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आज की दुनिया पूंजीवाद के अवसान और माक्र्सवाद के संभावनाओं की दुनिया है

vishesh aalekh20वीं सदी के अंतिम दशक में यह मान लिया गया, कि माक्र्सवाद की चुनौतियां खत्म हो गयी हैं, और सोवयित संघ के पतन के साथ ही अक्टूबर क्रांति का अंत हो गया है। लेनिन को गहरी नींद आ गयी है।

विचारों के स्तर पर दुनिया विकल्पहीन है, और समाज व्यवस्था के रूप में माक्र्सवाद को इतिहास के गहरे खडड में उतारा जा चुका है।

यह भी मान लिया गया, कि क्यूबा के समाजवादी क्रांति का अंत करीब है, और पूंजीवाद को पराजित नहीं किया जा सकता, वह अजेय है। विश्व व्यवस्था के रूप में समाजवाद उसका विकल्प नहीं है। यह सब मान लिया गया।

लेनिनग्राद अब सेंट पिटर्सबर्ग बन गया है, और रेड़ स्क्वायर के मर्इ दिवस की शान फीकी पड़ गयी है।

हम टूटी हुर्इ मुर्तियों और ताबूतों से घिरे हैं।

मगर,

21वीं सदी के पहले दशक नें, बड़ी शराफत से समझा दिया है, ”यह सब बकवास है।”

यह ठीक है, कि सोवियत संघ का पतन हुआ है, और रेड स्क्वायर का चेहरा जर्द है।

यह भी ठीक है, कि समाजवादी चीन की सूरत बदल गयी है, और माओवाद अपने ही देश में, अपनी औकात खो बैठा है। मगर, आज रूस और चीन के पास जो कुछ भी है, उसी समाजवादी व्यवस्था का हासिल है, जिसके बूते वो पूंजीवादी विश्व में ‘वैकलिपक मुक्त बाजारवाद’ के नये क्षेत्रों की रचना कर रहे हैं। किंतु, इसका अर्थ यह नहीं है कि समाजवाद की नियति पूंजीवाद की ओर वापसी है। बल्कि, वो समाजवाद की ऐसी पृष्टभूमि है, जहां संघषोर्ं की धार इस समझ के साथ तेज होनी है कि पूंजीवाद वेश बदल कर भी पलटवार कर सकता है। सामंतवाद से पूंजीवादी सकंक्रमण के दौरान, पूंजीवादी समाज व्यवस्था के पूर्ण विकास से पहले ही यदि समाजवादी क्रांति संभव है, तो समाजवादी संक्रमण के दौरान, पूंजवाद की वापसी भी हो सकती है। क्रांति वर्गविहीन समाज के निमार्ण की सतत प्रक्रिया है। जिसे एक तारीख या एक घटना से आंका नहीं जा सकता। समाजवादी संक्रमण के दौर में सोवियत संघ और चीन की स्थिति यही है। उन्हें वापस वहीं होना है, जहां से वो उल्टे पांव लौट रहे हैं, क्योंकि दुनिया की वैकलिपक व्यवस्था वह नहीं है, जिसे वो एकाधिकारवादी ताकतों के खिलाफ बना रहे हैं, बल्कि वह है, जिसे वो साम्राज्यवादी संक्रमण के दौरान, गलत दिशा की ओर मुड़ गये हैं।

शताब्दी भर लम्बी जिंदगी, आम आदमी की जिंदगी से लम्बी है, मगर, सामाजिक विकास की वह छोटी अवस्था है। हम उन्हें और उन्हीं घटनाओं को याद रख पाते हैं, जो समाज व्यवस्था के विकास को, सही सोच और सही दिशा देती है। व्लादिमीर इलियच लेनिन की प्रतिमायें तो तोड़ी जा सकती हैं, मगर, मिखार्इल गोर्बाचोव, येल्तसिन और पुतिन उन टूटी प्रतिमाओं के टुकड़े के बराबर भी नहीं हैं। माओ त्से तुंग को हम माक्र्सवादी कटघरे में खड़ा कर सकते हैं, मगर मुक्त बाजारवादी हू जिन ताओ, जिया बाओ या जी जिन पिंग की स्थिति माओ के सामने यही है। ये उस अवशेष पर पनपने वाले फफूंद हैं, जिन्हें मलबों के साथ हटा दिया जायेगा, जिनका हटना तय है।

हमारा मकसद इतिहास की ओर वापस होना नहीं है। हम माक्र्स-एंगल्स, लेनिन-स्टालिन के समय में वापस होना नहीं चाहते, हम उस आज से जुड़े हैं, जहां आनेवाले कल का निर्माण हो रहा है, और जिसकी जड़ें गहरी हैं। जिसे किसी दूसरे की खून से नहीं, अपने ही खून और पसीने से सींचा गया है। आज वेनेजुएला में किसी भी मजदूर या कर्मचारी को, 24 घण्टे में 6 घण्टा काम करना पड़ता है, ज्यादातर देशों मे 8 घण्टे काम करने का विधान है। मगर जैसे ही यह विधान कामगरों के अधिकार या मांग में बदलती है, उसका अर्थ बदल जाता है। 8 घण्टे के काम के अधिकार की लड़ार्इ बड़ी लम्बी है। 14 से 16 घण्टे तक लोगों को काम करना पड़ा है। मजदूरों की लड़ार्इ काम के घण्टों, काम की परिस्थितियों, और एवज में मजदूरी और क्षतिपूर्ति के लिये रही है। और यह लड़ार्इ, बदली हुर्इ परिस्थितियों में आज भी जारी है। कामगरों को जीने की लड़ार्इ हर हाल में लड़नी पड़ती हैं मगर यह माक्र्सवाद और श्रमिक वर्ग के संघर्षों की अधूरी तस्वीर है। आप चाहें तो कह सकते हैं, कि सोच के स्तर पर यह अपरिपक्व है। यह लड़ार्इ उत्पादन के साधन पर मजदूर वर्ग के हक की लड़ार्इ है। राजसत्ता पर अधिकार और राज्य की सरकार को आम जनता के पक्ष में खड़ा करने की लड़ार्इ है। वर्ग विभाजित समाज व्यवस्था और राज्य के शोषक इकार्इ को बदलने की लड़ार्इ है। माक्र्सवाद एक सुसम्बद्ध दर्शन और समाज व्यवस्था है, जो सिर्फ इतिहास की व्याख्या नहीं करता, बल्कि आज और आने वाले कल की समझ भी देता है, और सोच की समझदारी निरापद भी नहीं होती।

कम मजदूरी, कम सुविधा, और सस्ते में कच्चा माल के लिये, आज भी उधोगों का पलायन जारी है। संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोप से उधोगों का पलायन तीसरी दुनिया के देशों में हो रहा है- विशेष कर चीन में। जिन कारणों से औपनिवेशिक ताकतों ने तीसरी दुनिया के देशों को अपने उपनिवेशों में बदला, साम्राज्यवादी ताकतों ने वित्तीय उपनिवेशों की स्थापना की, आज वित्तीय पूंजी को मिली खुली छूट उनकी ऐसी समस्या बन गयी है, जिसका समाधान उनके पास नहीं है। पूंजीवादी वैश्विक व्यवस्था राजनीतिक रूप से असंदर्भित हो गयी है, और आर्थिक एवं सामाजिक धु्रविकरण की नयी परिस्थितियां बन गयी हैं। चीन वित्तीय ध्रुविकरण का केंद्र बनता जा रहा है, और संयुक्त राज्य अमेरिका सामरिक धु्रविकरण के केंद्र में है। पूर्व समाजवादी देशों के बीच की नजदीकियां नये समिकरण को जन्म दे रही हैं। जिनके पास जनसमस्याओं का, कामगर-मजदूर और समाज के बहुसंख्यक वर्ग की समस्याओं का, कोर्इ समाधान नहीं है। उनकी स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। जन चेतना का समाजिकरण होता जा रहा है। मुक्त बाजारवाद और नवउदारवादी वैश्वीकरण ने जन समस्याओं का भी वैश्वीकरण कर दिया है। समस्याओं का वैश्वीकरण समाधान के वैश्वीकरण की पृष्टभूमि होती है। शांति के बजाये संकट की घडी में, समाज ज्यादा एकजुट होता है। मंदी ने इसी एकजुटता की ओर विश्व समुदाय और विश्व समाज को, समाज के बहुसंख्यक वर्ग, श्रमिक और कामगरों को धकेल दिया है। यूरोप और अमेरिका और पूंजीवादी देशों के सामने अंधी सुरंगें हैं। उन्होंने अपने विकास की उन संभावनाओं को खो दिया है, उन संरचनाओं को तोड़ दिया है, जो सामाजिक विकास के क्रम में राज्य और सरकार की तरह स्वाभाविक रूप में बनी, मगर, जिसे चंद लोगों ने समाज पर प्रभुत्व कायम करने का जरिया बना लिया। आज राज्य और आम जनता के हितों से जुड़ी सरकारों का वित्तीय पूंजी, अंत कर चुका है। उसने अपने ही पांव के नीचे से, अपने होने की जमीन खींच ली है।

”क्या कर रही है, आज की पूंजीवादी सरकारें?” यदि हम सोचें तो, हमारे सामने शोषण, दमन और वित्तीय पूंजी के लिये लड़ती हुर्इ सरकारें ही नजर आयेंगी, जो खुद को बचाने के लिये अपने देश और दुनिया की आम जनता को मार रही हैं। उन्होंने आम जनता के हितों और उसकी खुशहाली के खिलाफ समाज के स्वाभाविक विकास को रोकने का निर्णय लिया है। उन्होंने मान लिया है, कि सारी दुनिया के प्राकृतिक संसाधन और जन समुदाय तथा भूखण्डों पर एकाधिकार कायम कर, वो खुद को बचा सकती है। उन्हें नहीं मालूम, कि उन्होंने जनभावनाओं और अपनी संभावनाओं की हत्या कर दी है। उन्होंने आम जनता को सड़कों पर उतरने के लिये विवश कर दिया है। और जो लड़ार्इयां सड़कों पर लड़ी जाती हैं, उसमें गृहयुद्ध के बीज होते हैं।

आज लड़ार्इयां सड़कों पर ही लड़ी जा रही है। एकाधिकारवादी ताकतों ने वित्तीय पूंजी के जाल की बुनावट इस तरह की है कि पूंजीवादी लोकतंत्र का ऊपरी ढांचा तो बचा हुआ है, मगर उसकी वैधानिक इकार्इयां, प्रशासनिक निकाय और न्याय प्रक्रिया तक, वैधानिक परिवर्तनों की राह को रोक कर खड़ी है। लोकतंत्र के नाम पर लोकतंत्र की हत्या की जा रही है। ये हत्यायें तीसरी दुनिया के देशों मे साम्राज्यवादी सेनायें ही नहीं कर रही हैं, बल्कि, अपने देश और दुनिया में सीनेट, संसद, कांग्रेस, पार्लियामेण्ट, डयूमा और ऐसे ही किसी नाम से पुकारी जाने वाली लोकतंत्र की वैधानिक इकार्इयां भी कर रही हैं, जिन पर ‘वित्तीय पूंजी’ का कब्जा हो गया है। आज की दुनिया 147 विशालकाय कारपोरेशनों के नियंत्रण में है, जो अपने हजारों छोटे-बड़े कारपोरेशनों, कम्पनियों और अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयों से दुनिया को नियंत्रित कर रही है। पूंजीवाद पूरी तरह एकाधिकारवाद में बदल गया है, और यह उसकी आखिरी अवस्था है। वह संकटग्रस्त है। पूंजीवाद की वैश्विक संरचना टूट रही है। वह चाह कर भी अपने को बचा नहीं सकता। उसने अपने राजनीतिक, आर्थिक एवं सामाजिक संरचना को असंदर्भित बना दिया है। उसने यह प्रमाणित कर दिया है, कि वह एक संक्रमणकालीन अवस्था है। जिसे बनाये रखने की उसकी कोशिशों का अंत नहीं हुआ है।

हम संक्रमण के दौर में हैं, और आज की दुनिया माक्र्स-एंगल्स की दुनिया नहीं है, लेनिन और माओ की दुनिया भी नहीं है। चेग्वेरा और फिदेल कास्त्रो की दुनिया भी बदल गयी है। आज की दुनिया सोवियत संघ और यूरोप के समाजवादी देशों के पतन और पूंजीवाद के अवसान की दुनिया है। आज की दुनिया क्यूबा के समाजवादी क्रांति और लातिनी अमेरिकी देशों में विकास के जरिये समाजवाद के विकल्पों की दुनिया है। आज की दुनिया माक्र्सवाद के संभावनाओं की दुनिया है। हमारे सामने मर्इ दिवस की वापसी है। जिसकी शुरूआत 1886 में हुर्इ। या यूं कहें कि मर्इ दिवस के रूप में उसे मान्यता बाद में मिली।

मजदूरों की संगठित पहली लड़ार्इ को गुलामों के विद्रोह की तरह ही खून से सान दिया गया।

4 मर्इ 1886 में शिकागो के इलेनाइस में 8 घण्टे के काम के अधिकार के लिये मजदूरों ने एक प्रदर्शन का आयोजन किया और एक आंदोलन खड़ा हो गया। शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के खिलाफ मजदूरों को घेर कर उन पर गोलियां चलायी गयीं, कर्इ लोग मारे गये और 50 से अधिक लोग बुरी तरह घायल हुए, नेतृत्व कर्ताओं को हिरासत में ले लिया गया। उन पर केस चलाया गया और न्यायालय के द्वारा 7 लोगों को फांसी की सजा दी गयी। इन्हीं 7 मजदूर नेताओं में से 2 को शिकागो के गर्वनर के द्वारा फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया गया। शारीरिक एवं मानसिक यातनाओं के दौर में 1 मजदूर नेता ने आत्महत्या कर ली और 4 लोगों को 11 नवम्बर 1887 में फांसी के फंदे से टांग दिया गया। मजदूर संगठनों पर सरकारी हमले तेज हो गये और मजदूरों के अधिकार को कुचलने की नयी शुरूआत हुर्इ। मगर 4 मर्इ के मजदूरों की इस शहादत ने मजदूरों के झण्डे को लाल कर दिया। सेकेण्ड इण्टरनेशनल के दूसरी कांग्रेस में ‘शिकागो की शहादत’ के नाम पर, 1 मर्इ को ‘मजदूर दिवस’ में बदलने का निर्णय लिया गया और 1891 में इसकी शुरूआत हुर्इ।

1917 के अक्टूबर क्रांति के बाद सोवियत संघ के रेड स्क्वायर का मर्इ दिवस मजदूरों के संगठित ताकत की नयी पहचान बनी, जहां मजदूरों की पहली सरकार बनी और समाजवादी राज्य का उदय हुआ। माक्र्स के साथ एंगल्स के बाद लेनिन और माक्र्सवाद के साथ लेनिनवाद का जन्म हुआ। आज 1886 से 2013 की दुनिया अलग है, मगर श्रमिक वर्ग का संघर्ष अपनी पराजय और उपलबिधयों के साथ आज भी जारी है। आज भी संदर्भित है, और आज भी आनेवाले कल की संभावनायें उनसे जुड़ी हुर्इ हैं।

गये साल 2012 में, क्यूबा की राजधानी हवाना में ‘मर्इ दिवस’ के परेड़ में 5 महाद्वीप के 117 देशों के 1900 प्रतिनिधि शामिल हुए और 5 लाख लोगों के साथ उन्होंने मार्च किया। ”दुनिया के मजदूरों एक हो!” का नारा बुलंद किया गया, और 5 लाख से अधिक लोगों ने सामूहिक संकल्प लिया कि ”वे समाजवादी की रक्षा करेंगे और उसका विकास करेंगे।”

आज क्यूबा के होने का मतलब है ”21वीं सदी का समाजवाद”। जिसने सोवियत संघ के ‘रेड स्क्वायर’ को क्यूबा में पुर्नजीवित कर दिया।
आज लातिनी अमेरिकी देशों में वेनेजुएला के होने का मतलब है- ”विकास के जरिये समाजवाद”, जिसके मूल में फिदेल कास्त्रो और हयूगो शावेज हैं। जिन्होंने न सिर्फ माक्र्सवाद के नये संस्करण को विकसित किया, बल्कि, नवउदारवादी वैश्वीकरण के विरूद्ध समाजवादी वैश्वीकरण को नयी दिशा दी। जिसकी अनिवार्यता बहुधु्रवि विश्व की अवधारणा सी, रोज बढ़ती जा रही है। महाद्वीप के समाजवादी देशों के द्वारा प्राकृतिक संसाधन को राज्य के अधीन लाया जा चुका है। बैंकों, उधोगों, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का राष्ट्रीयकरण किया जा रहा है। सामाजिक विकास के अंतर्गत पूरे महाद्वीप को जिस तरह आपस में जोड़ा गया है, उसका प्रभाव यूरोप एवं अमेरिका की आम जनता पर गहरा पड़ा है। माक्र्स, एंगल्स, लेनिन के साथ अब फिदेल, चे और शावेज को भी पोस्टरों में बढ़ी जगह मिल गयी है। तीसरी दुनिया के देशों पर भी गहरा प्रभाव पड़ा है।

‘विकास के जरिये समाजवाद’ ने पश्चिमी मीडिया और अमेरिकी प्रचारतंत्र द्वारा प्रचारित इस अवधारणां को तोड़ दिया है कि ”समाजवाद के लिये सर्वहारा क्रांति” अनिवार्य है। उसने यह सिद्ध कर दिया है कि चुनावी प्रक्रिया से भी समाजवादी क्रांति संभव है। माक्र्स, एंगल्स या लेनिन ने सर्वहारा के सशस्त्र संघर्ष को क्रांति के लिये एकमात्र शस्त्र कभी नहीं कहा।

गये साल, अपने को ”99 प्रतिशत” कहने वाले आकोपायी वालस्ट्रीट मोमेंट से जुड़े लोगों ने अमेरिका के 130 शहरों में मर्इ दिवस की रैलियां निकाली। न्यूयार्क में सबसे बड़ा प्रदर्शन हुआ। इन प्रदर्शनों को रोकने के लिये एफबीआर्इ एवं अमेरिकी प्रशासन ने दमन का सहारा लिया 97 लोगों की गिरफ्तारियां हुर्इ।

यूरोप और यूरोपीय संघ के लगभग हर एक देश में ज्यादातर शहरों में मर्इ दिवस मनाया गया। लोगों ने सरकार विरोधी नारे लगाये और यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक, विश्व बैंक, और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के खिलाफ प्रदर्शन किये। आज यूरोपीय संघ के 60 से 80 प्रतिशत लोग, अपने देश को यूरोपीय संघ से अलग करना चाहते हैं। 60 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जो यह मान कर चल रहे हैं, कि पूंजीवादी व्यवस्था का अंत जरूरी है। कल तक इस पतनशील व्यवस्था से निकलने का इनके पास कोर्इ विकल्प नहीं था, मगर आज आम जनता के पास समाजवादी विकल्प है। वो अपने देशों के जनविरोधी और युद्ध उन्मादी सरकारों के खिलाफ हैं। इसके बाद भी सरकारें अपनी लड़ार्इ आम जनता के नाम से लड़ रही है, जो यह प्रमाणित करने के लिये काफी है, कि आम जनता का हित किसी भी समाज व्यवस्था के हित से बड़ा है, जिसकी अवहेलना आज की सरकारें कर रही हैं।

तीसरी दुनिया के देशों में भी माक्र्सवाद की नयी समझ के साथ, मर्इ दिवस की वापसी हुर्इ है। जहां माक्र्सवाद की नयी संभावनायें समाज व्यवस्था के रूप में जन्म ले रही हैं।

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