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इक्वाडोर- ”जनक्रांति को मिला जनसमर्थन”

latine america (2)17 फरवरी, को हुए राष्ट्रपति चुनाव में राफेल कोरिया को इक्वाडोर की आम जनता ने, तीसरी बार देश का राष्ट्रपति चुना है। उन्हें 59.9 प्रतिशत वोट मिले, और दूसरे स्थान पर रहे प्रमुख विपक्षी गिवलेर्मो लासो को 23.8 प्रतिशत वोट मिला। जीत के बाद कैरौनदिलीट पैलेस की बालकनी से अपने समर्थकों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने जीत को इक्वाडोर की आम जनता और बोलिवेरियन क्रांति की जीत करार देते हुए कहा कि ”इस क्रांति को कोर्इ नहीं रोक सकता क्योंकि हम इतिहास का निर्माण कर रहे हैं, अपने महान देश और लातिनी अमेरिका का निर्माण कर रहे हैं।” उन्होंने आगे कहा ”स्वतंत्रता का अधिकार उन्हें है, जो उसे पाने के योग्य होते हैं, और यह अधिकार सभी के लिये है।” उन्होंने खुले शब्दों में कहा कि ”हमारा अपना कुछ भी नहीं है, जो भी है, वह इस देश की आम जनता का है। सरकार शासन करने के लिये नहीं, सेवा करने के लिये है।” अंत में उन्होंने ”शानदार भरोसा” करने के लिये लोगों को धन्यवाद दिया।

राफेल कोरिया इक्वाडोर के पहले राष्ट्रपति हैं, जिन्होंने देश को स्थिरता दी और उन्हें लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति चुना गया। वो जनवरी 2007 में पहली बार राष्ट्रपति बने थे। उनके पदभर सम्भालने से पहले इक्वाडोर लातिनी अमेरिका का एक अस्थिर राज्य था, जहां 10 साल में 7 राष्ट्रपति सत्ता में आये और उन्हें सत्ता छोड़ना पड़ा। उन्होंने राष्ट्रपति का पद तब संभाला जब वैश्विक मंदी ने संयुक्त राज्य अमेरिका में दस्तक देना शुरू कर दिया था। 2009 में जब अमेरिकी साम्राज्य मंदी की चपेट में आयी उसकी वैश्विक वित्त व्यवस्था की चूलें हिल गयीं। इक्वाडोर की अर्थव्यवस्था अमेरिकी वित्त व्यवस्था से जुड़ी हुर्इ थी। उसके पास अपनी मुद्रा तक नहीं थी। इसलिये अमेरिकी मंदी का सीधा प्रभाव उसकी वित्तव्यवस्था पर भी वही पड़ा जो अमेरिकी वित्त व्यवस्था पर पड़ा और आज भ्ी अमेरिका अपने विशाल संसाधन के बाद भी उससे उबर नहीं सका है। उसके उबरने की संभावनायें रोज घटती जा रही हैं। यह तय हो चुका है कि उसका उबरना असंभव की सीमा तक कठिन है।

कोरिया ने अपने देश का निर्माण इसी वैश्विक मंदी के विस्तार के बीच किया है। इसलिये उनके द्वारा उठाया गया हर एक कदम इस वैश्विक मंदी से उबरने की दिशा की ओर उठाया गया कदम है जिस समय अमेरिका, यूरोप और उनकी अर्थव्यवस्था से जुड़े तीसरी दुनिया के देशों में बेरोजगारी दर तेजी से बढ़ी है, ठीक उसी समय इक्वाडोर में बेरोजगारी दर घटी है। पिछले साल के अंत में 4.1 प्रतिशत बेरोजगारी दर में भारी गिरावट आयी है। यह इक्वाडोर के 25 साल के इतिहास में सबसे बड़ी गिरावट है। साल 2000 में गरीबी दर 64 प्रतिशत से भी ज्यादा था, जो घट कर 27 प्रतिशत रह गया है। शिक्षा पर खर्च में दो गुणा से भी ज्यादा वृद्धि की गयी है। स्वास्थ्य एवं चिकित्सा के क्षेत्र में भी बढ़ोत्तरी की गयी। हाउसिंग क्रेडिट के क्षेत्र में सरकारी छूट में बहुत विस्तार किया गया। आम जनता की फिक्र की गयी।

जिसे रोक कर यूरोप और अमरिका में मंदी को रोकने की कोशिश की गय, इक्वाडोर में कोरिया ने, बिल्कुल उसके विपरीत कदम उठाया। उन्होंने व्यवस्था, सरकार, बैंक, वित्तीय इकार्इ और उधोगों को बचाने के बजाये, आम जनता को मंदी के प्रभाव से बचाने के लिये आवश्यक कदम उठाये। पश्चिमी देश और अमेरिकी स्कूल के अर्थशास्त्री कोरिया की इस सफलता को भाग्य, अवसर और योग्यता का मिश्रण मानते हैं। वैश्विक मंदी के खिलाफ खड़े होने, उसे रोकने और विकास को सही दिशा देने में जिस क्षमता और नीतियों को इक्वाडोर में लागू किया गया, उसे वो अपने देश और दुनिया के सामने आने से रोकते हैं, ताकि वैश्विक मंदी से लाभ उठाने की उनकी योजनाओं का पर्दाफाश न हो सके।

जनवरी 2007 में राफेल कोरिया ने जैसे ही राष्ट्रपति का पदभार संभाला, अगले ही साल 2008 में, वैश्विक मंदी और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संकट की शुरूआत संयुक्त राज्य अमेरिका में हो गयी। इक्वाडोर अमेरिका और यूरोप के सबसे ज्यादा प्रभावित देशों की तरह ही, लातिनी अमेरिकी देश था। क्योंकि उसकी वित्त व्यवस्था, विदेश से -अमेरिका और स्पेन में- काम करने वाले इक्वाडोर वासियों के पैसे और तेलों के निर्यात पर निर्भर था, जोकि उसके तेल निर्यात का 62 प्रतिशत और सरकारी रिजर्व का 34 प्रतिशत था। वर्ष 2008 में अंतर्राष्ट्रीय तेल बाजार में 79 प्रतिशत तक की गिरावट आयी, और प्रवासियों के द्वारा भेजे जाने वाले पैसों में भी रूकावट आती चली गयी, क्योंकि अमेरिकी एवं यूरोपीय देशों की मंदी ने बेरोजगारी को बढ़ाना शुरू कर दिया। उसकी अर्थव्यवस्था में ठहराव आ गया है, हम कह सकते हैं, कि वह सहसा ही जम गयी। उसकी तुलना हम अमेरिकी के हाउसिंग बबल से कर सकते हैं, जिसकी वजह से महामंदी की शुरूआत हुर्इ।

इक्वाडोर के लिये एक और बुरी बात यह थी कि उसकी खुद की मुद्रा नहीं थी। वर्ष 2000 में उसे अमेरिकी डालर को अपनी मुद्रा के रूप में स्वीकार करने के लिये विवश होना पड़ा था। मतलब यह कि वह अपनी वित्तव्यवस्था की तरलता को बनाये रखने के लिये विनिमय दर में परिवर्तन नहीं कर सकता था। वह अपनी वित्त व्यवस्था को बचाने के लिये अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा उठाये गये कदमों को नहीं उठा सकता था। उसे उस वित्तीय व्यवस्था और उस मुद्रा पर निर्भर होना था, जो पतनशील थी, जिसका नाश हो रहा था। उसके पास अपनी व्यवस्था को बचाने के लिये सीमित साधन और विकल्प थे। इक्वाडोर की वित्त व्यवस्था को अमेरिकी मंदी से बचाना और वैश्विक मंदी के घातक प्रभाव से इक्वाडोर वासियों को सुरक्षित करना आसान नहीं था। संकट चौतरफा था। अमेरिका की वैश्विक वित्त व्यवस्था में तेजी से सिकुडन हो रहा था। इक्वाडोर की अर्थव्यवस्था भी इस संकुचन से पूरी तरह अप्रभावी नहीं थी। उसने अपने सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 1.3 प्रतिश ही खोया और तीन तिमाही में ही उसे नियंत्रित कर लिया और असके एक साल बाद ही उसने मंदी से पहले वाले उत्पादन स्तर को प्राप्त कर लिया। मंदी शुरू होने के 2 साल बाद ही इक्वाडोर अपने 20 साल के ‘ग्रोथ ट्रेण्ड’ को प्राप्त कर लिया।

राफेल कोरिया की इन उपलब्धियों ने उन्हें न सिर्फ इक्वाडोर का बलिक लातिनी अमेरिका के सबसे जनप्रिय राष्ट्रपतियों में शामिल कर दिया।

ऐसा उन्होंने किया कैसे? यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है।

राफेल कोरिया एक सफल समाजवादी अर्थशास्त्री रहे हैं। वो पूंजीवादी वैश्विक व्यवस्था और 20 साल में एक बार आने वाले वित्तीय संकट की बारीकियों को अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने इक्वाडोर की वित्तीय संरचना को बदल कर, उसे राज्य के नियंत्रण में ले लिया, और पूंजीवादी खेमें से निकालने की चरणबद्ध कार्ययोजना को अंजाम दिया। उन्होंने बैंकों और वित्तीय इकार्इयों को बचाने के बजाये आम जनता को भूख, गरीबी, और बेरोजगारी से बचाने का ठोस निर्णय लिया। उन्होंने अपने देश की आंतरिक संरचना को समझ कर, समाजपरक वित्तव्यवस्था के निर्माण की ओर कदम बढ़ाया। उन्होंने राजकोषीय प्रोत्साहन -जो कि सकल घरेलू उत्पाद- जीडीपी का- 5 प्रतिश था, उसे बढ़ाया और इक्वाडोर में चल रहे भवन निर्माण -कंस्ट्रक्शन- के क्षेत्र में हाउसिंग क्रेडिट में 2009 में 599 मिलियन डालर का विस्तार किया ताकि बाजार की तरलता बनी रहे और श्रमिक वर्ग के हाथों को काम मिले। उन्होंने बेरोजगारी को आम जनता से दूर रखने के लिये 2011 तक इस विस्तार को जारी रखा। उन्होंने, सड़क, स्कूल, अस्पताल और समाज के बुनियादि ढांचे में खर्च को बढ़ा दिया। राज्य एवं सरकार के द्वारा चलाये जा रहे सामाजिक कार्यों के क्षेत्र में न सिर्फ बजट में प्रावधान रखा, बलिक उनमें भारी इजाफा किया। जिसका समाज व्यवस्था और आम जनता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा। 2006 में इक्वाडोर का हेल्थ बजट 561 मिलियन डालर था, जो वर्ष 2012 में बढ़ कर, 1774 मिलियन डालर हो गया है, शिक्षा के बजट में भी भारी वृद्धि की गयी है। 2006 में यह 2.5 प्रतिशत था जो 2013 में उनके जीडीपी का 6 प्रतिशत हो गया है।

उन्होंने इक्वाडोर के सेण्ट्रल बैंक को सरकारी नियंत्रण में ले लिया और दबाव बनाया कि 2 बिलियन डालर का जो रिजर्व विदेशों में रखा है, उन्हें वापस इक्वाडोर लाया जाये। और ऐसा ही किया गया। उन्होंन पबिलक बैंको द्वारा इन्फ्रास्ट्रक्चर (वाहय संरचना), हाउसिंग, कृषि और अन्य घरेलू वित्तीय खर्च के लिये, उसे कर्ज के रूप में देने की व्यवस्था की। इसके अलावा देश से बाहर जाने वाले पैसों पर सरकारी टैक्स लगाये और बैंको पर अनिवार्य शर्तें रखी कि अपना 60 प्रतिशत लिक्विड एसेट -जिसे तत्काल मुद्रा में बदला जा सके जैसे सोना- देश के अंदर रखा जाये। परिणाम स्वरूप बैंकों पर तो करों में वृद्धि हुर्इ किंतु घरेलू विकास योजना, आधारभूत ढांचे के निर्माण और आम जनता के कर्ज पर ब्याज दर घटा दिया गया। जिसका सकारात्मक लाभ देश की वित्तव्यवस्था को मिला। उन्होंने अपने तेल निर्यात की नीतियो में भी परिवर्तन ला दिया। उन्होंने तेल के सरकारी मूल्य में वृद्धि के बाद विदेशी तेल कम्पनियों से किये गये समझौतों पर नये सिरे से बातचीत की। परिणाम स्वरूप सरकारी रेवेन्यू जो कि 2000 में 27 प्रतिशत था, वह 40 प्रतिशत हो गया।

राफेल कोरिया द्वारा उठाये गये इन वित्तीय कदमों का सीधा प्रभाव इक्वाडोर की वित्त व्यवस्था और देश की आम जनता पर पड़ा। वैश्विक मंदी के घातक परिणामों से न सिर्फ देश की अर्थव्यवस्था, उसयकी विकास योजनाओं को बचाना संभव हो सका, बलिक आम जनता का जीवन भी संभलने के लायक बना रहा।

इक्वाडोर के मतदाताओं ने जार्ज ग्लास को उपराष्ट्रपति और 137 सीटों वाले कांग्रेस के लिये भी मतदान किया और वहां भी कोरिया को भारी सफलता मिली। सरकार की तरफ से जारी प्रेस वक्तव्य में कहा गया कि ”राफेल केरिया का राष्ट्रपति चुना जाना अल्बा देशों, लातिनी अमेरिका के बोलिवेरियन क्रांति और समाजवादी ताकतों की जीत है।” कोरिया की जीत पर वेनेजुएला के उपराष्ट्रपति मादुरा ने बधार्इ देते हुए कहा कि ”हम खुश हैं। हम उन्हें वेनेजुएला की आम जनता और राष्ट्रपति शावेज की तरफ से जीत की बधार्इ देते हैं।” कोरिया के लिये वेनेजुएला से आये बधार्इ संदेश का अपना महत्व है। उन्होंने कहा-”शावेज की ओर से आये अपने लिये उनकी संवेदनाओं को मैं दिल से महसूस करता हूं। उनसे मेरा सिर्फ इतना ही आग्रह है कि वो इन बातों को भूल कर थोड़ा आराम करें। जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी स्वस्थ्य हों। क्योंकि वेनेजुएला और लातिनी अमेरिका को, और उनके दोस्तों को उनकी जरूरत है।”

क्यूबा के राष्ट्रपति राउल कास्त्रो ने भी राफेल कोरिया को तीसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने पर बधार्इ देते हुए कहा है कि ”यह जनक्रांति को मिला जनसमर्थन है।

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