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इस्त्राइल और तुर्की के सम्बंधों को बढ़ाने की अमेरिकी पहल

इस्त्राइल मध्य-पूर्व और पश्चिमी एशिया में अपने हितों से जुड़ा हुआ अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ खड़ा है। वह फिलिस्तीनी बंदियों के साथ अमानवीय अत्याचार कर रहा है, गाजापटटी और सीरिया के गोलान हार्इट क्षेत्र पर हमले कर रहा है, वह सीरिया के खिलाफ तुर्की में अपने लड़ाकू जेट विमानों की तैनाती चाहता है, मगर सीरियायी विद्रोहियों को सीधे तौर पर हथियारों की आपूर्ति से बच कर रहना चाहता है। र्इरान से उसके सम्बंध उलझे हुए हैं, और वह उसके परमाणु संयत्रों पर सीधी कार्यवाही का पक्षधर हैं उसकी नीतियां तेलअबीब में कम वाशिंगटन में ज्यादा बनती हैं।

एक रिपोर्ट के अनुसार ”इस्त्राइल तुर्की के एकिंसी एयरबेस पर सीरिया के खिलाफ अपने लड़ाकू जेट विमानों की तैनाती चाहता है, जिसके एवज में वह तुर्की को उन्नत फौजी साज-ओ-सामान और टेक्नोलाजी मुहैयया करायेगा।” यह रिपोर्ट टार्इम्स आफ इस्त्राइल का हैं जिसमें नेशनल सिक्यूरिटी कांउसिल के हवाले से यह बात कही गयी है।

18 अप्रैल को राष्ट्रसंघ में सीरिया के राजदूत बशर जाफरी ने इस्त्राइली सरकार पर सीरियायी विद्रोहियों को उकसाने का आरोप लगाते हुए कहा कि ”इस्त्राइल का सीरिया में सक्रिय आतंकवादी गुटों से साझेदारी हैं, वह इन हथियारबद्ध गुटों को कब्जा किये गये गोलान हार्इट के सीमारेखा को पार करने देता है। इस्त्राइली अस्पतालों में उनका इलाज होता है, और उन्हें ठीक होने पर दोबारा सीमा पार करा कर, सीरिया भेजा जाता है।”

सीरिययी विद्रोहियों को हथियार देने के मामले का औपचारिक सवाल भर उलझा हुआ है, वास्तव में तुर्की, जार्डन, के जरिये इन्हें हथियारों की आपूर्ति की जा रही है, और सउदी अरब वहां विद्रोहियों को मासिक वेतन देता रहा है। वैसे इस्त्राइल ने सीरियायी विद्रोहियों को हथियार देने के मामले को खारिज कर दिया है।

18 अप्रैल को इस्त्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने एक टीवी साक्षात्कार में कहा कि ”इस मामले में हम सतर्क हैं… हमारे लिये, यह तय करना आसान नहीं है, कि कौन हमारा विरोधी है, और किसे हथियारों की आपूर्ति की जा सकती है? हमारे लिये यह बड़ा ही उलझा हुआ सवाल है।”

इस्त्राइली मामलों के अच्छे जानकार मोशे माओज का कहना है कि ”तेलअबीब के लिये इस बात का महत्व बनता है, कि विद्रोहियों को हथियारों की आपूर्ति वह तुर्की के सहयोग से करे।”

इस्त्राइल तुर्की के साथ अपने बिगड़े हुए सम्बंधों को सुधारने की कोशिश कर रहा है। अमेरिकी सेक्रेटरी आफ स्टेट जान कैरी ने तुर्की से कहा है कि ”वह बिना देरी किये इस्त्राइल के साथ तेल पर आधारित कूटनीतिक सम्बंधों को फिर से स्थापित करे।” उन्होंने अपने दूतावास में राजदूतों के अदला-बदली करने का भी निर्देश दिया है, ताकि सही अर्थों में कूटनीतिक सम्बंधों की स्थापना हो सके। जान कैरी ने तुर्की के विदेश मंत्री के साथ इस्ताम्बुल में आयोजित संयुक्त प्रेस कांफ्रेन्स में कहा कि ”वाशिंगटन चाहता है कि अंकरा-तेलअबीब के सम्बंध पूरी तरह सामान्य हो। वे दोनों ही इस क्षेत्र में अमेरिका के बड़े सहयोगी हैं।”

उन्होंने कहा- ”वाशिंगटन और अंकरा सीरिया में शांतिपूर्ण तेजी से सत्ता परिवर्तन के लिये मिल कर, लगातार काम करेंगे।”

वैसे अमेरिका और तुर्की सीरिया में ”शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन” के लिये मिल कर जैसे काम कर रहे हैं, उसने ”शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन” के सोच को ही बदल दिया है। विद्रोहियों को आर्थिक सहयोग के साथ प्रशिक्षण और हथियार बांटे जा रहे हैं। जार्डन में सीरिया की सीमा पर अमरिकी सेना खड़ी है। तुर्की में सीरिया की सीमा पर पेटि्रयाट मिसार्इलों की तैनाती हो गयी है। आतंकवादियों को सीमा पार कराया जाता है। हजारों आम लोग मारे जा चुके हैं। युद्ध का खतरा रोज बढ़ रहा है। विद्रोहियों की सरकार गठित हो गयी है। अमेरिका उनका मित्र देश है और यूरोपीय संघ उन्हें मान्यता दे चुका है। उन्हें कूटनीतिक रूप से सीरिया का तेल बेच कर हथियारों की खरीदी का रास्ता दिखाया जा रहा है। लाखों सीरियायी सीरिया से लेकर पड़ोसी देशों में शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। दो साल से गृहयुद्ध जारी है। यूरोपीय देश, अमेरिका और उसके अरब मित्र देश शांतिपूर्ण परिवर्तन में लगे हैं।

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के इस्त्रार्इल यात्रा के दौरान ही यह तय हो गया था कि तेलअबीब और अंकरा के रिश्तों में आवश्यक सुधार जरूरी है। यही कारण है कि 2010 में गाजा जा रहे समुद्री पोत पर इस्त्राइली हमले से मारे गये 9 तुर्की नागरिकों के लिये इस्त्राइल ने माफी मांगी ओर उनके परिवार वालों को मुआवजा देने की भी पेशकश की। तेलअबीब और अंकरा के बीच रिश्तों को सामान्य बनाने की औपचारिकता यूं तो पूरी हो गयी है, मगर तुर्की की आम जनता, इस्त्राइल और अमेरिका के विरूद्ध है, वह उन पश्चिमी ताकतों के खिलाफ है, जो सीरिया और पूरे क्षेत्र में अस्थिरता एवं युद्ध को बढ़ावा दे रहे हैं। जान कैरी को भी भारी विरोध प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। तुर्की के लोग अपनी सरकार के भी खिलाफ हैं। सरकार को भी भारी विरोध का सामना करना पड़ रहा है।

तेलअबीब और अंकरा की सरकारों के बीच भले ही मुददे तय हो गये हैं, और मुआवजे पर भी सहमति हो गयी है, मगर तुर्की में फिलिस्तीन समर्थकों की बड़ी जमात 2010 के इस्त्राइली हमले के खिलाफ मुकदमा जारी रखने के पक्ष में है। उनका कहना है कि ”तब तक हम न तो मुआवजे की बात करेंगे ना ही कोर्ट में चल रहे प्रकरण को बंद होने देंगे, जब तक गाजा पर से नाकेबंदी को हटा नहीं दिया जाता है।”

उनका तर्क है कि 31 मर्इ 2010 को इस्त्राइली सेना ने अंतर्राष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में हमला किया था। तुर्किस डेली के माध्यम से उनका कहना है कि ”इस्त्राइली माफी का मतलब है कि वह अपने अपराध को स्वीकार करता है।” अंकरा और तेलअबीब के रिश्तों को वो सिर्फ कूटनीतिक महत्व का मानते हंै, जिसका उनके लिये कोर्इ मतलब नहीं है।

दोनों देशों के बीच अब तक राजदूत स्तर के सम्बंधों की शुरूआत नहीं हो सकी है।

अरब जगत से इस्त्राइल और फिलिस्तीन के मुददे को मिटाया नहीं जा सकता। यह मामला भी सामने आया है कि फिलिस्तीन कैदियों की अदला-बदली और रिहार्इ से पहले, इस्त्राइली जेल में उन कैदियों के शरीर में खतरनाक वायरस इंजेक्ट कर दिया जाता है। 19 अप्रैल को ‘रसियन डेली’ कोमसोमोल्सकाया-प्रावदा के अनुसार- ”इस्त्राइली जेल से रिहा हुए फिलिस्तीनी रेनिया सागा ने बताया, कि इस्त्राइल की सरकार जेल से बाहर जाने वाले कैदियों के शरीर में खतरनाक वायरस डाल देती है। यही कारण है कि कर्इ रिहा हुए कैदी नामालूम बीमारी से मर जाते हैं।”

फिलिस्तीन कैदी यह मांग कर रहे हैं कि ”अंतर्राष्ट्रीय संगठन इसे रोकने के लिये तत्काल कदम उठाये।” एक मानवाधिकार संगठन ने इस्त्राइल पर फिलिस्तीनी कैदियों पर घातक दवाओं का टेस्ट -प्रयोग- करने का भी आरोप लगा चुकी है। इण्टरनेशनल सालिडर्टी फार हयूमन रार्इटस इन्टीटयूट ने कहा है कि यह नैतिक एवं चिकित्सा के सिद्धांतों का सीधे तौर पर उल्लंघन है।”

मानवाधिकार ग्रूप -वी तस्लीम के अनुसार- ”इस्त्राइली जेलों में अभी 4700 से भी ज्यादा फिलिस्तीनी कैदी हैं, इनमें से 170 एडमिनिस्ट्रेटिव कैदी है।” जिन्हें अमानवीय यातनायें दी जा रही हैं।

तुर्की से अपने सम्बंधों को सुधारने में इस्त्राइल की मूल दिलचस्पी अपनी सुरक्षा के लिये अरब जगत के बीच बनती विभाजन की रेखा को चौड़ा करना है, ताकि फिलिस्तीन का मुददा भी कमजोर पड़ जाये और पूरे क्षेत्र की राजनीतिक अस्थिरता का लाभ उठाया जा सके। अमेरिका सीरिया और र्इरान के विरूद्ध तुर्की और इस्त्राइल के सम्बंधों को बढ़ा रहा है।

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