मौत 4 फरवरी को पुलिस हिरासत में नील डेल्टा के शहर तान्ता में हो गयी। जिसकी शिनाख्त एक राजनीतिक समाजसेवी के रूप में की गयी। जिसके अंतिम संस्कार के दौरान भी पुलिस के द्वारा अंश्रुगैस के गोले दागे गये।

पुलिस के द्वारा लोगों की की जा रही हत्या, हिरासत के बाद, दी जा रही शारीरिक यातनाओं के अनगिनत किस्से हैं। ”मिस्त्र क्रांति” के दूसरी साल गिरह पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान, 28 वर्षीय मोहम्मद-अल-ग्युनदे को पुलिस ने तहरीर चौक पर गिरफ्तार किया था। बाद में बेहोशी के हालत में उसे अस्पताल लाया गया। जहां उसकी मौत गहरे चोटों की वजह से हो गयी। डाक्टर के अनुसार जब उसकी मौत हुर्इ वह कोमा में था। उसे दिमागी चोट लगी थी और उसे शरीर पर कर्इ गंभीर चोट लगे थे। मानवाधिकार ग्रुप्स ने इस घटना की निंदा करते हुए इसे पुलिस की क्रूरता की एक और वारदात करार दिया।

राष्ट्रपति भवन पर हुए प्रदर्शन में भी एक प्रदर्शनकारी पुलिस की गोली से मारा गया था। कर्इ घायल हुए थे। दूर्घटना के बाद राष्ट्रपति भवन और उसके आस-पास के इलाकों में मिस्त्र की दंगारोधी विशेष पुलिस को तैनात किय गया था। प्रदर्शनकारियों ने आजाद चौक में मिस्त्र के प्रधानमंत्री के काफिले पर भी हमला किया।

काहिरा के अलावा मिस्त्र के कर्इ अन्य शहरों में भी 1 फरवरी को प्रदर्शन हुए। प्रदर्शनकारियों का मानना है कि ”राष्ट्रपति मुर्सी ने 2011 के मिस्त्र क्रांति के आदर्शों को धोखा दिया है।” वो यह भी मानते हैं कि ”मोहम्मद मुर्सी उन्हीं आदर्शों और हितों को पूरा कर रहे हैं, जो होस्नी मुबारक कर रहे थे।” और यह गलत भी नहीं है। मुर्सी का राष्ट्रपति चुना जाना और अमेरिका की मध्यस्तता में मुसलिम ब्रदरहुड और सेना के कार्यकारी परिषद के बीच तालमेल का होना, इस बात के प्रमाण हैं। साम्राज्यवादी ताकतों के लिये मिस्त्र में जनतंत्र के नाम पर सेना की वरियता वाली सरकार ही उपयोगी है। इसलिये आज की सरकार मिस्त्र के लोगों या उनकी भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं कर पा रही है। लम्बे संघर्षों ने और मिस्त्र की सरकार ने, लोगों को हिंसक संघर्ष के लिये विवश कर दिया है, जिसकी शुरूआत जनक्रांति के दूसरे वर्षगांठ से हो गयी है। मोहम्मद मुर्सी ने भले ही सिक्यूरिटी फोर्स से प्रदर्शनकारियों से संयम से निपटने की सलाह दी है, और विपक्ष ने प्रदर्शनकारियों को हिंसक न होने की अपील की है, लेकिन इन अपीलों का महत्व तब घट जाता है जब जन-आकांक्षाओं को धोखा देने के लिये की जाती है। पुलिस और सिक्यूरिटी फोर्स के द्वारा दमन जारी है, ऐसे में प्रदर्शनकारियों से शांति बनाये रखने और हिंसक न होने की सलाह नहीं दी जा सकती। आम जनता हमेशा से अहिंसक होती है, और सरकारें ही सबसे पहले हिंसक होती हैं। मिस्त्र में चुनाव भी जनतंत्र की बहाली के संघर्ष को धोखे में डालने के लिये की गयी है।

24 फरवरी को भारी संख्या में लोगों ने काहिरा की सड़कों पर उतर कर राष्ट्रपति मुर्सी के खिलाफ प्रदर्शन किये। बड़ी संख्या में लोग मुख्य प्रशासनिक भवन के सामने इक्कटठा हुए। उन्होंने प्रशासनिक भवन को मुख्य द्वार पर कब्जा कर लिया। वहां काम करने वाले एक कर्मचारी ने बताया कि ‘युवा प्रदर्शनकारियों ने मुख्य द्वार बंद कर दिया। उन्होंने कहा- जो भी बाहर जाना चाहता है और जिन्होंने अपनी डयूटी पूरी कर ली है, वो बाहर चले जायें, हम किसी को अब भीतर आने नहीं देंगे।”

25 जनवरी को क्रांति के दूसरी वर्षगांठ पर हुए प्रदर्शन में 100 से अधिक लोग घायल हुए थे। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच मिस्त्र के सभी शहरों में हिंसक झड़प हुए।

स्वेज नहर के दूसरे सबसे व्यस्ततम और प्रमुख शहर पोर्ट सर्इद में 18 फरवरी को दसो हजार कामगर और युवाओं ने हड़ताल के साथ जन-प्रदर्शन किये। परिणाम स्वरूप सभी काम-काज ठप्प पड़ गये। स्वेज नहर अथारिटी द्वारा संचालित नहर कामगरों ने बंदरगाह के प्रमुख दरवाजे पर कब्जा कर लिया। इण्डसिट्रयल फ्री जोन के 29 फैक्ट्री के लगभग 40 हजार कामगर हड़ताल पर चले गये। स्कूल और सभी शासकीय कार्यालय भी बंद हो गयें।

18 फरवरी को अल सुबह कामगर और नौजवानों ने पूरे शहर में अमरिकी समर्थित राष्ट्रपति मोहम्मद मुर्सी और उनकी मुसलिम ब्रदरहुड की नेतृत्व वाली सरकार को सत्ता से बेदखल करने की मांग के साथ मार्च किया और नारे लगाये ”सत्ता छोड़ो मुर्सी, सत्ता छोड़ो!” प्रदर्शनकारियों ने प्रांतीय सरकार के मुख्यालय को घेर लिया। जिसमें रेल कर्मचारी, श्रमिक वर्ग, विधार्थी, नौजवान, टिचर के अलावा प्रांतीय सरकार और कोर्ट के कर्मचारियों ने भी प्रदर्शन में भाग लिया। टेलीफोन कम्पनी, प्राकृतिक गैस कर्मचारी, कस्टम अधिकारी और अन्य संस्थानों के लोगों ने भी हड़ताल में भाग लिया। स्वेज नहर के कर्मचारियों की हिस्सेदारी महत्वपूर्ण थी। स्वेज नहर और पोर्ट सर्इद का बंद होना सिर्फ मिस्त्र की सरकार की अर्थव्यवस्था पर ही नहीं, विश्व व्यवस्था पर भी प्रभावकारी प्रमाणित हुआ। मोहम्मद मुर्सी ने इन जगहों पर अब सेना को तैनात कर दिया है।

21 फरवरी को चुनाव की घोषणां को मिस्त्र की आम जनता और विपक्ष स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है, वो इसे देश की जनता और विश्व समुदाय को धोखे में रखने की कवायत मान रही है। वह राष्ट्रपति और सैन्यपरिषद के अधिकारों को घटा कर देश की सत्ता जनता को सौंपने के पक्ष में है। जिसे राष्ट्रपति, सैन्य परिषद और अमेरिकी तथा पशिचमी ताकतें स्वीकार करना नहीं चाहती हैं। यही कारण है कि जन संघर्षों की दिशा हिंसक होती जा रही है।

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