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आम जनता के लिये बोलेवेरियन क्रांति

latine americaइक्वाडोर में राफेल कोरिया ने यह प्रमाणित कर दिया है कि वैश्विक मंदी के घातक प्रभावों को तीन तिमाही में ही, रोका जा सकता है, और उससे उबरने के लिये एक साल का समय पर्याप्त है। मगर वैश्विक मंदी के जिस भयानक दौर से यूरोप गुजर रहा है, और संयुक्त राज्य अमेरिका की सिथति डांवाडोल है, वह चार लम्बे साल गुजारने के बाद, 2008 से भी बड़े, दूसरे मंदी के दौर में प्रवेश कर रहे हैं। यूरोपीय संघ बिखरने को है, और संयुक्त राज्य अमेरिका के कर्इ राज्य, उससे अलग होना चाहते हैं। दो महाद्वीप की आम जनता भूख, गरीबी, बेरोजगारी और सरकारी दमन का शिकार हो रही है पहली बार उसे इस बात का एहसास हो रहा है पूंजीवादी जनतंत्र और वित्तीय साम्राज्यवा तीसरी दुनिया के देशों के लिये कितना निर्मम और क्रूर रही है। दमन, दोहन और शोषण पर टिकी उसकी वैश्विक व्यवस्था का व्यावहारिक अर्थ क्या है? उनके बैंक, कारपोरेशन और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों ने अपने लाभ के लिये तीसरी दुनिया के देशों को किस तरह लूटा है। उन्होंने राजनीतिक असिथरता को अपना हथियार बना लिया है। एशिया और अफ्रीका के अनगिनत देश इस पतनशील व्यवस्था के शिकार हैं। जिसके पांव लातिनी अमेरिकी देशों से उखड़ते जा रहे है।, जहां समाजवादी सोच की नयी जमीन बोलिवेरियन क्रांति के रूप में वास्तव में बढ़ रही है। जहां क्यूबा, वेनेजुएला, बोलेविया और इक्वाडोर जैसे देश हैं। जो पूरे महाद्वीप को एक देश में ही नहीं बदल रहे हैं, बलिक जन समस्याओं के समाधान के लिये जनसत्ता की स्थापना भी कर रहे हैं। आज लातिनी अमेरिका और कैरेबियन देशों की समाज व्यवस्था भले ही अलग-अलग है, मगर उनके विकास की सामूहिक दिशा समाजवादी समाज व्यवस्था की ओर बढ़ रही है।

यह बड़ी बात है कि महाद्वीप की आम जनता बोलिवेरियन क्रांति की अवधारणांओं से बंध गयी है, वो अपने देश की सरकार के खिलाफ हों या सरकार के साथ, उनकी सोच की बाहें आपस में जुड़ी हुर्इ हैं। यह जुडाव दुनिया के अन्य देशों के साथ भी जुड़ता जा रहा है। ”अफ्रीका-साउथ अमेरिका” -ए0एस0ए0- का तीसरा सम्मेलन ‘इक्वाटोरियल गुआना (गिनी) में 21 फरवरी को हुआ, जहां दो महाद्वीप के देशों को विश्व में ”वास्तविक शक्ति स्तम्भ” के रूप में उभरने की बाते हुर्इं, जिन्हें साम्राज्यवादी हस्तक्षेप के भयानक दौर से गुजरना पड़ रहा है। जहां आने वाले कल की संभावनायें जन्म ले रही हैं।

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