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अफ्रीका पर, सेना और हथियारों का बढ़ता बोझ

africaभूख, गरीबी और अभाव से घिरे अफ्रीका के छोटे देशों का विकास सामूहिक रूप से ही संभव है, मगर पश्चिमी देशों की घुसपैठ और अमेरिकी साम्राज्य की दखलंदाजी, अफ्रीकी महाद्वीप के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। ऐसा दशकों से नहीं, सदियों से हो रहा है। अफ्रीका को अमेरिकी सैनिकों और हंथियारों से भरने की कोशिशें हो रही हैं। 2013 में अमेरिकी सैन्य कार्यक्रमों की घोषणा जनवरी में ही की जा चुकी है, जिसके अंतर्गत 35 से ज्यादा अफ्रीकी देशों में सैन्य अभ्यास की जायेगी। जिसकी शुरूआत हो गयी है। पेण्टागन इन कार्यक्रमों को संचालित कर रहा है। ‘सेकेण्ड कमबैट बि्रगेड’ का यह अभियान 2013 के मार्च से होना तय था, किंतु इसकी सार्वजनिक जानकारी नहीं दी जायेगी।

पेण्टागन की रिपोर्ट के अनुसार लीबिया, सूडान, नाइजर, केन्या और यूगांडा से शुरू होने वाले इस कार्यक्रम का घोषित उददेश्य हथियारबद्ध गुटों, जिनका सम्बंध अल कायदा जैसे आतंकी गुटों से है, उनके खिलाफ अफ्रीकी देशों की सेना को प्रशिक्षित करना है, ताकि अफ्रीकी देशों में राजनीतिक स्थिरता कायम हो सके।

अमेरिकी सरकार और पश्चिमी देश अपने घोषित उददेश्यों के विरूद्ध काम करने की नीतियों का पालन बड़ी र्इमानदारी से करते आये हैं। यदि यह सवाल किया जाये, कि इन गुटों के पास अमेरिकी और पश्चिमी देशों के हथियार कहां से आये, और अल कायदा जैसे आतंकी संगठनों को जन्म किसने दिया और ये किनके र्इशारे पर काम कर रहे हैं? तो घोषित उददेश्यों की धज्जियां उड़ जायेंगी। विकीलिक्स का ‘कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस रिपोर्ट’ की याद आयेगी, जिसमें कहा गया है, कि ”अमेरिकी सेना का अफ्रीका में मूल उददेश्य यह सुनिश्चित करना है कि नाइजीरिया का तेल भण्डार सुरक्षित रहे।” उसी योजना अफ्रीकी महाद्वीप के खनिज भण्डारों का दोहन है। कोर्इ आतंकी है या नहीं? यह अमेरिकी हितों से निर्धारित होता है। यही कारण है, कि अफगानिस्तान का आतंकवादी लीबिया में विद्रोही बन जाता है, और लीबिया की टीएनसी सरकार तुर्की के रास्ते सीरिया में आतंकवादियों की घुसपैठ कराती है। माली में विद्रोहियों के बीच आतंकवादी घुस आते हैं, और आतंकवादियों के नाम से उन विद्रोहियों की हत्यायें की जाती हैं, जो आतंकवादियों के विरूद्ध, अपने को अलग कर चुके होते हैं। वास्तव में, साम्राज्यवादी ताकतों के हितों में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करना ही आतंकवादियों का मकसद है। और राजनीतिक अस्थिरता साम्राज्यवादी ताकतों की जरूरत है, क्योंकि ऐसा होने पर ही वो राजनीतिक हस्तक्षेप और अपनी सैन्य कार्यवाही चला सकते हैं। उन सैन्य अभियानों को जारी रख सकते हैं, जिनका अघोषित लक्ष्य अफ्रीकी महाद्वीप पर अपना एकाधिकार कायम करना है।

तीसरी दुनिया के आंतकी संगठन राजनीतिक अस्थिरता फैलाने और विद्रोह खड़ा करने वाले ऐसे अगि्रम दस्ता बन गये हैं, जो नाटो सेना और अमेरिकी सेना के लिये काम करते हैं। उनके आगे-आगे उनके लिये जमीन बनाते हुए चल रहे हैं। जिन्हें आर्थिक एवं हथियारों सहित कूटनीतिक संरक्षण हासिल है। सच तो यह है, कि अफ्रीका में अमेरिकी समर्थक देशों की सरकारें आतंकवादियों की भर्ती कर रही हैं। भूख, गरीबी और अभाव से पीडि़त लोगों को जबर्दस्ती आतंकवादी बनाया जा रहा है।

23 अप्रैल को टयूनीसिया की राजधानी टयूनिस में एक प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शनकारी वो लोग थे, जिनके लड़कों और जवान परिजनों को सीरिया में विद्रोहियों की मदद के लिये भेजा गया था। प्रदर्शनकारी मांग कर रहे थे कि ”सीरिया से उनके बच्चों को वापस लाया जाये।” उनकी मांग थी कि सरकार इस बारे में दमिश्क से बात करे और उनके बच्चों की सही-सलामत वापसी हो। एक प्रदर्शनकारी ने कहा- ”हम बहुत ही गरीब लोग हैं। हमारे पास इतना पैसा नहीं है कि हम तुर्की जा सकें। हम बस इतना चाहते हैं कि जिन्होंने हमारे बच्चों को वहां भेजा है, उन्हें वापस लाने की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है।”

मगर, यह जिम्मेदारी सरकार या साम्राज्यवादी ताकतें नहीं निभायेंगी, क्योंकि वो सीरिया में लीबिया को देखना चाहते हैं। वो सोचते और मानते हैं कि लीबिया उनकी बड़ी सफलता है। जहां उनके खिलाफ अब उन्हीं के हथियारों से, उन्हीं के पाले-पोसे हुए हथियारबद्ध गुट लड़ रहे हैं। वो मीलिसियायी लड़ रहे हैं, जिन्होंने कर्नल गददाफी के खिलाफ लड़ा था, और लीबिया ही नहीं अफ्रीका की संभावनाओं और संभावनाओं को सच में बदलने वाले कार्यक्रमों की हत्या कर दी थी। गददाफी का न होना, अफ्रीका को उसके आज के संघर्षों और आने वाले कल के अच्छे दिनों से अलग करना है। जिसे थोड़ी देर के लिये सफलता मिल गयी है।

28 अप्रैल को लगभग 200 हथियारबद्ध लोगों ने लीबिया के विदेश मंत्रालय के भवन को घेर लिया। लीबिया के सैन्य अधिकारी एसाम-अल-नाक के अनुसार- ”लगभग 40 ट्रकों में भर कर आये लोग मशीनगन और एन्टी-एयरक्राफ्ट गनों से लैस हैंं। उन्होंने मंत्रालय को घेर लिया है।” उनकी मांग है कि ”मुअम्मर गददाफी के समय में काम करने वाले लोगों को हटा कर, उनकी जगह उन लोगों का काम पर लगाया जाये, जिन्होंने गददाफी को सत्ता से बेदखल करने में मदद दी है।”

हथियारबद्ध गुटों ने मंत्रालय में काम करने वाले लोगों को बिलिडंग में घुसने नहीं दिया। अधिकारिक रूप से कहा गया है, कि ”हथियारबद्ध लोगों से बातचीत चल रही है।”

अमेरिका और पश्चिमी देश जिसे लीबिया की चुनी हुर्इ सरकार कहते हैं, उनके पास आम लीबियावासियों का समर्थन नहीं है। नकली चुनाव में गददाफी समर्थकों को भाग नहीं लेने दिया गया। उन्हें सत्ता से दूर रखने की लड़ार्इयां आज भी लड़ी जा रही हैं। लीबिया की मौजूदा सरकार उन लोगों की अवैध सरकार है, जिन्हें टीएनसी विद्रोही कहा जाता था, जो वास्तव में आतंकवादी हैं।

लीबिया की राजनीति अस्थिरता ने अफ्रीका की राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ा दिया है। गददाफी समर्थक देशों में भी अस्थिरता पैदा की जा रही है।

माली की समस्या के मूल में पश्चिमी देशों का होना और गददाफी का न होना ही है। जिन्होंने माली की सरकार और ट्राइबल विद्रोहियों के बीच सम्मानित समझौते कराये, बल्कि माली के विकास योजनाओं से उन कबीलों को जोड़ने और माली सरकार के जरिये, उनके विकास एवं पहचान को सुनिश्चित करने का काम भी किया। जिन्होंने लीबिया युद्ध के दौरान नाटो सेना से, गददाफी के पक्ष में, लड़ार्इयां लडी। माली कभी फ्रांस का उपनिवेश था। औपनिवेशिक ताकतों को जब भी अपने उपनिवेशों से हटना पड़ा उन्होंने ऐसी विभाजन रेखायें खींची, जिसका उददेश्य स्वतंत्र उपनिवेशों के बीच के संघर्ष को लगातार बढ़ाना था। 21वीं सदी में उन्होंने आतंकवादियों की भूमिका बढ़ा दी।

जो हथियार पश्चिमी देश और अमेरिकी सेना ने टीएनसी विद्रोही, आतंकी और स्थानीय कबीले के लोगों को कर्नल गददाफी के खिलाफ बांटा गया था, वहीं हथियार अब पूरे उत्तरी अफ्रीकी देशों में फैल गया है। गये साल माली में तख्ता पलट के बाद से जो राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो गयी है, उसी का लाभ टूवारेंग विद्रोहियों ने उठाया और माली के महत्वपूर्ण शहर कोन्नो पर कब्जा कर लिया। माली की सरकार ने राष्ट्रसंघ और फ्रांस से सहयोग की मांग की। राष्ट्रसंघ ने दिसम्बर 2012 में अफ्रीकी देशों की वरियता में 3000 अंतर्राष्ट्रीय सैन्य टुकडियों की तैनाती की मंजूरी दे दी, और 11 जनवरी 2013 को फ्रांस ने अपनी सेना को माली में उतार दिया।

टूवारेंग विद्रोहियों और उत्तरी क्षेत्र में सक्रिय इस्लामी संगठनों के बीच एक अस्थायी मोर्चा बनाया गया है। इस्लामी संगठन और टूवारेंग विद्रोहियों के बीच का सहमोर्चा टूट गया। उन्होंने विद्रोहियों को किनारे कर दिया। जिनकी वजह से इस्लामी संगठनों के हाथों में उत्तर क्षेत्र आया था। माली में गृहयुद्ध का व्यापक प्रभाव वहां के जनजीवन पर पड़ा है।

माली के राजनीतिक संकट के पीछे टूवारेंग लोगों का दशकों पुराना संघर्ष है। जो माली की 15.5 मिलियन की आबादी में 1.2 मिलियन लोग हैं। जिनके पास अपनी कोर्इ जमीन, अपना कोर्इ देश नहीं है। ऐतिहासिक रूप से इनकी जमीन नाइजर, उत्तरी माली और कर्इ छोटे टुकड़े लीबिया, नाइजीरिया, बुरकिना फासो और आज के अल्जीरिया में है। वे खुद को केल तामाशेक कहते हैं और तामाशेक भाषा बोलते हैं। ये 20वीं सदी से ही अपने पर उपनिवेशवादियों द्वारा थोपे गये सीमाओं के खिलाफ लड़़ रहे हैं। जिनका दमन औपनिवेशिक काल में हुआ और उपनिवेशों की स्वतंत्रता के बाद भी। 2009 में लीबिया ने माली सरकार और टूवारेंग विद्रोहियों के बीच शांति समझौता कराया किंतु गददाफी के न होने का खामियाजा टूवारेंगों की अब भरना पड़ रहा है। पूरे क्षेत्र के खनिज सम्पदा पर फ्रांस, पश्चिमी देश, और अमेरिकी का कब्जा है। जिन्हें राजनीतिक रूप से अस्थिर और आर्थिक रूप से कमजोर बनाये रखने का षडयंत्र सिर चढ़ कर बोल रहा है। इस क्षेत्र की खनिज सम्पदा ही साम्राज्यवादी हस्तक्षेप की मूल वजह है। फ्रांस के पीछे-पीछे माली में अब यूरोपीय संघ के देश, नाटो संगठन और अमेरिकी सेनायें पहुंच गयी हैं। जिनका हाथ आतंकी बंटा रहे हैं।

राष्ट्रसंघ के सुरक्षा परिषद ने माली के लिये 12,600 से ज्याद ”शांति सेना” भेजने के प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दे दिया है। जिसमें 11,200 सैन्य अधिकारी -सेना के होंगे, तथा 1440 अंतर्राष्ट्रीय पुलिस होगी। जो 1 जुलार्इ 2013 से माली में रहेगी। जिन्हें एम0आर्इ0एन0यू0एस0एम0ए0 से जाना जायेगा। फ्रांस समर्थित ये टुकडियां जरूरत पड़ने पर अफ्रीकी देशों के विद्रोहियों का सामना करेंगी। इस तरह राष्ट्रसंघ की शांति सेना साम्राज्यवादी ताकतों और माली सरकार के पक्ष में स्थितियां बनाने का काम करेंगी।

फ्रांस ने अप्रैल में अपने 4000 सैन्य टुकडि़यों के वापसी के कार्यकम को स्वीकृति दे दी है, और उनकी वापसी भी होने लगी है, किंतु उसने कहा है कि 1000 फ्रांसीसी सैन्य टुकडियां इसके बाद भी माली में बनी रहेंगी। 26 अप्रैल को फ्रांस के रक्षामंत्री ने स्पष्ट किया, कि 12,000 राष्ट्रसंघ शांति सेना के माली में पहुंचने के बाद भी फ्रांस वहां अपने 1000 सैन्य टुकडियों को तैनात रखेगा।” यह बात उन्होंने माली के गाओ शहर में पहुंचने पर कही। अपने इस यात्रा के दौरान माली के वर्तमान राष्ट्रपति डयाकानडो ट्रो और जनरल इब्राहिम दाहरो डेमबेल से मिलकर उनसे माली की सेना को ट्रेनिंग देने के मुददे पर चर्चा के दौरान कही। माली की सरकार फ्रांसीसी सरकार और नाटो तथा अमेरिकी समर्थन से ही अपने को बनाये रखने में नीति पर चल रही है। और अमेरिकी सरकार जिसके साथ है, राष्ट्रसंघ भी उसी के साथ है, जिसके लिये मानवाधिकार बड़ा मुददा है, मगर यह मुददा वहां ही खड़ा होता है, जहां अमेरिका या नाटो देश नहीं हैं। जहां ये होते हैं वहां वैसे भी मानवाधिकार महफूज रहता है, जैसे लीबिया के बाद अब माली में महफूज है।

‘डाक्टर विदाउट बार्डर’ ने कहा है कि ”मारिटानिया रेगिस्तान में शरणार्थियों के रूप में रहने वाले 74,000 माली के निवासियों को मानवीय सहयोग की सख्त जरूरत है।”

12 अप्रैल को उन्होंने कहा कि ”मबीरा कैम्पों में रहने वाले माली के शरणार्थियों की स्थिति बड़ी बुरी है। यहां मानवीय सहयोग अपर्याप्त है। बेघरबार हुए लोगों के पास जीने की कोर्इ भी परिस्थिति नहीं है। वो खाना और पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। यहां 50 डिग्री सेलिसयस तक तापमान पहुंच गया है।” संस्था की आपात अधिकारी मैरी क्रिस्टीना फेरिर ने कहा कि ”कैम्प के बच्चों में मृत्यु दर में भारी वृद्धि हुर्इ है।” उनके अनुसार शरणार्थी शिविर में 23 से 24 बच्चे रोज मरते हैं। वो भूख और कुपोषण के शिकार हैं और उनके पास इलाज एवं दवा की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।

भूख, गरीबी और अभाव से घिरे इस क्षेत्र पर अब सेना और हथियारों का बोझ बढ़ता जा रहा है।

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