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एशिया को बाजार बनाने की कोशिशें जारी हैं

asiaएशिया में कुछ ऐसी बातें भी हो रही हैं, जो थोड़ी सी लीक से हट कर है।

• अफगानिस्तान अमेरिकी सरकार के खिलाफ सख्त लहजे में बातें कर रहा है।

• पाकिस्तान में आवाम की सरकार, अमेरिकी रिश्तों में आयी तल्खी के बाद भी, अपना कार्यकाल पूरा कर ली।

• चीन में स्वाभाविक रूप से सत्ता परिवर्तन हो गया, मगर देश के नये प्रधानमंत्री ने भारत से अच्छे सम्बंधों की बहाली पर जोर दिया।

• भारत अपने छोटे पड़ोसी देशों के करीब पहुंचने की कोशिशें कर रहा है।

• उत्तरी कोरिया की, अमेरिका पर परमाणु हमले की धमकी अजीब है।

इसके अलावा, बाकी जो है, वह अपनी लीक पर है।

• ओबामा इस्त्राइल की यात्रा पर हैं, वहां से वो बेस्ट बैंक और जार्डन जायेंगे। मुददा र्इरान, सीरिया और फिलिस्तीन है।

• र्इरान को परमाणु शक्ति सम्पनन देश न बनने देने की अमेरिकी जिदद पुरानी है।

• सीरिया में विद्रोही कमजोर पड़ रहे हैं। साम्राज्यवादी ताकतें, अब युद्धद्वार खोलने के फिराक में है।

• एशिया में अफ्रीका की तरह सैन्य हस्तक्षेप की तैयारियां चल रही हैं।

जो लीक पर है, और जो लीक से थोडा ही सही, मगर हट कर है, यदि उन्हें आपस में जोड़ कर देखा जाये तो, दो बातें बिल्कुल साफ नजर आयेंगी कि 1. जनतंत्र के धोखे को बनाये रखने और 2. एक बड़े युद्ध की अनिवार्यता को करीब लाने की, कोशिशें जारी हैं। और इन कोशिशों में, चुनी हुर्इ सरकारों और साम्राज्यवादी शक्तियों की भूमिका सबसे बड़ी है। जिसका घातक प्रभाव, क्षेत्र की आम जनता पर पड़ना तय है।

साम्राज्यावादी अमेरिका और पश्चिमी देशों के हस्तक्षेप से पहले और बाद के अफगानिस्तान के बीच यदि हम विभाजन रेखा खींचें तो हस्तक्षेप से पहले वहां समाजवादी क्रांति को अंजाम दिया गया, मगर आज इस्लामी आतंकवादी और तालिबान के साये में विदेशी सैनिकों के छावनी में बदल गया है। लाखों जानें जा चुकी हैं, देश मलबा हो गया है। अफगानिस्तान पूरे क्षेत्र के लिये अमेरिकी खतरे की पहचान बन गये हैं। अमेरिकी सेना और सीआर्इए की देख-रेख में आतंकी प्रशिक्षण शिविर चल रहे हैं, और आतंकियों की खेप लीबिया से लेकर सीरिया तक विद्रोहियों का हाथ बंटा रहे हैं। दक्षिणी उपसहारा क्षेत्र में उनकी गतिविधियां बढ़ गयी हैं। माली के बाद अल्जीरिया को निशाना बनाया जा रहा है। कहने को अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन मारा जा चुका है, मगर आतंकवादियों की न सिर्फ तादाद बढ़ी है, एशिया और अफ्रीकी महाद्वीप में उनका क्षेत्र विस्तार भी हुआ है। आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी जंग आतंकवादियों के लिये नयी पृष्टभूमि ही नहीं बनी है, यह साम्राज्यवादी हस्तक्षेप की पृष्टभूमि ही बनी है। साम्राज्यवादी शक्तियों के आगे-आगे विद्रोहियों का झण्डा उठाये आतंकी चल रहे हैं, जिस पर अमेरिकी बाज बैठा है।

इराक और अफगानिस्तान की तबाही का पूरा श्रेय अमेरिकी सरकार और पश्चिमी देशों की सरकारों को जाता है। आज पाकिस्तान की जो स्थिति है, उसके पीछे भी अमेरिकी सरकार है, जिसने पाक-अफगान सीमांत क्षेत्रों में पहले इस्लामी जुनून को बढ़ाया और फिर आतंकी शिविरों में आतंकवादियों को तैयार किया गया। पाक सरकार, पाक सेना और आर्इ एस आर्इ ने अमेरिकी सरकार और सीआर्इए के सहयोग से इस्लामी आतंकवाद को अंतर्राष्ट्रीय बनाया। जिसकी ताप अब पाकिस्तान को भी झुलसा रही है। पाक सरकार अमेरिकी सहयोग, आतंकी संगठनों, और आवाम के दबाव के बीच है। भारत और पाक के रिश्तों के बीच कुछ ऐसा है कि आवाम की सरकार वहां की सैनिक सरकार से बेहतर नहीं है। दोनों के बीच का तनाव लगातार बढ़ रहा है। वैसे, पाक विदेशमंत्री हीना रब्बानी कहती हैं कि ”दोनों देशों के बीच के विवादों का हल आतंकी हमला या युद्ध नहीं है।” मगर भारत में आतंकी हमले हो रहे हैं, और हर हमले में पाक आतंकवादियों के होने का आरोप भारत प्रमाणित करता रहा है। अफजल गुरू के फांसी को लेकर पाक संसद ने निंदा प्रस्ताव भी पारित किया है। भारत की आपतित सख्त है। भारतीय संसद ने भी पाकिस्तान को अपनी सीमा में रहने की हिदायत दी है।

भारत और पाकिस्तान के बीच का तनाव प्रायोजित लगता है। 2013 में पाकिस्तान में आम चुनाव है, और 2014 में भारत में आम चुनाव का होना तय है। भारत में तानाशाही या सैनिक शासन की आशंकायें नहीं बनतीं, मगर, पाकिस्तान इन्हीं आशंकाओं के साये में जीता है। सरकार पर सेना का दबाव और आतंकी गतिविधियों के साथ पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता की वजह राजनीतिक भ्रष्टाचार भी है, जिसकी कोर्इ सीमा नहीं रह गयी है। दोनों ही देशों को हंथियारों के जिस होड़ में शामिल कर दिया गया है, उसे पश्चिमी ताकतें और अमेरिकी सरकार बनाये रखना चाहती है, साथ ही, उन्हें अच्छा बाजार बनाने की कोशिशें भी जारी हैं। आने वाला कल भारत के जरिये पाकिस्तान में व्यापार को बढ़ाने वाला ही प्रमाणित होगा जैसे आज पाकिस्तान के जरिये भारत में आतंकी गतिविधियां बढ़ार्इ जा रही हैं। दोनों देशों का उपायोग एक ही ताकत कर रही है। पाकिस्तान में परवेज मुशर्रफ भी पहुंच गये हैं, अब वो वहां अमेरिकी हितों का खयाल रखेंगे। मतलब, जनतंत्र अभी बचा रहेगा।

एशिया को सुरक्षित बाजार बनाने की कोशिशें जारी हैं। इस दृष्टि से चीन और भारत की स्थिति महत्वपूर्ण है। जहां राजनीतिक स्थिरता और सुरक्षित बाजार के साथ प्रचूर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन और श्रमशक्ति के स्त्रोत हैं। साम्राज्यवादी ताकतों के लिये चीन से ज्यादा भारत का महत्व इसलिये है, कि उसकी आर्थिक एवं राजनीतिक महत्वकांक्षायें यूरोपीय देश और अमेरिका के विरूद्ध नहीं जाती, ना ही वह गंभीर चुनौती है। चीन के उदय ने उसके वैश्विक समिकरण एवं संतुलन को प्रभावित किया है। आर्थिक रूप से वह वैश्विक संतुलन के केंद्र में आ गया है।

चीन में हुए नेतृत्व परिवर्तन की सुनिश्चित प्रक्रिया ने भी, साम्राज्यवादी ताकतों के द्वारा, राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर के, राजनीतिक लाभ उठाने की नीति को -चीन के लिये- असंदर्भित बना दिया है। वैसे नये नेतृत्व के सामने वैश्विक मंदी के दौर में अपने वित्तीय वर्चस्व को बढ़ाने और एशिया की शांति और सुरक्षा के लिये ठोस कदम उठाने की चुनौती है। भारत से अपने संबंधों को बढ़ाने की पेशकश का अपना महत्व है, जिसके जरिये अमेरिका एवं पश्चिमी देश, एशिया में चीन की चुनौतियों को रोकना चाहते हैं। भारत भी अपने छोटे पड़ोसी देशों से सम्बंधों में नयी जान डालने में लगा है, लेकिन उसकी आंतरिक समस्यायें अब उसके अंतर्राष्ट्रीय महत्व को प्रभावित करने लगी हैं। वह उस वित्तीय संकट के करीब है, जिसमें यूरोपीय देश फंसे हुए हैं। उसकी वित्तीय एवं राजनीतिक संरचना घुटने टेकने के करीब है। यदि चीन से उसके सम्बंधों में विकास होता है और यदि वह अपने सार्वजनिक क्षेत्रों की हत्या करने के बजाये उन्हें संरक्षित करता है, तो उसकी स्थितियां संभल सकती है, मगर, भारत की केंदि्रय सरकार न तो रूपये को डालर से मुक्त करना चाहती है, ना ही अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों से दूरियां बढ़ाना चाहती है, ना ही निजी क्षेत्रों को बढ़त दिलाने से बाज आना चाहती है। इसलिये, उसका बाजार बनना तय है।

इसलिये, लीक से थोड़ी हट कर घटने वाली घटनाओं की कडि़यां भी एशिया को सुरक्षित बाजार बनाने की घटनाओं से जुड़ी हुर्इ है, जहां हथियारों की होड़ और राजनीतिक हस्तक्षेप की बढ़ती आशंकायें हैं। उत्तरी कोरिया और दक्षिणी कोरिया के बची का विवाद वास्तव में चीनी सागर में चीन के वर्चस्व और अमेरिकी वर्चस्व के बीच की लड़ार्इ है। चीन की बढ़ती सैन्य क्षमता को द0 कोरिया और जापान अपने लिये खतरा मानते हैं, और जापानी द्वीपों में अमेरिकी सैन्य अडडों तथा युद्धाभ्यास को उत्तरी कोरिया अपने लिये खतरा मानता है। वास्तव में यह चीन और अमेरिका की मौजूदगी का खतरा है। उत्तरी कोरिया की ताकत अमेरिका पर हमले की नहीं है, मगर वह परमाणु हमले की धमकी दे रहा है। तनाव बढ़ रहा है।
साम्राज्वादी ताकतें चीन के साथ मिल कर जिन मुददों को सुलझाना चाहती है, सही अर्थों में वह लेन-देन जैसा ही समझौता होगा। चीन अपने राष्ट्रीय हितों से संचालित होने वाला देश है, मगर उसके हितों मे भारी विस्तार हो गया है। यह रूस और ‘बि्रक्स देशों’ से अपने सम्बंधों में ही नहीं, अफ्रीकी देशों तथा लातिनी अमेरिकी देशों से भी अपने सम्बंधों में विस्तार चाहता है। अघोषित तौर पर ही सही, मगर उसके निवेश के क्षेत्रों में बदलाव आया। वह अमेरिका और यूरोप में हो चुके अपने पूंजी निवेश को सुरक्षित करने में लगा है। जहां वित्तीय संकट पहले ज्याद गहरा सा गया है। यूरोप 2013 में इस दौर से बाहर निकलने की स्थिति में नहीं है, और अमेरिकी अर्थव्यवस्था में ऐसे ‘इकोनामी बबल्स’ बन रहे हैं, जो संभलने का एहसास कराते हुए, आज जो है उससे बड़े संकट में उसे फंसाती जा रही है।

अमेरिका र्इरान और सीरिया के मुददे पर एशिया में अपने मित्र देशों को लामबद्ध कर रहा हैं बराक ओबामा ने इस्त्राइल और जार्डन की यात्रा की। इस्त्राइल र्इरान पर हमले के लिये उदधत है और जार्डन में सीरिया की सीमा पर अमेरिकी सैनिकों की भी मौजूदगी है। सीरिया के समुद्री सीमा से लगे क्षेत्रों में नौ सैनिक बेड़ों की हलचलें बढ़ गयी हैं। सीरियायी विपक्ष और विद्रोहियों की एकजुटता और प्रवासी सरकार बना कर, जो कूटनीतिक लाभ उठाने की कोशिशें साम्राज्यवादी देश कर रहे हैं, उससे चीन के साथ रूस का हित भी प्रभावित होता है, यही कारण है कि तनाव बढ़ता जा रहा है, दूसरी ओर सीरिया में विद्रोहियों की स्थिति भी बिगड़ती जा रही है। जनसमर्थन के अभाव और सीरियायी सेना की जमीनी सक्रियता से उनके पांव उखड़ते जा रहे हैं। वो अपने पश्चिमी सहयोगियों से सहयोग बढ़ाने, हंथियार देने और हस्तक्षेप करने की मांग कर रहे हैं।

सीरिया की समस्या का समाधान सुलह और समझौते के अलावा और कुछ नहीं है, मगर साम्राज्यवादी शक्तियां युद्ध के द्वारा खोलना चाहती हैं। हम युद्ध के कितने करीब हैं? या उनसे हमारी दूरियां कितनी हैं? नहीं कहा जा सकता, क्योंकि दुनिया के मुक्त बाजार की हालत अच्छी नहीं है। वह वित्त्ीय संकट से ही नहीं घिरा है, उसके सामने राजनीतिक समस्यायें भी हैं। रूस की सक्रियता और चीन की प्रभावशाली उपस्थिति ने एशियायी परिदृश्य को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। चीन के नये नेतृत्व ने मुक्तबाजार के नये क्षेत्र के लिये, बाधाओं को हटाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त की है। जिस तेल के लिये अमेरिका और पश्चिमी देशों की नीतियां तय होती हैं, लड़ार्इयां लड़ी जाती हैं, और राजनीतिक अस्थिरता पैदा की जाती है, उसी तेल पर चीन और रूस के द्वारा मुक्तबाजार के नये क्षेत्रों की रचना की जा रही है। पाक-र्इरान पार्इप लार्इन के लिये चीन पाकिस्तान को आर्थिक सहयोग देने का प्रस्ताव रख चुकी है, जिस पार्इप लार्इन की योजना में कभी भारत भी शामिल था, और अमेरिकी दबाव की वजह से उसने अपनी उदासीनता दिखार्इ। साइप्रस का वित्तीय संकट अब तेल के लिये मारामारी में बदल गया है, जहां रूसी कम्पनियों को बढ़त मिलने की परिस्थितियां बन गयी हैं। तेल व्यापार में अमेरिकी और यूरोपीय वर्चस्व का अंत एशिया में नजर आने लगा है, और यह चुनौती अफ्रीकी महाद्वीप में भी बनती जा रही है। तेल एवं खनिज सम्पदा ने सभी महाद्वीपों को आपस में जोड़ दिया है।

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