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यूरोप के 80 प्रतिशत लोग यूरोपीय संघ के खिलाफ हैं

europeअंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष यह मानता है कि ”यूरोजोन, दुनिया की वर्तमान अर्थव्यवस्था के लिये, सबसे बड़ा खतरा बन गया है।” जिसकी अर्थव्यवस्था इस साल 0.3 प्रतिशत और सिकुड़ सकती है।

16 अप्रैल को ‘वल्र्ड इकोनामिक आउटलुक’ को जारी करते हुए अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष ने अपने दो साल के आंकलन में कहा है कि ”यूरो जोन की अर्थव्यवस्था में आये, लम्बे समय से ठहराव का प्रभाव मध्य यूरोप, पूर्वी यूरोप और अन्य देशों की अर्थव्यवस्था के विस्तार पर भी पड़ने लगा है।” उसने स्वीकार किया है कि यूरोजाने की वजह से, यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था और कमजोर पड़ सकती है। उसके इकोनामिक काउन्सलर ओलिवर बलानचार्ड ने कहा है कि ”यूरोपीय देशों के सामने कर्इ बड़ी चुनौतियां हैं।”

उन्होंने यूरोपीय देशों से कहा- ”जो आपके पास है वह है, कमजोर बैंक, कमजोर सरकारें, और कमजोर विकास दर, और यह खतरा कि स्थितियां बद से बदतर होती जा रही हैं।” उन्होंने निजीकरण की मांग को मजबूत करने के लिये वह सब करने को कहा जिससे बैंकिंग सिस्टम और फिस्कल एकीकरण को इस तरह व्यवसिथत किया जा सके कि वह विकास को खत्म न करे।

आज यूरोजोन, यूरोपीय संघ और यूरोपीय देशों के मित्र देशों की ऐसी हालत कैसे बन गयी? किन कारणों ने उसे उनकी अपनी ही वैश्विक वित्तीय संरचना के लिये, सबसे बड़ा खतरा बना दिया? उनका वास्तविक उल्लेख या आंकलन नहीं किया गया है। जिस मजबूती की अपेक्षा ओलिवर रखते हैं, वह मजबूती कैसे आयेगी? शायद उन्हें ठीक से नहीं मालूम है, और मालूम है, तो वह अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष की नीतियों से मेल नहीं खाती है, जिसने विश्व बैंक, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और निजी वित्तीय इकार्इयों के साथ मिल कर ऐसी स्थितियां पैदा कर दी है, कि सरकारें कमजोर पड़ गयीं और आम यूरोपीय लोगों का विश्वास यूरोपीय संघ और मौजूदा व्यवस्था से ही उठ गया है। जिसे जानने या बनाये रखने की कोशिश आज तक नहीं की गयी।

सरकार को जनविरोधी और आम जनता को सरकार विरोधी बना कर किसी भी अर्थव्यवस्था को बचाया नहीं जा सकता। इस बात को अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां आज तक समझ नहीं सकी हैं। यही कारण है कि यूरोपीय संघ ने आम लोगों का विश्वास खो दिया है। 24 अप्रैल को ‘गार्जियन’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार- स्पेन, बि्रटेन, जर्मनी, फ्रांस, इटली और पोलैण्ड के ज्यादातर लोगों का विश्वास यूरोपीय संघ से उठ गया है।

यूरोबैरोमीटर द्वारा 6 देशों में कराये गये सर्वेक्षण के अनुसार 42 प्रतिशत पोलिस, 53 प्रतिशत इटैलियन, 56 प्रतिशत फ्रेंच, 59 प्रतिशत जर्मन, 69 प्रतिशत बि्रटिशर्स और 72 प्रतिशत स्पेनिश लोगों को यूरोपीय संघ पर विश्वास नहीं है, उसने अपना भरोसा खो दिया है। पूरे यूरोप में मात्र 20 प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं जो यूरोपीय संघ पर अब भी विश्वास रखते हैं। यूरोप संशयवाद का शिकार हो गया है। आर्थिक असमानता, सामाजिक सुरक्षा और सोच के स्तर पर टूटी हुर्इ मान्यताओं ने लोगों के पांव के नीचे से अपनी श्रेष्ठता के बोध को छीन लिया है। सामाजिक अनास्था और आत्महत्या की प्रवृतियों में इजाफा हुआ है। लोगों में भारी गुस्सा है, उनकी रातें, सड़कों पर गुजरती हैं। आर्थिक परिस्थितियों ने राजनीतिक एवं सामजिक असंतोष को जन्म दिया है।

लोगों की समझ में नहीं आ रहा है कि वो वित्तीय समस्या, मुद्रा की स्थिति और कर्ज के संकट से कैसे उबरें? बजट में भयानक कटौतियां, सार्वजनिक एवं सामाजिक खर्चों में की जा रही सरकारी कटौतियां और यूरोप के अमीर देशों के द्वारा संकटग्रस्त गरीब देशों को दिया गया बेल आउट -कर्ज- और उनकी शर्तें उन पर भारी पड़ रही हैं। उनका विश्वास टूट गया है।

‘यूरोपीयन काउंसिल आन फोरेन रिलेशन’- मेडि्रड आफिस के प्रमुख जोस इग्नासिया तोरेब्लांका ने कहा है कि ”यह क्षति इतना गहरा है कि इस बात का कोर्इ महत्व नहीं है कि आप कर्ज देने वाले देश हैं, या कर्ज लेने वाले देश हैं? आप यूरोपीय संघ के सदस्य देश हैं या यूनार्इटेड किंगडम? इसका घातक प्रभाव सभी पर पड़ रहा है।” विशेषज्ञों का मानना है कि ”यूरोपीस संघ के लोगों के विश्वास का उठना, यूरोपीय संघ के राजनेताओं के लिये एक बुरा सपना है।” और यह सपना सच होता जा रहा है।

अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय इकार्इयां, यूरोपीय कमीशन, यूरोपीय देशों की सरकारें और राजनेताओं- राजनीतिक दलों ने अपने सामने वित्तीय संकट का बैनर लगा रखा है। उन्होंने अपनी सोच पर आर्थिक समस्या- कर्ज लेने और कर्ज देने से लेकर कर्ज के संकट से उबरने के लिये कटौतियों का पर्चा सटा लिया है। उनके लिये यूरोप की आम जनता एक ऐसे करोबार की तरह है, जिसकी सामाजिक एवं निजी सुविधाओं और जरूरतों में कमी करके, गिरती-भहराती, व्यवस्था को बचाया जा सकता है। परिणाम यह हो रहा है, कि जिस व्यवस्था को वो बचाने की लड़ार्इ लड़ रहे हैं, आम जनता अपनी समस्याओं की वजह से, उसी के खिलाफ हो गयी है। स्थितियां बदतर इसलिये भी हैं, कि वित्तीय पूंजी और निजीकरण, वैश्वीकरण और बाजारवाद के जिन नीतियों ने उन्हें संकटग्रस्त किया है, उन्हीं नीतियों से वो अपनी सममस्या का समाधान चाहते हैं।

अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष मानता है कि ‘एक तात्कालिक रिपोर्ट के अनुसार यूरोजोन में बेरोजगारी दर 12.1 प्रतिशत हो गयी है।’ मगर इस बेरोजगारी की समस्या से उबरने के लिये उसकी सोच की दिशा और नीतियां नाकाम रही हैं।

‘इण्टरनेशनल लेबर आर्गनार्इजेशन’ ने 8 अप्रैल को घोषणा की कि- ”वर्ष 2008 से अब तक यूरोपीय संघ के 6 मिलियन लोगों ने अपनी नौकरियों को गंवाया है।” उसने जानकारियां दी कि ”साल 2012 में 27 देशों के यूरोपीय संघ में बेरोजगारी दर 57.6 तक पहुंच गया है, जो 2008 की तुलना में 1.6 प्रतिशत कम है।” आगे कहा गया है कि ”इसका मतलब साफ है कि यूरोपीय मंदी के प्रारमिभक दौर के पहले की स्थिति को पाने के लिये 5.9 मिलियन काम के अवसर कम हैं।

संगठन ने प्रमुखता से इस बात को रेखांकित किया है कि रोजगार के स्तर में गिरावट वर्ष 2012 में तब से आर्इ है, जब से निजी कम्पनियों ने पार्ट-टार्इम और अस्थायी समझौतों पर जोर देना शुरू किया।” अपने खर्च को घटाने और बदलती हुर्इ परिस्थितियों में अपने लाभ को बचाने के लिये, स्थायी नौकरियों में कमी की गयी। जिसने बेरोजगारी के साथ आर्थिक अनिश्चयता को बढ़ाने का काम किया। सरकारें इन स्थितियों को संभालने के लिये न तो सार्वजनिक क्षेत्रों का बढ़ाने और काम के नये अवसर बनाने के लिये कोर्इ काम की, ना ही निजी कम्पनियों को अपने नियंत्रण में लेने की कोशिशें की। बल्कि, उन्होंने आम जनता के सामाजिक सुविधाओं में कटौती के साथ सार्वजनिक एवं सरकारी उपक्रमों के निजीकरण का रास्ता चुना। सरकारी खर्च में कटौतियां की जाने लगींं। सामाजिक सम्पतित को बेचा जाने लगा और नये करों के वृद्धि के साथ रोज नये करों-कटौतियों की घोषणां की जाने लगी। जिस समय आम जनता को बेलआउट पैकेज की जरूरत थी, ठीक उसी समय सरकारें यूरोपीय संघ के बेल आउट पैकेजों पर निर्भर हो गयी। कर्ज के संकट को नये सिरे से बढ़ाने का काम किया गया।

यूरोपीय संघ की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी और फ्रांस ने बेल आउट पैकेज के नाम से संकटग्रस्त यूरोपीय संघ के देशों की अर्थव्यवस्था पर अंतर्राष्ट्रीय मुदाकोष, विश्व बैंक एवं यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक के साथ मिल कर कब्जा जमाना शुरू कर दिया। आज यूरोपीय संघ के बिखरने और आम जनता के विश्वासों में आयी कमी की सबसे बड़ी वजह यही है, क्योंकि ग्रीस, स्पेन, पुर्तगाल, आयरलैण्ड, निदरलैण्ड, इटली या अन्य किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को बेलआउट पैकेज से संभाला नहीं जा सका, बल्कि स्थितियां पहले से ज्यादा बुरी होती चली गयीं। यूरोप में राजनीतिक अनास्था अपने चरम पर है। आम जनता यूरोपीय संघ और अपने देश की राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय नीतियों के भी खिलाफ है, जहां आतंकवाद और युद्ध को प्रमुखता मिल गयी है। वो यह मानती है कि सरकारें अपने देश की समस्याओं को सुलझाने के बजाये अस्थिरता के लिये युद्ध की आशंकाओं को बढ़ा रही है, जिसका व्यापक प्रभाव पड़ रहा है।

पैन -यूरोपियन फोर्स- यूरो पोल ने, 25 अप्रैल को जारी अपने वार्षिक रिपोर्ट में कहा है कि ”2012 में सीरिया विदेशी लड़ाकों का ठिकाना बन गय था।” …..”वो विदेशी जो यूरोप के हैं, जब वो सीरिया से वापस आयेंगे -जिन्हें वहां आतंकी गतिविधियों को संचालित करने, उसमें भाग लेने की ट्रेनिंग और शिक्षा दी जाती है” तब वो क्या करेंगे? जहां सरकार के खिलाफ आम जनता सड़कों पर लड़ रही है, और सरकारी दमन का शिकार हो रही है। जिन्हें सुनना पड़ता है कि उनकी सरकार आतंकवाद के खिलाफ है, आतंकवाद के खिलाफ लड़ार्इयां लड़ रही है।

यूरोप ने अपने लिये खुद उन विसंगतियों को पैदा किया है, जिसका जवाब उनके पास नहीं है। 24 अप्रैल को यूरोपीय संघ के ”एण्टी टेरेरिस्ट चीफ” गिलिस डी कैकोफ ने बि्रटिश मीडिया से कहा कि ”लगभग 500 यूरोपियन सीरिया में राष्ट्रपति बशर-अल-असद की सरकार के खिलाफ लड़ रहे हैं। यूरोपीय संघ के देशों में बि्रटेन, आयरलैण्ड और फ्रांस के सबसे ज्यादा लड़ाके सीरिया में हैं।” और ऐसे ठिकानों की कमी तीसरी दुनिया में नहीं है। अमेरिका और यूरोपीय देशों ने मिलकर ऐसे कर्इ ठिकानों को बना लिया है। जहां वो विद्रोह के नाम पर आतंकवादियों के साथ मिल कर आतंकी गतिविधियों को संचालित कर रहे हैं। वो इसका आर्थिक एवं सामरिक आंकलन तो करते हैं, मगर इस बात का आंकलन नहीं करते कि उनके देश एंव संघ की आम जनता पर इन घटनाओं एवं गतिविधियों का क्या प्रभाव पड़ेगा? खासकर तब जब उनकी जनविरोधी एवं दमनकारी नीतियों के खिलाफ आम जनता सड़कों पर है। वह अपनी समस्याओं के समाधान और अपने अधिकारों की लडार्इ लड़ रही है। यूरोपीय संघ के खिलाफ यूरोप की आम जनता ही नहीं, विश्व जनमत भी हो गयी है। तीसरी दुनिया के किसी भी देश में आम जनता उनका स्वागत नहीं करती। जहां वो अपनी लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को बचाने के लिये लड़ार्इयां लड़ रहे हैं।

वो इस बात से परेशान है, कि तीसरी दुनिया के देशों की ओर उनके यहां से औधोगिक पलायन हो रहा है, जिसकी वजह से जनअसंतोष और बेरोजगारी बढ़ रही है, बल्कि, उनकी अर्थव्यस्था के संभलने की संभावनायें भी मरती जा रही हैं। मुनाफे के पीछे चलती वित्तीय पूंजी का बहाव तीसरी दुनिया की ओर बन गया है। वो तीसरी दुनिया के देशों पर, उसके प्राकृतिक संसाधन और राजनीतिक संरचना पर अधिपत्य चाहती है। वित्तीय पूंजी ने उन्हें जिस मुकाम पर पहुंचा दिया है, उसी वित्तीय पूंजी के लिये वो लड़ार्इयां लड़ रही है।

अपने वर्तमान इण्टरव्यू में यूरोपीय संघ की कमिश्नर मारिया डामानाकि ने कहा है कि ”पिछले डेढ़-दो सालों से यूरोपीय कमीशन की नीति रही है, कि पूरे यूरोपीय महाद्वीप में ”लेबर कास्ट” को घटाया जाये, ताकि यूरोपीयन कम्पनियों का पूर्वी यूरोप और एशिया से मिल रही प्रतिद्वनिदता में, हम टिक सकें।” जहां लेबर कास्ट कम है। जहां यूरोप से उधोगों के पलायन के बाद नये उधोग लगाये जा रहे हैं। यूरोप का सिकुड़ता बाजार और बाजार में कम दामों पर मिलते विदेशी सामानों के बीच आम यूरोपीयन की घटती क्रय क्षमता का जवाब उनके पास नहीं है। उस असंतोष का जवाब उनके पास नहीं है, जो काम के अवसर की कमी, कम वेतन और कम सुविधाओं और कटौतियों की वजह से है। सत्तारूढ़ वर्ग को सबसे बड़ा खतरा श्रमिक वर्ग के बढ़ते असंतोष से है। 22 अप्रैल को यूरोपीय कमीशन के प्रसिडेण्ट जोस बानरोस ने चेतावनी देते हुए कहा कि ”कटौती की नीतियां राजनीतिक एवं सामाजिक सीमा तक ही संभव है।”

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