Home / विश्व परिदृश्य / यूरोप / साइप्रस- यूरोपीय संकट का नया रूप

साइप्रस- यूरोपीय संकट का नया रूप

europe (3)साइप्रस के वित्तीय संकट ने यूरोपीय वित्तीय संकट और उसके समाधान की नीतियों को नया मोड़ दे दिया है। यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के बेल आउट पैकेज की नीतियां खुलेआम हो गयी हैं। वैश्विक मंदी के बिसात पर खेले जाने वाले इस खेल के उलझने और उसके खतरनाक होने के आसार बन गये हैं। साइप्रस की संसद ने यूरोपीय संघ के बेल आउट पैकेज को लेने की शर्तों को पहले अस्वीकार कर दी और संशोधित रूप में उसे स्वीकार कर ली। जिसकी वजह आर्थिक सहयोग देने का रूसी प्रस्ताव है, या शतेर्ं इतनी अव्यवहारिक थीं कि उन्हें माना ही नहीं जा सकता? का सवाल हमारे सामने है। वैसे, यूरोपीय संघ के वित्तीय विश्लेषक यह मान कर चल रहे थे कि साइप्रस की स्थिति ऐसी नहीं है कि वह ‘बेल आउट पैकेज’ पाने की शर्तों को असिवकार कर सके।

16 मार्च को हुए यूरोपीय संध की बैठक में साइप्रस के बैंको को 10 बिलियन यूरो का बेल आउट देने का निर्णय लिया गया। शर्त यह थी कि, साइप्रस के बैंकों में जमा किये गये धन पर टैक्स लगा कर, पैसों की उगाही की जाये। यूरोपीय संघ यह चाहता है कि 1,00,000 यूरो से ऊपर जमा किये गये धरराशि पर 1 से 10 प्रतिशत तथा छोटे जमाकर्ताओं पर 6.75 प्रतिशत का टैक्स लगा कर 6 बिलियन यूरो हासिल कर लिया जाये। जैसे ही इस निर्णय की खबर मिली साइप्रस के बैंक एटीएम पर जमा धनराशि निकालने वालों की भारी भीड़ लग गयी। एक घण्टे के अंदर यह भीड़ इतनी बढ़ गयी कि उसे नियंत्रित करना और एटीएम में इतने पैसों की व्यवस्था करना मुश्किल हो गया। पूरे देश में अजीब सी अफरा-तफरी मच गयी।

यूरोपीय संघ के इस शर्त से वरिष्ठ बैंक बाण्ड धारक और साइप्रस के सम्प्रभु कर्ज पर निवेश करने वालों को बरी रखा गया था।
इस पूरे प्रकरण में इस बात की भी जानकारी सामने आयी है, कि जर्मनी ने साइप्रस की सरकार से कहा था, कि वह इन शर्तों को स्वीकार करे या यूरोजोन की सदस्यता छोड़ दे।

साइप्रस की वित्त व्यवस्था में, वर्ष 2012 के अंतिम तिमाही में 3.4 प्रतिशत का संकुचन हुआ था। वह पिछले 6 तिमाही से वह लगातार सिकुड़ रही थी। जिसे संभालने के लिये साइप्रस की सरकार अपने अंतर्राष्ट्रीय कर्जदाताओं से 17 बिलियन यूरो- लगभग 22 बिलियन डालर- के कर्ज का प्रस्ताव रखा था। जिसमें से 10 बिलियन यूरो को मंजूरी दी गयी थी।

यूरोपीय संघ के स्टेटिसटिक्स आफीस यूरो, देशों के रिपोर्ट के अनुसार -यूरोजोन की अर्थव्यवस्था में पिछले तीन तिमाही से लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। दो तिमाही लगातार गिरावट होने की स्थिति में, अर्थव्यवस्था में मंदी की शुरूआत मान ली जाती है। इससे पहले 2009 में ऐसी गिरावट दर्ज की गयी थी। वर्तमान में यूरो जोन और यूरोपीय संघ के ज्यादातर देशों की वित्त व्यवस्था लगातार डुबकियां लगा रही है। साइप्रस की वित्त व्यवस्था में आयी गिरावट उसी का विस्तार है। जिससे उबरने के लिये उसे कर्ज की जरूरत है।

16 तारीख के यूरोपीय संघ के निर्णय को स्वीकार करने या अस्वीकार करने के लिये साइप्रस की संसद का विशेष सत्र बुलाया। 19 मार्च को संसद में मतदान हुआ और संसद के द्वारा प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया गया। जिसकी संभावना यूरोपीय संघ को भी नहीं थी। तीन सप्ताह पहले राष्ट्रपति का चुनाव हुआ है और नये राष्ट्रपति निकोस ऐनसतासियादेस बेल आउट पैकेज लेने के पक्ष में थे। लेकिन साइप्रस की संसद में उन्हें अस्वीकृति मिली। वैसे भी देश की 71 प्रतिशत आम जनता इस प्रस्ताव का विरोध कर रही थी।

इस आर्थिक प्रस्ताव के विश्लेषक एवं अर्थशास्त्री भी यह मानते हैं कि यदि यूरोपीय संघ की शर्तो को माना जाता है, तो बैंकों की स्थिति खराब हो जाती, उनकी कोर्इ शाख बचती ही नहीं। सच तो यह है कि साइप्रस पर जिन शर्तों को लादा जा रहा था, उसने यूरोपीय संघ और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों के प्रति यूरोप की आम जनता ही नहीं -जो पहले से सरकारों की बाजारवादी आर्थिक नीतियों से नाराज हैं- यूरोपीय संघ एवं यूरो-जोन के सदस्य देशों को भी आशंकित कर दिया है। यह आशंका बढ़ गयी है कि ऐसी शर्तें उन पर लादी जा सकती है। इसने यूरोपीय संघ, अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है, जो आर्थिक सहयेाग के नाम पर सदस्य देशों की वित्तव्यवस्था पर अपना अधिकार कर रही है। बैंकों के प्रति अविश्वास और उनकी शाख गिरा रही है। जिससे वित्तीय अव्यवस्था का बढ़ना तय है। जिसे साइप्रस की सरकार सह रही है।

वैसे यूरोप के अन्य संकटग्रस्त देशों के बजाये, इस देश की स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी है। यहां 12 प्रतिशत बेरोजगारी है और इस का कुल कर्ज, उसके सकल घरेलूउत्पाद का 87 प्रतिशत है, जबकि अमेरिका का कर्ज उसके सकल घरेलू उत्पाद का 100 प्रतिशत की सीमा को पार कर चुका है।
मूडी रेटिंग एजेन्सी ने जानकारी दी है कि ”रूसी कम्पनियों एवं रूस के लोगों के द्वारा व्यकितगत जमा साइप्रस के बैंकों में 31 बिलियन डालर है।” साइप्रस के बैंकिग क्षत्रे में 25 प्रतिशत पूंजी रूस का है। इसलिये यदि सभी खातेदारों पर यूरोपीय संघ द्वारा यदि कर की शर्तों को वहां की सरकार मान लेती तो, सबसे बड़ी हानि रूस को होती। रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने यूरोपीय संघ के द्वारा रखी गयी शर्तों को गलत, अव्यवहारिक एवं खतरनाक करार दिया था।

रूस साइप्रस को वित्तीय संकट से निकालने के लिये, पहले ही आर्थिक सहयोग देने की पेशकश कर चुका है। वह उन दोनों बैंकों को खरीदने का प्रस्ताव भी रख चुका है, जिनकी वजह संकट अपने चरम पर पहुंचा। रूसी उधोगपतियों ने भी इन बैंकों में अपना डिपोजिट बढ़ाने का आश्वासन दिया है। साथ ही उन बैंको के शेयर खरीदने के लिये भी वो तैयार हैं। स्कार्इ न्यूज से मिली खबरों के आधार पर रूसी कम्पनी गेज़प्रोम ने सहयोग के रूप में एक बड़ी धनराशि देने का प्रस्ताव इस शर्त के साथ रखा है कि साइप्रस अपने समुद्री क्षेत्र में उस कम्पनी को तेल की खोज करने, शोधन एवं गैस निकालने का अधिकर दे। इस कम्पनी में रूस की सरकार का शेयर निर्णायक है।

साइप्रस की सरकार ने रूस के इस प्रस्ताव को अब तक स्वीकार नहीं किया है। इसके बाद भी संभावना इस बता की व्यक्त की जा रही है कि साइप्रस के पास इसके अलावा अब कोर्इ विकल्प नहीं है। वह आर्थिक रूप से समरभूमि में बदल गया है। यूरोपीय संघ और उसके पीछे की वैश्विक शक्तियां साइप्रस की अर्थव्यवस्था को किसी भी कीमत पर सम्भलने देना नहीं चाहेंगी। वो उसे यूरोजोन से अलग कर, अपना दबाव बनाये रखने के लिये, उसे दिवालिया बनाना चाहेंगी। जिसका नकारात्मक प्रभाव यह भी पड़ सकता है कि यूरोपीय संघ के देशों में अपने स्वतंत्र असितत्व की अनिवार्यता बढ़ जाये। वो अपने देश की सरकार विरोधी जनभावनाआें को संभालने के लिये यूरोपीय संघ एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों का विरोध भी कर सकती है। ऐसी स्थिति में रूस और चीन के नये ध्रुवीकरण के समिकरण के अलावा उनके पास और कोर्इ ठोस विकल्प नहीं होगा।

साइप्रस वित्तीय ध्रुवीकरण की पृष्टभूमि में बदल गया है। यह पृष्टभूमि नये राजनीतिक समिकरण एवं संकट को भी दावत दे सकती है, क्योंकि यह सोचना कि यूरोपीय संघ चुपचाप अपना बिखरना स्वीकार कर लेगी, मूलत: गलत है।

और यह बात गलत प्रमाणित नहीं हुर्इ संशोधित शर्तों के साथ साइप्रस सरकार ने यूरोपी संघ से बेलआउट पैकेज लेने की घोषणा कर दी है। जिसका मतलब है आने वाले निकटतम कल में उसकी मुसीबतों का बढ़ना तय है। यूरोपीय संध अपनी शर्तों में बदलाव लायेगा और दुनिया में रूस और चीन के बन रहे वित्तीय धु्रवीकरण का दबाव भी साइप्रस को झेलना पड़ेगा। दो संकटग्रस्त बैंकों को कंगाल होने से बचाना मुश्किल है, क्योंकि रूस और उसकी निजी कम्पनियों के द्वारा जमा धनराशि और 25 प्रतिशत की जो धनराशि साइप्रस के बैंकिंग क्षेत्र में लगी है, यदि वह उन्हें निकालता है, तो साइप्रस की वित्तव्यवस्था आज जहां है -जिसे संभालने के लिये उसे बेलआउट की जरूरत है- उससे पीछे चली जायेगी। सामान्य खाताधारी भी अपनी धनराशि को बैंकों से निकाल लेगा। यही नहीं यदि यह तय है, कि आने वाले कल में जिन शर्तों को साइप्रस पर लादा गया है, उसे यूरोपीय संघ के सदस्य देशों पर भी लादा जायेगा, तो पूरे यूरोपीय देशों के बैंकों की विश्वस्नियता संकट में है।

बस एक जटिल सवाल है कि यूरोपीय संघ और उसके पीछे की वित्तीय ताकतें यूरोपीय बैंकों की शाख क्यों घटाना चाहती है?

Print Friendly

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Select language:
Hindi
English
Scroll To Top