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मुद्रा के ढेर से अर्थव्यवस्था को संभालने की कोशिश

rashtriya vicharअपना आखिरी बजट पेश करने के बाद, राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय निवेशकों के दरवाजे पर, दस्तक देने का काम, सरकार कर रही है, जो इस बात का प्रमाण है, कि देश की अर्थव्यवस्था की सेहत खराब है, और आम जनता की अब खैर नहीं। कि उदारीकरण की यही सबसे बड़ी उपलबिध है, और उत्पादन के साधन पर अब वित्तीय पूंजी का अधिकार है।

इन दस सालों में, देश के वित्तीय ढांचे को, इस तरह ध्वस्त किया गया है, कि आंकड़ों से विकास की सीढि़यां ग्राफ बनाती रही हैं, और विकास के लिये निजीकरण की सीमायें सरकार बढ़ाती है। पूंजी निवेश के लिये अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोल दिये गये हैं। खनिज, उधोग, ऊर्जा से लेकर खुदरा कारोबार तक को, राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले कर दिया गया है। आज बैंक, बीमा और वित्तीय इकार्इयां भी सुरक्षित नहीं हैं। राजकोष के तली में छेद तो पहले से ही है, अब वित्तीय डांके की योजनओं को अंजाम दिया जा रहा है। स्थितियां ऐसी बना दी गयी हैं, कि अब यूपीए की मनमोहन सरकार रहे न रहे, इन नीतियों को बदल पाना आसान नहीं है, क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से किये गये करार से सरकारें जुड़ी हैं।

वैसे भी, देश की सरकार को ‘आम जनता के नाम से’ कारपोरेट जगत ही चला रहा है। इस बीच अस्त होते मनमोहन सरकार के दूसरे कार्यकाल में -भ्रष्टाचार के जितने ठिकरे फूटे हैं, वह न तो राष्ट्रीय-बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बिना संभव था, ना ही, इतना सब कुछ होने के बाद भी, सरकार बची रहती और सीधे तौर पर उन कम्पनियों एवं कारपोरेशनों के खिलाफ, विरोध के स्वर इतने कमजोर होते।

हम यह नहीं कह सकते, कि उन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और देशी कारपोरेट घरानों के खिलाफ, हमारे पास कुछ नहीं है, देश में उनका स्वागत हुआ है, मगर विरोध जिस रूप में होना चाहिये था, वह विरोध अब तक खड़ा नहीं हुआ है। देश की यूपीए सरकार के सामने न तो संसद में, न सड़कों पर यह सवाल ही खड़ा किया गया है कि राष्ट्रीयकरण की ओट में निजीकरण का अधिकार उन्हें किसने दिया है? इस सवाल की धार को भोंथरा और कमजोर ही नहीं रखा गया, बल्कि, इसे सवाल ही बनने नहीं दिया गया। सरकार एक के बाद एक विधेयक और प्रस्ताव रखती रही, करार करती रही, संसद में हर साल, इनके पक्ष में, जन विरोधी बजट पेश करती रही, हाय-तौबा के अलावा न तो संसद में विपक्ष और संसद से बाहर आम जनता में एकजुटता नजर आयी। देखा जाये तो, मनमोहन सरकार के जोड़-तोड़ और तिकडम को मान्यता ही दी गयी। राजनीतिक दलों ने निजी हितों के लिये जनहित को खिसका कर किनारे कर दिया। आम जनता हजारों-हजार की तादाद में जमा हुर्इ, मगर किसी भी आंदोलन का वह हिस्सा ही नहीं बनी।

यही कारण है कि हम मानते हैं, कि भारत में विपक्ष है ही नहीं, और सरकार विरोधी आंदोलन धोखेबाज हैं।

आम जनता को सरकार ही नहीं, विपक्ष भी धोखा दे रही है, और वो लोग भी, जिनके समर्थन में आम जनता ने टोपी लगाये और उस पर कभी लिखा गया- ”मैं अन्ना हूं।” कभी लिखा गया- ”मैं आम आदमी हूं।” टोपी का अन्ना और टोपी का आम आदमी, टोपी पहनाने वालों का जरिया ही बने। भ्रष्टाचार राष्ट्रीय सीमाओं को लांघ कर बहुराष्ट्रीय हो गया है, और राजनीतिक-आर्थिक घपले-घोटालों का पर्दाफाश किसी सार्वजनिक जिमखाने का ‘ट्रेड मील’ बन गया है, जिस पर चलिये या दौडिये, जहां हैं, वहीं बने रहेंगे। देश की मौजूदा अर्थव्यवस्था की कवायत भी कुछ ऐसी ही है। नये-नये मशीनों और नये-नये तरकीबों से वर्जिशें हो रही हैं।

अर्थव्यवस्था में वित्तीय पूंजी को आकर्षित करने के लिये, देशी-विदेशी निवेशकों के दरवाजे खट-खटाये जा रहे हैं। और यह कोर्इ और नहीं, देश के वित्तमंत्री खटखटा रहे हैं। जिन्हें अमेरिकी स्कूल के अर्थशास्त्री को ऐसा संस्करण कह सकते हैं, जिनकी समझ में यह बात आ गयी है, कि ”अब आंकड़ों से और नहीं खेला जा सकता।” घोषित विकासदर को हासिल नहीं किया जा सकता। यह बात समझ में आ गयी है कि मनमोहन सिंह के उदारीकरण का मुंह के बल गिरना तय है। इसके बाद भी, वो खण्डहर होने से, खुद को बचाने की लड़ार्इ लड़ रहे हैं। वो मरीज के उस तेवर से खुश हो लेते हैं, जो मर्ज को छुपाने के लिये अखितयार किया जाता है। उन्हें रोग के असाध्य होने की समझ है, या नहीं? यह बताया नहीं जा सकता, क्योंकि पूंजीवादी अर्थशास्त्री की समझ बाजार में चलने वाले सिक्कों से नियंत्रित होती है। उसकी गिरेबां वित्तीय पूंजी, उसके विस्तार और लाभ के हाथों में होती है। सरकार राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पूंजी निवेशकों को लाभ पहुंचाने की जुगत भिड़ा रही है। संसद में बजट पेश करने के साथ ही उन्होंने देश के उधोगपतियों और उनके समूहों से उनके यहां जा कर, उन्हें मनाने के अभियान की जानकारी दी। यही नहीं, वो उन देशों का दौर भी करेंगे जहां के विदेशी निवेशकों ने, भारतीय अर्थव्यवस्था में अपने लिये संभावनायें देखी है, जो निवेश करना चाहते हैं। उन्होंने देशी उधोगपतियों के समूहों को मनाने की पहल भी की है। सीआर्इआर्इ, फिक्की, और एसोचैम के प्रतिनिधियों से उन्होंने चर्चायें की। वो देशी औधोगिक घरानों को आश्वस्त करना चाहते हैं, कि सरकार उनके हितों का खयाल रखेगी। उन्होंने नयी सहुलियतों और रियायतों को देने का आश्वासन भी दिया। वो देश के औधोगिक शहरों का दौर करेंगे। यह दौरा कितना कारगर होगा? यह तो नहीं कहा जा सकता, मगर सरकार लूट की दावत जरूर दे रही है।

भारत के मिश्रित अर्थव्यवस्था के साथ दो दूर्घटनायें एक साथ घटीं, जिसके सूत्रधार डा0 मनमोहन सिंह और उनके महान अर्थशास्त्री हैं। एक- वैश्विक स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था को अमेरिकी अर्थव्यवस्था से जोड़ दिया गया और दो- देश की घरेलू अर्थव्यवस्था का क्रमश: निजीकरण किया गया। यह प्रक्रिया आज भी जारी है। आर्थिक विकास के लिये देशी-विदेशी पूंजी निवेश की संयुक्त स्थितियां बनायी गयीं। आर्थिक दृषिट से सभी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय ठिकानों का निजीकरण भीतर ही भीतर कर दिया गया। मतलब, दूर्घटनायें घट चुकी हैं। अमेरिकी मंदी और यूरोपीय संकट की काली छाया देश की अर्थव्यवस्था को उस ओर घसीट रही है, जिससे निकलने की राह बाजारवादी सोच में नहीं है। मनमोहन सिंह छपे नोटों को पूंजी मान रहे हैं और पूंजी निवेश को अर्थव्यवस्था में औधोगिक रफ्तार को बढ़ाने का जरिया। वो ‘पोर्टफोलियों इन्वेस्टमेण्ट’ को बढ़ाने के लिये आधारभूत ढांचे के निर्माण में भी विदेशी पूंजी के सहयोग के पक्षधर हैं। वो वित्तीय पूंजी को उस सीमा तक खुली छूट देने के पक्षधर हैं, कि राष्ट्रीयकरण की ओर लौटने की राहें स्थायी रूप से बंद हो जायें। वो संभावनाओं का पीछा करने वाले ऐसे अर्थशास्त्री हैं, जो राज्य की सरकारों के सिमटते दायरे और सिकुड़ती हुर्इ वित्तीय शक्तियों का मतलब समझना नहीं चाहते हैंं। उन्होंने बैंकों, कारपोरेशनों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के जाल में देश की राजनीतिक संरचना को भी उलझा दिया है। जहां आम आदमी मानव श्रमशक्ति का स्थायी स्त्रोत और उपभोक्ता होता है। उसकी सामूहिकता और सामाजिक होने पर रोक लग जाती है।

राज्य एवं उनकी सरकारों का पूंजी के नियंत्रण में आ जाना, देश की मौजूदा वित्त व्यवस्था की दिशा है। जो दूर्घटना यूरोपीय महाद्वीप में घट चुकी है, उस ओर बढ़ना है। आज यूरोपीय कमीशन यूरोपीय संघ के सदस्य देशों की वित्तीय नीतियों का नियंता बन गया है, जिसे विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक नियंत्रित करते हैं। जिनके द्वारा वित्तीय रूप से संकटग्रस्त देशों को आर्थिक सहयोग -बेलआउट पैकेज- दिये गये हैं। ग्रीस की अर्थव्यवस्था को संभालने के लिये करोड़ो-करोड डालर की दी गयी मदद, उसकी अर्थव्यवस्था पर सबसे बड़ा बोझ है। स्थितियां ऐसी हैं कि अब दिवालिया हो कर ही वह अपनी अर्थव्यवस्था का पुर्ननिर्माण कर सकता है। यही हाल स्पेन, पुर्तगाल, इटली, हालैण्ड, निदरलैण्ड जैसे और भी कर्इ देशों का है। फ्रांस के बाद यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी भी अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने की कोशिशों में लग गया है। अमेरिका की स्थिति भी यही है। वैश्विक मंदी की ओट में ये देश अपनी व्यवस्थागत कमियों को छुपाने में लगे हैं।

rashtriya vichar (2)मनमोहन सिंह महान अर्थशास्त्री हैं और उनके पास पी0 चिदम्बरम (वित्तमंत्री) और मोण्टेक सिंह अहलुवालिया (योजना आयोग) जैसे महान अर्थशास्त्री भी हैं। जिनके भारी भरकम दिमाग में यह सवाल नहीं आता कि-

• अमेरिकी साम्राज्य और यूरोपीय देशों के पास अपने निर्माण और विकास के लिये पूंजी की कमी कभी नहीं रही। उन्होंने तीसरी दुनिया को लूट कर अपना निर्माण किया, फिर भी वो संकटग्रस्त क्यों हैं?

• ऐसा क्यों है, कि निजी क्षेत्रों में करोड़ों-अरबों डालर होने के बाद भी सरकारें दिवालिया हो रही हैं?

• जिन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों ने अपने देश की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया और उसके पुर्ननिर्माण के लिये दी जाने वाली सहायता के नाम पर, अपने ही देश की आम जनता को वो लूट रहे हैं, वो भारत का निर्माण क्यों करेंगे?

यह तो तय है कि वित्तव्यवस्था को संभालने और औधोगिक विकास में आयी सुस्ती को खासी गति देने के लिये राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय निवेशकों को छूट देने की रेवडी लिये वित्तमंत्री पी0 चिदम्बरम यहां-वहां घूम रहे हैं, निवेश के लिये हर एक क्षेत्र का दरवाजा खोलते फिर रहे हैं, वह इस सच को उजागर कर रहा है, कि सरकार की अपनी क्षमता चूक गयी है। वह उनके (वित्तीय पूंजी के) नियंत्रण में है, जो यदि हाथ खींच लें, तो पूरी व्यवस्था ही ढ़ह सकती है।

कल तक ऐसा नहीं था, मगर आज ऐसा है, जबकि हमारे पास मानव श्रमशक्ति का न चूकने वाला स्त्रोत, खनिज एवं ऊर्जा का विशाल भण्डार, और विस्तृत भूखण्ड है। वह बाजार भी है जिस पर अधिकार जमाने और अपनी वित्त व्यवस्था को बचाने के लिये, अमेरिकी एवं यूरोपीय देशों के राजनयिक अपने राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ, भाग-दौड़ रहे हैं। वो अपने लिये उम्मीदें बना रहे हैं, और मनमोहन सिंह अपने अर्थशास्त्री समूहों के साथ, उनके पीछे-पीछे भाग रहे हैं। उन्हें अपनी ओर आकर्षित करने, उन्हें मनाने और उनकी शर्तों को मानने को वित्तीय नीतियां बता रहे हैं। वो देश की आम जनता की जरूरत समझा रहे हैं। बेचारे वित्त मंत्री को यह सदमा है, कि देश के उधोगपतियों के पास बड़ी पूंजी है, मगर वो निवेश नहीं कर रहे हैं। वो उनमें विश्वास जगाने की कोशिशें कर रहे हैं। उनके सामने अपनी हरकतों से अपने को छोटा और अपने बजट को चुनावी बजट बता रहे हैं।

वो इस सवाल से भाग और कतरा रहे हैं, कि देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति ऐसी क्यों है? और क्यों हुर्इ?

वो इस सवाल से भी भाग और कतरा रहे हैं, कि उनका लक्ष्य क्या हैं? वो निजीकरण को इतना तरजीह क्यों दे रहे हैं?

यह जानते हुए कि सार्वजनिक क्षेत्रों का विस्तार और वित्तीय पूंजी का राज्य के नियंत्रण में होना ही समस्या का स्थायी समाधान है। ऐसा कर के ही हम राज्य के संदर्भित होने को प्रमाणित कर सकेंगे, और रोज बढ़ती जनसमस्याओं का समाधान भी यही है।

लातिनी अमेरिका के समाजवादी देशों ने वैश्विक मंदी के इस भयानक दौर में, न सिर्फ अपनी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने का कठिन काम किया और उसका निर्माण किया, बल्कि पूरे महाद्वीप में सहयोग एवं समर्थन की नयी सोच भी दी। राष्ट्रीयकरण और सामाजिक कार्यों से जनसमस्याओं का समाधान किया। इक्वाडोर के राष्ट्रपति राफेल कोरिया ने 9 महीने के अंदर ही दिवालिया होती अर्थव्यवस्था और राजनीतिक असिथरता से, अपने देश को मुक्त किया, और दो साल के अंदर उन्होंने वैश्विक मंदी के प्रभावों से मुक्त कर लिया। उन्होंने राष्ट्रीय महत्व के सभी उधोगों का राष्ट्रीयकरण किया, सार्वजनिक क्षेत्रों का पुर्ननिर्माण किया, अपने देश के रिजर्व को विदेशों से वापस लाया। वेनेजुएला में हयूगो शावेज ने जो किया था, उसे अपना आधार बनाया। जिसका आधार क्यूबा है। बैंकों आदि वित्तीय इकार्इयों को बचाने के बजाये राफेल कोरिया ने आम जनता को बचाने की नीतियों का अनुसरण किया। वो भी अर्थशास्त्री ही हैं। और हमारे यहां भी अर्थशात्रियों की जमात है, प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री से लेकर योजना आयोग में कुंद दिमाग दिवालिया सोच वाले अर्थशात्रियों की भीड़ है। जो यह मानते हैं कि निजीकरण और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के सहयोग से वो अपनी वित्तव्यवस्था को बचा सकते हैं।

मनमोहन सिंह और उनकी जमात के लोग मुद्रा की ढेर पर बैठ कर अर्थव्यवस्था को संभालने की संभावनायें तलाश रहे हैं। अपार मानव श्रमशक्ति, विशाल खनिज एवं ऊर्जा के स्त्रोत और विस्तृत भूखण्ड पर बसे बाजार को बाजारवादी बना रहे हैं। सार्वजनिक क्षेत्रों का निजीकरण और राष्ट्रीय तथा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को नयी छूट दे रहे हैं। अमेरिका और यूरोप की पतनशील व्ययवस्था की ओर बढ़ रहे हैं। एक ऐसी अर्थव्यवस्था का निर्माण कर रहे हैं, जिसकी मजबूती सामाजिक असमानता और विपन्नता को बढ़ाने के लक्ष्य से संचालित हो रही है। वो वित्तीय पूंजी के लिये, विकास की उल्टी दिशा की ओर बढ़ रहे हैं। पूंजी से अर्थव्यवस्था को संभालने की नाकाम कोशिशें कर रहे हैं।

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