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भारत और चीन के विकास के लिये पर्याप्त जगह है

rashtriya antarrashtriya‘हम आपस में मित्र हैं, और मित्र बने रहेंगे।’ यह राजनीति में नहीं कहा जा सकता, मगर भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की मारिशस यात्रा का अंत कुछ इसी रूप में हुआ। घरेलू समस्याओं से उपजे विरोध प्रदर्शन और आतंकी हमलों के बीच बांगलादेश की यात्रा का अंत भी कुछ ऐसा ही हुआ। जिसके स्वतंत्र असितत्व में आने की लड़ार्इ में, भारत की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। नेपाल के राजनीतिक उथल-पुथल और भारत विरोध के बीच कर्इ सकारात्मक पहलू हैं। भुटटान मित्र देश है, श्रीलंका में मानवाधिकार का मुददा अंतर्राष्ट्रीय मंच पर जोर पकड़ रहा है। अमेरिका जिन सवालों को खड़ा कर रहा है, भारत किसके साथ होगा? अब यह सवाल नहीं है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री राजा परवेज अशरफ की निजी भारत यात्रा, पाकिस्तान से उलझे रिश्तों की तरह ही उलझी रही। भारतीय विदेशमंत्री सलमान खुर्शीद ने शाही दावत दी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा- पाकिस्तान के साथ रिश्ते सामान्य नहीं। भारतीय मीडिया ने भारत-पाक सीमा पर हुए तनाव और आतंकी हरकतों की तरह भारतीय सैनिकों की नृसंश हत्या और सिर कलम करने के मुददों को खड़ा किया। यादें तल्ख और तेवर नाराजगी के थे। भारत और चीन के रक्षा बजट का मुददा कुछ ज्यादा ही गर्म रहा। बि्रक्स देशों के डरबन सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति जी जिन पिंग से भी वार्ता हुर्इ। मनमोहन सिंह की बूढ़ी काठी और सुस्त दिमाग को नयी खुराक मिली। वो सोच सकते हैं कि चीन भी अब उदारवादी है और रूस भी बाजारवादी हो गया है। वो मुक्तबाजार के नये क्षेत्रों की रचन कर रहे हैं, इसलिये बाजार होना बुरी बात नहीं। वो न तो अपनी लचर व्यवस्था देख पा रहे हैं, ना ही चीन में बढ़ते विरोध को देखने की कोशिश कर रहे हैं।

पिछले साल की तुलना में चीन के रक्षा बजट में 10 प्रतिशत इजाफा हुआ और 2013 का रक्षा बजट 119 बिलियन डालर हो गया। भारत की सरकार की कोर्इ प्रतिक्रिया नहीं है, मगर जनमानस में असुरक्षा की भावना और चीन से खतरे की आशंका को हवा दिया जा रहा है कि भारत का रक्षाबजट चीन के अनुपात में एक तिहार्इ है। कि भारत के रक्षा बजट में कटौती गलत है। 2013-14 का भारतीय रक्षाबजट मात्र 39 बिलियन डालर है, जोकि बहुत कम है। हमें अपने रक्षा बजट में इजाफा करना होगा, हथियारों की खरीदी करनी होगी, आयुद्धों का उत्पादन करना होगा, वगैरह-वगैरह, कर्इ बातें।

भारत और चीन को यदि हम एक ही तराजू के पलडों में रख कर देखेंगे तो, ऐसा ही लगेगा। मगर, क्या भारत और चीन को एक ही तराजू के दो पलड़ों पर रख कर देखने का नजरिया सही है? जिन पश्चिमी देशों और अमेरिका के नजरिये से हम देखने की कोशिश करते हैं, क्या वो देश भारत और चीन को इस नजरिये से देखते हैं?

इस सवाल का सबसे कडुआ जवाब यह है, कि ”वो ऐसा नहीं करते।” चीन की क्षमता, चीन की विश्वस्नियता और अंतर्राष्ट्रीय जगत में चीन की वक़त भारत से अधिक है। मगर, भारत में वो इस नजरिया को रोज बढ़ाते हैं, नये-नये तरीकों से यकीन दिलाते हैं, कि दोनों ही देश एक तराजू के बराबर पलड़े हैं। और यह भी बताते हैं कि भारत का पलड़ा हल्का है, जिसे वो अमेरिकी साम्राज्य और पश्चिमी देशों की मदद से बराबर कर सकता है। उससे आगे निकल सकता है। ”सहयोग” और ”आगे निकलना” ही उनकी चालबाजी है। उनकी नीति और उनकी ऐसी अनिवार्यता है, जो अब भले ही खुल कर सामने आ गयी है, मगर भारतीय राजनीतिज्ञ और भारतीय मीडिया, इसे समझना नहीं चाहते। ऐसी समझदारी से वो कतरा कर रहना पसंद करते हैं, क्योंकि पश्चिमी देशों और अमेकिरी साम्राज्य को अपना मित्र बनाये रखना चाहते हैं। वो अपने भरम को टूटने देना नहीं चाहते हैं। वो हथियारों के दौड में देश को शामिल कर, उसकी सुरक्षा के लिये खुद फिक्रमंद और जिम्मेदार दिखना चाहते हैं। जोकि वो हैं नहीं। यदि वो ऐसा होते तो रक्षाघोटालों की इतनी जुड़ी कडियां नहीं होतीं।

यदि हम उनसे सवाल करें कि भारत की सुरक्षा के लिये वास्तविक खतरा किससे है? तो उनकी अंगुलियां पाकिस्तान और चीन की ओर उठेंगी।
यदि हम उनसे सवाल यह भी करें कि क्या हथियारों से हमारी सुरक्षा सुनिश्चित हो जायेगी? तो उनके पास इस सवाल का सही जवाब नहीं होगा।
क्योंकि, हथियारों की होड़ सुरक्षा की गारण्टी नहीं है। यह भारत को पाकिस्तान बनाना है। साम्राज्यवादी ताकतों और उनके पालतु आतंकवादियों के चंगुल में फंसना है।

भारत में एक भी आदमी ऐसा नहीं मिलेगा, जो भारत को पाकिस्तान बनाना चाहता हो। हां, पाकिस्तान में ऐसे उदारवादी मिल जायेंगे, जो भारत के भ्रष्टतम नेताओं को छोड़ कर, पाकिस्तान को भारत बनाना चाहते हैं। वो न सिर्फ अमेरिकी साम्राज्यवादियों के चंगुल से निकलना चाहते हैं, बल्कि इस्लामी कटटरता और फौजी तानाशाही की गिरफ्त से भी निकलना चाहते हैं।

हम पाकिस्तान बनना नहीं चाहते हैं, मगर हममें से कोर्इ यह सवाल खुद से नहीं करता कि पाकिस्तान अमेरिका क्यों नहीं बनना चाहता है? जो भारत को पाकिस्तान बनाना नहीं चाहते हैं, वो भी भारत को अमेरिका बनाने के पक्ष में हैं। भारतीय राजनेता अमेरिका के पक्ष में मनमोहन सिंह बने रहना चाहते हैं। भारतीय मीडिया अमेरिका के खिलाफ संभल कर बोलती है, कुछ इस तरह बोलती है जैसे यूरोप और अमेरिका बनना फक्र की बात है। जबकि, अमेरिका होना सारी दुनिया को खतरे में डालना है। और यूरोप होना आम जनता के खिलाफ ऐसी सरकार होना है, जो जन विरोधी है। यूरोप और अमेरिका होना अपनी शांति और स्थिरता के खिलाफ साजिशों में शामिल होना है।

भारत और चीन के रिश्तों के बीच यह साजिश सक्रिय है। भारत और चीन के बीच 1962 के खतरों को बोया जाता है। भारत के जेहन में यह खतरा इसलिये बरकरार है, कि दोनों देशों के बीच सीमा विवाद, आज तक नहीं सुलझ सका। आधी सदी बीतने के बाद भी भारत के लिये यह मुददा आज तक नहीं बीत सका, मगर चीन में यथास्थिति को बनाये रखने की जिद है। मौजूदा हालात को देख कर यह नहीं लगता कि वार्ताओं की मेज पर समस्याओं को सुलझाने के अलावा और कोर्इ विकल्प है। युद्ध तो विकल्प किसी भी कीमत पर नहीं है। मगर युद्ध के खतरे को दिखाया जाता है।

कल के चीन और आज के चीन के फर्क को हमें स्वीकार करना ही होगा। यह भी स्वीकार करना होगा कि चीन वैश्विक शक्ति के रूप में उभर चुका है, और एशिया में भी, भारत उसका प्रमुख प्रतिद्वनिद नहीं है। एशिया की शांति और स्थिरता के लिये चीन और रूस की जितनी दखल और अनिवार्यता है, भारत की वैसी दखल नहीं है। यह भारत के लिये अच्छी नहीं, बुरी स्थिति है, कि वह अमेरिकी खेमें में खड़ा होता जा रहा है। जिसका उपयोग साम्राज्यवादी ताकतें चीन के विरूद्ध करना चाहती हैं, और वो ऐसा कर रही हैं। उन्होंने ही उस खतरे को बना कर रखा है, जिसके बने रहने से भारत उनके लिये हथियारों का बाजार बना रहेगा। वो बाजार को अपने पक्ष में रखना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि हथियारों की लगभग 70 प्रतिशत जो खरीदी भारत पूर्व सोवियत संघ आज के रूस से कर रहा है, उसका रूख उनकी ओर हो।

यह अजीब सी बात है, कि अमेरिका और पश्चिमी देशों को चीन की जितनी जरूरत है, उतना ही बड़ा खतरा वो चीन को अपने लिये मानते हैं।
उनकी परेशानी यह है, कि वो न तो चीन की बढ़त को रोक पा रहे हैं, ना ही उसकी बढ़त चाहते हैं। स्थितियां ऐसी बन गयी हैं कि यदि आज चीन की वित्तीय स्थिति बिगड़ती है तो यूरोपीय देश और अमेरिकी वित्तव्यवस्था भी ढह जायेगी। और यदि चीन समृद्ध होता रहता है, उसके विकास दर और वित्तीय सीमाओं का बढ़ना जारी रहता है, तो वह चंद वर्षों में ही अमेरिकी वित्तव्यवस्था की जगह ले लेगा।

जिस निजीकरण और नवउदारवादी वैश्वीकरण के जाल में यूरोपीय देश और अमेरिकी साम्राज्य, तीसरी दुनिया के देशों को शिकार की तरह फंसा कर रखे थे, वही निजीकरण और वैश्विकरण ने, उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया है, चीन ने उसका उपयोग उनके खिलाफ कर लिया है। वह अब एक समानांनतर वैश्विक वित्तव्यवस्था है, एक विकल्प है। वह डालर के लिये एक गंभीर चुनौती है। जिस उत्पादन के सस्ते संसाधन -मजदूरी और कच्चा माल- के लिये नवउदारवादियों ने वैश्विकरण की नीतियां बनायी, उसी ने चीन के वित्तीय विकास को आगे बढ़ाया। वैश्विक मंदी ने औधोगिक पलायन की दिशा को चीन की ओर मोड़ दिया।

आज चीन अफ्रीका और लातिनी अमेरिका और आस्ट्रेलिया में सबसे बड़ा निवेशक देश है। एशिया में उसकी स्थिति सबसे अच्छी है। दोनों महाद्वीपों की वित्तव्यवस्था में उसका बड़ा निवेश है। यही नहीं, यूरोपीय देश अपनी दिवालिया होती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिये चीन का निवेश चाहते हैं। अमेरिकी वित्तव्यवस्था की हालत तो यह है, कि यदि वह दिवालिया होती है, तो उसके कर्इ बड़े राज्यों पर चीन का कब्जा होगा, वो उसके वित्तीय उपनिवेश होंगे।

हम उपनिवेशवाद या वित्तीय साम्राज्यवाद के पक्ष में नहीं हैं। मगर हम देख रहे हैं कि जिस वैश्विक वित्तीय अस्थिरता का लाभ चीन ने अपने लिये उठाया, भारत उसका शिकार बन गया। जिसकी सबसे बड़ी वजह मौजूदा राजनीतिक एवं आर्थिक ढांचा है। भारत में मनमोहन सिंह का उदारीकरण निजी क्षेत्रों को खुली छूट दी, वहीं चीन में नवउदारवादी बाजारवाद को थोड़ी सी छूट दे कर उन्हें चीन की सरकारी कम्पनियों के नियंत्रण में ले लिया गया। अमेरिका में उसकी तीन कम्पनियां काम कर रही हैं, जिनमें से दो पर पूरी तरह सरकारी नियंत्रण और तीसरी कम्पनी में सरकार की बड़ी हिस्सेदारी है। आज स्थिति यह है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व चीन को अमेरिकी बैंकों को खरीदने की अनुमति देने को है। संयुक्त राज्य अमेरिका के कर्इ राज्य, फेडरल सरकार के अलावा, पूंजी निवेश के लिये, चीन से पेशकश और समझौते कर रहे हैं।

ऐसा नहीं है, कि भारतीय उपमहाद्वीप के पास संसाधनों की कमी थी, या उसकी वित्तव्यवस्था इतनी लचर थी कि वह अपनी वित्तीय सीमाओं का विस्तार नहीं कर सकता था। सच तो यह है कि वैश्विक मंदी -अमेरिकी मंदी- के पहले दौर में उसकी वित्तव्यवस्था अप्रभावी ही रही, मगर, वह उसे विस्तार नहीं दे सका। मनमोहन सरकार के उदारीकरण ने देश को बाजार बना दिया। सार्वजनिक क्षेत्रों की गठरी बांध कर उन्हें निजी क्षेत्रों के माल गोदामों में पहुंचा दिया। राज्य के नियंत्रण से बाहर पूंजी को निकालने के लिये एंडी से चोटी तक का जोर लगा दिया। यूरोपीय देश और अमेरिकी सरकार के द्वारा फैलाये गये ‘आर्थिक महाशक्ति’ बनने के भ्रम जाल में फंस गया। जो भारत को युद्ध का खतरा भी दिखा रहे हैं। हथियारों की खरीदी और हथियार उत्पादन के लिये उकसा रहे हैं, जिसका नकारात्मक प्रभाव उसकी वित्तव्यवस्था पर पड़ना तय है।

चीनी नेतृत्व ने चंद महीने पहले यह कहा है कि ”चीन और भारत के पास, मौजूदा विश्व में, समान विकास के लिये, पर्याप्त जगह है।”

सवाल यह है कि हमारे पास पर्याप्त संसाधन और योजनायें हैं या नहीं? मौजूदा दौर में सवालों से टकराने और उन्हें सुलझाने की जरूरत है, मगर हम निजीकरण और हथियारों के जाल में फंसते जा रहे हैं। चीन के रक्षाबजट पर हमें नजर तो रखनी चाहिये, मगर उसके आर्थिक विकास पर भी नजर रखने की जरूरत है। चीन का रक्षा बजट 119 बिलियन डालर है, मगर आर्थिक विकास और सामाजिक विकास के लिये निर्धारित बजट के बारे में हम कुछ नहीं जानते, जिसके बिना कोर्इ भी देश न तो अर्थिक महाशक्ति बन सकता है, ना ही अपनी सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है। भारत की सुरक्षा के लिये सबसे जरूरी है कि वह अपने विकास की दिशा का सही निर्धारण करे।

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