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एशिया में युद्ध के खतरे को बढ़ाया जा चुका है

asiaतीसरी दुनिया को मुनाफे के नजरिये से देखने वालों ने, आतंकवादियों के साथ मिल कर एशिया में युद्ध के खतरे को बढ़ा दिया है। उन्होंने हथियारों के लिये इतनी जगह बना दी है, कि जनतंत्र के लिये जगह की कमी पड़ गयी है। सेना, विद्रोही और आतंकवादियों को किसी भी देश की समस्या को बढ़ाने और उसका समाधान बनाने का जरिया बना लिया गया है। अब इन्हें, गलत ही सही, मगर राजनीतिक दर्जा मिल गया है। स्थितियां ऐसी बना दी गयी हैं, कि जनतंत्र और जनतांत्रिक इकार्इयों और आम जनता की निर्णायक स्थितियों का अर्थ बदल गया है। एशिया और अफ्रीका में एक भी ऐसा देश नहीं है, जिसके बारे में कहा जा सके, कि ”वह पूरी तरह सुरक्षित है और उसके देश की आम जनता महफूज है।” सच तो यह है कि आम जनता के हाथों से, उसके देश की सरकारों ने और बाजारवादी ताकतों ने, सभी अधिकारों को छीन लिया है। जनतंत्र अब उनकी मुहताज है, जिन्हें उसने बनाया है। उस पर वित्तीय पूंजी का कब्जा हो गया है।

जनतंत्र पर उन ताकतों ने अपना अधिकार जमा लिया है, जो अपने देश में भी जनतंत्र की क्रमिक हत्या कर रही हैं, और तीसरी दुनिया के देशो पर अपना वित्तीय वर्चस्व बनाये रखने के लिये, वहां जनतंत्र और मानवाधिकार के नाम पर, राजनीतिक अस्थिरता पैदा कर रही हैं। उन्होंने अपने पीछे आतंकवाद की संगठित ताकत को खड़ा कर लिया है। एशिया और अफ्रीका में यह नजारा साफ-साफ नजर आ रहा है, कि अल कायदा जैसे आतंकी संगठन भी अब, अमेरिकी सरकार और पश्चिमी ताकतों के हितों के लिये काम कर रही हैं। लीबिया की सफलता ने उन्हें उत्साही कर दिया है, कि वो सीरिया में भी सफल हो सकते हैं। जिन्हें अमेरिकी सरकार, यूरोपीय संघ, अरबलीग और अरब जगत के जार्डन, तुर्की, कतर और सउदी अरब जैसे देश, राजनीतिक दर्जा दिलाने में लगे हैं।

अफगानिस्तान में अमेरिकी सरकार और पश्चिमी देशों ने पाकिस्तान के जरिये इस्लामी आतंकी संगठन अल कायदा और तालिबानियों को पैदा किया। जहां जनतंत्र आज भी खतरे में है और पाकिस्तान के बारे में यकीन के साथ नहीं कहा जा सकता है, कि वह अपनी मौजूदा पहचान बचा भी पायेगा या नहीं? इराक आतंकवादियों की चपेट में है और इराकी फ्रण्ट सीरिया में सक्रिय अल नुसरा से जुड़ चुका है, जिनकी प्रतिबद्धता अल कायदा के प्रमुख अल-जवाहिरी से है, जिसे अमेरिका और पश्चिमी देशों का संरक्षण हासिल है। र्इरान में सक्रिय आतंकी संगठन मुजाहिदीन-ए-खलक का कार्यालय वाशिंगटन के व्हार्इट हाउस ब्लाक में खोला जाता है। सीरिया के राष्ट्रपति बशर-अल-असद ने चेतावनी दी है, कि ”यदि सीरिया का बंटवारा हो जाता है, या आतंकी सीरिया की सत्ता -किसी तरह- संभाल लेते हैं तो अलकायदा जैसे आतंकी संगठन पूरे क्षेत्र में तेजी से फैल जायेंगे।” और यह मध्य-पूर्व, एशिया या तीसरी दुनिया के देशों के लिये ही नहीं, बल्कि, अमेरिका और पश्चिमी देशों की आम जनता के लिये भी बड़ा खतरा होगा।” वैसे भी अमेरिकी सरकार अपने देश के आम लोगों को दहशतगर्दों के नाम से मार रही है, आतंक फैला रही है, उसका लाभ उठा रही है। ऐसी राष्ट्रीय चेतना पैदा करना चाह रही है, जो फासिस्टों की होती है। यूरोप और अमेरिका की आम जनता बड़े ही बेचारी किस्म की स्थितियों की शिकार है, वह यूरोपीय और अमेरिकी मंदी की मार सहती है, बाजारवादी नीतियों का विरोध करती है, और अपनी श्रेष्ठता पर भी यकीन करती है। सदियों से शोषण और दमन पर पनपी उनकी संस्कृति यूं तो कंगाल ही रही है, मगर समृद्धि के जिस आवरण से ढंक कर उसकी श्रेष्ठता का प्रदर्शन किया जाता था, वह आवरण भी अब फटता जा रहा है। यह सोचना कि, ‘आतंकी वित्तीय पूंजी का हथियार है’ घातक है, जोकि है।

सारी दुनिया को मुनाफे के नजरिये से देखने वाली शक्तियों ने अपनी आर्थिक एवं राजनीतिक संरचना के पतन को उग्र राष्ट्रवाद, नस्ल-जातिय हिंसा, मजहबी जुनून और आतंकी संगठनों से बचाने की पहल की है। उन्होंने शीतयुद्ध से भी बुरी स्थितियों की रचना कर दी है।

बि्रटेन की राजधानी लंदन में सिथत ”इण्टर नेशनल सेण्टर फार द स्टडी आफ रेडिकलार्इजेशन’ द्वारा हाल ही में कराये गये एक अध्ययन के अनुसार पिछले दो सालों में -जब से सीरिया के संकट की शुरूआत हुर्इ है- 5,500 विदेशी लड़ाकों ने सीरिया की यात्रा की है।” जो विद्रोहियों के साथ देश की आज जनता की हत्यायें करते हैं, सीरियायी सेना पर हमले करते हैं, और ऐसे आतंकियों के साथ अभियान चलाते हैं, जो पश्चिमी हितों के लिये काम कर रहे हैं। इस अध्ययन से यह बात भी सामने आयी है कि 11 प्रतिशत ऐसे लड़ाके-विद्रोही यूरोप से हैं, जिनके पास बि्रटिश पासपोर्ट है। एक अध्ययन से यह बात भी सामने आयी है कि सीरिया में 90 प्रतिशत विद्रोही गैर सीरियायी हैं। जो मूलत: आतंकी हैं।

ऐसे ही आतंकियों के लिये ‘सीरियन फ्रेण्डस’ के सदस्य देश तुर्की के शहर इस्ताम्बुल में मिलते हैं, अमेरिकी विदेशमंत्री जान कैरी भी जिसमें भाग लेते हैं और ‘सीरियन नेशनल कालिजन’ को सीरिया की वैधानिक सरकार का दर्जा दिलाते हैं। यूरोपीय संघ ने यह निर्णय लिया है कि सीरियन नेशनल कालिजन, सीरिया के प्राकृतिक संसाधन खनिज एवं तेल का व्यापार कर सकती है और यूरोपीय संघ के सदस्य देश न सिर्फ उसके साथ व्यावसायिक लेन-देन कर सकते हैं, बल्कि वहां की तेल कम्पनियों में पूंजी निवेश भी कर सकते हैं। जिन पैसों से सीरियायी विपक्ष और विद्रोहियों तथा आतंकियों को हथियारों की खरीदी कर सकते हैं।

सीरिया ने राष्ट्रसंघ में पत्र लिख कर इस बारे में अपनी सख्त आपतित दर्ज करायी है। लेकिन अमेरिका की ओबामा सरकार, यूरोपीय संघ, अरबलीग और अपनी आम जनता की अनदेखी करने वाली अरब जगत की चंद सरकारों ने जैसी स्थितियां पैदा कर दी है, शांतिपूर्ण समझौते की राहें बंद होती जा रही हैं। उन्होंने सीरिया की समस्या को इस तरह उलझा दिया है कि कूटनीतिक पहल और राजनीतिक समाधान की राहें बंद सी हो गयी हैं, और हथियारों पर जोर बढ़ता जा रहा है।

चंद महीनों में ही उत्तरी कोरिया का मामला इस तरह उभर कर सामने आया कि परमाणु युद्ध की आशंकायें बन गयीं। इसे इस तरह प्रचारित किया गया, कि दक्षिण कोरिया और जापान उत्तरी कोरियायी आतंक से पीडि़त हैं और वो अपनी सम्प्रभुत्ता के लिये सुलह-समझौता चाहते हुए, अपनी सुरक्षा के लिये लड़ार्इ की तैयारी कर रहे हैं। जोकि वास्तव में चीन सागर और प्रशांत महासागर में अमेरिकी सैन्य क्षमता को बढ़ाने की कार्यवाही थी, ताकि चीन के बढ़ते सैन्य वर्चस्व को रोका जा सके।

चीन ने अपने वार्षिक सुरक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट में लिखा कि- ”कुछ देश एशिया-प्रशांत सैन्य समझौते को मजबूत कर रहे हैं, और अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ने के लिये, क्षेत्रीय स्थिति को तनावपूर्ण बना रहे हैं।” बीजिंग वाशिंगटन की इन कोशिशों का सख्त विरोधी रहा है। उसने जापान, दक्षिण कोरिया, फिलिपिंस और वियतनाम की भी आलोचना की है। उत्तरी एवं दक्षिणी कोरिया के मामले को जिस तरह ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया, और बिना सुलझे ही तनाव सहसा ही घट गया, उससे कर्इ आशंकायें जन्म लेती हैं। वाशिंगटन-बीजिंग के बीच समझौते से लेकर, किसी भी मुददे को लेकर ‘मीडिया वार’ शुरू करने की आशंकायें भी जन्म लेती है, जो सीरिया और र्इरान के खिलाफ आज भी जारी है। जिसे इराक और अफगानिस्तान तथा लीबिया के खिलाफ लड़ा गया।

भारत और चीन का सीमा विवाद और चीनी घुसपैठ का मुददा भी कुछ ऐसा ही लगता है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र एंव मध्य-पूर्व की स्थिति को देखते हुए दोनों देशों के बीच का संघर्ष बेमानी सा लगता है, खास कर तब जब बि्रक्स देशों के सम्मेलन में दोनों देशों के बीच राजकीय यात्रा की बात तय है, खास कर तब जब चीन यह मानता है कि दोनों देशों के विकास के लिये समान अवसर और पर्याप्त जगह है, खास कर तब, जब भारत और चीन के बीच अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों के 2014 में हटने के बाद आतंकवाद से निपटने के लिये पहली बार सकारात्मक सहमति बनी है। भारत और चीन के बीच सशस्त्र संघर्ष भारत से ज्यादा चीन के लिये आत्मघाती होगा। ऐसा होने पर एशिया में अमेरिका की स्थिति मजबूत होगी। वह भारत में भी अपनी सैन्य उपस्थिति बढ़ाना चाहेगा। इसमें कोर्इ दो राय नहीं है, कि भारत की वित्तीय एवं सामरिक क्षमता चीन से कमजोर है, मगर उसका राजनीतिक महत्व चीन से कम नहीं है। और चीन ही नहीं रूस भी यह कभी नहीं चाहेगा, कि दोनों देशों के विवाद से बि्रक्स देशों की मजबूती घटे और अमेरिका तथा पश्चिमी देशों की ताकत में इजाफा हो।

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने शायद पहली बार जर्मनी के यात्रा के दौरान खुले शब्दों में र्इरान से अपने व्यावसयिक सम्बंधों को जारी रखने की बात कही है। वो यूरोपीय संघ से व्यावसायिक रिश्तों को बढ़ाने के पक्षधर हैं, मगर र्इरान से अपने तेल आयात को किसी भी कीमत पर घटाने की मांग को उन्होंने खारिज कर दिया। भारत के विदेश सचिव रंजन मथार्इ ने कहा है कि ”कुछ नीतिगत एवं बैंकिंग समस्याओं की वजह से भले ही हाल मे दिनों में र्इरान से तेल की खरीदी में कमी आयी है।” जिसे हल कर लिया जायेगा। भारत के रिफार्इनरी एचपीसीएल, एमआरपीएल और एस्सार र्इरानी कच्चे तेल के प्रमुख खरीददार हैं।

र्इरान के परमाणु कार्यक्रमों को लेकर अमेरिका एवं पश्चिमी देशों के द्वारा रखे गये सवालों का औचित्य आज तक प्रमाणित नहीं हुआ है। ना ही सीरिया के बशर-अल-असद सरकार पर रखे गये सवालों का कोर्इ मतलब है। जिसे क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता के लिये खतरा करार देते, अब अमेरिकी विदेशमंत्री जान कैरी इसे तुर्की, इस्त्राइल और अमेरिका के लिये खतरा करार देने लगे हैं। उन्होंने 21 अप्रैल को कहा कि ”वर्तमान सीरिया का संकट और र्इरान का परमाणु कार्यक्रम वाशिंगटन, तेलअबीब और अंकरा की सुरक्षा के लिये प्रमुख खतरा है।” जबकि इस्त्राइल अपने लड़ाकू जेट तुर्की में तैनात करना चाहता है, और तुर्की पर अमेरिकी दबाव है कि वह इस्त्राइल को अनुमति दे। तुर्की आतंकवादियों की घुसपैठ बड़े पैमाने पर सीरिया में करा रहा है, और अमेरिका तथा पश्चिमी देश इन आतंकियों को सीरिया की वैधानिक सकरार का दर्जा दे रहे हैं। अमेरिका ने र्इरान को अलग-थलग करने की जिन नीतियों का सहारा लिया है, उसी का परिणाम है कि क्षेत्रीय संतुलन ही नहीं बिगड़ा है, बल्कि क्षेत्रीय धु्रविकरण की शुरूआत भी हो गयी है। यह ध्रुविकरण वैश्विक स्तर पर भी जारी है।

र्इरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने अफ्रीकी देशों की यात्रा के दौरान बानिन में कहा कि ”र्इरान और अफ्रीकी देशों का आपसी सहयोग विश्व शांति, सुरक्षा और मानवता के लिये है।” उन्होंने आपसी सम्बंधों को सदभावना और न्याय पर आधारित करते हुए कहा कि ”यह किसी भी देश या संगठन के विरूद्ध नहीं है।” जैसा कि साम्राज्यवादी ताकतें करती और मानती रही हैं। जिनके लिये आपसी सहयोग और सदभावना का मतलब आर्थिक लाभ के लिये सम्बंधों की पहल हैं उनके लिये सुरक्षा का मतलब दूसरे देश के लिये खतरा बनना है। और यह खतरा तब तक बना रहेगा, जब तक तीसरी दुनिया के देशों को मुनाफे के नजरिये से देखा जायेगा। और उन्हें आर्थिक रूप से अपने ऊपर निर्भर बनाये रखने के लिये, राजनीतिक अस्थिरता के लिये आतंकी संगठनों से साझेदारी की जायेगी। यह खतरा तब तक बना रहेगा, जब तक राज्य को वित्तीय पूंजी के नियंत्रण से बाहर नहीं लाया जायेगा। सरकार को आम जनता के पक्ष में खड़ा करना ही इस संघर्ष का सही समाधान है। जिसकी अनदेखी की जा रही है, और एशिया में युद्ध के खतरे को रोज बढ़ाया जा रहा है।

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