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साइप्रस का संकट अब स्थायी हो गया है

europe (2)साइप्रस के कैबिनेट द्वारा अनुमोदित यूरोपीय संघ के बेल आउट शर्तो सहित समझौते को साइप्रस के पार्लियामेण्ट ने अपनी मंजूरी दे दी है। ऊपरी तौर पर देखने पर साइप्रस के वित्तीय संकट का अस्थायी समाधान निकल गया है, और उसके अर्थव्यवस्था के संकट को टाला जा चुका है, मगर वास्तव में यह साइप्रस के संकट का स्थायी होना है। जिन दबावों और परिस्थितियों के बीच यह समझौता हुआ है, उसने यह प्रमाणित कर दिया है कि यूरोपीय संघ की स्थिति अब वह नहीं है, जो पहले थी।

1 मार्च से लेकर 15 मार्च के बीच, 15 दिनों में 132 निजी कम्पनियों और निजी खातेदारों ने भारी मात्रा में जमा धनराशि को साइप्रस के बैंकों से निकालने का काम किया है। यह वही समय है जब यूरोपीय संघ ने अधिकारिक स्तर पर साइप्रस के बैंकों एवं वित्तीय इकार्इयों में जमा धनराशि पर टैक्स लगाने का निर्णय लिया था। जिसका सीधा और नकारात्मक प्रभाव साइप्रस की वित्त व्यवस्था पर पड़ा और उसके बैंकों की शाख गिर गयी।

साइप्रस के पास रूस और उसकी निजी कम्पनियों का कर्ज देने का प्रस्ताव था। जो यूरोपीय गुटों की शर्तों से इस मामले में बेहतर था, कि साइप्रस की अर्थव्यवस्था पर उसका नियंत्रण बना रहता। हां, खनिज तेल के खोज और उसकी रिफायनरी तथा तेल आयात-निर्यात का एक हिस्सा ही सरकार को मिल पाता। लेकिन साइप्रस सरकार ने यूरोपीय संघ की सदस्यता और यूरोपीय संध के घातों से बचने के लिये शर्तों को स्वीकृति दी।

24 अप्रैल को कैबिनेट ने ‘लोन एग्रीमेण्ट’ को पास कर दिया और उसे मतदान के लिये, पार्लियामेण्ट को प्रेषित कर दिया। साइप्रस की पार्लियामेण्ट ने सहायता समझौते पर मतदान कराने की घोषणा ने, यूरोपीय संध को चौंका दिया था, क्योंकि लगभग आधे सदस्य बेल आउट का विरोध कर रहे थे कि 17.5 बिलियन यूरो से 23 बिलियन यूरो तक का बेल आउट कास्ट साइप्रस के कंधों पर पड़ना तय है। 25 अप्रैल को निकोसिया ने ट्रोइका के साथ सहायता समझौते पर हस्ताक्षर किया था, जिसे पार्लियामेण्ट ने पास कर दिया। जिसके अनुसार साइप्रस के दो बड़े बैंको में 1 लाख यूरो से ज्यादा की जमा राशि पर टैक्स लगेगा।

साइप्रस के बेल आउट में से 10 बिलियन यूरो ट्रोइका (यूरोपीय संघ, यूरोपीय सेण्ट्रल बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष) देगा और साइप्रस अपने बैंक डिपाजिट का उपयोग करेगा, अतिरिक्त कर लगायेगा, और अपने सेण्ट्रल बैंक के स्वर्ण रिजर्व के बड़े हिस्से को बेचेगा। इसके अलावा, सरकारी क्षेत्र के औधोगिक एवं अन्य इकार्इयों का निजीकरण भी करेगा। जोकि ट्रोइका का मूल उददेश्य है, और जिसके माध्यम से वह किसी भी देश की अर्थव्यवस्था पर अपना वर्चस्व बढ़ाती है। इस समझौते के बाद से साइप्रस, ग्रीस, पुर्तगाल, निदरलैण्ड, आयरलैण्ड और स्पेन जैसे देशों के कतार में खड़ा हो गया है। जिसे यूरोपीय संघ की शर्तों के आधार पर अपनी अर्थव्यवस्था में आवश्यक सुधार करना होगा, साथ ही खर्च में कटौती के नाम पर सरकारी उपक्रमों के कर्मचारी एवं मजदूरों के वेतन, पेंशन में कटौतियां करनी पडे़गी, बल्कि सरकार के द्वारा चलाये जा रहे सामाजिक कार्यक्रमों में भी भारी कटौतियां करनी होगी। आम जनता पर नये करों को लगाने की विवशता होगी। साइप्रस की सरकार का वास्तविक दर्जा न सिर्फ घटता चला जायेगा, बल्कि ट्रोइका ही सत्ता के केंद्र में होगा। जिसके खिलाफ यूरोप की 80 प्रतिशत आबादी है।

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