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सरकार के बदलने से, व्यवस्था नहीं बदलती?

rashtriya mudda‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स-2012’ के अनुसार- ”दुनिया की बहुसंख्यक भूख से पीडि़त आबादी भारत में रहती है।” वह भी तब, जब कि देश में खाधान्न की कमी नहीं है। खाधान्न हमारी सरकार के पास है, मगर 10 करोड़ से अधिक लोग भुखमरी के शिकार हैं। उन तक अनाज पहुंचाने और खाधान्नों को सुरक्षित रखने के बजाये, सरकार उनका निर्यात करने में लगी है। यह चौंकाने वाला सच है, कि भारत 100 लाख टन चावल निर्यात करने वाला सबसे बड़ा देश है। उसने 95 लाख टन गेहूं का भी निर्यात इस साल किया है। उसका सबसे बड़ा निर्यातक देश होना बड़ी बात है, या देश में सबसे ज्यादा भुखमरी के शिकार लोगों का होना बड़ी बात है? तय करें।

हो सकता है कि सरकार के दिग्गज अर्थशास्त्री, यह समझाने में कामयाब हो जायें कि ‘चावल को सड़ाने से अच्छा है, उसे बेच देना, जिनसे विदेशी मुद्रा भी मिलती है।’ मगर वो यह समझाने में कामयाब नहीं हो सकते, कि अनाज को सड़ाने की जरूरत क्या है, जबकि उनका भण्डारण भी हो सकता है, और उन्हें जरूरत मंदों तक पहुंचाया भी जा सकता है।

दो साल पहले सड़ रहे, सरकारी गोदामों के अनजा को, गरीबों में बांटने का आदेश सर्वोच्च न्यायालय ने देश की केंद्रीय सरकार को दिया था। जो खाधान्न मंत्री ही नहीं, प्रधानमंत्री को भी नागवार गुजरी थी। इसे उन्होंने नीतिगत मामला बताया था, और कहा था कि ”न्यायालय सरकार के नीतिगत मामलों में दखल न दे।” उन्होंने यह भी कहा था कि ”हमारे देश की वितरण व्यवस्था इतनी मजबूत नहीं है कि वितरण की समुचित व्यवस्था हो सके।” उन्होंने आश्वासन भी दिया था कि ”सरकार वितरण व्यवस्था को जल्द से जल्द चुस्त-दुरूस्त कर लेगी।” भण्डारण के मामले में उन्होंने, विवादित मुददों से बच निकलने के लिये, खामोशी का रूख ही अखितयार किया। वैसे भी इससे उनके निर्यात और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के सेहत पर बुरा असर पड़ता। हाल-फिलहाल में उन्होंने कुपोषण के आंकड़ों को देख कर उसके खिलाफ मुहीम छेड़ने की बात भी की थी। बातें वो हमेशा अच्छी और गोल-गोल करते हैं। अपने पहले कार्यकाल की उपलबिधयों का तमगा पाने के बाद दूसरे कार्यकाल के शुरूआती दौर में उन्होंने देशवासियों को विश्वास दिलाया था कि ”100 दिनों के अंदर वो पूरे प्रशासनिक एवं वैधानिक व्यवस्था को चाकचौबंद कर देंगे।” उन्हें तीसरे कार्यकाल की भी जरूरत है, इसलिये वो कह सकते हैं कि ”हमारे पास खाधान्न के भण्डारण की समूचित व्यवस्था नहीं है।”

सवाल है कि खाधान्न के वितरण और भण्डारण की व्यवस्था, किसकी जिम्मेदारी है?

ऐसा वो चाह सकते हैं, मगर कह तो सकते नहीं कि, ”यह सरकार की नहीं, किसानों और निजी कम्पनियों की जिम्मेदारी है।” कि ”जो उत्पादन करे, वह अपने उत्पादन को संभाले और जो धंधा करे, वह अपने धंधे को सम्भाले।” वो लेवी और निर्यात के मसले को गोल कर जायेंगे। या उसे भी किसी विदेशी- बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को नीलाम कर देंगे। ऐसा हम सोचते हैं, और हमारा विश्वास है। भारतीय कृषक समाज के अध्यक्ष कृष्णबीर चौधरी कहते हैं कि ”अनाज भण्डारण की व्यवस्था करने के बजाये सरकार उन कारपोरेटस के लिये ‘कोल्ड-चेन’ बनाये जाने को लेकर ज्यादा संजिदा नजर आती है, जो लाचार किसानों से बेहद कम दामों में कृषि उत्पाद खरीदते हैं। गरीब किसानों से खरीदे गये इन उत्पादों की प्रोसेसिंग करके महंगे दामों में घरेलू बाजार के अलावा विदेशों में बेचा जाता है।”

रिजर्व बैंक आफ इणिडया ने ‘इणिडया रूरल क्रेडिट सर्वे कमेटी’ का गठन 1946 में किया था। कमेटी ने ग्रामीण क्षेत्रों में कर्ज एवं बाजार की व्यवस्था के लिये अनाज के भण्डारण की सिफारिश की थी। इसे ही आधार बना कर भारत सरकार ने ”एग्रीकल्चर प्रोडयूस कारपोरेशना एक्ट’1956 बनाया, जिसके अंर्तगत वैज्ञानिक पद्धति से भण्डारण के साथ फाइनेन्स एवं मूल्य की स्थिरता की सिफारिशें की गयी थीं। भण्डार गृहों में रखे गये अनाज की रसीद दिखा कर बैंकों से लोन की व्यवस्था किसानों की थी। इन्हीं भण्डार गृहों पर किसानों को फसल चक्र से लेकर फसल की देख-रेख, अनाजों को ठीक से रख-रखाव करने, और बाजार में उसे बेचने के लिये सही जानकारियां देने की जिम्मेदारियां थीं। इन भण्डार गृहों के जरिये ही आपूर्ति एवं सही मूल्य को भी नियंत्रित किया गया।

50 से 70 के दशक में ग्रामीण क्षेत्रों से लेकर राज्य स्तर पर छोटे-बड़े भण्डार गृहों का निर्माण भी हुआ। स्टेट वेयर हाउसिंग कारपोरेशन और सेण्ट्रल वेयर हाउसिंग कारपोरेशन की स्थापना हुर्इ, उन्हें बढ़ाया भी गया। जो किसानों के लिये जरूरी भी है। मगर अब स्थितियां बदल गयीं। सरकारी गोदामों में अनाज रखने के लिये जगह दी गयी है, कि उसके पास सरकारी भण्डारण की समूचित व्यवस्था नहीं है, उसके परमपरागत भण्डारण की व्यवस्था को तोड़ दिया गया है, सरकार की दिलचस्पी इस बात से घट गयी है कि वह भण्डार गृहों का निर्माण किसानों के हित में करे, परिणाम हमारे सामने है- किसानों के पास अपनी उपज सस्ते में बेचने की विवशता है। उसकी फसल और अनाज की तरह ही उसका जीवन असुरक्षित हो गया है। लगभग 15 करोड़ किसान परिवारों के बजाये देश की सरकारें ”कोल्ड चेन” बनवा कर निजी कम्पनियों और कारपोरेशनों को लाभ पहुंचा रही हैं। ‘बहुराष्ट्रीय फूड प्रोसेसिंग’ और कृषि उपज पर आधारित ‘एग्री-बिजनेस कम्पनियों’ को सिर्फ सस्ता कृषि उपज ही नहीं दिला रही है, किसानों को दी जाने वाली ‘सबिसडियों’ का फायदा भी पहुंचा रही है।

मनमोहन सरकार के घोटालों की फेहरिश्त में एक घोटाला यह भी है।

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और कृषि उपज पर आधारित व्यापारिक कम्पनियों को लाभ पहुंचाने की नीति सिर्फ केंद्र और कांगे्रस शासित राज्यों की सरकारों की ही नहीं है, विपक्ष और भाजपा शासित राज्यों की भी है। कम-ओ-बेस यह स्थिति पूरे हिंदुस्तान की है। किसानों के उपज की सुनियोजित लूट हो रही है, और देश की सरकारें उसकी साझीदार हैं। किसानों के उत्पाद और सही उपभोक्ताओं के बीच लूटेरों के कर्इ गिरोह हैं। कृषि के क्षेत्र में सक्रिय हुर्इ वित्तीय पूंजी का ही यह कमाल है, कि अब किसानों को उसके उत्पादन का सही मूल्य नहीं मिल पाता और सही उपभोक्ता-खरीददारों को सस्ते में खाधान्न नहीं मिल पाता। सरकार की नीतियां और विपक्ष की दलीलें लचर हैं। किसानों को लाभ पहुंचाने या समाज के सबसे कमजोर वर्ग के हितों का खयाल रखने की बातें, गलत हैं। कांग्रेस हरित क्रांति का गाना गाती है, जिसने कृषि के क्षेत्र में असंतुलन पैदा किया, और पंजाब, हरियाणा के कर्इ गांवों पर ‘बिकने के लिये तैयार’ की तखितयां लगवा दी, महंगे कृषि ने किसानों को तबाह किया। भाजपा गुजरात की तख्ती लगाये विकास और सुशासन का राग अलाप रही है, जहां औधोगिक घरानों और कृषि पर आधारित उधोगों को तो भारी मुनाफा हुआ, मगर कपास उत्पादक किसानों की हालत पतली हो गयी। दक्षिण में मसाला उत्पादक किसानों की हालत बदतर है। उन्हें सरकारी प्रोत्साहन तो दिया गया, मगर उनके पास बाजार के लिये सरकारी सहयोग एवं देशी बाजार नहीं है, और विदेशी बाजार के लिये जिन बहुराष्ट्रीय प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, वहां उनकी हडिडयां भी सलामत नहीं बचती।

ढेरों अनाज सरकारी माल गोदामों, अस्थायी बनाये गये माल गोदामों में सड़ रहे हैं। करोड़ों लोग भूख से त्रस्त हैं। वर्तमान फसल वर्ष में 1000 लाख टन खाधान्नों के भण्डारण की व्यवस्था सरकार को करनी है। सरकार क्या करेगी? यह बताने की जरूरत नहीं है। वह आश्वासन देगी, डूबती अर्थव्यवस्था को आंकडों से पाटेगी और किसानों के हितों में आने वाले कल के सपने बांटेगी। अब तक की सरकारों की यही नीतियां रही हैं। 1979 में जब, किसानों में, अधिक खाधान्न उत्पादन का जोश भरा गया था, खाध एवं नागरिक आपूर्ति मंत्रालय ने 50 खाधान्न भण्डार गृह देशभर में बनाने का अपने सामने लक्ष्य रखा था। पूरे देश में नेटवर्क बनाने की योजना रखी थी, ताकि खाधान्न उत्पादन वाले राज्यों से अनाज की आपूर्ति विभिन्न राज्यों के गरीबों तक पहुंच सके। लेकिन योजनायें लगभग 4 दशक से फार्इलों में हैं। हर साल अनाजों की बर्बादी हो रही है, हर साल गरीबी और भुखमरी के शिकार लोगों की तादाद बढ़ रही है। सरकार की वरियता बदल रही है।

खाधान्न उत्पादन, उनका भण्डारण एवं संरक्षण और उनके वितरण की समूचित व्यवस्था का मुददा आज भी राष्ट्रीय मुददा नहीं है। हमारे देश के अर्थशास्त्री, अर्थशास्त्री से प्रधानमंत्री बने मनमोहन सिंह, उधोगों के लिये आधारभूत ढांचा, विदेशी पूंजी निवेश और सटटेबाज अर्थव्यवस्था के उतार चढ़ाव से परेशान हैं। निजी कम्पनियों के लिये जगह बनाने, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को देश में बुलाने और डूबती अर्थव्यवस्था की नैया पार लगाने की जुगत भिड़ाने में लगे हैं। वो ग्रामीण विकास के लिये 2.5 लाख पंचायत घर बनवाने में लगे हैं, उन्हें कम्प्यूटर नेटवर्क से जोड़ने और सोलर पावर की सप्लार्इ में लगे हैं। यह निवेश जरूरी है, उनके लिये, क्योंकि ऐसा होने पर देश का ग्रामीण क्षेत्र बहुराष्ट्रीय ग्रामीण क्षेत्रों में बदल जायेगा। सपनों की गोटियां बिछा कर, उन्हें हारने के लिये दांव लगाने की सीख दी जा सकेगी। यह दिखा कर कृषि के क्षेत्र में निवेशकों को आकर्षित भी किया जा सकेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में बदलाव तो आयेगा, मगर ग्रामीणों की हालत कितनी बदल पायेगी? अनुमान लगाया जा सकता है। ‘खाध भण्डारण गृह’ के निर्माण के लिये पैसा नहीं है, सरकार के पास। पूरे देश में खाध भण्डारण गृह बनवाने के लिये 1 लाख करोड़ रूपये की जरूरत है। सरकार की मुश्किल यह है।

पहली नजर में यह बात खास गलत नहीं लगती।

यदि घपलों-घोटालों की बात छोड़ दी जाये, जिनसे हुए वित्तीय हानि का सही आंकलन आसान नहीं है, तो भी सरकार की यह बात समझ से बाहर है। 2004-05 से लेकर 2012 तक बजट दस्तावेजों में ‘राजस्व छूट’ के नाम से, केंद्र की यूपीए सरकार कारपोरेट जगत, और औधोगिक घरानों को 32 लाख करोड़ की छूट दे चुकी है। और 2013-14 के लिये 5.73 लाख करोड़ की छूट का निश्चित प्रस्ताव है।

कृषि मंत्रालय ने हर एक गांव में सुरक्षित ‘खाधान्न गोदाम’ बनवाने का निर्णय लिया है। कृषि मंत्रालय विश्वास के साथ यह बताने की स्थिति में नहीं है, कि देश में कितने गांव हैं? इसलिये, बड़ी आसानी से समझा जा सकता है कि इस निर्णय के प्रति सरकार कितनी गंभीर है।

यह अच्छी बात है, कि हम खाधान्न के बड़े निर्यातक देश हैं, मगर यह तो अच्छी बात नहीं हो सकती कि, हमारे पास न तो खाधान्न के भण्डारण की समुचित व्यवस्था है, ना ही ऐसी वितरण प्रणाली है, कि उसे भूखे लोगों तक पहुंचाया जा सके।

हमारे सामने भूख, गरीबी, बेकारी, किसानों की बदहाली और भुखमरी के शिकार करोड़ों लोग हैं। ऐसी सरकारें हैं, हमारे सामने, जो कारपोरेट जगत के हितों के लिये काम करती हैं। और सबसे बुरी बात यह है कि हमारी राजनीतिक संरचना, उसकी आर्थिक बुनावट कुछ ऐसी है कि सरकारों के बदलने से व्यवस्था नहीं बदलती।

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