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ग्रीस पर बिक्री और निलामी का टैग लगा है

पिछले 5 सालों से मंदी की मार सहते, और हर दूसरे दिन दिवालिया घोषित होने के कगार पर खड़े ग्रीस के प्रधानमंत्री ऐन्टोनिस सामारास ने 9 मार्च को कहा कि ”ग्रीस में अब और कटौतियां नहीं होंगी।” उन्होंने यह भी आश्वासन किया कि ”राहत देने के लिये भी अब कदम उठाये जायेंगे।” यह घोषणा तब की गयी जब 9 मार्च को ही सशस्त्र सेना के सदस्यों ने भी ग्रीस सरकार द्वारा लागू की गयी कटौतियों के खिलाफ प्रदर्शन किये। कल तक जो सेना प्रदर्शनकारियों का दमन कर रही थी, उसी सेना के द्वारा विरोध प्रदर्शन, सरकार के लिये गंभीर चेतावनी बन गयी। प्रधानमंत्री के द्वारा घोषित आश्वासनों के हाथ-पांव कितने मजबूत हैं? यह बातया नहीं जा सकता, क्योंकि ग्रीस की संसद पिछले कर्इ सालों से आम जनता को राजनीतिक धोखे देती रही है। एक सरकार सत्ता छोड़ देती है, और दूसरी सरकार को आने को सत्ता परिवर्तन बताया जाता है। दूसरी सरकार उन्हीं कटौतियों को लागू करती है। उसके पास तर्क होता है कि यह पिछली सरकार का निर्णय है। मानने की वैधानिक विवशता है। सत्ता परिवर्तन के नाम पर ग्रीस में सरकारें भर बदलती रही हैं।

आज ग्रीस पर ग्रीस की सरकार का नहीं यूरोपीय कमीशन और उन वित्तीय इकार्इयों का अधिकार है, जिन्होंने उसे कर्ज दिया है। ग्रीस के बैंक और वित्त व्यवस्था को उन्होंने अपने कब्जे में ले लिया है। उन्हीं के द्वारा खर्च में कटौतियों का प्रावधान एवं प्रस्ताव बनाया जाता है, जिसे पास करने के लिये संसद बाध्य है। वित्तीय इकार्इयों के द्वारा ही राजनीतिक निर्णय भी लिये जा रहे हैं।

आज ग्रीस पर बिक्री और नीलामी का टैग लगा है। उसकी सार्वजनिक समपतितयों की नीलामी हो रही है। इंटिरियर जसिटस, सांस्कृतिक मंत्रालय के साथ एथेन्स पुलिस मुख्यालय सहित 28 राजकीय भवनों को बेचा जा रहा है। बिक्री और लीज का प्रस्ताव ‘एड प्रार्इवेटाइजेशन एजेन्सी’ के वेबसार्इट पर पोस्ट किया गया है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और यूरोपीय संघ जिसे संयुक्त रूप से ट्रोयेका कहा जाता है, की शर्त के अनुसार ग्रीस की सरकार को निजीकरण से 2.6 बिलियन यूरो प्राप्त करना है। ग्रीस सरकार की योजना सरकार द्वारा संचालित गैस कम्पनी -डीर्इपीए, कर्इ क्षेत्रीय बंदरगाह, एयरपोर्ट और रेलवे को भी बेचने की है।

यह स्थिति कुछ ऐसी ही है, कि जिस चीज को बचाने के लिये कर्ज लिया गया था, अब उसे ही बेच कर कर्ज का ब्याज भरना है। 2008 से लेकर 2012 के बीच ग्रीस की अर्थव्यवस्था में 20 प्रतिशत से कहीं ज्यादा संकुचन हुआ है। यह गिरावट आज भी जारी है। समाज में हर एक चीज का अभाव है, बाजार से दवार्इयां भी गायब हो गयी हैं। जरूरतमंद नाराज लोगों की भीड़ दवा दुकानों के सामने लगी रहती है। ‘ग्रीक नेशनल आर्गनार्इजेशन फार मेडिसिन’ के प्रेसिडेण्ट ने कहा है कि -कम्पनियों ने अपनी सप्लार्इ इसलिये रोक दी है कि ”ग्रीस का बाजार अब उनके लिये लाभकारी नहीं रह गया है।” ग्रीस में अन्य यूरोपीय देशों के अनुपात में दवाओं की कीमत कम है, इसलिये दवा निर्माता निजी कम्पनियों ने, दवाओं की सप्लार्इ घटा दी है। दवाओं की सप्लार्इ में लगभग 90 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गयी है।

ग्रीस के बाजार में आवश्यक सामानों की भारी कमी है, और जो है उसे खरीदने की क्षमता आम जनता में नहीं है। सरकार के द्वारा सामाजिक कार्य रोक दिये गये हैं, और सरकारी करों में भारी वृद्धि की जा चुकी है। सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण का परिणाम यह हुआ है कि सामान्य बेरोजगारी दर 26 प्रतिशत के आंंकडे को पार कर लिया है, और युवाओं में बेरोजगारी दर 60 प्रतिशत से ऊपर है। लोगों की नाराजगी, इतनी जायज है कि ग्रीस की सरकार भी यह मान कर चल रही है, कि खर्च में कटौती और करों में वृद्धि के लिये कोर्इ जगह नहीं है। मगर, यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष का दबाव बरकार है। सरकार सार्वजनिक क्षेत्रों और औधोगिक इकार्इयों को ही नहीं, अब सरकारी भवनों को भी बेचने के लिये विवश हो गयी है।

इसके बाद सरकार क्या करेगी? यह सरकार को भी मालूम नहीं है। देश की नाराज जनता भी इस बात को नहीं जानती है। जन असंतोष अपने चरम पर है। और उम्मीदें खत्म हो गयी हैं। माना यही जा रहा है कि ग्रीस का दिवालिया होना तय है।

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