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सीरिया में आतंकवादियों को सत्ता सौंपने की अमेरिकी-पश्चिमी देशों की नीति

asia (2)सीरिया की समस्या को नया मोड़ दिया जा चुका है। 22 अप्रैल को यूरोपीय संघ के लक्जमबर्ग बैठक में, सीरिया पर लगाये गये प्रतिबंधों में ढ़ील देने के नाम पर, यह निर्णय लिया गया है, कि ‘यूरोपीय संघ के सदस्य देश सीरियायी विद्रोहियों से, तेल की खरीदी कर सकते हैं।’ निर्णय में कहा गया है कि ”यह कदम सीरिया की विपक्ष को सहयोग और समर्थन देने के लिये उठाया गया है।” ताकि विद्रोही उन पैसों से सीरिया की बशर-अल-असद की वैधानिक सरकार के खिलाफ लड़ने के लिये हथियारों की खरीदी कर सकें।

सीरिया ने यूरोपीय संघ के इस निर्णय की कड़े शब्दों में निंदा की है। 23 अप्रैल को, राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद को लिखे गये अपने पत्र में सीरिया के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि ”यूरोपीय संघ का यह कदम कि वह सीरिया के तेल एवं उसके अन्य उत्पादों का आयात करेगा और सीरिया की तेल कम्पनियों में ‘सीरियन नेशनल कालिजन’ के जरिये निवेश और तेल की खरीदी करेगा, यह सीरिया के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप है। यह मामला किसी भी देश के आंतरिक मामले में हस्तक्षेप न करने के सिद्धांत के विरूद्ध उसका उल्लंघन है।”

पत्र में यूरोपीय संघ के इस निर्णय को ”अनोखा और अभूतपूर्व निर्णय” करार देते हुए कहा गया है कि ”यूरोपीय संघ सीरिया की अर्थव्यवस्था को अपने निशाने पर ले कर उसे तोड़ने के आर्थिक एवं राजनीतिक अभियान में शामिल है।

सीरिया के विदेश मंत्रालय ने खुले तौर पर यह लिखा है कि ”यूरोपीय संघ और ना ही किसी भी पक्ष को यह अधिकार है कि वह ऐसा कदम उठाये जिससे किसी भी देश के प्राकृतिक संसाधन पर राज्य की सम्प्रभुत्ता के अधिकारों का उल्लंघन हो, या वह प्रभावित हो।” पत्र में साफ तौर पर कहा गया है कि ”यूरोपीय देश इससे काफी आगे बढ़ कर इन प्राकृतिक संसाधनों पर निवेश करने की संभावनाओं को अपनी स्वीकृति दे चुके हैं, और यह सब उस एक ग्रूप के पक्ष में किया गया है जिसे वो विपक्ष कहते हैं, और जो उनकी मान्यता के आधार पर सीरिया की आम जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। हालांकि वास्तव में वो किसी और का नहीं बल्कि वो अपने संरक्षक और उनके हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो दूसरे देशों के हैं।”

सीरिया के विदेश मंत्रालय ने मांग की है कि ”वो इस गैर कानूनी निर्णय को कार्यरूप में बदलने से रोक लगाये, जो कि राष्ट्रसंघ चार्टर का खुला उल्लंघन है।” सीरिया ने अंत में कहा है कि ”हम अपने प्राकृतिक संसाधन पर अपनी सम्प्रभुत्ता को बनाये रखने के प्राकृतिक अधिकार को बरकरार रखने के लिये आवश्यक कदम उठायेंगे।” उसने इस अवैध लूट की योजना का विरोध किया है।

यूरोपीय संघ के इस निर्णय के पीछे अमेरिकी सरकार और नाटो संगठन तथा अरब जगत में उनके मित्र देश सउदी अरब, कतर, तुर्की और जार्डन का समर्थन है, जिन्होंने फरवरी-मार्च 2013 में दोहा सम्मेलन में सीरिया की प्रवासी सरकार का गठन किया और उसे मान्यता दी। जो वास्तव में विपक्ष, विद्रोही और आतंकी गठजोड़ को सीरिया की वैधानिक सरकार बनाने का व्यापक षडयंत्र है। जिनके बीच आपसी संघर्ष आज भी जारी है। ”सीरियन नेशनल कोलिजन” के नाम से संगठित इकार्इ को भले ही अमेरिका और यूरोपीय संघ मान्यता दे चुकी है, मगर उसकी वास्तविक पैठ सीरिया में भी नहीं है। और अब सीरिया भी अकेला नहीं है।

अहमद-मुआज-अल-खतीब के द्वारा ”सीरियन नेशनल कोलिजन” के पे्रसिडेण्ट पद से इसितफा देने के बाद, जार्जी साबरा प्रवासी सरकार के अंतरिम प्रेसिडेण्ट बनाये गये हैं। उनके तेवर हिजबुल्ला के प्रति आक्रामक हैं, जो लेबनान-सीरिया बार्डर से विद्रोही समर्थक आतंकवादियों के खिलाफ सक्रिय है। उन्होंने 20 अप्रैल को प्रेसिडेण्ट बनते ही कहा- ”कुसाइर और होम्स में हिजबुल्ला ने हमारे खिलाफ युद्ध की शुरूआत कर दी है, वह सीरिया-लेबनान सीमा पर हमसे लड़ रहा है।” माना यही जाता है कि हिजबुल्ला सीरिया में विदेशी हस्तक्षेप के खिलाफ है। वह विदेशी ताकतों और आतंकियों के घुसपैठ के खिलाफ है। जिसे पश्चिमी मीडिया आतंकवादी संगठन करार देते रहे हैं।

जार्जी साबरा का जवाब देते हुए हिजबुल्ला एक्जीक्यूटीव कांउसिल के शेख नबीस काक ने कहा है कि ”हम सीरिया-लेबनान सीमा पर अपने लेबनानी भार्इयों को सुरक्षित करने के लिये लड़ रहे हैं। जो कि हमारा नैतिक एवं राष्ट्रीय कर्तव्य है, जिन्हें सीरियायी विद्रोहियों से खतरा है।” यह भी माना जा रहा है कि लेबनान की सीमा से सीरिया में घुसने वाले विद्रोहियों एवं विदेशी लड़ाकों और आतंकवादियों के खिलाफ हिजबुल्ला खुली लड़ार्इ लड़ रहा है। वह बशर-अल-असद की सरकार को ही सीरिया की वैधानिक सरकार मानता है। इस क्षेत्र से सीरियायी विद्रोहियों के उखड़ते पांव की एक बड़ी वजह यह भी है।

राष्ट्रसंघ के महासचिव बान की मून ने कहा है कि ”सीरियायी विद्रोहियों को अरब देश हथियार देना बंद करें।” जिसे अरब लीग ने अस्वीकार कर दिया है।

तुर्की, सउदी अरब, कतर और जार्डन सीरियायी विद्रोही एवं आतंकवादियों को न सिर्फ हथियारों की आपूर्ति कर रहे हैं, बल्कि सीरिया से लगे सीमा से अमेरिका एवं पश्चिमी देशों के सैन्य अधिकारियों के द्वारा प्रशिक्षित विद्रोही एवं आतंकियों का भी सीरिया में घुसपैठ करा रहे हैं। कतर की सेना पहले भी लीबिया के टीएनसी विद्रोहियों के साथ लीबिया में कर्नल गददाफी के खिलाफ लड़ चुकी है।

तुर्की के टीवी स्टेशन अलयुजोल कनाल द्वारा 5 अप्रैल को प्रसारित कार्यक्रम में, अपने इण्टरव्यू में सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल-असद ने कहा कि ”तुर्की की सरकार अधिकारिक रूप से अपने यहां आतंकवादियों को पनाह दे रही है। उन्हें जार्डन की सीमा से सीरिया भेजा जा रहा है। मार्च 2011 में, जब से देश में हिंसा फैली है, तब से अंकरा (तुर्की) विद्रोहियों को आर्थिक सहायता दे कर, उन्हें प्रशिक्षित करके और उन्हें हथियार उपलब्ध करा कर सीरिया में हिंसा बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।”

बशर ने चेतावनी देते हुए कहा कि ”यदि सीरिया का बंटवारा होता है, या आतंकवादी ताकतें सीरिया को अपने नियंत्रण में ले लेती हैं, तो आस-पास के देशों में भी वो तेजी से फैल जायेंगे।”

राष्ट्रपति असद द्वारा अरब लीग के इस निर्णय की कड़ी निंदा की गयी, जिस आधार पर अमेरिका, यूरोपीय संघ समर्थित सीरिया के विपक्षी गठबंधन को अरब लीग में सीरिया की जगह देने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि ”इससे अरब लीग की वैधता कम होती है। वह एक लीग है जो अरब देशों का प्रतिनिधित्व करता है, ना कि अरब जगत की आम जनता का। उसे किसी देश को वैधता देने या उससे वापस लेने का अधिकार नहीं है।”

साम्राज्यवादी ताकतें -अमेरिका और पश्चिमी देश- पिछले दो सालों से सीरिया में, बशर-अल-असद के वैधानिक सरकार को सत्ता से बेदखल करने की लड़ार्इयां लड़ रही हैं। उन्होंने विपक्ष को एकजुट किया, विद्रोहियों को संगठित किया और विद्रोहियों के नाम पर आतंकवादियों का घुसपैठ तुर्की एवं जार्डन सीमा से कराया। उन्हें प्रशिक्षित करना और हथियारों से लैस करने का काम भी उन्होंने किया। जार्डन, सउदी अरब और कतर तथा तुर्की के जरिये आर्थिक सहयोग दिया गया। अब उनकी कोशिश इन्हीं विद्रोही-आतंकियों के संगठन को सीरिया की प्रवासी सरकार के रूप में वैधानिक दर्जा दिलाने का है। अमेरिका और पश्चिमी प्रचारतंत्र लगातार सीरिया के खिलाफ प्रचार अभियान चला रही हैं।

आतंकवादियों की सरकार बनाने और उन्हें सीरिया की वैधानिक सरकार के रूप में मान्यता देने की अमेरिकी, यूरोपीय संघ की नीतियां यदि सफल हो जाती हैं, तो इसका प्रभाव सीरिया, सीरिया के आस-पास के क्षेत्रों पर ही नहीं पड़ेगा, बल्कि तीसरी दुनिया के देशों पर अधिकार जमाने, उन्हें अस्थिर करने की उनकी कोशिशों को नया आधार मिल जायेगा, जो कि निश्चय ही घातक है।

8 अपै्रल को अल-कायदा से प्रेरित इराक के आतंकी संगठन -‘इस्लामिक स्टेट आफ इराक नेटवर्क’ और सीरिया के आतंकी संगठन ‘अल-नुसरा’ ने अपने वेबसार्इट पर जानकारी दी है, कि दोनों ही ग्रूप अब संयुक्त रूप से इस्लामिक आफ इराक एण्ड द लीवेन्ट’ के नाम से अपना अभियान चलायेंगे। 9 अप्रैल को बि्रटेन के विदेश सचिव विलियम हग ने सीरिया के पश्चिमी देशों से समर्थित विपक्षी गठबंधन के लीडरों को लंदन में आमंत्रित किया है। उन्होंने कहा कि ”सीरियन नेशनल कालिजन’ के वरिष्ठ सदस्य जी-8 के सम्मेलन से पहले होने वाले प्रमुख कूटनीतिज्ञों की बैठक में भाग लेंगे।” इसी दौरान अमेरिकी सेक्रेटरी आफ स्टेट जान कैरी ने कहा कि ”वो बि्रटिश राजधानी में सीरियान नेशनल कालिजन के नेताओं से मिलेंगे।” उन्होंने यह भी कहा कि- ”अमेरिकी सरकार सीरियायी विद्रोहियों को हर तरीके से सीरिया में मदद करने पर गौर कर रही है।”

जब से अल-कायदा के इराकी फ्रण्ट और अल-नुसरा फ्रण्ट अपने एकीकरण की घोषणां की है, सीरिया की विपक्ष उनसे अपनी दूरी बनाने की नीतियों पर चलने की कोशिश कर रही है। सीरियायी संकट के शुरूआती दौर से ही इराकी फ्रण्ट ने अल नुसरा को प्रशिक्षित करने से लेकर उन्हें हथियार और वित्तीय सहयोग दिलाने का काम किया है।

अमेरिकी सेक्रेटरी आफ स्टेट जान कैरी ने 20 अप्रैल को तुर्की के शहर इस्ताम्बुल में ‘फेण्डस आफ सीरियन ग्रूप’ में भाग लिया, और जी-8 के लंदन सम्मेलन में ‘सीरियन नेशनल कालिजन’ के प्रमुख सदस्यों से भी मिले, जिन्होंने वाशिंगटन से हथियारों की मांग की।

सीरिया के विदेश मंत्री ने राष्ट्रसंघ सुरक्षा परिषद से मांग की है, कि वह अल नुसरा फ्रण्ट को अल कायदा से जुड़े आतंकी संगठनों में ग्रूप में शामिल करें। सीरिया की स्टेट न्यूज एजेन्सी- साना ने रिपोर्ट दी है कि ”राष्ट्रसंघ महासचिव बान-की-मून और सुरक्षा परिषद को लिखे अपने पत्र में विदेशमंत्री ने कहा है कि ”दमिश्क यह उम्मीद करता है कि राष्ट्रसंघ अपने भू-मण्डलीय सुरक्षा के दायित्वों की अपेक्षा को पूरा करते हुए विदेशी समर्थित ग्रूपों को आतंकवादियों की श्रेणी में डालेगा।” सीरिया में विदेशी समर्थित आतंकवादियों ने औपचारिक रूप से अलकायदा प्रमुख अल-जवाहिरी के प्रति अपनी वफादारी निभाने की शपथ ली है। अल नुसरा के प्रमुख अबु-मोहम्मद अल जवाहिरी ने 10 अप्रैल को अपने आडियों संदेश में कहा है कि ”यह ग्रूप अल कायदा प्रमुख के प्रति वफादार है।”

अपने पत्र में सीरिया के विदेश मंत्री ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के, अल नुसरा फ्रण्ट और उसके सहयोगी संगठन फ्री सीरियन आर्मी के द्वारा किये जा रहे अपराधों के प्रति की जा रही अनदेखी के खतरे को भी रेखांकित किया है।

रूस ने अलकायदा द्वारा सीरिया और मध्य-पूर्व में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिशों के प्रति चिंता व्यक्त की गयी है। रूस के विदेशमंत्री सर्गेर्इ लोवारोव ने 11 अप्रैल को जारी अपने वक्तव्य में कहा है कि ”रूस इस बात से चिंतित है।”

इस बीच सीरिया के गोलान हार्इट क्षेत्र में इस्त्राइली हमले के बाद भी, सीरियन आर्मी ने इदलिब के दो महत्वपूर्ण मिलिट्री बेस को विद्रोहियों से मुक्त करा लिया है। वाडी डेफ और हामदिमाया मिलिट्री कैम्प को मुक्त कराने के दौरान 21 आतंकी मारे गये। दमिश्क -एलेप्पों हार्इवे को भी उन्होंने अपने नियंत्रण में ले लिया है। जर्मन खुफिया विभाग के अनुसार सीरिया में विद्रोही गतिविधियों को संचालित करने वाले 95 प्रतिशत आतंकी-विद्रोही गैर सीरियावासी हैं।

14 अप्रैल को सीरिया के प्रधानमंत्री कील अल हैलचि ने विपक्ष के सभी सीरियायियों से अपील की है कि ”वे राष्ट्रीय वार्ता में शामिल हों, ताकि राजनीतिक कार्यक्रमों पर आम सहमति बना कर समस्या का समाधान निकाला जा सके।” सीरिया के कर्इ विपक्षी गुटों ने अपने हथियार डाल दिये हैं। सीरिया की समस्या का एकमात्र समाधान शांतिवार्ताओं से ही निकाला जा सकता है। जिसने सीरिया की आम जनता के जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है।

रूस इस समस्या को समाधान मानवीय एवं कूटनीतिक स्तर पर चाहता है, ताकि सीरिया में शांति एवं स्थिरता कायम हो। दमिश्क में सिथत रूसी दूतावास ने जानकारी दी है कि रूस ने सीरिया में चल रहे संकट से प्रभावित लोगों के लिये 30 टन से भी ज्यादा, मानवीय सहायता सामग्री भेजा है। 14 अप्रैल को सीरियन एयर लार्इन्स का एक जहाज इन सामानों के साथ दमिश्क पहुंचा। इमिपरियल आर्थोडाक्स पैलेस्टाइन सोशाइटी ने 22 मार्च करने 10 अप्रैल तक जरूरतमंद सीरियावासियों के लिये 64,200 अमेरिकी डालर की राशि जमा की। पिछले सप्ताह भी रूस के मिनिस्ट्री आफ सिविल डिफेन्स ने लेबनान में रह रहे सीरियायी शरणार्थियों के लिये 26.7 टन मानवीय सहायता सामग्री भेजा था। रूस के विदेश मंत्रालय ने लेबनाने और जार्डन में रह रहे सीरियायियों के लिये सहायता सामग्री भेजने के लिये मालवाहक विमानों की तैनाती कर दी है। मास्को ने इण्टरनेशनल कमेटी आफ रेडक्रास को 1 मिलियन अमेरिकी डालर की सहायता की है, ताकि वो सीरिया में काम कर रहे संगठनों को फण्ड दे सके।

सीरिया की सरकार ने बि्रटेन और फ्रांस के द्वारा बशर-अल-असद की सरकार के खिलाफ लड़ रहे विद्रोही और अल कायदा को समर्थन देने की नीतियों की निंदा की। उपविदेश मंत्री फैसल-अल-मिकदाद ने कहा कि ”बि्रटेन और फ्रांस प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से अल कायदा को समर्थन देने में मशगूल हैं।” उन्होंने खुले शब्दों में कहा कि ”वो सीरिया में हथियारबद्ध गुटों को राजनीति एवं फौजी समर्थन दे रहे हैं।”

सीरिया ने अधिकारिक रूप से तुर्की, जार्डन, सउदी अरब और कतर की भी आलोचना की कि वो पश्चिमी हितों को पुख्ता करने में लगे हैं। उन्होंने अपील की कि हम उम्मीद करते हैं कि ”वो सीरिया की अस्थिरता में अपनी सम्बद्धता अब और नहीं बढ़ायेंगे।” उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि ”इस क्षेत्र की अस्थिरता और लोगों को मारने के षडयंत्र की शुरूआत पश्चिम से होती हे, जिसे पूरा करने में कर्इ मूर्ख अरब लगे हैं।” साम्राज्यवादी ताकतें सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप की तैयारियां कर चुके हैं। मगर रूस का काला सागर में होना और राष्ट्रसंघ में चीन और रूस का एकसाथ होना, उनके लिये परेशानी है।

रूस ने सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप पर चेतावनी देते हुए कहा है कि ”इस तरह की गतिविधियों से अल कायदा जैसे संगठनों का विस्तार तेजी से होगा।” 17 अप्रैल को तुर्की के शहर इस्ताम्बुल में एक प्रेस कांफ्रेन्स में लोवारोव ने कहा कि ”हमारी कोशिश सैन्य हस्तक्षेप जैसी स्थितियों को आने से रोकना है। हम सीरिया की समस्या के समाधान के लिये एक वार्ता मंच की स्थापना करना चाहते हैं।” उन्होंने तथाकथित फेण्डस आफ सीरियन ग्रूप की निंदा करते हुए कहा कि ”इस से जिनेवा में लिये गये निर्णयों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।” पिछले साल हस्तक्षार किये गये जिनेवा समझौते के आधार पर समस्या के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया गया है।

सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल-असद ने कहा है कि ”सीरिया सरकार के मुकाबले अल कायदा को खड़ा करने की भारी कीमत पश्चिमी ताकतों को चुकानी पड़ेगी।” उन्होंने सीरिया के इखबैरिमाया टीवी को दिये ये इंटरव्यू में 17 अप्रैल को कहा कि ”पश्चिमी ताकतों ने अल कायदा को शुरूआती दौर में भारी-भरकम आर्थिक सहयोग दिया था, आज वही काम पश्चिमी ताकतें सीरिया, लीबिया और अन्य देशों में कर रहे हैं। जिसकी कीमत मध्य यूरोप और अमेरिका को भी चुकानी होगी।” उन्होंने तुर्की और अरब देशों की भी निंदा की जो यूरोपीय देश और अमेरिका के इशारे पर सीरियायी आतंकवादियों की मदद कर रहे हैं। जिनका मकसद साम्प्रदायिक गृहयुद्ध की शुरूआत करना है।”

सीरिया को अफगानिस्तान और लीबिया बनाने की साम्राज्यवादी कोशिशें जारी हैं। बशर-अल-असद के सामने सीरिया को बचाने की गंभीर चुनौती है। यह चुनौती दुनिया की आम जनता के सामने भी है, जो लीबिया को बचाने में नाकाम रही है।

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