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र्इरान-पाकिस्तान गैस पार्इप लार्इन

asia (4)”र्इरान और पाकिस्तान गैस पार्इप लार्इन प्रोजेक्ट” की शुरूआत 11 मार्च को पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और र्इरान के राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद की मौजूदगी में की गयी। इसका आयोजन दोनों देश के सीमा पर किया गया। दोनों देशों के राष्ट्रपतियों के अलावा कर्इ कैबिनेट मंत्रियों सहित महत्वपूर्ण लोगों ने भाग लिया।

1600 किलोमीटर लम्बी पार्इप लार्इन का अनुमानित लागत 1.2 से 1.5 बियिलन अमेरिकी डालर है। जिससे 21.5 मिलियन क्यूबिक मीटर्स प्राकृतिक गैस र्इरान से पाकिस्तान निर्यात किया जायेगा। र्इरान ने अपनी जमीन पर 900 किलोमीटर लम्बी पार्इप लार्इन बिछाने का काम पूरा कर लिया है। शेष पार्इप लार्इन को अपनी जमीन पर बिछाने का काम पाकिस्तान की सरकार को करना है।

‘एक्सप्रेस टि्रब्यून’ ने जानकारी दी है कि ”इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिये 500 मिलियन अमेरिकी डालर का सहयोग पाकिस्तान को देने का प्रस्ताव चीन ने किया है।” एक्सप्रेस टि्रब्यून को यह जानकारी र्इरान में पाक दूतावास के एक महत्वपूर्ण राजनयीक ने दी है। चीन की दिलचस्पी इस प्रोजेक्ट में पहले से है। इस प्रोजेक्ट में पहले भारत की भी मौजूदगी थी। र्इरान से पाकिस्तान होते हुए, पार्इप लार्इन को, भारत तक बिछाने की ‘त्रिदेशीय योजना’ थी। किंतु पाक से भारत के तनावपूर्ण रिश्ते ओर अमेरिकी दबाव की वजह से भारत इस प्रोजेक्ट के प्रति उदासीन बना रहा। अब चीन इसे अपनी जमीन तक पहुंचाने की योजना पर काम कर रहा है। संभावना व्यक्त की जा रही है कि पाकिस्तान को सहयोग देने के प्रस्ताव के पीछे चीन की यही नीति है। अमेरिकी दबाव में भारत अपने राष्ट्रीय हितों को हानि पहुंचा चुका है।

पाकिस्तान पर भी अमेरिकी दबाव है। 11 मार्च को अमेरिकी डिपार्टमेण्ट आफ स्टेट ने पाक सरकार को धमकी दी है कि ”यदि वह मल्टी बिलियन डालर गैस पार्इप लार्इन प्रोजेक्ट को जारी रखता है तो उस पर अमेरिकी प्रतिबंध लगाया जा सकता है। अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेण्ट के प्रवक्ता विक्टोरिया नूलैण्ड ने कहा है कि ”हम इस गैस पार्इप लार्इन प्रोजेक्ट से चिंतित हैं। यदि इस प्रोजेक्ट को जारी रखा गया तो ‘र्इरान सेन्सेशन एक्ट’ को लागू किया जायेगा।” उन्होंने यह भी कहा कि ”हमने अपनी चिंताओं को पाकिस्तान की सरकार को बता दिया है।”

‘र्इरान सेंन्सेशन एक्ट’ 1996 में पास किया गया था, जिसके अंर्तगत र्इरान के सहयोगी देशों को ही नहीं, उन कम्पनियों को भी अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा जो र्इरान के प्राकृतिक ऊर्जा- पेट्रोलियम पदार्थ जैसे सुरक्षित भण्डार को निकालने एवं विकसित करने के लिये 20 मिलियन डालर वार्षिक निवेश करेगा। इस कानून का मूल मकसद र्इरान की आर्थिक घेराबंदी कर उसके तेल भण्डारों एवं ऊर्जा के सभी स्त्रोतों पर अमेरिकी वर्चस्व बनाना है। यूं देखा जाये तो किसी भी देश को यह अधिकार नहीं होता कि वह अपने हितों के लिये उस देश के विकास को प्रतिबंधित करे। किंतु अमेरिकी साम्राज्य अपने आप में अनोखी मिसाल है, वह दुनिया के खनिज सम्पदा एवं ऊर्जा के स्त्रोत पर अपना आधिपत्य चाहता है, जिसके साथ यूरोपीय देश और इस्त्राइल जैसे पोषित देश हैं, जो भौंकता और काटता भी है।

अमेरिका और पश्चिमी देश र्इरान के परमाणु कार्यक्रमों को विवाद का मुददा बनाते रहे हैं। मार्च 2013 में, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने -इस्त्राइल की यात्रा पर जाने से ठीक पहले- र्इरान को परमाणु शक्ति सम्पन्न देश न बनने देने की अमेरिकी नीतियों की घोषणा की। उन्हेंने खुली चेतावनी के स्वर में कहा कि ”र्इरान के खिलाफ हमारे सभी विकल्प खुले हैं।” और सभी विकल्पों के खुले होने का मतलब होता है, कि अमेरिका साम्राज्य और साम्राज्यवादी ताकतों की सैन्य संगठन -नाटो- सैन्य कार्यवाही कर सकती है। उसे इस बात की अपेक्षा थी कि, व्यापक आर्थिक प्रतिबंधों की वजह से र्इरान घुटने टेक देगा, किंतु ऐसा नहीं हुआ, तमाम तकलीफों के बाद भी र्इरान परमाणु ऊर्जा का शांतिपूर्ण उपयोग करने के अपने अधिकारों के प्रति अडिग है। वह अपने इस अधिकार को यूरोपीय देश और अमेरिकी दबावों की वजह से छोड़ना नहीं चाहता, उसके परमाणु कार्यक्रम जारी हैं। जिसे चीन, रूस और ज्यादातर गुट निर्पेक्ष आंदोलन से जुड़े देशों का समर्थन हासिल है। लातिनी अमेरिकी देशों ने भी र्इरान का समर्थन किया है, वे अमेरिकी मनमानी के खिलाफ है।

र्इरान के तेल निर्यात को रोकने के लिये अमेरिकी सरकार ने र्इरानी तेलों के भुगतान के लिये डालर के उपयोग को रोक दिया है। उसकी सोच थी, कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में प्रचलित डालर में भुगतान की सुविधा रोकने का परिणाम यह होगा, कि र्इरान का तेल निर्यात रूक जायेगा और उसे आर्थिक रूप से घुटने टेकने के लिये विवश किया जा सके। किंतु र्इरान ने विनिमय और आपसी मुद्रा को मान्यता दे दी है। चीन के द्वारा पेट्रो डालर के विरूद्ध अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा के रूप में चीनी मुद्रा की व्यवस्था से, अमेरिकी नीतियों की गांठें ढ़ीली पड़ गयी हैं।

भारत की तरह पाकिस्तान भी ऊर्जा के संकट से गुजर रहा है। लगभग 180 मिलियन से ज्यादा पाकिस्तानी इस संकट से जूझ रहे हैं। इसलिये, पाक के हित में र्इरान-पाक पार्इप लार्इन का विशेष महत्व है, बस देखना यह है कि वह अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कैसे करता है?

इसी बीच अमेरिकी विरोध और चीन-रूस से बढ़ती उसकी नजदीकियों को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि, पाकिस्तान अमेरिकी चिंताओं को पहले जितना महत्व नहीं देगा। वैसे भी वह अमेरिकी गिरफ्त से निकलता जा रहा है। र्इरान-पाक गैस पार्इप लार्इन से यदि चीन की सम्बद्धता बन जाती है और आने वाले कल में इसका विस्तार चीन तक होता है -जिसकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता- तो अमेरिकी हितों को भारी हानि उठानी पड़ेगी। रूस भी प्राकृतिक गैस पार्इप लाइनों के जरिये पूर्वी यूरोप -पूर्व समाजवादी देशों- से अपने संबंधों को विस्तार दे रहा है। ऊर्जा के जिन स्त्रोतों पर यूरोप और अमेरिका एकाधिकार को बनाये रखने के लिये लड़ रहे हैं, अब उन्हें गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

यूरोपीय देश और अमेरिकी साम्राज्य की वित्तीय स्थिति ऐसी नहीं है कि, वो एक बड़े युद्ध का खर्च उठा सकें, मगर अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिये, इन खतरों को उठाने से वो बाज नहीं आयेंगे।

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