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व्यवस्था अपना बोझ आम जनता पर लाद रही है

rashtriya muddaभारत की अर्थव्यवस्था और उसकी राजनीतिक संरचना इतनी बदल गयी है, कि किसी भी राजनीतिक दल और किसी भी राजनीतिक मोर्चे का कोर्इ खास मतलब नहीं है, इसलिये तीसरे मोर्चे का खयाल जहां ठहरा है, उसे वही ठहरे रहने की छूट देनी चाहिये। यह कहना और सुनना अच्छा नहीं लगता, मगर सच यही है कि दो मोर्चों के बीच देश की राजनीति फंस गयी है, और तीसरा मोर्चा चुनाव से पहले का गठबंधन भर होता है। और वाम मोर्चा तीसरा मोर्चा अब तक नहीं बन सका है, और जितनी सुस्त रफ्तार है, उससे ऐसी अपेक्षा भी नहीं रखनी चाहिये। उन्हें देख कर ऐसा लगता है, जैसे अपनी मौत, आप ही मरने का उन्होंने मन बना लिया है।

बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और नवउदारवादी देशों के ‘गुड बुक’ में मनमोहन सिंह अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ तो है ही, अब बि्रटिश और अमेरिकी मीडिया तथा प्रतिनिधियों के जरिये नरेंद्र मोदी की दुकान भी उन्होंने खोल ली है। जो पहले से ही गुजरात में उनके अघोषित ब्राण्ड एम्बेस्डर रहे हैं, और जिनके लिये संभावनायें बनती जा रही हैं कि ”मोटा भार्इ, मोटी कमार्इ करा सकता है।” जिसकी उन्हें सख्त जरूरत है, क्योंकि, अमेरिका में दुकाने बंद हो रही हैं और यूरोप में जो हो रहा है, वही तो मौजूदा भारत के आर्थिक एवं राजनीतिक विकास की दिशा है। मनमोहन सिंह जी ने डरबन से दिल्ली लौटते हुए कहा- ”मैंने पूरी निष्ठा से देश की सेवा की है।”

अब जनता को तय करना है कि उनकी निष्ठा कितनी दागदार है?

बेदाग तो है नहीं यह तय है, क्योंकि देश यदि मुटठी भर लोगों से बनता तो ‘गुड बुक’ में प्रशसितपत्र की फोटो कापी भी लगी होती। उस पर बहुराष्ट्रीय बर्क भी चिपका होता और सोने चांदी की कसीदेकारी भी होती। रूपये के साथ विदेशी मुद्रा का ढेर भी होता और उसके नीचे कर्इ छेद भी होते।

यह मत पूछियेगा कि- ”कितने?”

क्योंकि, खदानों के बंटवारे से लेकर किसानों के कर्ज माफी तक, जहां भी हाथ डालेंगे, वहां छेद ही छेद है। घपलों और घोटालों का कोर्इ अंत नहीं है। जिस पर उड़ानें भरी जाती हैं, और जिन हथियारों की खरीदी होती है, वहां दलाली ही दलाली है। भ्रष्टाचारियों से लकदक मंत्रिमण्डल आर्थिक विकास के सक्रिय साझेदार हैं। आम जनता की राजनीतिक उदासी में कितनी समझदारी है? यह तय होना बाकी है(!) मगर प्रधानमंत्री जी को तीसरे कार्यकाल की उम्मीद है। कांग्रेसी बलबलाये हुए हैं कि पूरे कांग्रेस में राहुल गांधी ही युवा हैं, समझदार हैं, प्रधानमंत्री बनने के लायक हैं, मगर, नरेंद्र मोदी की पकी दाढ़ी और भावी चुनाव में अमेरिकी सक्रियता एक सवाल है। मुलायम सिंह न जाने क्यों पत्थर फेंकने की गुस्ताखी करते रहते हैं, जबकि वो मिटटी के लोंधा हैं। समाजवाद उनकी समझ से बाहर है। हां, समाजवादी पार्टी उनकी अपनी पार्टी है। जिसका समाजवाद से कुछ भी लेना-देना नहीं है। और यह अच्छी बात है।

भारत की राजनीतिक संरचना में न तो कोर्इ अलग से राजनीतिक दल है, ना ही राजनीतिक मोर्चा है, सभी उदारीकरण की बाजारवादी गठरी में बंधे कबाड़ हैं। इसलिये, यह सोचना कि यूपीए के रहते हम गर्त में जा रहे हैं और एनडीए के आते ही गर्त ऊंचार्इयों में बदल जायेगी, या कि गठरी में बंधे क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का प्रभाव बढ़ने से क्षेत्रीय विकास को नयी दिशा मिल जायेगी, गलत है। वो मेढक की तरह कूदेंगे और पांच साल बेवजह टर्रायेंगे। मनमोहन सिंह ने जिनकी सेवा बड़ी निष्ठा से की है, आने वाले सालों में भी, सभी राजनीतिक दल, उनकी सेवा बड़ी निष्ठा से करेंगे। इसलिये, भाजपा यदि यह कहती है, कि भारतीय राजनीति में दो ही मोर्चे हैं, तो गलत नहीं कहती, हां वह यह कहना या तो भूल जाती है, या कहती नहीं है कि ”वो एक ही ब्राण्ड के दो ब्राण्ड एम्बेस्डर हैं।”

यूपीए की मनमोहन सरकार आम आदमी के लिये देश की वित्त व्यवस्था को जिस गडढे में उतार चुकी है, वहां से निकलने की राहें बंद हैं। सरकार की वित्तीय नीतियां इस बात पर टिकी हुर्इ हैं कि पूंजी निवेश को कैसे बढ़ाया जाये? निवेशकों को कैसे आकर्षित किया जाये? सरकार अपने संसाधन और आम जनता के हितों को स्थायी रूप से स्थगित कर चुकी है। निवेशकों ने आज तक तो किसी देश का भला किया नहीं, फिर मनमोहन सिंह का भला वो कैसे करेंगे, जिनके रग-रग में खम्हीर खाये रस सा देश के प्रति निष्ठा टपक रही है। यह उनकी निष्ठा ही है कि हम अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और रेटिंग एजेन्सियों की तरफ बजरबटटुओं की तरह ताकते रहते हैं, कि वो कोर्इ ऐसी बात कह दें कि यह वहम बना रहे, कि हमारी वित्तीय व्यवस्था में संभावनायें बची हैं। जिसे देख कर पूंजी झोंकने वाला आ जाये। उनकी निष्ठा ही है, कि हम उन औधोगिक घरानों और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की ओर इस तरह ताक रहे हैं, कि दाता हम पर कृपा हो जाये। यूरोपीय संघ अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के साथ मिल कर कर्ज का संकट झेल रहे देशों की वित्त व्यवस्था पर अधिकार जामने के लिये बैंकों को ही अपना जरिया बनायी है, अब हमारे देश में एचडीएफसी, एक्सीस और आर्इसीआर्इसीआर्इ बैंक काला धन को सफेद बना रही है। सरकार कह रही है- ”हम देख लेंगे।”

पूंजी का यह सामान्य सिद्धांत है कि जब वित्तीय पूंजी सरकारी बजट के बराबर का बजट बनाने की क्षमता हासिल कर लेती है, वित्तीय तानाशाही का खतरा बढ़ जाता है। एक सीमा तक यह सुनिशिचत हो जाता है। मनमोहन सिंह के उदारीकरण ने ऐसी स्थितियां पैदा कर दी है कि लोकतंत्र का दम घुटना तय है।

किसी भी वित्त व्यवस्था की मजबूती उनकी पूंजी नहीं होती, उत्पादन के साधन और वित्तीय पूंजी के अधिकार पर निर्भर करता है। आज चीन मुक्त बाजारवादी व्यवस्था के जरिये सबसे तेजी से उभरती वित्तव्यवस्था है, जहां की वित्त व्यवस्था पर वहां की सरकार का नियंत्रण है। निजी कम्पनियों में भी उसका सरकारी निवेश निर्णायक है। मगर भारतीय अर्थव्यवस्था उदारीकरण के लिये तमाम दरवाजे तो खेलती जा रही है, मगर निजी पूंजी के वर्चस्व को भी बढ़ाती जा रही है। जिसका परिणाम यूरोप और अमेरिकी वित्त व्यवस्था है। जहां से न सिर्फ उधोगों का पलायन हो रहा है, बल्कि राज्य के नियंत्रण से पूंजी भी बाहर होती जा रही है। बाजार पर भी उसका नियंत्रण नहीं है। अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां बहुराष्ट्रीय कम्पनियां, दैत्याकार कारपोरेशनों ने वहां की वित्त व्यवस्था पर अपनी मजबूत पकड़ बढ़ा ली है। सरकारें अब पूंजी के नियंत्रण में हैं।

इन्हीं आर्थिक परिवर्तनों का परिणाम हमारे देश की राजनीतिक संरचना है, जहां बाजारवादी मूल्यों की डफली बजार्इ जा रही है। टके की भाषा, टके की जुबान और टके की तलब है। ऐसा विकास है, जो कदमताल से बदतर है। सरकार जिन आंकड़ों और आवश्यकताओं से खेल रही है, वह सच नहीं हैं आम जनता के लिये वहां मुसीबतें हैं। जो अभी बढ़ती हुर्इ महंगार्इ के रूप में नजर आ रही हैं, मगर सरकार ने अपनी गोटियां फेक दी है। महंगार्इ इसलिये नहीं है, कि देश में खाधान्न का संकट है, उत्पादन की कमी है, खनिज सम्पदा नहीं है, या हमारे प्राकृतिक संसाधन चूक गये हैं। महंगार्इ इसलिये है, कि सरकार निजी कम्पनियों के साथ मिल कर आम जनता की जेब काट रही है। हर एक चीज का निजीकरण हो रहा है। सरकार अपनी जिम्मेदारियों से भाग रही है। या आम जनता की जिम्मेदारियां उन्हें सौंप रही है, जिनकी वजह से भूख है, गरीबी है, बेरोजगारी है, और तेजी से बढ़ती महंगार्इ है। झूठ है, फरेब है, घपले-घोटाले और भ्रष्टाचार है। राजनीति में आयी गिरावट है।

हमारे यहां भूख, गरीबी और बेरोजगारी की बात कम की जाती है। राजनीति के गलियारे में इनकी चर्चायें कभी-कभी ही होती है, बेमौसम बरसात की तरह होती है।

महंगार्इ को लेकर कभी मध्यम वर्गी शहरी लोग सड़कों पर उतरते हैं, तो ज्यादातर विपक्ष के भाजपायी उसे राजनीतिक नजरिये से पेश करते है।
भ्रष्टाचार का मुददा गर्म है। अन्ना हजारे ने इसे हवा दिया। अरविंद केजरीवाल ने इसे ‘पर्दाफास’ में बदला। अब भ्रष्टाचार है, मगर मुददे की सेहत कोर्इ खास अच्छी नहीं है। क्योंकि सरकार हो या बाजार, या भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वाले, आम जनता को उसकी वजह बताना नहीं चाहते। वो भ्रष्टाचारियों को सुरक्षित रखते हुए भ्रष्टाचार मिटाना चाहते हैं।

इस बारे में कोर्इ कुछ नहीं कर रहा है, कि देश की सबसे बड़ी आबादी -जो गांवों में भी रहती है- हर एक मुददे के प्रति इतनी उदासीन क्यों है?

यह सामाजिक मसला नहीं है।

यह राजनीतिक मुददा नहीं है।

इसे प्रजातंत्र का मामला भी नहीं माना जाता।

सरकार या विपक्ष के लिये यह खास बात नहीं है कि देश की आम जनता के पास राजनीतिक समझ नहीं है। वो इसे मानेंगे भी नहीं, क्योंकि जब आम चुनाव होगा, किसी एक मतदान केंद्र को उठा लिया जायेगा जहां 60 से 80 प्रतिशत का मतदान हुआ होगा, और इसे ही आम जनता की जनतंत्र के प्रति समझदारी के रूप में पेश किया जायेगा।

‘भारतीय प्रेस परिषद’ के अध्यक्ष और पूर्व न्यायाधीश मार्कडेय काटजू ने कहा है कि ”90 फिसदी भारतीय भेंड बकरियों की तरह मतदान करते हैं। लोग जानवरों के झुंड की तरह बिना सोचे-समझे जाति और धर्म के आधार पर मतदान करते हैं। यह कड़वा सच है।” उन्होंने यह भी कहा कि ”सामंती शासकों के द्वारा लोकतंत्र को हार्इजैक किया जा चुका है।” कि ”मैं मतदान नहीं करूंगा, क्योंकि मेरा वोट व्यर्थ है।” उन्होंने अपने टीवी चैनल के साक्षात्कार में यह भी कहा कि ”मैं क्यों जानवरों की कतार में खड़ा होकर अपना समय गवाऊं?”

काटजू की सोच और समझ अपनी जगह है, और उम्र के जिहाज से है। दशकों पीछे है।

भारत में बड़ी मुश्किल से आधे लोग ही मतदान करते हैं।

एक समय था जब सामंतवाद से राष्ट्रीय पूंजीपतियों की राजनीतिक दलों ने सत्ता की साझेदारी की। वह ”हार्इजैक” नहीं था राजसत्ता की साझेदारी थी।

भारतीय लोकतंत्र उससे आगे बढ़ गया है। अब उस पर ‘वित्तीय पूंजी’ का अधिकार है। हार्इजैकर वो हैं जो सारी दुनिया में लोकतंत्र के लिये लड़ और लड़ा रहे हैं। जिनका लोकतंत्र खुद हार्इजैक हो गया है।

अब ‘भेड़ बकरियों’ की बात करें, तो यह आपकी अपनी समझ है, कि उनके साथ कतार में खड़ा होना समय की बर्बादी है। ऐसा बुद्धिजीवी होना है, जो करता कुछ नहीं, बस बातें करता है। ‘जो है’ उसी में फिट है, मगर बातें विरोध की करता है।

यह सोचना गलत है कि इस देश में सरकारें जो कर रही हैं, आम जनता उससे सहमत है। उसके पास सही विकल्प नहीं है। और विकल्पों को न बनने देना ही पक्ष और विपक्ष और उन्हें कठपुतली बनाने वालों की नीति है। मगर ऐसा होगा नहीं, यह तय है, क्योंकि मौजूदा व्यवस्था अपना बोझ आम जनता पर लाद चुकी है। सरकारें हमें पीट रही हैं, और हम पिट रहे हैं, आप चाहें तो मान सकते हैं कि लोकतंत्र की नेहार्इ पर गर्म लोहा पड़ा है, और लोहार के हाथ में हथौड़ा भी है, बस देखना यह है कि वह वित्तीय पूंजी का हंथियार बनाता है, या सामाजिक मुक्ती का औजार? भारत में वित्तीय पूंजी की तानाशाही का खतरा कुछ ज्यादा ही है।

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