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यह दौर, अफ्रीकी महाद्वीप के लिये खतरनाक है

africaअफ्रीका के बारे में हमारी सोच अविकसित ही रह जाती है, क्योंकि हमारी समझ, पश्चिमी देशों से हो कर गुजरती है। हम यह सवाल नहीं करते कि, अरब जगत के आंदोलित होने की वजह क्या है? क्यों टयूनीशिया से शुरू हुआ आंदोलन दो महाद्वीपों में फैल गया? हम यह मान लेते हैं, कि मिस्त्र में जनतंत्र की बहाली का आंदोलन चल रहा है, लीबिया में कर्नल गददाफी के पतन के बाद जनतंत्र की बहाली हो गयी है। कि माली में फ्रांसीसी सेनायें शांति और स्थिरता के लिये लड़ रही हैं। कि अफ्रीकी देश अपनी समस्याओं का समाधान यूरोपीय देश और अमेरिकी साम्राज्य के सहयोग के बिना नहीं कर सकते हैं। सदियों से अफ्रीकी महाद्वीप यूंही जी रहा है। वह अपना निर्माण नहीं कर सकता।

हम यह जानने की कोशिश ही नहीं करते हैं कि यह प्रचारित सच, कितना बड़ा झूठ है? हम उसकी समृद्धि और सतत संघर्षों को जानने की र्इमानदार पहल नहीं करते हैं। आप मानें, न मानें, मगर एक महाद्वीप को गोरे लोगों की काली परछार्इयों से काला होते हुए, देखने का अपराध तो हुआ है। पश्चिमी नजरिये से दुनिया को देखना बड़ी भूल है। जबकि उन्होंने वह किया है, जो एशिया में आज तक हो नहीं सका, और दक्षिणी अमेरिकी महाद्वीप का आज है।

2002 में ‘अफ्रीकी यूनियन’ की स्थापना हुर्इ।

अपने प्राकृतिक संपदा की लूट, सहयोग के जरिये राजनीतिक हस्तक्षेप और सैन्य अभियानों से अपने नियंत्रण में रखने की यूरोपीय-अमेरिकी नीतियों के खिलाफ, अफ्रीकी यूनियन को खड़ा करने की कोशिश की गयी। उन्होंने अपनी एकजुटता से महाद्वीप के विकास की योजनायें बनार्इ, जिसके तहत महाद्वीपीय वित्त व्यवस्था महाद्वीपीय सेना और स्वर्ण मुद्रा -गोल्ड दीनार- के साथ आर्थिक सहयोग की नीतियां तय की गयीं। जिसमें लीबिया के कर्नल गददाफी की सक्रियता और लातिनी अमेरिका के समाजवादी देशों की वैचारिक भूमिका महत्वपूर्ण थी।
वित्तीय स्तर पर ”अफ्रीकन सेण्ट्रल बैंक” के पास, पूरे महाद्वीप के लिये स्वर्ण समर्थित एक ही मुद्रा -स्वर्ण दीनार- को जारी करने का अधिकार होता। इसके अतिरिक्त ”अफ्रीकन इन्वेस्टमेण्ट बैंक” और ”अफ्रीकन मोनेटरी फण्ड” बनाने की योजना थी। सामरिक स्तर पर भी एक ”महाद्वीपीय सेना” के गठन की योजना बनार्इ गयी।

यदि अफ्रीकी देशों का विकास साम्राज्यवादी ताकतों का लक्ष्य होता -जैसा कि वो प्रचारित करते हैं- तो उनके लिये ”अफ्रीकी यूनियन” का गठन अच्छी खबर हो सकती थी, लेकिन अफ्रीकी यूनियन की कार्य योजनाओं और लक्ष्य ने यह स्पष्ट कर दिया कि ”महाद्वीप में साम्राज्यावादियों के दिन पूरे हुए।”

अमेरिकी और पश्चिमी हितों के पक्षधर नीतिकारों ने जान लिया कि, अफ्रीकी एकजुटता उनके लिये खतरा है। अफ्रीकी सेण्ट्रल बैंक और गोल्ड दीनार का मतलब पाउण्ड, स्र्टलिंग फ्रेंक और डालर के स्थान पर उन्हें भी अफ्रीकी देशों से व्यापार के लिये ‘गोल्ड दीनार’ का उपयोग करना पड़ेगा, जिस पर उनका कोर्इ नियंत्रण नहीं होगा। जबकि उनकी अपनी मुद्रा और पेट्रो डालर पर अमेरिकी फेडरल रिजर्व का अधिकार है, जिसे वो अपनी जरूरत के हिसाब से छाप सकते हैं। अफ्रीकन इन्वेस्टमेण्ट बैंक और अफ्रीकन मानेटरी फण्ड का मतलब अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष जैसे वित्तीय इकार्इयों का अफ्रीकी महाद्वीप से वर्चस्व का अंत होना। अपनी रिसर्च में जीन पाल पुगाला ने चिन्हित किया है कि 42 बिलियन डालर की पूंजी से अफ्रीकन मानेटरी फण्ड के शुरूआत की योजना थी। यह उम्मीद की जा रही थी कि, अफ्रीकी देशों से अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की पूरी गतिविधियों का अंत हो जायेगा, जिसके पास उस समय 25 बिलियन डालर की पूंजी थी। जिसके भरोसे ही उन्होंने पूरे महाद्वीप को घुटनों के बल बैठा कर, जकड़ रखा था। उनके विकास की दिशा का निर्धारण और उन्हें सार्वजनिक उपक्रमों के स्थान पर निजी उपक्रमों को बढ़ाने के लिये विवश करता आ रहा था। उनके खनिज सम्पदा का दोहन और उसकी चोरी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां कर रही थीं।

अफ्रीकी संघ की योजनायें उनके शोषण, दोहन और छलपूर्ण राजनीति के दरवाजे को बंद करने वाला प्रमाणित होगा, यह तय था।

अफ्रीकी संघ की स्थापना के दो वर्ष बाद ही 2004 में लीबिया के सिर्ते सम्मेलन में ”कामन अफ्रीकन डिफेन्स” और ”सिक्यूरिटी र्चाटर” पर सहमति बन गयी। जिसकी एक धारा में यह प्रतिबद्धता व्यक्त की गयी थी कि ”किसी भी अफ्रीकी देश पर किया गया हमला पूरे महाद्वीप पर किया गया हमला माना जायेगा।” सुरक्षा सम्बंधी यह घोषणां पत्र नाटो देशों के घोषणां पत्र की तरह ही था। इसे कार्यरूप में बदलने के लिये वर्ष 2010 में ”अफ्रीकन स्टैण्ड-बार्इ फोर्स” की स्थापना की गयी। यह घोषणां पत्र के निर्णयों को लागू करने के लिये मिले जनादेश के बाद बनाया गया। अफ्रीकी महाद्वीप के लिये यह एक महत्वपूर्ण गठन था। जिससे नाटो के द्वारा सैन्य हस्तक्षेप की आशंकाओं को समाप्त करने की कोशिश की गयी। जिसके पक्ष में कहा जा सकता है कि यह नव उपनिवेशवादी और नवउदारवादी साम्राज्यवाद के विरूद्ध अफ्रीकी देशों की रक्षा करने की योजना का अंग था। मगर, आशंका इस बात की भी थी, कि इसका स्वतंत्र असितत्व इन्हीं ताकतों के पक्ष में भी काम कर सकता था। वैसे, पश्चिमी ताकतों ने अफ्रीकी एकजुटता और उसके सैन्य संगठन के विरूद्ध अपनी कार्ययोजना पहले से ही बना ली थी। किंतु इसी बीच उस पर अमल से पहले ही उनकी अर्थव्यवस्था संकटग्रस्त हो गयी, और चीन का उदय हो गया।

इन स्थितियों ने नयी परिस्थितियों को जन्म दिया। यह तय हो गया कि अफ्रीकी देशों पर आर्थिक दबाव बनाने के लिये, अब तक की नीतियां अब कारगर नहीं रह गयी हैं, क्योंकि छल-प्रपंच, और ब्लैकमेलिंग और वित्तीय जाल में फंसाये रखने का अब समय ही नहीं है। अपने वर्चस्व को बनाये रखने के लिये सैन्य अभियानों की अनिवार्यता पहले से बढ़ गयी है। 2002 में ”अफ्रीकन आयल पालिसी इनिसिएटिव ग्रूप” द्वारा जारी अमेरिकी श्वेत पत्र में इस बात की अनुसंशा की गयी है कि ”अफ्रीका के उप-सहारा क्षेत्र में एक नये और सशक्त यूएस मिलिट्री को-आपरेशन की जरूरत होगी।” एक ‘सब यूनिफाइड कमाण्डेण्ड’ बनाने का निर्णय भी लिया गया था। 2008 में ‘ए एफ आर र्इ सी ओ एम’ के नाम से असितत्व में आये सैन्य संगठन के अंतर्गत एक ऐसी सेना का गठन किया गया जो पश्चिमी देशों के चेन कमाण्डेन्ड के अंतर्गत अफ्रीका के सहयोगी देशों में सैन्य अभ्यास और सैन्य अभियानों को अंजाम देगी।

इस योजना में सबसे बड़ी बाधा अफ्रीकी यूनियन का होना था, जिसने अफ्रीकी महाद्वीप में अमेरिकी सेना के होने को खारिज कर दिया था। अफ्रीकी यूनियन ने पश्चिमी एवं अमेरिकी ताकतों को बाध्य कर दिया कि वो इस संगठन का मुख्यालय अफ्रीकी महाद्वीप से बाहर जर्मनी में स्थापित करें। जबकि तात्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बुश ने सार्वजनिक रूप से इसके मुख्यालय को अफ्रीका में स्थापित करने की घोषणां की थी।
2009 अमेरिकी साम्राज्य और यूरोपीय देशों के लिये, सबसे बुरा वक्त तब आया जब कर्नल गददाफी को अफ्रीकी यूनियन का अध्यक्ष चुना गया। जो साम्राज्यवादी शक्तियों के घोर विरोधी थे, जिन्होंने सोवियत संघ के पतन के बाद भी, इन ताकतों से दशकाें लम्बा संघर्ष किया था। वैसे भी, लीबिया अफ्रीकी यूनियन का सबसे बड़ा आर्थिक सहयोग देने वाला देश था। साम्राज्यवादी ताकतों के सामने यह बात बिल्कुल साफ थी कि, लीबिया में कर्नल गददाफी के रहते अफ्रीकी यूनियन को कमजोर का पाना मुश्किल है। इसी दौरान गददाफी ने भी कुछ जल्दबाजी की। उन्होंने पूरे महाद्वीप के लिये एक मुद्रा, एक सेना और एक पासपोर्ट का प्रस्ताव रखा। अमेरिकी साम्राज्य और यूरोपीय देशों के लिये अफ्रीकी महाद्वीप में अपने पहली पहले जैसी स्थितियों को बनाये रखना मुश्किल होता चला गया।

इसके बाद लीबिया और कर्नल गददाफी के साथ क्या हुआ? यह हम जानते हैं। लीबिया पर सैन्य हस्तक्षेप के लिये आतंकवादियों के साथ मिल कर विद्रोह की स्थितियां बनायी गयीं। उन्हें भारी मात्रा में आर्थिक एवं सैन्य आयुद्धों की आपूर्ति की गयी। राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में सैन्य हस्तक्षेप के प्रस्ताव पर अफ्रीकी यूनियन के तीन देश -नार्इजीरिया, गैबन और दक्षिणी अफ्रीका ने प्रस्ताव के पक्ष में मत डाले। रूस और चीन ने ऐतिहासिक भूल की। अफ्रीकी यूनियन के नये अध्यक्ष जीन पिंग -गैबन के राजनीतिक और 2004-05 में राष्ट्रसंघ महासभा में भी थे- ने लीबिया पर नाटो सेना द्वारा थोपी गयी नयी सरकार को मान्यता भी दे दी। यही नहीं उन्होंने कर्नल गददाफी की हत्या के बाद, अफ्रीकी यूनियन को उसके घोषित उददेश्यों से दूर कर दिया। उन्होंने न तो शोक सभा होने दी, ना ही एक मिनट का मौन रखने की परम्परा को पूरा होने दिया।

दक्षिणी अफ्रीका ने राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद में, सैन्य हस्तक्षेप के प्रस्ताव पर, प्रस्ताव के पक्ष में मतदान करने पर, अफसोस जाहिर किया। दक्षिणी अफ्रीका के दो राष्ट्राध्यक्षों ने नाटो सेना के सैन्य अभियानों की कड़े शब्दों में निंदा की। दक्षिण अफ्रीकी विदेश मंत्रालय के डिप्लोमेट आफ इण्टरनेशनल रिलेशन के एक प्रमुख राजनीतिज्ञ ने कहा कि ”साउदर्न अफ्रीकन डव्लपमेण्ट कम्युनिटी -एस0ए0डी0सी0 के देश -दक्षिणी अफ्रीका, जिम्बाबे, अंगोला, तंजानिया, नामिबिया और जामिबया- जिन्होंने क्षेत्रीय स्वतंत्रता के संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभार्इ है,- ने जीन पिंग के प्रति गहरा असंतोष जाहिर किया। जुलार्इ 2012 में 37 अफ्रीकी देशों के समर्थन से जीन पिंग को अफ्रीकी यूनियन की अध्यक्षता से निकाल बाहर किया गया। डा0 एनकोज़ाजाना एदलामिनी -जो जूमा- पूर्व साउथ अफ्रीकन विदेश मंत्री इहाबो मबकी की दाहिना हाथ हैं- ने पदभार संभाल लिया। जो जीन पिंग की तरह पश्चिमी ताकतों के सामने आत्मसमर्पण करने वालों में नहीं हैं। माना यही जा रहा है, कि अफ्रीकी यूनियन एक बार फिर स्वतंत्रता के लिये प्रतिबद्ध लोगों के नियंत्रण में आ गया है।

कर्नल गददाफी की हत्या अफ्रीकी यूनियन के सबसे महत्वपूर्ण सदस्य और साहेल-सहारन क्षेत्र की क्षेत्रीय सुरक्षा की हत्या प्रमाणित हुआ है, जिसका खामियाजा अब पूरे अफ्रीकी महाद्वीप को भरना पड़ रहा है। लीबिया की तबाही नये सिरे से अफ्रीकी महाद्वीप की तबाही और अस्थिरता की शुरूआत बन गयी हैं, कर्नल गददाफी ने लीबिया और वहां की आम जनता के लिये जो किया है, और अफ्रीकी महाद्वीप की एकजुटता और स्थिरता के लिये जो किया है, उसका आंकलन आने वाला कल ही कर पायेगा। मौजूदा दौर अफ्रीकी महाद्वीप के लिये सहयोग, समर्थन, शांति, विकास और स्थिरता के विरूद्ध साम्राज्यवादी हस्तक्षेप और अस्थिरता का है। यह दौर अफ्रीकी महाद्वीप के लिये खतरनाक है।

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