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आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी साम्राज्य

americaअमेरिकी सरकार के राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय रूप से, इस बात की सहुलियतें हासिल कर ली है, कि वह जिसे चाहे आतंकवादी घोषित कर सकती है। किसी भी संगठन, किसी भी राजनीतिक दल या किसी भी देश को आतंकवादी होने की सूची में डाल सकते हैं। बड़ी अच्छी मनमानी है। आप आतंकवादी हैं या नहीं? यह आपकी नीतियां या आपकी हरकतें नहीं, वाशिंगटन तय करता है। वैश्वीकरण की तरह ही आतंकवाद की अमेरिकी परिभाषा रोज बदलती है।

कल तक, र्इरान विरोधी आतंकवादी संगठन -”मुजाहिदीन-ए-खलक आर्गनार्इजेशन”- एक आतंकवादी संगठन था। अमेरिका के स्टेट डिपार्टमेण्ट ने उसे आतंकवादी संगठन घोषित कर रखा था। मगर आज मुजाहिदीन-ए-खलक का कार्यालय व्हार्इट हाउस के एक ब्लाक में है। जिसका उदघाटन 11 अप्रैल 2013 को हुआ। जिसमें पूर्व नेशनल सिक्यूरिटी एडव्हाइजर और रिटायर जनरल जेम्स जान्स और पूर्व राष्ट्रपति जार्ज बुश के काल में आर्मस कण्ट्रोल अधिकारी जान बाल्टन ने भाग लिया। इस आतंकी संगठन को कुछ महीना पहले ही अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेण्ट ने अमेरिका के आतंकी संगठन की सूची से बाहर निकाला था।

मुजाहिदीन-ए-खलक संगठन ने र्इरान की सरकार और नागरिकों के खिलाफ कर्इ हिंसक घटनाओं को अंजाम दे चुकी है।

1979 में हुए र्इरान के ‘इस्लामी क्रांति’ के बाद से अब तक 17000 र्इरानी आतंकी गतिविधियों में मारे जा चुकी हैं, जिसमें 12000 लोगों को मौत मुजाहिदीन-ए-खलक संगठन के द्वारा अंजाम दिये गये आंतकी हमलों से हुर्इ है।

र्इरान के तेल भण्डार पर और उसकी अर्थव्यवस्था पर अधिकार जमाने की कोशिशें पिछले कर्इ दशकों से अमेरिकी सरकार करती रही है। जिसमें अब तक उसे सफलता नहीं मिल सकी है। र्इरान के परमाणु कार्यक्रमों पर खड़ा किया गया विवाद भी इसी का हिस्सा है। उस पर लगाये गये आर्थिक प्रतिबंध, नौसैनिक बेड़ों से की गये नाकेबंदी और र्इरान के खिलाफ चलाये जा रहे राजनीतिक अभियानों का मकसद भी यही है। र्इरान हमेशा से यह ओराप लगाता रहा है कि उसके देश में जारी आतंकवादी हमलों में अमेरिकी सरकार और उसकी खुफिया एजेन्सी सीआर्इए का हाथ है। उसने हमेशा ये प्रमाणित किया है कि र्इरान का परमाणु कार्यक्रम, देश के शांतिपूर्ण विकास का हिस्सा है, मगर अमेरिकी सरकार और पश्चिमी देश उसके इस दावे को खारिज कर, उसे विश्वशांति के लिये खतरा प्रमाणित करते रहे हैं। जबकि आधुनिक र्इरान ने आज तक किसी भी देश पर कभी भी हमला नहीं किया है। वास्तव में वह सहअसितत्व और शांतिपूर्ण विकास का पक्षधर रहा है।

र्इरान-पाकिस्तान गैस पार्इप लार्इन योजना की शुरूआत ने नयी स्थितियां पैदा कर दी है। अमेरिकी सरकार पाकिस्तान पर दबाव बनाने की नाकाम कोशिशें कर चुकी है। चीन ने पाकिस्तान के सामने इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिये आर्थिक सहयोग देने का प्रस्ताव भी रखा है, जिसका मतलब यह भी है कि वह र्इरान-पाक गैस पार्इप लार्इन को अपना समर्थन दे रहा है। दोनों देशों के बीच की इस योजना पर अमेरिकी हस्तक्षेप के खिलाफ वह इनका साथ देगा।

आज र्इरान के पक्ष में यह बात कही जा सकती है, कि अमेरिकी सरकार पर लगाये गये उसके आरोपों का ठोस प्रमाण है कि मुजाहिदीन-ए-खलक संगठन द्वारा र्इरान में किय गये आतंकी गतिविधियों के पीछे अमेरिकी सरकार का हाथ है। यदि ऐसा नहीं होता तो मूजाहिदीन का वैधानिक कार्यालय व्हार्इट हाउस के इतने करीब अमेरिका में नहीं होता। अमेरिकी सरकार यदि मुजाहिदीन-ए-खलक को सहयोग दे रही है, तो तय है कि आने वाले दिनों में वह इसका उपयोग अरब जगत, मध्यपूर्व एशिया और विशेष रूप से र्इरान और सीरिया में आतंकी गतिविधियों को बढ़ाने की योजना पर काम कर रही है। उसकी योजना खलक के जरिये राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर विद्रोह की स्थितियां बनाने की भी हो सकती है। वह इराक की सफलता को र्इरान में और लीबिया में की गयी कार्यवाहियों को सीरिया में लागू करना चाहता है। जहां विद्रोही और आतंकियों का गठजोड़ कायम हो चुका है। पश्चिमी देश और अमेरिका जिन्हें आर्थिक, कूटनीतिक एवं हथियारों से सहयोग दे रहे हैं। दोहा में सीरियायी विपक्ष और विद्रोही-आतंकियों की सीरिया की प्रवासी सरकार भी बनायी जा चुकी है, जिसे अमेरिका और यूरोपीय संघ ने मान्यता भी दे रखी है।

इसके बाद भी स्थितियां पूरी तरह अमेरिकी साम्राज्य और नाटो संगठन के देशों के पक्ष में नहीं है। रूस की सैन्य उपस्थिति काला सागर में है और वह पूर्व सोवियत संघ के विदेश नीतियों की ओर बढ़ रहा है। रूस के विदेशमंत्री लोवारोव ने स्पष्ट कर दिया है कि ”वह लीबिया के अनुभव को सीरिया में लागू नहीं होने देगा।”

र्इरान ने भी इस बात की घोषणा कर दी है, कि सीरिया में पश्चिमी ताकतों के सैन्य हस्तक्षेप के विरूद्ध र्इरान की सेना सीरिया की सेना के साथ होगी। उसने इस बात की भी घोषणां कर दी है कि यदि र्इरान के तेल निर्यात को बाधित किया जायेगा, तो वह हरमूज जलडमरूमध्य के समुद्री मार्ग को निश्चित तौर पर रोक देगा, जहां से पश्चिमी देशों एवं अमेरिका का तेल आयात होता है।

इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया की घटनाओं ने खुले तौर पर यह प्रमाणित कर दिया है, कि अलकायदा जैसे आतंकी गुटों से भी अमेरिकी सरकार के नजदीकी सम्बंध हैं। अलकायदा प्रमुख अलजवाहिरी का छोटा भार्इ सीरियायी सेना की हिरासत में है, जो आतंकी और सीरियायी विद्रोहियों की मीटिंग ले रहा था।

सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल-असद ने तुर्की टीवी चैनल से प्रसारित साक्षात्कार में सीरिया के विभाजन की आशंका जताते हुए चेतावनी दिया है कि ऐसा होने पर क्षेत्रीय संतुलन खतरे में पड़ जायेगा और आतंकी अन्य देशों में भी अपनी पैठ बनाने में लग जायेंगे। जोकि, अमेरिका और पश्चिमी देश चाहते हैं। उनका मकसद बशर-अल-असद को सत्ता से बेदखल करना और ऐसा ना होने पर सीरिया को विभाजित करना है। जहां अलकायदा अमेरिकी सहयोगी है।

खुले तौर पर अमेरिकी सरकार इस्लामी आतंकवादियों को आर्थिक सहयोग दे रही है, और हथियारों की आपूर्ति भी कर रही है। कतर में उसने अफगान, तालिबानियों का कार्यालय गये साल खुलवाने में मदद किया। वह तालिबानियों को अच्छा और बुरा तालिबानी के रूप में विभाजित कर, उन्हें वैधानिक रूप दे रही है। जो अमेरिकी समर्थक हैं, वो अच्छे तालिबानी हैं, उनपर ड्रोन हमले हो रहे हैं। तीसरी दुनिया के एशिया और अफ्रीका में इस्लामी आतंकवादी अमेरिकी हितो के लिये काम कर रहे हैं।

ऐसी स्थिति में यह सोचना और मानना आसान नहीं है कि बोस्टन मैराथन में जो धमाके हुए हैं वो आतंकी हमले हैं। अमेरिका ऐसी कार्यवाहियों को खुद भी अंजाम देता रहा है।

वाशिंगटन में ‘मुजाहिदीन-ए-खलक संगठन’ का कार्यालय खोलने का विरोध उसके द्वारा आतंकी हमलों में मारे गये लोगों के परिवार वालों ने किया, उन्होंने इसे अंतर्राष्ट्रीय कानून की अवहेलना करार दिया। तेहरान सिथत ”एसोसियेशन फार डिफेणिडंग विकिटम आफ टैरेरिज्म” ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को लिखा है कि ”मुजाहिदीन-ए-खलक वास्तव में एक आतंकवादी संगठन है।” उसने आगे लिखा है कि ”मुजाहिदीन-ए-खलक की सोच लोकतंत्र को नकारते हुए तानाशाही को समर्थन देना है। संगठन का गठन भी इसी तरह किया गया है।”

दुनिया में -खास कर तीसरी दुनिया में- हो रहे ज्यादातर आतंकी हमलों और विद्रोही गतिविधियों में अमेरिकी सरकार, सेना, और उसकी गुप्तचर इकार्इ सीआर्इए की भूमिका महत्वपूर्ण है। इराक, अफगानिस्तान, लीबिया, सीरिया, सूडान, माली, अल्जीरिया, अनगिनत ऐसे देश हैं जिनकी राजनीतिक अस्थिरता के लिये खुले तौर पर अमेरिकी सरकार और पश्चिमी देश जिम्मेदार हैं। जिनके लिये आतंकवादी संगठन काम कर रहे हैं। जिस तरह उपनिवेशों की स्थापना करने के लिये मिशनरियां औपनिवेशिक ताकतों के आगे-आगे चल रही थीं, आज अमेरिकी एवं नाटो सैन्य हस्तक्षेप की अनिवार्यता पैदा करने के लिये आतंकी संगठन उनका नेतृत्व कर रहे हैं। ऐसे अनगिनत विडियो फुटेज, दस्तावेज और प्रमाण हैं जो आतंकी संगठनों से साम्राज्यवादी ताकतों के सम्बंधों को उजागर करती है।

अब इन साम्राज्यवादी ताकतों की पहली वरियता इन आतंकी संगठनों को उस मुकाम पर लाना हो गया है, जहां उनकी सूरत वैधानिक रूप से विद्रोही और प्रवासी सरकार के नुमाइन्दे की नजर आये। जो काम उन्होंने टीएनसी विद्रोहियों को लीबिया की सरकार बना कर किया, वो ही काम अब वो सीरिया और तीसरी दुनिया के अन्य देशों में राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर, जनतंत्र की स्थापना के नाम पर करना चाहते हैं। ये पेशेवर विद्रोही वास्तव में ऐसे आतंकी हैं, जिनके पीठ पर अमेरिका और पश्चिमी देशों का हाथ हैं आतंकवाद के खिलाफ अमेरिकी युद्ध सही अर्थों में किसी भी देश के अंदरूनी मामलों मे हस्तक्षेप और सैन्य कार्यवाही में बदल गया है। इसलिये, इसी महीने हुए बोस्टन मैराथन बम धमाका, 911 की श्रेणी का आतंकी हमला है, जिसकी जिम्मेदारी किसी भी आतंकी संगठन ने नहीं ली। अमेरिका पर आतंकी हमला, अमेरिकी सरकार की सोची-समझी कार्यवाही है।

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