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हारे हुए लोगों के साथ

सपनों में हम
हारे हुए लोगों के साथ होते हैं।
इसलिये
जागने के बाद
सपने टूटते नहीं, सवाल करते हैं,
जानना चाहते हैं, उन लोगों के बारे में
जो सपनों में आते हैं।
जिनके बदन पर
होते हैं जख्मों के गहरे निशान,
जो सदियों से बस्ती में
अलाव की तरह जल रहे हैं।

जो
न थके
कदमों के निशान की तरह
हमें देखते हैं,
कहते हैं हमसे
कि आजाद होने की सोच
गुलामों की जिंदगी है।
पूछते हैं हमसे
कि मुल्क और कौम को
गुलाम क्यों बनाया जाता है?
क्यों आजादी को बांध कर
दीमकों की बाबी में डाल दिया जाता है?

मैं
खुद से सवाल करता हूं
कि कौन हैं वे लोग
जो परछार्इयों की तरह सपने में आते हैं
और सपनों को सच करार देते हैं।
जिन्हें गोलियां सिर्फ इसलिये मारी गयीं
कि उनकी चमड़ी काली है।
काले लोगों के बारे में मेरी सोच
उन लोगों की तरह है
जो बड़ी मजबूती से लड़ते हैं
मगर, हार जाते हैं।

अब,
मैं सपने में भी
हारना नहीं चाहता,
इसलिये हारे हुए लोगों को
अपनों की तरह जीना चाहता हूं।
चाहता हूं
उन्हें भी जान लेना
जो गलत होने के बाद भी जीत जाते हैं।
मैं अपनी जमीन
अपनी जड़ों को जीना चाहता हूं
जो हारने के बाद भी
जीने की लड़ार्इ लड़ रहे हैं।

कल रात
मैंने सपने में देखा
कि सूरज की किरणें
खेतों में हल जोत रही हैं,
बह रहे नदी के पानी का रंग लाल है,
जिनमें,
जहाज के मस्तूलों की तरह
बुर्ज और कंगूरे बह रहे हैं,
सूरज घास के मैदान में टहल रहा है ऐसे
जैसे, सदियों की सुरंग से निकला काला आदमी
नीले आसमान के नीचे हाथ बांधे टहलता है।
देखता है गुजरी हुर्इ सदी को सपनों की तरह।

सपने में मुझे
अस्वाभाविक कुछ नहीं लगा
न किरणों का हल जोतना,
न सूरज का जमीन पर टहलना,
ना ही नदी के पानी का लाल होना।
सपनों में
आने वाले कल की लड़ार्इयों को लड़ना
मुझे स्वाभाविक लगा।
जो जागने के बाद टूटते नहीं
हकीकत में जीतने के लिये
सवाल करते हैं।

-आलोकवर्धन

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