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हयूगो शावेज के लिये

vishesh aalekh”जो इतिहास बनाते हैं, उन्हें इतिहास होते हुए देखना, बुरा लगता है।” यह हयूगो शावेज के न होने के खबर की, पहली प्रतिक्रिया थी। मैंने अपनी लड़की की ओर देखा, जिसका चेहरा फक्क पड़ गया था। वह इण्टरनेट पर खबरों को ऐसे खंगाल रही थी, जैसे यह अमेरिकी कारस्तानी तो नहीं है? मगर, खबर धीरे-धीरे पुख्ता होती चली गयी, कि जो होना नहीं चाहिये था, वह हो चुका है। शावेज की पूरी जिंदगी खयालों में बदल गयी, यह खयाल भी आया कि ”लेनिन के न होने की खबर को, सोवियत संघ ने कैसे बर्दास्त किया होगा?” मेरे सामने फिदेल कास्त्रो की सूरत घूम गयी कि चेग्वेरा के मारे जाने की खबर की तरह ही लगा होगा उन्हें शावेज का न होना। कि अपने देश में समाजवादी क्रांति को सफल बनाने वाले के मन पर कितनी चोटें हैं? मैं गिन नहीं सका। अलेंदे का खयाल आया कि ”इतिहास हमारा है, जिसे आम जनता ने बनाया है।”

इसलिये, किसी के इतिहास बनने से न तो जिंदगी की सांसें थमती हैं, ना ही उनसे हमारा रिश्ता टूटता है, बल्कि दुनिया की तरह ही इतिहास से भी हम गहरार्इ से जुड़ जाते हैं। शावेज का न होना सदमा तो है, पर ऐसा सदमा नहीं कि हम थउस कर, बैठ जायें।

शावेज जो थे (हैं) यदि वैसे नहीं होते, तो उनसे हमारा कोर्इ रिश्ता नहीं होता। न तो दिल उदास होता, न मेरी लड़की की आंखें भरतीं, जो उनसे कभी नहीं मिली। मगर, शावेज का जाना उसके लिये, उन अपनों का जाना है,
जिनसे हम प्यार करते हैं, जिनके होने को हम बड़ी सिददत से महसूस करते हैं, क्योंकि वो अपने लिये नहीं अपने देश, अपनी दुनिया और अपनों के लिये जीते हैं। और ऐसे लोगों की तादाद हमारे यहां कम नहीं है। चार्वाक, चाणक्य से लेकर माक्र्स, ऐंगल्स और लेनिन ही नहीं, कर्इ ऐसे चिंतक और लेखक हैं, जो हमारे लिये गुजरे ही नहीं, आज भी जीवित हैं। हम उनसे मिलते, बोलते, बलियाते ही नहीं हैं, उनके साथ उठते-बैठते और चाय भी पीते हैं। वो हमें जीते हैं, और हम उन्हें जीते हैं।

आप पूछ सकते हैं, कि ”इससे शावेज के होने, न होने का क्या मतलब है?”

हम समझते हैं, कि यही उनके होने, या न होने का मतलब है। उनके साथ जीने वालों की वेनेजुएला में, लातिनी अमेरिका में, और दुनिया में, कमी नहीं है। शावेज का होना यह प्रमाणित करता है कि ‘सरकारें यदि चाहें तो, आम जनता के जीवन को बेहतर बना सकती हैं।’ और ‘आम जनता यदि चाहे तो एक शोषक इकार्इ को सामाजिक इकार्इ में बदल सकती है।’ शावेज ने अपने देश में यही किया। उन्होंने लातिनी अमेरिका और कैरेबियन देशों को आपस में जोड़ा, तीसरी दुनिया के महाद्वीपों तक अपनी पहुंच बनार्इ, बहुध्रुवि विश्व और समाजवादी एकजुटता की अवधारणां के रूप में वेनेजुएला और लातिनी अमेरिका को बनते हुए माडल के रूप में पेश किया। जहां सहयोग एवं समर्थन तथा विकास के जरिये समाजवाद की सोच आकार पा रही है। आप मानें या न मानें, मगर अब लातिनी अमेरिका संयुक्त राज्य अमेरिका का पिछवाड़ा नहीं रहा, जिसे वह अपने घर का आंगन समझता था। अब लातिनी अमेरिका एक ऐसा महाद्वीप है, जहां बोलिवेरियन क्रांति और समाजवाद की संभावनायें पल रही हैं। जिसकी शुरूआत क्यूबा की समाजवादी जन क्रांति से हुर्इ, और वेनेजुएला में जो विकास के जरिये समाजवाद में बदल गया। और सबसे अच्छी बात यह है कि वेनेजुएला अकेला नहीं है। शावेज के बिना भी वह अकेला नहीं है। क्यूबा, बोलिविया, इक्वाडोर, निकारागुआ, पराग्वे, ब्रजील, अर्जेन्टीना ही नहीं, लातिनी अमेरिकी देश और दुनिया का समाजवादी जन-समुदाय उसके साथ है।

शावेज जन समाजवादी एकजुटता के लिये पांचवे इण्टरनेशनल की स्थापना करना चाहते थे। आप तो जानते ही हैं, कि माक्र्सवादी अपनी दुनिया के बारे में सोचे बिना रह ही नहीं सकता। वह चाहे जहां भी हो, उसकी बाहें सीमाओं को लांघ कर, शोषित मानवता से जुड़ती ही हैं। माक्र्स और ऐंगल्स ने पहले और दूसरे इण्टरनेशनल की स्थापना की थी। तीसरे इण्टरनेशनल की स्थापना लेनिन ने की और चौथे इण्टरनेशनल में स्टालिन की भूमिका महत्वपूर्ण थी। पांचवे इण्टरनेशनल की अनिवार्यता पिछले दशक से महसूस की जा रही है, लेकिन शावेज उसकी पृष्टभूमि ही बना सके। यह जिम्मेदारी आज पर बाकी रह गयी। यह अच्छी बात है कि हवाना (क्यूबा) और काराकस (वेनेजुएला) में इसकी पहल हो गयी है। जहां के मजदूर दिवस में 147 देशों के हजार से ज्यादा प्रतिनिधि और एक लाख से ज्यादा लोग एक साथ मार्च करते हैं। सोवितय संध के ‘रेड स्क्वायर’ की झलक इन देशों में नजर आने लगी है। सोवियत संघ और पश्चिमी यूरोप के समाजवादी देशों के बिखरने के बाद चीन से जो अपेक्षायें थीं, वह लातिनी अमेरिकी देशों में पूरी हो रही हैं। पूंजीवादी वैश्वीकरण ने समाजवादी वैश्वीकरण की सोच को विकल्पों के रूप में पेश कर दिया है। जहां हथियारों के लिये कोर्इ जगह नहीं है, और जहां आपसी सहयोग और समर्थन से राज्य आम जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर रही है।

जिस वैश्विक मंदी ने अमेरिकी वित्त व्यवस्था की चूलें हिला दी है, और यूरोपीय देशों की वित्त व्यवस्था को दिवालियापन के कगार पर ला कर खड़ा कर दिया है, उसी वैश्विक मंदी के दौर में शावेज ने वेनेजुएला में समाजवादी ढांचे को खड़ा करने का काम किया है। लातिनी अमेरिकी और कैरेबियन देशों के संगठन ने पूरे महाद्वीप को नवउदारवादी वैश्वीकरण के जाल से निकलने और उसके पुर्ननिर्माण की योजना की शुरूआत की। आज लातिनी अमेरिकी महाद्वीप में किसी भी एक देश का मामला पूरे महाद्वीप का मामला बन गया है। क्यूबा पर लगा आर्थिक प्रतिबंंध हो, हैती के पुर्ननिर्माण का सवाल हो, फाकलैण्ड का विवाद हो, या पराग्वे में हुआ तख्तापलट हो, अलग-अलग समाज व्यवस्था होने के बाद भी, अपनी समस्याओं के सामूहिक समाधान की उनकी पहल एक है। उनकी एकजुटता ही शावेज हैं।

वैश्विक मंदी के जिस दौर में पूंजीवादी देशों ने आम जनता के ऊपर सरकारों के द्वारा लिये गये कर्ज, सामाजिक सुविधाओं में कटौती, नये कर, और काम के अवसर की कमी को लाद कर, आम जनता को बाजार के हवाले कर दिया, उसी दौर में लातिनी अमेरिका के समाजवादी और गैर-पूंजीवादी देशों ने अपने देश की आम जनता की फिक्र की। जिस समय पूंजीवादी विश्व अपने वित्त व्यवस्था को बचाने के लिये, बैंकों, वित्तीय इकार्इयों और औधोगिक घरानों को बचाने के लिये सहुलियतों के साथ बेलआउट पैकजों की व्यवस्था में लगी थीं, लातिनी अमेरिका के समाजवादी देशों ने शिक्षा, स्वास्थ्य एवं चिकित्सा, आवास तथा मूलभूत जरूरतों की पूर्ति के लिये काम के नये अवसर को बढ़ाने का काम किया। निजी सम्पतित का राष्ट्रीयकरण करना, राज्य द्वारा संचालित वितरण केंद्रों से कम मूल्य पर आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति आम आदमी तक की। ग्रामीण क्षेत्रों के लिये चालित दुकानों की व्यवस्था की। राष्ट्रीय एवं निजी कम्पनियों के उत्पादन को सुनिशिचत मकाम तक पहुंचा दिया। जिनके लिये हयूगो शावेज और वेनेजुएला में उनके द्वारा लागू नीतियां आदर्श रही हैं। बोलेविया के राष्ट्रपति इवो मोरालेस ने शावेज के निधन पर कहा- ”वो हमेशा जिंदा रहेंगे।”

वेनेजुएला की आम जनता, अधिकतम गरीबी में जीने वाले लोग और मजदूर वर्ग उन्हें अपना मसीहा मानते हैं, जिनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिये सरकारी आय का 61 प्रतिशत सामाजिक कार्यों के लिये, हर साल खर्च हुआ। शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा, आवास और मूलभूत जरूरतों की पूर्ति का लक्ष्य उन्होंने सरकार के सामने रखा। भूमि सुधार के माध्यम से उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में विकास की पहल की। शहर और गांव के बीच की दूरियों को घटाने के लिये समूचित विकास योजनाओं को विकसित किया। जिसका व्यापक प्रभाव न सिर्फ वेनेजुएला की आम जनता पर पड़ा, बल्कि पूरे महाद्वीप पर पड़ा। क्यूबा के बाद वेनेजुएला दूसरा वह देश है, जहां पूर्ण साक्षरता है। मिशन राबिन्सन-1 और मिशन राबिन्सन-2 के तहत यह काम किया गया। मिशन रिबास और सुक्रे के तहत विश्वविधालयीन शिक्षा की व्यवस्था की गयी 2011 तक 2-3 मिलियन -लगभग 20 से 30 लाख विधार्थी- विश्वविधालय में शिक्षा ले रहे हैं। नेशनल पबिलक सिस्टम के अंतर्गत नि:शुल्क स्वास्थ्य चिकित्सा की व्यवस्था की गयी। 1999 में 1 लाख लोगों पर 20 डाक्टर थे, 2010 में 80 डाक्टर हैं। 2005-2012 के बीच 7,873 मेडिकल सेण्टर का निर्माण किया गया। 2004 में ”आपरेशन मिराकल” की शुरूआत हुर्इ और 1.5 मिलियन -15 लाख- लोगों की आंखों का इलाज हुआ, वो देखने के लायक बने। 1999 में गरीबी दर 42.8 प्रतिशत थी, और अधिकतम गरीबी दर 16.6 प्रतिशत थी, जो 2011 में घट कर 26.5 और 7 प्रतिशत पर पहुंच गयी। 1999 से अब तक 7 लाख घरों का निर्माण किया गया, और उन्हें आवासहीनों को बांटा गया, जहां कम्यूनों के स्थापना का लक्ष्य रखा गया। इसी दौरान 10 लाख हेक्टर जमीन का वितरण वहां के मूलनिवासियों के बीच किया गया। जमीनदारों से जमीन छीन कर उसे आम जनता के हवाले किया गया। शावेज ने तेल कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण किया। उन्होंने सरकारी आय का 60.6 प्रतिशत खर्च सामाजिक कार्यों में किया। आज वेनेजुएला अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और विश्व बैंक के कर्ज की अदायगी के बाद, उनसे पूरी तरह मुक्त देश है। वेनेजुएला के सभी सार्थक कार्यक्रमों की दिशा महाद्वीपीय रही है। उसने अपने होने का लाभ सभी लातिनी अमेरिकी और कैरेबियन देशों की आम जनता को दिया है। 18 देश ऐसे हैं, जहां तेलों की सप्लार्इ 40 से 60 प्रतिशत कम दरों पर की जाती है। उनके समकक्ष सिर्फ कर्नल गददाफी ही ठहरते हैं। वैश्विक मंदी के दौरान शावेज ने आम वेनेजुएलावासियों की सुविधाओं में कटौती के स्थान पर अमीर लोगों पर सरकारी कर बढ़ाये, सामाजिक कार्यक्रमों में इजाफा किया और सामाजिक खर्च को बनाये रखा। वो सरकार को आम जनता के हवाले करने के पक्षधर थे।

शावेज के होने का मतलब राजसत्ता में आम जनता की हिस्सेदारी और अपनी समस्याओं को अपने हाथों में लेना है। राज्य को शोषक इकार्इ से बदल कर, उसे सामाजिक इकार्इ में बदलना है। जो आम जनता के हितों में राज्य के शोषक चरित्र को बदलना नहीं चाहते, जो अपनी समस्याओं को, समाधान के लिये, अपने हाथ में लेने वाली जनता के खिलाफ है, जो राज्य के प्राकृतिक संसाधन से आम जनता की दावेदारी को एक-एक कर खारिज करना चाहते हैं, उन्हें आप क्या कहेंगे? या वो आपके बारे में कैसी राय रखेंगे?

शावेज के बारे में अमेरिकी सरकार और पश्चिमी मिडिया की सोच, वही है। फिदेल कास्त्रो के बाद हयूगो शावेज लातिनी अमेरिका के सर्वाधिक चर्चित राष्ट्राध्यक्ष हैं, जिन्हें आम लातिनी अमेरिकी अपनी जिंदगी से ज्यादा प्यार करता है, यही कारण है कि वो पश्चिमी देशों की सरकार और अमेरिकी साम्राज्य के निशाने पर है। उनकी परेशानी यह है कि इन्होंने वैचारिक धरातल पर ही नहीं, व्यवस्था की जमीन पर भी उन्हें मात दी। जिन्हें खत्म करने की सामूहिक (विद्रोह खड़ा करके) और निजी (हत्या करके) कोशिशों का अंत आज तक नहीं हुआ। ऐसे दस्तावेज हैं, जिनसे प्रमाणित किया जा सकता है, कि सीआर्इए, माफिया के साथ मिल कर 600 से ज्यादा हमले फिदेल कास्त्रो पर करा चुकी है। यह उनकी भूल है, कि फिदेल क्यूबा हैं। कि फिदेल के न रहने पर क्यूबा की समाजवादी क्रांति का अंत हो जायेगा। उन्होंने यह भूल शावेज के बारे में भी की। 2002 में उन्होंने शावेज का तख्तापलटने की कोशिश भी की, मगर वेनेजुएला की आम जनता सड़कों पर उतर आयी। अमेरिकी समर्थक और अमेरिकी सैन्य अधिकारी शावेज को राष्ट्रपति भवन में कैद करने के बाद भी 48 घण्टे भी इस तख्तापलट को संभाल नहीं सके, क्योंकि शावेज ने राज्य और उसकी सरकार को आम जनता के पक्ष में खड़ा करने का काम किया।

राज्य हमारे लिये एक आवश्यक बुरार्इ है, मगर ऐसी बुरार्इ नहीं कि जिसे मुक्त बाजार के लिये, वित्तीय पूंजी से मिटा दिया जाये। जिसे निजीकरण के पाट से पीस कर, धूल मे मिला दिया जाये। जैसा कि पूंजीवादी सरकारें कर रही हैं। वो राज्य और उनकी सरकारों को डालर और अमेरिकी सेना का लिबास पहनाने में लगी है। जबकि राज्य सामाजिक विकास की सबसे महत्वपूर्ण अवस्था और इजाद है। आज राज्य के बिना समाज या विश्व समाज की कल्पना तक नहीं की जा सकती। जिसे एक वित्तीय इकार्इ में बदला जा रहा है। बाजारवादी मानवीय सम्बंधों को कारोबारी सम्बंधों में बदलने पर आमादा है।

क्या वास्तव में राज्य एक वित्तीय इकार्इ है?

क्या उसे सिर्फ वित्तीय इकार्इ में बदला जा सकता है?

इस सवाल का जवाब हम मुक्त बाजारवादियों की तरह नहीं दे सकते, जो मानते हैं कि ‘बाजार को राज्य के नियंत्रण से मुक्त होना चाहिये।’ जो यह कहते हैं कि ‘बाजार को अपनी जिम्मेदारी खुद उठाने दें, वह कोर्इ गल्ती नहीं कर सकता।’ जबकि हम जानते हैं कि हमारा आज उन्हीं गलितयों का परिणाम है। वैश्विक मंदी से लेकर अर्थहीन होती राज्य की सरकारें और दैत्याकार कारपोरेशन उन्हीं के परिणाम हैं। बाजार को मुक्त छोड़ने की बात, राज्य को बाजार के नियंत्रण में लाने की वित्तीय पूंजी की साजिश है। जो प्रमाणित करते हैं, कि मानवीय एवं सामाजिक सम्बंधों का आधार अर्थ है। वो राज्य को शोषक इकार्इ बनाये रखने के पक्षधर हैं। यही कारण है कि राज्य को समाज और आम जनता के पक्ष में खड़ा करने वाले लोग उन्हें चुभते हैं। शावेज पूंजीवादी विश्व और साम्राज्यवादी अमेरिका की नजरों में हमेशा खटकते रहे।

लोग कहते हैं कि शावेज अमेरिकी साम्राज्य के प्रबल विरोधी थे। लोग यह सवाल नहीं करते कि शावेज अमेरिकी सरकर और उसकी नवउदारवादी वैश्वीकरण के विरूद्ध क्यों थे?

सवाल यह भी होना चाहिये कि क्यों उन्होंने जार्ज बुश के बजाये, फिदेल कास्त्रो के साथ खड़ा होना पसंद किया?

क्यों उन्होंने राष्ट्रसंघ के महासभा में अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश के भाषण के बाद, अपने वक्तव्य में कहा- ”वातावरण में व्याप्त सल्फर की गंध से पता चलता है, कि कल यहां शैतान आया था।” जिसने लाखों इराकियों को तेल के कुवें के लिये मौत के घाट उतार दिया।

क्यों वो अमेरिकी राष्ट्रपति को ‘मिस्टर डेंजर’ कहते थे?

आज दुनिया के सामने जितने भी खतरे हैं, वह अमेरिकी साम्राज्यवाद की देन हैं। जिसने राज्य एवं उनकी सरकारों को आम जनता के विरूद्ध खड़ा कर दिया है। जिसने सामाजिक विकास की दिशा को रोके रखने को अपनी वैश्विक जिम्मेदारियों में बदल दिया है।

भले ही इस बात के ठोस प्रमाण नहीं हैं, कि शावेज का निधन अमेरिकी साजिश है, मगर इसकी घोषणा से पहले 2 अमेरिकी राजनयिकों का 24 घण्टे में वेनेजुएला से निष्कासन और सैनिक अस्पताल में शावेज की मृत्यु के बाद ‘मृत्यु के वास्तविक कारणों की जांच, और तह तक जाने की बातें, यह प्रमाणित करती हैं, कि स्थितियां सामान्य नहीं हैं। यह इत्तफाक नही ंहो सकता कि समाजवादी सोच रखने वाले, लातिनी अमेरिकी देशों के 6 राष्ट्राध्यक्षों को कैंसर है। लूला डिसिल्वा- ब्रजील के पूर्व राष्ट्रपति और डेल्मा रूसेफ ब्रजील के वर्तमान राष्ट्रपति। फर्नाण्डो लुगो- पराग्वे के राष्ट्रपति- जिनका वैधानिक तख्तापलट हाल-फिलहाल में अमेरिकी सहयोग से किया गया। क्रिस्टीना फर्नाणिडस- अर्जेन्टीना की राष्ट्राध्यक्ष और वेनेजुएला के राष्ट्रपति हयूगो शावेज, जिन्हें दो साल पहले इसकी जानकारी हुर्इ और क्यूबा में इलाज के बाद, उन पर कैंसर का नया हमला हुआ और मृत्यु का कारण संक्रमण बताया गया।

2012 में 6 साल के लिये शावेज तीसरी बार राष्ट्रपति चुने गये, मगर शपथ ग्रहण से पहले ही पश्चिमी मीडिया ने अमेरिक सूत्रों के हवाले से कहा- ”उनकी वापसी नहीं होगी।” और ऐसा ही हुआ, कि शावेज की वापसी नहीं हुर्इ। इलाज के लिये क्यूबा जाने से पहले ही उन्होंने विदेशमंत्री निकोलस मदुरो को उपराष्ट्रपति घोषित किया और आम जनता से उनके पक्ष में अपील की।

लोग पूछते हैं- ”लातिनी अमेरिकी महाद्वीप और वेनेजुएला की आम जनता शावेज को क्यों इतना प्यार करती है?”

जवाब सीधा और साफ है, कि ”वो शावेज के रूप में अपने को देखते हैं। वो कहते हैं- ”शावेज! शावेज से पहले हमें पता नहीं था कि हम भी इंसान हैं।” उनके लिये व्यवस्था अमानवीय थी, और वो अमानवीय स्थितियों में जीते थे।

जोस पेरतिएरा ने अपने एक लेख में लिखा है कि ”मैं क्यूबा से वेनेजुएला आने वाले विशेष विमान पर यात्रा कर रहा था, यात्रियों की हरकतें ऐसी थी, जैसे वो दुनिया को बहुत दिनों के बाद देख रहे हैं, उनके लिये दुनिया बिल्कुल नयी थी। जब मैंने जानकारी ली तो पता चला -जब ये अपने देश से क्यूबा गये थे, तब अंधे थे।”

‘आपरेशन मिराकल’ के अंतर्गत लातिनी अमेरिका और कैरेबियन देशों के ऐसे लोग जिन्होंने अपनी आंखे खो दी है, या जो ठीक से देख नहीं सकते, उनका नि:शुल्क आपरेशन, लाने ले जाने के लिये विमान यात्रा की सुविधा और रहने-खाने की व्यवस्था वेनेजुएला और क्यूबा के सहयोग से किया जाता है।

अब आप समझ सकते हैं, कि जिसकी वजह से आदमी पहली बार या फिर से देखता है, और जीना सीखता है, उसे कितना चाह सकता है(?) ऐसे लोगों को मार पाना, क्या संभव है? लेनिन को चाहने वालों ने उन्हें मुकाम दिया, शावेज के चाहने वाले भी उन्हें वह मुकाम देंगे। 14 साल, बहुत ही छोटा समय होता है, मगर शावेज ने 14 साल में लम्बी दूरियां तय की है।

5 मार्च की रात को बोलिवर स्क्वायर से लेकर काराकस के राष्ट्रपति भवन -मिराफ्लोरेस- तक लाखों-लाख लोग जमा थे। वेनेजुएला जाग रहा था। कि ”एकजुट लोगों को कभी हराया नहीं जा सकता।”

देश के अंतरिम राष्ट्रपति के पद की शपथ निकोलस मदुरो ने ली। उन्होंने कहा- ”हम सभी शावेज हैं। मगर तब तक, जब तक हम एकजुट है। यदि हम बंटते हैं, तब हम कुछ नहीं होंगे। और मैं समझता हूं कि वेनेजुएला की आम जनता को अब ‘कुछ नहीं होना’ स्वीकार नहीं होगा।”

इसके बाद भी हम जानते हैं, कि साम्राज्यवादी ताकतें शावेज के न होने का लाभ, वेनेजुएला को असिथर करके, उठाना चाहेंगी। वेनेजुएला को अब शावेज के होने, न होने के बीच से गुजरना है, और लातिनी अमेरिकी देशों को भी।

‘इण्टरनेशनल माक्र्ससिस्ट टेनडेन्सी’ लिखता है- वेनेजुएला के लोग यह जानते हैं कि ”वो एक युद्ध के बीच से गुजर रहे हैं, और युद्ध में इस बात का महत्व नहीं होता कि हममें से कौन मारा गया? महत्व इस बात का होता है कि जो मारे गये और मारे जा रहे हैं, उनकी जगह हमें भरनी है। आज वेनेजुएला के हर एक घर, हर एक गली, सड़क और चौराहे से यह आवाज आ रही है कि संघर्ष जारी रहेगा।”

लातिनी अमेरिकी देशों की तरह हम मानते हैं, कि ”शावेज जिंदा हैं।” ऐसे लोग मरते नहीं, आम लोगों को भी इतिहास से जोड़ते हैं। उस इतिहास से जोड़ते हैं, जिसे आम जनता ही बनाती है। जिसे हम आज की तरह सिददत से महसूस करते हैं। जिनके साथ हम उठते-बैठते हैं, बोलते-बतियाते हैं, और चाय भी पीते हैं, जो हमें जीते हैं और हम उन्हें जीते हैं। कि हम हारेंगे नहीं संघर्ष जारी रहेगा।

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