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चीन की तीखी प्रतिक्रिया

rashtriya antarrashtriyaभारत और चीन के रिश्तों को सिर्फ सीमा विवाद के नजरिये नहीं देखा जा सकता। स्थितियां उससे आगे निकल गयी हैं और दोनों देशों की जिम्मेदारियां उससे बड़ी है, हमारे लिये यह एशिया की शांति एवं स्थिरता से जुड़ा हुआ मुददा है।

एशिया प्रशांत क्षेत्र, दक्षिणी चीन सागर, कोरिया प्रायद्वीप और मध्य-पूर्व की जैसी स्थिति है, उसमें भारत और चीन के रिश्तों का उलझना साम्राज्यवादी ताकतों को नयी छूट देना ही प्रमाणित होगा, जो अपने वित्तीय वर्चस्व को बनाये रखने के लिये सामरिक रूप से भी सक्रिय है। जिसका मकसद राजनीतिक अस्थिरता और युद्ध की आशंकाओं को बनाये रखना है।

16 अप्रैल को चीन ने एशिया में अपनी सैन्य सक्रियता बढ़ाने के लिये अमेरिकी सरकार की निंदा करते हुए कहा कि ”यह कदम एशिया प्रशांत क्षेत्र में तनाव को बढ़ा रहा है।” चीन के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता यांग यू जुंन ने कहा कि ”अमेरिका इस क्षेत्र में और ज्यादा सैन्य टुकडियां, युद्धपोत और लड़ाकू बम वर्षकों को भेज कर अस्थिरता पैदा करने की कोशिश कर रहा है। वह इस क्षेत्र के अपने सहयोगी देशों के साथ अपने सैन्य सम्बंधों को ज्यादा मजबूत कर रहा है।” जो इस क्षेत्र की शांति एवं स्थिरता के लिये बड़ा खतरा है। यांग ने यह वक्तव्य वार्षिक सुरक्षा मंत्रालय के रिपोर्ट की जानकारी देते हुए बिजिंग में आयोजित प्रेस कांफ्रेन्स में दिया। उन्होंने कहा कि ”अपनी सैन्य क्षमता, को इस क्षेत्र में बढ़ाने के लिये युद्ध के मुददे खड़े किये जा रहे हैं, और सैन्य सम्बंधों को बढ़ाने के लिये समझौते किये जा रहे हैं, उन्हें मजबूत किया जा रहा है, जो कि समय की मांग नहीं हैं, ना ही यह इस क्षेत्र की शांति एवं विकास को बढ़ाने के लिये है।”

उन्होंने कहा- ”हम उम्मीद करते हैं कि इससे जुड़े सभी पक्ष ऐसे काम करेंगी जिससे इस क्षेत्र के देशों के बीच आपसी विश्वास और बढ़े, और वो अपना सहयोग यहां की शांति एवं स्थिरता को बनाये रखने में देंगी।”

40 पेज के इस वार्षिक रिपोर्ट में चेतावनी दी गयी है, कि चीन इस समय उलझे हुए कर्इ खतरों से घिरा हुआ है। क्योंकि कुछ देश एशिया प्रशांत क्षेत्र में अपने सैन्य समझौतों को मजबूत कर रहे हैं, और अपनी मौजूदगी को बढ़ा रहे हैं, वो खुले तौर पर यहां की स्थिति को तनावपूर्ण भी बना रहे हैं।” रिपोर्ट में यह भी कहा गया है, कि ”हम तब तक किसी पर हमला नहीं करेंगे, जब तक हमारी सम्प्रभुत्ता और अखण्डता पर हमला नहीं किया जाता है। और यदि ऐसा किया गया तो हम उसका उचित जवाब देंगे।”

बीजिंग लगातार वाशिंगटन द्वारा एशिया प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य क्षमता को बढ़ाने और जापान, दक्षिण कोरिया, फिलिपिंस और वियतनाम के साथ मिल कर सैन्य सम्बंधों को बढ़ाने की निंदा करता रहा है।

ऐसी स्थिति में चीन के द्वारा विवादास्पद मैकमोहन लार्इन का उल्लंघन करके भारत अधिकृत लददाख क्षेत्र के 19 किलोमिटर की घुसपैठ और चीनी सेना द्वारा टेंट लगा कर जमे रहने की घटना की दो ही वजह हो सकती है, कि चीन अपनी सैन्य स्थिति मजबूत करने के लिये यह कार्यवाही कर रहा है, या यह पहले की स्थिति का जबर्दस्त प्रचार है। सबसे अजीब बात यह है, कि इस घटना को अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में जगह कम मिली है, और हिंदी भाषी समाचार पत्रों में इसे विशिष्टता से प्रकाशित किया जा रहा है। भारतीय संसद भी इस बात पर बहंस कर रही है, मगर मौजूदा सत्र में भी गतिरोध बना हुआ है।

भातर की यात्रा पर आने से ठीक पहले नेपाल के माओवादी नेता प्रचण्ड ने बिजिंग की यात्रा की, जहां उन्होंने चीन, भारत, नेपाल के त्रिपक्षीय सम्बंधों पर जोर दिया और चीन के नये नेतृत्व ने अपनी सहमति जतार्इ। दूसरी ओर 18 अप्रैल को भारतीय प्रतिनिधि मण्डल से 2014 में अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद आतंकवाद की समस्या से निपटने के लिये भारत से सहयोग एवं संयुक्त कार्ययोजनाओं पर चर्चायें हुर्इं। यह पहला अवसर है जब आतंकवाद के मुददे पर चीन ने भारत के साथ वार्ता की पेशकश की। चीन के नये प्रधानमंत्री ली के चियांग अपनी पहली विदेश यात्रा नर्इ दिल्ली से शुरू करना चाहते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे पत्र में दोनों देशों के विकास के लिये समान अवसर और जगह की बात भी की है। बि्रक्स देशों के सम्मेलन में भी चीन के नये राष्ट्रपति ने भारत से समान और सहयोगी सम्बंधों का विश्वास जताया था।

दोनों देशों की बढ़ती हुर्इ नजदीकी से अमेरिकी सरकार की मुश्किलें बढ़ती है, इसलिये यह सोचा जा सकता है, कि इसके पीछे कुछ ऐसा जरूर है, जो मीडिया वार से जुड़ा हुआ है। वैसे भी अमेरिका भारत पर दबाव बढ़ाने की स्थिति में है, और चीन को मानवाधिकार के हनन के मुददे से जोड़ कर उसके विरूद्ध प्रचार अभियान चला रहा है।

बीजिंग ने अमेरिका द्वारा चीन के मानवाधिकार की स्थिति के बारे में की गयी टिप्पणियों को खारिज करते हुए कहा है, कि ”वाशिंगटन मानवाधिकार के हनन के अपने कारनामों की ओर से आंख मूंद कर दूसरे देशों पर उनके हनन का आरोप लगाता रहता है।”

21 अप्रैल को जारी रिपोर्ट में चीन की संसद -स्टेट कांउसिल- के सूचना विभाग ने कहा है कि ”अमेरिकी सेना पूरी दुनिया में चलाये जाने वाले अपने अभियानों के दौरान अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकारों का खुलेआम उल्लंघन करती है और अमेरिकी लोकतंत्र को राजनीतिक सहयोग लेकर उसे पालना, हतोत्साहित करने वाला कदम है।” ‘द हयूमन रार्इटस रिकार्ड आफ द युनार्इटेड स्टेटस इन 2012’ के नाम से जारी इस रिपोर्ट में अमेरिका में घट रही हिंसक घटनाओं को भी मानवाधिकार के उल्लंघन के रूप में रेखांकित किया गया है। और उसे आम अमेरिकी के जीवन की सुरक्षा के सवाल से जोड़ कर देखा गया है।

इस रिपोर्ट में राष्ट्रपति चुनाव में 50 प्रतिशत से भी कम लोगों की हिस्सेदारी का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि अमेरिकी सरकार लगातार जिस तरह राष्ट्रपति चुनाव का प्रचार और आम अमेरिकी को मतदान के लिये प्रेरित करती रहती, उसका प्रभाव भी अब नकारात्मक पड़ रहा है, और आम अमेरिकी नागरिक अपने मताधिकार के अधिकार से दूर होता जा रहा है। 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में 57.7 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने अधिकार का उपयोग नहीं किया।

अफगानिस्तान, पाकिस्तान और यमन जैसे देशों में अमेरिकी देशों द्वारा चलाये जा रहे सैन्य अभियानों का उल्लेख करते हुए इसे उन देशों के नागरिकों के मानवाधिकार का हनन करार दिया गया है।

19 अप्रैल को अपने वार्षिक मानवाधिकार रिपोर्ट में अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेण्ट ने कुछ देशों पर मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाते हुए, र्इरान, रूस और वेनेजुएला पर सख्त टिप्पणियां की है। उसने मिस्त्र, बांगलादेश और चीन की भी निंदा की है। उनके द्वारा विदेश से आर्थिक सहायता लेने वाले संगठनों पर रोक लगाने और राजनीतिक मानवाधिकार के हनन और श्रमिको के बीच काम करने वालों की हत्या करने और हिरासत में, लेकर यातना देने की भी निंदा की गयी है। यह प्रमाणित किया गया है कि इन देशों मे मानवाधिकार की स्थिति बुरी है।

मानवाधिकारों का हनन सारी दुनिया में बड़े पैमाने पर हो रहा है। अमेरिकी स्टेट डिपार्टममेण्ट जिन देशों पर मानवाधिकार के उल्लंघन का आरोप लगाया है, वह अपने आप में हास्यास्पद इसलिये है, कि सारी दुनिया में उसके द्वारा ही मानवाधिकारों का उल्लंघन सबसे ज्यादा किया जाता रहा है। अमेरिकी साम्राज्य ने इराक, अफगानिस्तान और लीबिया में जो किया, उससे पहले जापान और वियतनाम तथा अफ्रीकी देशों में जो किया गया, या अभी जो सीरिया में किया जा रहा है, उसकी जानकारी सारी दुनिया को है, इन मुददों पर बहंस होती रही है। लाखों लोग दुनिया भर में अमेरिकी नीतियों की वजह से मारे जाते हैं। करोड़ों-करोड़ लोगों का जीवन हमेशा असुरक्षित रहता है, आज भी है। आज दुनिया जिन खतरों के बीच से गुजर रही है, उनमें से नब्बे प्रतिशत खतरों को अमेरिकी साम्राज्य ने पैदा किया है, वह दुनिया के लिये सबसे बड़ा खतरा बन चुका है।

उसने अमानवीय होने की सभी सीमाओं को पार कर लिया है। वह उन आतंकियों के साथ मिल कर अपने होने की लड़ार्इ लड़ रहा है, जिन आतंकियों ने हत्या और जनसंहार को अपना हथियार बनाया है। उसने ही अपने देश में ‘डिफेंस अथरार्इजेशन एक्ट 2012’ जैसे कानूनों को लाद रखा है और आज आम अमेरिकी के पास उसका अपना कोर्इ निजी जीवन नहीं है। अमेरिका एक विशाल यातना केंद्र में बदल गया है। वहां अपनी बात कहना, सरकार के नीतियों की आलोचना करना है, ऐसा अपराध है, जिसके अंतर्गत उन्हें घरेलू आतंकवादी घोषित किया जा सकता है। इसलिये न सिर्फ दुनिया में, बलिक अमेरिकी सरकार अपने देश में भी मानवाधिकार का उल्लंघन करने वाला सबसे बड़ा देश है।

राष्ट्रसंघ के ‘हयूमन रार्इटस काउंसिल’ के कर्इ रिपोर्ट ऐसे हैं, जिनमें अमेरिका को मानवाधिकार के उल्लंघन का गंभीर दोषी करार दिया गया है, उस पर कर्इ देशों में ड्रोन हमले करने, आम लोगों की हत्या करने का भी आरोप लगाया गया है। उसके अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा ग्वाटेनामो बे और अबू गरेब जेलों में भी मानवाधिकार के उल्लंघन का आरोप है।

एशिया प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य सक्रियता, चीनी सागर और कोरिया द्वीप समूहों पर अपने वर्चस्व बनाये रखने की छटपटाहट और मध्यपूर्व की जैसी स्थिति है, उसको देखते हुए चीन की प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण है। एशिया में रूस और चीन के जरिये जिस नये धु्रव की रचना हो रही है, उसमें भारत की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसलिये रूस, चीन और भारत के बीच अच्छे सम्बंधों की अनिवार्यता आज की जरूरत है। हम एशिया में निर्णायक संघर्ष की ओर बढ़ रहे हैं। अमेरिका एवं पश्चिमी देशों की योजना उसे अपने नियंत्रण में लेने की है।

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