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यूरोपीय देशों में मंदी की बढ़ती मियाद

europe2008 से शुरू हुए यूरोपीय मंदी का अंत नजर नहीं आ रहा है, मगर यूरोपीय कमीशन ने कहा है कि ”यूरोजोन को अभी एक साल और मंदी का सामना करना पड़ेगा।” इस तरह यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि ”बस, एक साल और। मंदी अपने उतार पर है।” लेकिन, ऐसा नहीं है।

ग्रीस पर बिक्री और निलामी का टैग लग गया है।

स्पेन की आम जनता यह मानती है कि मंदी से उबरने के लिये सरकारी नीतियां गलत हैं।

पुर्तगाल की सड़कों पर 15 लाख लोग एक साथ सड़कों पर उतरते हैं।

साइप्रस को संभालने की नीतियां पहले से गलत हैं।

फ्रांस और जर्मनी की हालत तेजी से बिगड़ रही है।

बि्रटेन निजीकरण से उपजे गरीबी का शिकार है।

यूरोपीय देशों के लोग एक साथ मिल कर यूरोपीय संघ के मुख्यालय के सामने प्रदर्शन कर रहे हैं।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष को यूरोप से बाहर निकलने और सरकारों से सत्ता छोड़ने के, नारे लगाये जा रहे हैं।

14 मार्च को हजारों यूरोपवासियों ने यूरोपीय संघ के मुख्यालय ब्रुसेल्स में, कटौतियों के खिलाफ प्रदर्शन किये। जर्मनी, फ्रांस, बि्रटेन, बेलिजयम और अन्य यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के मजदूर संगठनों और जनसंगठनों के 15,000 से ज्यादा लोगों ने यूरोपीय संघ के नेताओं के द्वारा थोपी गयी कटौतियों को खत्म करने की मांग की। लोग यह महसूस करने लगे हैं, कि वित्तीय संकट उन पर थोपा गया है। लोग सार्वजनिक निकायों को बंद करने या उनके निजीकरण के विरूद्ध हैं। वो अपने देश की सरकार और यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के खिलाफ हैं। वो राज्य की सरकारों को आम जनता के पक्ष में खड़ा करना चाहते हैं। जो इस बात का प्रमाण है, कि आम जनता में, वित्तीय संकट के खिलाफ नयी राजनीतिक चेतना में इजाफा हुआ है और अब यूरोपीय परिदृश्य का बदलना तय है। वैस भी, बेलआउट पैकेज के लिये साइप्रस पर लादी जा रही शर्तों ने यूरोपीय संघ को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। यह प्रमाणित कर दिया है कि वित्तीय संकट झेल रहे यूरोपीय देशों को बेल आउट देना मुनाफे का सौदा है। इस घटना ने यूरोपीय देशों के लोगों को लगने लगा है कि यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने, उनके देशों की सरकार के साथ मिल कर, वित्तीय संकट से लाभ कमा रहे हैं। मौजूदा व्यवस्था का जनविरोधी होना प्रमाणित हो गया है।

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