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कैलेण्डर की पीठ पर रोने की तारीख

vakradhrishtiइस महीने दो तारीखें हैं-8 मार्च और 23 मार्च। दोनों तारीख आधी आबादी के लिए महत्वपूर्ण है। एक स्त्री के स्तर पर और दूसरा युवा नागरिक के स्तर पर। एक का प्रयोजन अंर्तराष्ट्रीय है, तो दूसरा आयोजन देसी प्रेरणास्तंभ है। आधुनिक लहजे में युवा फ्लेवर का है। 23 मार्च, 1931 सचमुच रोने की तारीख थी जो कब की बीत गर्इ है। अब तो उस दिन रोने की याद में रोने की तारीख घोषित(सरकारी तौर पर नहीं) है। इस रोने में भी दंगल हैं। हर कोर्इ नहीं रो सकता है इस दिन। आम निगाह में यह दिन राष्ट्रीय महत्व का है; लेकिन, सियासतदारों के लिए यह दिन राजनीतिक महत्व या प्रेरणा का कम मालूम देता है। दरअसल, विचारधारा और खेमे में बँटे लोग आज़ादी के परवानों की भी बँटार्इगिरी करने लगे हैं। अपनी देश की माटी में पैदा हुए भगत सिंह जैसे वीर सपूतों के ध्येय और लक्ष्य तक को किसी विचार-विशेष की खोली में समेटने लगे हैं। उनके संघर्ष की चेतना और शहादत का लोग सरलीकरण या कि विरूपीकरण करने पर उतर आये हैं। जिन्हें देशी मूल्य, दर्शन और संस्कृति का न तो भान है और न ही वास्तविक ज्ञान; वे भी भगत सिंह को लेकर लगातार रोते दिख रहे हैं। यह युवाशकित से डरे हुए लोग हैं जो अक्सर डरते हुए रोते हैं।

दरअसल, अपने मुल्क में रोना छोड़कर कुछ भी मौलिक नहीं बचा है। आजकल रोने का मामला इतना हिट हो चुका है कि लोग बात-बात पर रोते हैं। लेकिन अनायास कभी नहीं रोते। उनके रोने की डेटिंग चलती है। अत: रोने की कुछ महत्वपूर्ण तारीखें हैं-12 जनवरी, युवा दिवस; 30 जनवरी, महात्मा गाँधी की पुण्यतिथि; 8 मार्च, महिला दिवस; 23 मार्च, भगत सिंह का शहादत दिवस; 20 मर्इ, राजीव गाँधी का बलिदान दिवस; 30 मर्इ, हिन्दी पत्रकारिता दिवस; 5 जून, पर्यावरण दिवस; 14 सितम्बर, हिन्दी दिवस; 2 अक्तूबर, गाँधी एवं शास्त्री जी का जन्मदिवस; 14 नवम्बर, नेहरू जी का जन्मदिवस; 10 दिसम्बर, मानवाधिकार दिवस; 23 दिसम्बर, किसान दिवस इत्यादि।

रोने की दृष्टि से अपना देश विकल्पहीन नहीं है। कभी हम गाँधी के नाम पर रोते हैं, तो कभी भगत सिंह का नाम लेकर रोते हैं। सबकी एक ही कठौती में हर-हर गंगा है। वैसे इसमें भी वर्गीकरण है। इन्दिरा और राजीव गाँधी पर रोने के लिए तो ‘दस जनपथ का कापीराइट है। जबकि लाल बहादुर शास्त्री और चौधरी चरण सिंह के नामखाते तक सीज हो चुके हैं। असल में, आजकल मूल्यहीनता एक उत्सव है जबकि तारीख-विशेष पर रोना एक औपचारिकता-बोध माना जाने लगा है। तभी तो, भगत सिंह को थोड़ा-बहुत जानने वाले प्राय: उनकी शहादत को अपूरर्णीय क्षति बताकर रोते हैं। यह कहकर रोते हैं कि-‘अब लोग अपने यहाँ नहीं, पड़ोसी के घर भगत सिंह पैदा हो, चाहने लगे हैं।(ऐसे जुमले उछालने वाले बहुसंख्यक हैं) इसी में से अग्रणी कुछ लोग आज के युवाओं को देखकर रोते हैं कि वे भगत सिंह को जानते तक नहीं हैं। उनका रोना सौ फीसद सही रोना है। बराक ओबामा भारत के शहर कलकता को जानकर अपने अमेरिकावासी की प्रतिभा पर रोते हैं। बाकायदा अपने उदबोधन में इस शहर का नाम लेते हैं। हमारा मसला है कि हममें से अधिसंख्य भगत सिंह को जानते-पहचानते हैं; लेकिन इस सच्चार्इ को जगजाहिर होने की आशंका से रोते हैं।

खैर, इस दिन यह गाते हुए रोया जा सकता है-”माँ….ए रंग दे बसंती चोला….। शर्तिया रोना अच्छी बात है। तभी तो शहीद भगत सिंह जिनकी फाँसी बि्रटिश काल में इसी रोज हुर्इ थी; अब उनके नाम पर देश सिर्फ रोता है, उनकी विचार-दृष्टि, दूरदर्शिता और संभाव्य-चेतना की कसौटियों पर संवाद और विमर्श नहीं करता है। दरअसल, उनका रोना बाज़ार का स्पेशल टयुन बना दिया गया है। अत: इस टयुन को सुना-सुनाकर कर्इ लोग अपना नाम धन्य करवा लेते हैं। अपना चेहरा यानी फोटू अखबार में छपवा लेते हैं। रेडियो पर अपने रोने की धुन बजवा लेते हैं। टेलीविज़न भी उनकी रोनी सूरत दिखा-दिखाकर अपनी टीआरपी रेट बढ़वा लेता है। यह रोना इतना कारामाती है कि बड़े-बड़े हंसोड़ों को रोना आ जाता है; रुदालियों की तबीयत हरी हो जाए; उन माँओं की बाँछें खिल जायें जिनके बच्चे रोअंटा हैं।

हाँ, तारीख़ाना बरसी पर रो लेने में हर्ज नहीं है। सब मेढक टर्रा रहे हों, तो अपना टर्राना जायज ठहराया जा सकता है। यह टर्राना देश को देशभकित से तर कर देता है। इस टर्राने में कर्इ बार वे खुद पानी-पानी हो जाते हैं। तर-बतर। क्योंकि लोग अब टर्राने वाले पर गुर्राने लगे हैं। अपने दोनों कान पर हाथ रख माइक या लाउडस्पीकर दूसरी ओर घुमा लेने के लिए कहने लगे हैं। लोगों में शहीद भगत सिंह के प्रति प्रेम है; लेकिन उन पर रोने वालों के प्रति उनकी अंधश्रद्धा नहीं है। यानी उनके रोने की मुख्य वजह यह है कि आँख-दीदा वाली आधुनिक पीढ़ी में पुरनियों जैसा क्रेज नहीं दिखार्इ दे रहा है। वाकर्इ आज की युवा पीढ़ी भगत सिंह का चित्र छपा जर्सी पहन सकती है; लेकिन उनके बारे में प्रायोजित कार्यक्रम में रोने का नौटंकी या तमाशा नहीं कर सकती है। वह विवेकानंद, गाँधी, भगत सिंह, सुभाष, लोहिया, जेपी, चन्द्रशेखर आदि के बारे में खुद पढ़कर उनके किए पर ‘दिल से रे…दिल से रे…, गाना सुनते हुए हँस तो सकती है। लेकिन, उसे सरकारी रोना में शामिल होना नापसंद है।

बहरहाल, सरकार की गले की हडडी यह है कि वह इन्हें याद न करें, तो अमेरिका, बि्रटेन, फ्रांस, इटली, जर्मनी, जापान या फिर चीन उन्हें याद करने लगेगा। जी में आया तो ये देश अपने यहाँ भारतीय ज्ञानियों, महापुरुषों, क्रांतिकारियों, संत, महात्माओं को म्युजियम में पुतला बनाकर संजोने लगेंगे या फिर इनकी लिखी पुस्तकें अपने यहाँ पाठयक्रम में लगवा देंगे। दरअसल, ज़ाहिर होने भर की देर है। भारतीय ज्ञान-मीमांसा के बारे में उन्हें बढि़या माल-आसबाब होने की खबर जहाँ लगी, वे अपने यहाँ संस्कृताचार्य पणिडतों की नियुक्ति भी कर सकते हैं। ऐसे में मामला बेहद संगीन हो जाएगा। फिर युवा, पर्यटन एवं संस्कृति मंत्रालय का क्या होगा? अतएव, वे अपने जि़न्दा रहने की शर्त पर रोने की तारीख घोषित कर देते हैं। कार्यक्रम के लिए मोटा पैकेज आवंटित कर देते हैं। ज्यादा इच्छा बलवती हुर्इ, तो अमुक व्यकित की प्रतिमा, पुस्तक, भवन, टिकट या टकसाल से गढ़ा मुद्रा का तत्काल लोकार्पण करा देते हैं। अभ्यस्त डीलर डलिया की जगह ट्रक भर कर फूल, माला और गुलदस्ता लिए पहुँच जाते हैं। उन्हें जैसी रकम दी जाये वैसी स्कीम वाला बेजोड़ आयोजन आयोजित कर देते हैं; साथ में आयोजक को अपनी ओर से जानदार उपहार भी भेंट कर देते हैं। यह सबकुछ इतना रटपट और व्यवसिथत होता है कि किसी को इसमें भी भ्रष्टाचार होने का कोर्इ चांस नहीं दिखार्इ देता है।

बहरहाल, रोना माहौल का है। मंत्री, हुक्मरान, नौकरशाह, अफसरशाह, तो और जोरदार ढंग से रोते हैं। जबकि सबसे नीचे के अधिकारी-कर्मचारी इन रोवनहारों के ऊपर रोते दिखार्इ देते हैं। सबसे अलहदा ढंग से इस मौके पर बुद्धिजीवी रोते हैं। प्राय: देखा गया है कि जब ऐसे दिव्यजनों की आँख से आँसू निकलना चूक जाता है, तो वे रोने पर किस्सा, कहानी, कविता, संस्मरण, चुटकुला इत्यादि कहकर रोते हैं। तब भी यदि एक बूँद लोर नहीं ढरकता है, तो वे बातों से जीभ के तवे पर लार चूस-चूसकर रोते है। यानी रोने की इस व्यायाम में शामिल होना भी इतना श्रमसाध्य है कि पत्थर-दिल को भी रूलार्इ आ जाए।

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