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दीवारों को मैंने

दीवारों को मैंने
बाहों की तरह जुड़ते देखा है!
कह नहीं सकते हैं उन्हें आप
कि दीवारों को बोलना नहीं आता,
वो सपाट
और बेजुबान हैं!
नहीं कह सकते हैं उन्हें आप
कि छत के बोझ को उठाये रहने का
उनके चेहरे पर सिकन नहीं है!

यह
सच है या झूठ (?) कह नहीं सकता,
मगर
दीवारों को कुछ कहते,
जमीन पर अंगुलियों से कुछ लिखते
और सलेट-पटटी बनते मैंने देखा है!
मैंने देखा है
उन्हें
कैनवास और गुजरे हुए कल का
चलचित्र बनते।
तस्वीरों को उनके बदन पर
उभरते मैंने देखा है।

झाड़ कर बदन को
पलस्तर गिराते,
कंधे पर लदे छतों को उतारते
और नींव के र्इटों को हिलाते दीवारों को
मैंने देखा है।
देखा है मैंने टकराते सिरों को संभालते,
चीखों को
समाते अपने भीतर!
दीवार को नदी
और नजारा बनते मैंने देखा है!

दीवारें
र्इंटों की बंधी मुटिठयां हैं
वह लम्हा है जब आदमी
दीवार की तरह मजबूत हो जाता है,
नहीं कह सकता
यह सच है या झूठ
मगर
दीवारों को मैंने
छतों के ऊपर निकलते,
और बाहों की तरह जुड़ते देखा है!

-आलोकवर्धन

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