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बहुराष्ट्रीय कम्पनियां और कारपोरेशनों के खिलाफ

latine americaलातिनी अमेरिकी देशों में काम कर रहे, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के बारे में, सही नीतियों का निर्धारण करने के लिये, 22 अप्रैल को इक्वाडोर में एक बैठक आयोजित की गयी। जिसमें महाद्वीप के कर्इ देशों के मंत्रियों ने भाग लिया। उनके सामने क्षेत्र में काम कर रहे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के शोषण को नियंत्रित करने के लिये, व्यावहारिक नीतियों को तय करने की जिम्मेदारी थी। मंत्री स्तर की इस पहली बैठक का उददेश्य ”समान कार्ययोजना” बनाना था जिस पर सभी देश मिल कर काम कर सकें।

इस बैठक की शुरूआत इक्वाडोर के विदेशमंत्री रिकार्डो पाटिनो ने कर्इ महत्वपूर्ण मुददों के साथ इस बात पर जोर किया कि ”हमारे सामने एक ऐसी क्षेत्रीय व्यवस्था के स्थापना की जरूरत है, जो बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के साथ होने वाले विवादें को हल कर सके और राष्ट्रीय हितों को सुरक्षित बना सके।” क्योंकि अब तक यही होता रहा है कि ऐसे विवादों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को लाभ मिलता रहा है।

इक्वाडोर के विदेशमंत्री पटिनो ने सुझाव रखा कि ”एक रीलिवेंट एजेन्सी की स्थापना होनी चाहिये, जो दक्षिणी अमेरिकी देशों को सुरक्षित कर सके, उनके हितों की रक्षा कर सके, और बाद में इस एजेन्सी का विस्तार मध्य अमेरिकी -कैरेबियन- देशों में भी किया जाये।”

इस बैठक में वेनेजुएला के विदेशमंत्री, निकारागुआ के वित्तमंत्री, बोलेविया के उपव्यापार मंत्री, क्यूबा के विदेशमंत्री और ”बोलिवेरियन एलायंस आफ द अमेरिका” के एकिजक्यूटिव सेक्रेटरी रोडोल्फो सांज ने हिस्सा लिया।

दुनिया में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां जहां भी हैं, उनका मूल मकसद कम से कम लागत में ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाना है। इस मुनाफे के लिये वह किसी भी स्तर तक जाने के लिये तैयार रहते हैं। प्राकृतिक संसाधनों के अबाध दोहन और मानव श्रमशक्ति के अनियंत्रित शोषण से उन्हें रत्तिभर भी परहेज नहीं है। वह उस अमानवीय व्यवस्था का प्रमुख हिस्सा है जिसके लिये प्रकृति सम्पदा का अकूत भण्डार है, और आदमी श्रमशक्ति का ऐसा स्त्रोत जिसे कम से कम कीमत में खरीदने और कम से कम सुविधाओं में काम कराया जा सकता है। उसके लिये बाजार ही सबकुछ है।

आज अमेरिका और यूरोपीय देशों से तीसरी दुनिया के देशों में हो रहे औधोगिक पलायन की मुख्य वजह यही है कि प्राकृतिक संपदा और मजदूर इन देशों में सस्ता है। विकास के नाम पर पूंजी के जरिये अनियंत्रित लाभ कमाया जा सकता है। उन्होंने वित्तयी पूंजी के जरिये इन देशों की सरकारों पर भी -ज्यादातर देशों में- अपनी पकड़ बढ़ा ली है। यही कारण है कि सरकारें इन कम्पनियों के लिये काम करने लगती है। एशिया और अफ्रीका के ज्यादातर देशों में यही हो रहा है। लातिनी अमेरिकी देशों में भी यही होता था। मगर समाजवादी देशों और गैर पूंजीवादी उत्पादन पद्धति की मौजूदगी ने इन अंतर्राष्ट्रीय कम्पनियों के सामने कर्इ मुश्किलें खड़ी कर दी है। जिनके लिये अपने देश एवं महाद्वीप के प्राकृतिक संसाधनों को सुरक्षित रखने, उस पर राज्य के अधिकार को सुनिश्चित करने के साथ ही, अपने हितों को सुरक्षित करने की जिम्मेदारी है। जबकि बहुराष्ट्रीय कम्पनियां इसके विपरीत काम करती रही हैं।

इक्वाडोर में अमेजोन क्षेत्र के जंगलों को खत्म किया जा चुका है। पेरू में एक पहाड को समतल किया गया है। ब्रजील का सेवादु घास के मैदान को सोया क्षेत्रों में बदला जा चुका है। वेनेजुएला का ओरनिको क्षेत्र का तेल भण्डार, जोकि अभी पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है, ऐसे उदाहरण हैं, जो यह प्रमाणित करते हैं कि लातिनी अमेरिकी देशों में बहुराष्ट्रीय कम्पनियां क्या कर रही हैं?

राज्य के द्वारा अपने प्राकृतिक संसाधन पर अधिकार जमाने की नीति -जोकि स्वाभाविक एवं वैधानिक है- मौजूदा वैश्विक बाजारवादी अर्थव्यवस्था और नवउदारवादी वैश्वीकरण की नीतियों के खिलाफ है। लातिनी अमेरिका के कर्इ देशों की वित्त व्यवस्था और आम जनता पर पड़ा है, वहीं दूसरी ओर निजी एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का हित इससे प्रभावित हुआ है। वैश्विक मंदी ने पूंजीवादी विश्व व्यवस्था को आम संकट में बदल दिया है, वहीं यह भी प्रमाणित कर दिया है कि लाभ पर आधारित व्यवस्था आर्थिक अनिश्चयता एवं असुरक्षा के अलावा और कुछ भी देने की स्थिति में नहीं। समाजवादी अर्थव्यवस्था फिर से प्रासंगिक नजर आने लगा है और लातिनी अमेरिका के समाजवादी देशों ने यह प्रमाणित भी कर दिया है, कि आम जनता का हित वहां ज्यादा सुरक्षित है। पूंजीवादी व्यवस्था की विसंगतियों से निजात पाने की एकमात्र दिशा समाजवादी है।

जिस समय यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था दिवालिया हो रही है, और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर उसके जीडीपी का 100 प्रतिशत से ज्यादा का कर्ज है, और उसके किसी भी दिन बिखरने की आशंकायें रोज बढ़ती जा रही हैं, ठीक उसी दौरान महाद्वीप के समाजवादी देशों ने अपने देश की आम जनता को वैश्विक मंद के प्रभावों से न सिर्फ बचाने का काम किया है, बल्कि अपनी वित्त एवं समाज व्यवस्था को बढ़ाने का काम भी किया है।

निजीकरण के विरूद्ध राष्ट्रीयकरण की नीतियों ने बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हितों को नियंत्रित करने की पहल भी की है, और नये विवादों को भी जन्म दिया है। अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का हित प्रभावित हुआ। यूरोपीय देशों के बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को भी इस महाद्वीप के कर्इ स्थानों से अपने तम्बू कनातों को समेटना पड़ा है।

अमेरिकी, मल्टीनेशनल एनर्जी कारपोरशेन -शेवरन- पर इक्वाडोर के अमेजोन क्षेत्र में पर्यावरण के लिये 19 बिलियन डालर का कानूनी दावा पेश कर रही है। वेनेजुएला और इक्वाडोर जैसे देशों में चीन की कम्पनियों ने भी अपने पांव पसार लिये हैं। 2008 के वित्तीय संकट के दौर में चीन इस क्षेत्र में प्रमुख ऋण देने वाला देश बन गया है। आज वह लातिनी अमेरिकी महाद्वीप में सबसे बड़ा पूंजी निवेशक देश है। 2010 में चीन के द्वारा इस महाद्वीप में 37 बिलियन डालर का पूंजी निवेश किया गया।

अब चीन के वित्तीय विस्तार ने नयी स्थितियों की रचना कर दी है। यह सवाल खड़ा हो गया है, कि चीन और लातिनी अमेरिका का असंतुलित व्यापार लातिनी अमेरिकी देशों के हित में नहीं है।

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और कारपोरेशनों के प्रति इक्वाडोर में उभरे ”कामन एक्सन प्लान” की सोच, अपनी वित्त व्यवस्था और प्राकृतिक संसाधन पर राज्य के अधिकार की दावेदारी से महाद्वीप में नयी स्थितियों का बनना तय है। लातिनी अमेरिकी देशों की सामूहिकता, हर छोटे बड़े मुददों से बढ़ रही है।

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