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बि्रक्स देशों का डरबन सम्मेलन

africa (2)दक्षिण अफ्रीका की राजधानी डरबन में 26-27 मार्च को बि्रक्स देशों का पांचवां शिखर सम्मेलन हुआ जिसमें पांचों देशों के शासनाध्यक्षों ने भाग लिया।

बि्रक्स देशों के संगठन को बिखरा हुआ र्इंट समझने वाले अमेरिका और पश्चिमी देशों को अब यह लगने लगा है कि दुनिया के पांच बड़े देशों के एक साथ होने का कुछ मतलब है। उनकी मौजूदगी तीसरी दुनिया के देशों के लिये ही नहीं, यूरोप और अमेरिका के लिये भी निर्णायक हो सकती है। अलग-अलग समाज व्यवस्था वाले इन देशों की सोच अब आपस में मिलने लगी है, वो धीरे-धीरे नयी आर्थिक चुनौती और राजनीतिक विकल्पों में बदलने लगे हैं। रूस और चीन की नजदीकियां बढ़ी हैं। भारत और चीन के बीच की दूरियां घटी हैं। ब्रजील लातिनी अमेरिका के समाजवादी देशों की आर्थिक नीतियां और सामाजिक कार्यक्रमों के प्रभाव में आता जा रहा है, रूस और चीन से उसके रिश्ते बढ़ रहे हैं। भले ही वह विश्व राजनीति में कर्इ विवादास्पद मुददों में अमेरिकी लाबी में खड़ा नजर आता है। दक्षिण अफ्रीका अफ्रीकी संघ का समर्थक है, और लीबिया के मुददे पर राष्ट्रसंघ में अमेरिका के साथ खड़ा होने का उसे अफसोस है। गुट निर्पेक्ष देशों के संगठन को मानने वाला भारत अभी संक्रमण के दौर में है। वह चीन के वर्चस्व से चिंतित है।

ब्रजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिणी अफ्रीका- इन पांच देशों के एक साथ खड़ा होने को सिर्फ अच्छी संभावनाओं के नजरिये से नहीं देखा जा सकता, ना ही यह कहा जा सकता है, कि इन देशों के एक साथ खड़े होने का कोर्इ मतलब नहीं है। सच तो यह है कि आर्थिक हितों से जुड़े इन देशों के बीच अपनी वैश्विक उपस्थिति को कारगर बनाने के लिये, और अपनी समस्याओं को हल करने के लिये, सामूहिक होने की परिस्थितियां हैं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था और यूरोपीय देशों के आर्थिक संकट ने, नयी स्थितियों की अनिवार्यता बना दी है। चीन और रूस समानांतर अर्थव्यवस्था और वैश्विक मुद्रा की वैकलिपक व्यवस्था है, जिसकी पहल सितम्बर 2012 में हो चुकी है। ब्रजील के आर्थिक सम्बंध चीन से बढ़े हैं, अब वह आर्थिक रूप से अमेरिका से बड़ा व्यापारिक सहयोगी बन गया है। भारत और दक्षिण अफ्रीका की खिचड़ी थोड़ी अलग है, मगर सुरक्षा के मामले में भारत के पास 70 प्रतिशत रक्षा उपकरण और हथियार रूस के हैं। इस तरह आर्थिक सहयोग के साथ राजनीतिक सम्बंधों की कडि़यां भी जुड़ी हुर्इ हैं। इसे हम बहुध्रुवी विश्व की अवधारणां की ठोस पहल भले न कह सकें, मगर, रूस और चीन की उपस्थिति एक विकल्प तो बनाती ही है।

बहर हाल हम डरबन सम्मेलन की ओर चलें, जहां ‘बि्रक्स विकास बैंक’ की आपसी सहमति बन गयी है। पांचवें शिखर सम्मेलन के घोषणा पत्र में विकास बैंक पर सहमति और बिजनेस काउंसिल के गठन को उपलबिध बताया गया है। यह भी कहा गया है कि ”बि्रक्स विकास बैंक विश्व बैंक का प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक होगा।” जिससे बि्रक्स देश जी-20, अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष और अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों को प्रभावित कर सकेंगे। 100 अरब डालर के प्रारम्भिक कोष से बनने वाले इस बैंक से मुद्रा भंडार की एक ऐसी व्यवस्था को बनाने की बात कही गयी है, जो मौदि्रक उतार-चढ़ाव के समय, बि्रक्स देशों को मौदि्रक स्थिरता में सहयोग दे सकेगा। बि्रक्स देश आपसी मुद्रा में अपने आयात और निर्यात को बढ़ावा देने के प्रति पूरी तरह सहमत हैं। वो वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के बीच आपसी स्थिरता को बढ़ावा देने के पक्ष में हैं। इस कोष के निर्माण में चीन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है।

बि्रक्स देश राजनीतिक विवादों से बचते हुए आर्थिक समन्वय एवं सहयोग को बढ़ावा देने के पक्ष में हैं। उन्होंने तय किया है कि प्रभावशाली आर्थिक सम्बंधों से राजनीतिक समस्याओं का समाधान संभव है।

आज दुनिया के राजनीतिक सम्बंधों का जिस तरह आर्थिककरण हो गया है, उसे देखते हुए इसे राजनीतिक संगठन के रूप में उभरने की पृष्टभूमि भी कही जा सकती है। यूरोपीय संघ हो, या जी-8 देशों का आर्थिक मकड़जाल सभी के मूल में वित्तीय वर्चस्व की उदारवादी नीतियां हैं। यही कारण है कि अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रकोष और विश्व बैंक जैसी वैश्विक आर्थिक इकार्इयों ने राजसत्ता को अपने कब्जे में ले लिया है। दो दशक पहले तक राजनीतिक शर्तें आर्थिक सहयोग पर लदी रहती थीं मगर, आज मुक्त बाजारवाद सब पर भारी है। चीन तक अपने राजनीतिक विचारों में संशोधन कर चुका है। रूस मुक्त बाजारवाद का नया क्षेत्र बनाने में लगा है। भारत की स्थिति भी कुछ ऐसी ही है, वह आनेवाले कल के आर्थिक महाशक्ति बनने के भंवर जाल में फंसा हुआ है।

जन समस्याओं को हल किये बिना किसी भी वित्त व्यवस्था का कोर्इ भविष्य नहीं है, और बाजारवाद जन समस्याओं को विस्फोटक बना रहा है। मौजूदा पूंजीवादी वैश्विक परिदृश्य में, यदि लातिनी अमेरिकी देशों को छोड़ दिया जाये तो जनसमस्याओं का समाधान निकालते हुए विकास की संभावनाओं की धार भोंथरी है। सरकारें निजीकरण और वित्तीय पूंजी के वैश्विक विस्तार को ही विकास की दिशा मान कर चल रही हैं। इस लिये, बि्रक्स देश रूस और चीन का विकल्प राजनीतिक रूप से साम्राज्यवादी अमेरिका और यूरोप देशों को नियंत्रित करने का विकल्प तो पेश करती हैं, मगर आर्थिक रूप से वो विकल्प नहीं है। बि्रक्स देशों का संगठन आने वाले कल में क्या करता है? यह तय होना बाकी है, मगर वह एक ऐसा विकल्प बनने में लगा है जो 43 प्रतिशत आबादी को प्रभावित कर सकता है। जिसका वैश्विक स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद 25 प्रतिशत से ज्यादा है। संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ के बाद बि्रक्स देशों का यह संगठन तीसरे नम्बर का आर्थिक संगठन है। इसके सदस्य देशों का निर्यात विश्व निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत है। इस लिये, संभावना इस बात की बनती है, कि अमेरिकी एवं यूरोपीय शक्ति के क्रमश: घटने का सीधा लाभ इस संगठन को मिल सकता है। रूस और चीन स्वतंत्र रूप से एक विकल्प बन चुके हैं, इस लिये बि्रक्स संगठन को भी इसी रूप में देखा जा रहा है।

इस संगठन के सदस्य देशों की उपयोगिता आपसी रूप में भी बड़ी है। ब्रजील और रूस जिन्स उत्पादक देश हैं, जिसकी आवश्यकता भारत और चीन को है। रूस और ब्रजील के पास कमोडिटी -माल-असबाब- की बड़ी ताकत है। दक्षिण अफ्रीका के पास भरपूर खनिज सम्पदा है। चीन विशाल उत्पादक शक्ति एवं पर्याप्त से ज्यादा श्रमशक्ति सम्पन्न देश है, जिसकी वजह से यूरोप और अमेरिका से औधोगिक पलायन हो रहा है, भारत के पास सूचना और प्रोधोगिकी के क्षेत्र में बड़ी संभावनायें एवं शक्तियां हैं। इस तरह उनके आपसी हित एवं अनिवार्यता एक-दूसरे से स्वाभाविक रूप से जुड़े हुए हैं। पहले अमेरिका ब्रजील का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी देश था, अब चीन हो गया है। रूस का कारोबारी सहयोगी अब जर्मनी नहीं चीन बन गया है। रूस के सम्बंध अमेरिका और यूरोप से कम हुए हैं और एशिया तथा लातिनी अमेरिका से बढ़े हैं। चीन अफ्रीका का सबसे बड़ा निवेशक देश है। उसका पूंजी निवेश लातिनी अमेरिका में भी सबसे ज्यादा है। यह वह समिकरण है जो यह प्रमाणित करता है, कि बि्रक्स देशों के बीच आर्थिक सम्बंधों की ही अनिवार्यता नहीं है, बल्कि वैश्विक विकास की परिस्थितियां भी कुछ ऐसी ही बनती जा रही हैं। वैश्विक मंदी ने और बाजारवादी वित्त व्यवस्था ने एकजुटता की नयी अनिवार्यता पैदा कर दी है।

बि्रक्स देशों के बीच व्यापार बढ़ाने और उसकी राहों में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिये ”बि्रक्स बिजनेस काउंसिल” के गठन का निर्णय लिया गया है। पांचों देशों की आपसी सहमति की घोषणा भी की गयी है। जिसमें पांचों सदस्य देशों के उधोग संगठनों के पांच-पांच प्रतिनिधि होंगे। जिसका मुख्यालय बि्रक्स के अध्यक्ष देश में होगा।

‘बि्रक्स विकास बैंक’ पर आपसी सहमति की घोषणा तो हो गयी है, किंतु, इसे अंजाम तक पहुंचाने के लिये कर्इ बाधाओं को पार करना है। भारत और दक्षिणी अफ्रीका की चिंता इस बैंक पर चीन के वर्चस्व को ले कर है। 100 करोड़ डालर की प्रारम्भिक राशि का मुददा भी अहम है। जिससे रूस और ब्रजील की तो सहमति है किंतु भारत और दक्षिणी अफ्रीका इस राशि को आधा करना चाहते हैं, ताकि पांचों देशों के द्वारा समान धन राशि की व्यवस्था हो और अधिकार भी समान हो।

सम्मेलन के दौरान शाही दावतों में भी कर्इ महत्वपूर्ण मुददों पर भी चर्चायें हुर्इं। भारत के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह और चीन के राष्ट्रपति जी जिनपिंग के बीच दोनों देशों के बीच के विवादित मुददों पर भी चर्चायें हुर्इं। मनमोहन सिंह तिब्बत में चीन के द्वारा बनाये जा रहे ब्रम्हपुत्र नदी पर बांध और पाकिस्तान के साथ बंदरगाह निर्माण के प्रति अपनी चिंता व्यक्त की। जिसके प्रति चीन के राष्ट्रपति का रूख सकारात्मक था। आपसी सम्बंध और वित्तीय रिश्तों से ही सीमा विवाद का समाधान भी आसान होगा, ऐसी संभावनाएं उन्होंने व्यक्त की।

रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भी भारतीय उपमहाद्वीप की मौजूदा स्थितियों के बारे में अलग से बातचीत की। इसी दौरान भारत और रूस के आपसी रिश्तों और बि्रक्स संगठन को मजबूती देने वाले कार्यनीतियों पर भी लम्बी वार्ता हुर्इ। ब्रजील भारत से अपने कारोबारी रिश्तों को बढ़ाने का पक्षधर है। भारत के लिये यह दौर गंभीर आर्थिक संकट का है। 74 सदस्यों के साथ पहुंचे सबसे बड़े प्रतिनिधि मण्डल के सदस्यों ने दक्षिण अफ्रीका और अफ्रीकी देशों में कारोबार बढ़ाने के अवसर की ताक में, कर्इ वार्तायें की। जिसमें कर्इ उधोग संगठनों के प्रतिनिधि भी थे।

बि्रक्स सम्मेलन में कारोबारी रिश्तों पर तो खुली चर्चा हुर्इ, मगर राजनीतिक मुददों पर बंद कमरे में विशेष बैठकें आयोजित की गयीं। जिसमें सीरिया, र्इरान, फिलिस्तीन और अफगानिस्तान के मुददों पर भी चर्चायें हुर्इ।

शिखर सम्मेलन से ठीक पहले रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि ”बि्रक्स को अब संवाद मंच की जगह बातचीत के कार्यशील अन्तर्राष्ट्रीय संगठन के रूप में तब्दील किया जाये। ताकि विश्व राजनीति के प्रमुख मुददों पर दुनिया की 43 प्रतिशत आबादी वाले ये पांचों देश एकमत हो कर अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी बात रखें। दिल्ली सम्मेलन में भी यह बात उभर कर सामने आयी थी। र्इरान, अफगानिस्तान, सीरिया और फिलिस्तीन के मुददों पर आपसी सहमति बनाने की कोशिश की गयी। सभी देश किसी भी देश के आंतरिक मामले में सैन्य हस्तक्षेप के खिलाफ हैं। इन मुददों के प्रति अंतर्राष्ट्रीय मंच पर रूस और चीन की नीतियां स्पष्ट हैं। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है, कि विश्व शांति एवं क्षेत्रीय स्थिरता के खिलाफ अब वो अमेरिकी साम्राज्य एवं नाटो संगठन की कार्यवाहियों की अनदेखी नहीं कर सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ में इन दोनों देशों के पास विटो का अधिकार है, जिसका उपयोग वो अमेरिकी प्रस्तावों के खिलाफ कर्इ बार कर चुके हैं।

बि्रक्स देशों को बिखरा हुआ र्इंट कहने वाले देशों को भी डरबन सम्मेलन से यह अंदाजा लग गया है कि अमेरिका और पश्चिमी ताकतों को अब आर्थिक ही नहीं राजनीतिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ेगा।

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